Wednesday, February 11, 2026
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विज्ञान व्रत की पाँच ग़ज़लें

1
क्या बनाऊँ आशियाँ
कम पड़ेगा ये जहाँ
बिजलियाँ ही बिजलियाँ
और मेरा घर यहाँ
एक थे हम दो यहाँ
कौन आया दरमियाँ
ढूँढ़ते हो क्यों निशाँ
वो ज़माने अब कहाँ
था जहाँ से वो बयाँ
अब नहीं हूँ मैं वहाँ
2
आप कब किसके नहीं हैं
हम पता रखते नहीं हैं
जो पता तुम जानते हो
हम वहाँ रहते नहीं हैं
जानते हैं आपको हम
हाँ मगर कहते नहीं हैं
जो तसव्वुर था हमारा
आप तो वैसे नहीं हैं
बात करते हैं हमारी
जो हमें समझे नहीं हैं
3
वो पराया भी रहे तो
और मेरा भी लगे तो
गर सुबह सूरज ढले तो
वक़्त का पहिया थमे तो
ढूँढ़कर ख़ुद वो थके तो
ख़ुद मगर ख़ुद में मिले तो
सूर्य कर दे बर्फ़बारी
चाँद सूरज – सा तपे तो
क़र्ज़ जो उस पर नहीं था
वो चुकाने में चुके तो
4
आँखों में मैख़ाने थे
वो कुछ और ज़माने थे
‘ईलू’ जैसे शब्द कई
मैंने तुमसे जाने थे
उनके दिल में मेरे भी
कुछ महफ़ूज़ ठिकाने थे
उनसे जब पहचान हुई
मुझको सब पहचाने थे
नाप न पाए मुझको वो
शर्मिन्दा पैमाने थे
5
इस अदा से वो मिला
सोचना मुझको पड़ा
खो चुका जिसका पता
फिर उसे क्या ढूँढ़ना ‌
आंधियाँ पुरज़ोर थीं
सब उजड़ कर रह गया
वो कहीं टिकता नहीं
क्या बताऊॅं फिर पता
जो रहा है सोच में
काश मुझको सोचता
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2 टिप्पणी

  1. विज्ञान व्रत जी!

    आपकी पाँचों गज़ल अच्छी लगीं लेकिन तीसरी गजल ज्यादा अच्छी लगी।
    बधाई आपको

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