विज्ञान व्रत की पाँच ग़ज़लें
क्या बनाऊँ आशियाँ
बिजलियाँ ही बिजलियाँ
एक थे हम दो यहाँ
ढूँढ़ते हो क्यों निशाँ
था जहाँ से वो बयाँ
आप कब किसके नहीं हैं
जो पता तुम जानते हो
जानते हैं आपको हम
जो तसव्वुर था हमारा
बात करते हैं हमारी
वो पराया भी रहे तो
गर सुबह सूरज ढले तो
ढूँढ़कर ख़ुद वो थके तो
सूर्य कर दे बर्फ़बारी
क़र्ज़ जो उस पर नहीं था
आँखों में मैख़ाने थे
‘ईलू’ जैसे शब्द कई
उनके दिल में मेरे भी
उनसे जब पहचान हुई
नाप न पाए मुझको वो
इस अदा से वो मिला
खो चुका जिसका पता
आंधियाँ पुरज़ोर थीं
वो कहीं टिकता नहीं
जो रहा है सोच में
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विज्ञान व्रत जी नमस्कार
आपकी सभी गज़लें लाज़वाब
वाह, वाह
Dr Prabha mishra
विज्ञान व्रत जी!
आपकी पाँचों गज़ल अच्छी लगीं लेकिन तीसरी गजल ज्यादा अच्छी लगी।
बधाई आपको