प्रख्यात फिल्म अभिनेता राजेन्द्र गुप्ता से मधु अरोड़ा की बातचीत
उत्तर: कोई भी जानबूझकर संघर्ष का रास्ता नहीं चुनता। आप करते बहुत सारे काम हैं, पर अपनाते वही हैं जिसमें आपको मज़ा आता है। मैंने भी बहुत ग़लतियां कीं, बहुत भटका, बहुत तथाकथित संघर्ष किया, पर घूम-फिरकर जब नाटक में आया तो मुझे असली मज़ा आया इसमें। दूर से कई चीजें आसान लगती हैं, वह तो उस क्षेत्र में आने पर पता चलता है कि कितने मुश्किलात हैं इधर। आपको तो पता है कि इन्सानी नेचर ऐसा नहीं होता कि वह सुविधाओं को छोड़ दे। मैं मानता हूं कि संघर्ष जैसा कोई शब्द है ही नहीं। जब हम किसी काम को अपनी मर्जी़ से चुनते हैं तो संघर्ष किस बात का? लेकिन इन्सान ज़बर्दस्ती ग्लोरिफाई करता है अपने संघर्ष को। अन्तत: तो यह आपका अपना मज़ा ही है। माना, फिल्मों में पैसा है, शोहरत है लेकिन आपका ताल्लुक़ आन्तरिक सुख से है। आन्तरिक सुख तो एक मृगतृष्णा है, उसकी तलाश में हम नये-नये काम करते हैं और अपनी प्रतिभा को तराशते हैं। बेहतर से बेहतर काम करने की कोशिश करते हैं। हरेक का अपना तरीका है ख़ुद को अभिव्यक्त करने का। अपने सुख के लिये काम की तलाश को आप संघर्ष कह लीजिये या कुछ और। अंतत: तो यह आपका और सिर्फ़ आपका अपना मज़ा है।
उत्तर: मैंने इस पर ग़ौर से स्टडी नहीं की है। संघर्ष बड़ा व्यक्तिगत सा होता है। संघर्ष करना इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति का नेचर, ज़रूरतें और व्ख़ाब क्या हैं? संघर्ष यह भी है कि एक नौकरी मिल जाये और रोज़ी-रोटी का जुगाड़ हो जाये। संघर्ष यह भी है कि फिल्मों में, सीरियलों में रोल चाहिये। इसके लिये आप फोटो खिंचायेंगे, फोटो सेशन करायेंगे। दरअसल किसी भी कार्य में हमारा पारिवारिक माहौल बहुत काम करता है। हमारे रहन-सहन, बोल-चाल, खान-पान के ढंग से पारिवारिक पृष्ठभूमि सामने आती है। इंसान की हर चीज़ बहुत व्यक्तिगत होती है। यह अलग बात है कि हर चीज़ को जनरलाइज करने के लिये हम कुछ भी बोल जाते हैं। अब रही बात पहले की पीढ़ी और और आज की पीढ़ी के संघर्षों में फर्क़। तो मधुजी, मेरी पीढ़ी के लोग काफी साल पहले ही मुंबई आ गये थे और मैं एनएसडी से उत्तीर्ण होकर काफी साल बाद मुंबई आया था। मुझे सोचना पड़ता था कि मुझे मुंबई जाना है। एक तरफ मुंबई जैसा शहर आपको जितना आकर्षित करता है, उतना ही डराता भी है। सो पत्नी से विचार-विमर्श करके ही मुंबई आया। पत्नी के समर्थन के बिना तो बिल्कुल भी नहीं आता। हां, यह बात ज़रूर थी कि मुझे खाने-पीने के इंतजाम की चिन्ता नहीं थी। उस सबकी व्यवस्था आराम से हो जाती थी। मग़र, आज एन एस डी का बच्चा बहुत जल्दी मुंबई आ जाता है। इसका मतलब है कि टी वी के कारण इतनी ओपनिंग हो गई है कि संघर्ष कम हो गया है। आपके सीनियर साथी आपके संघर्ष को कम करते हैं। वे आपके लिये सीनियर एंकर होते हैं। वे आपका मार्गदर्शन करते हैं। हमारे समय में ऐसा नहीं था। एन एस डी से पास करके छात्रों को अकेले आना होता था और अकेले संघर्ष करना होता था। कोई मार्गदर्शन करनेवाला नहीं होता था। उस समय संघर्ष तो थे पर रास्तों का पता नहीं होता था कि किस राह पर चलकर मंजि़ल पाना है।
उत्तर: दरअसल, सहज महसूस करना कोई मायने नहीं रखता। आपको पता है कि नाटकों, फिल्मों और सीरियलों के अलग- अलग अनुभव, अलग-अलग कारण और अलग- अलग सुख हैं। हम सिनेमा इसलिये करते हैं ताकि हमारा काम ज्य़ादा लोगों तक पहुंचे और नाम भी पहुंचे और उसीके जरिये फाइनेंशियल इमेज पहुंचती है। हमारी व्यावसायिक इमेज बन जाती है। यह इसका एक पहलू है। हम सीरियल तब करते हैं जब सिनेमा में उस शीर्ष तक नहीं पहुंच पाते। अभिनय हम सीरियल में भी करते हैं। इससे अभिनय भी हो जाता है और एक तयशुदा रक़म भी मिल जाती है और सबसे बड़ी बात कि हम ख़ुद को बेकार महसूस न करें, विशेष रूप से सामाजिक रूप से। हां, सीरियलों के माध्यम से करोड़ों लोगों तक पहुंचते हैं। मैं मानता हूं कि मुझे सीरियलों अच्छे रोल मिले हैं, सिनेमा में नहीं। एक बात यह भी है कि सिनेमा व सीरियलों में वहां की कंडीशन, कंपल्शन्स में काम करना होता है। जबकि थियेटर में हमें स्वयं को मांजने का, रियाज़ करने का मौका मिलता है। अपने काम के नये रूप ढूंढ़ने का, आत्म संतुष्टि का, चुनौतियों का सामना करने का मौका नाटक में मिलता है। हम तीस से साठ दिन लगातार अपने को-स्टार्स के साथ काम करते हैं, उस चरित्र को जीने की अभिव्यक्ति में उतारने का अंदाज़ थियेटर देता है। हम नाटक को मिल-जुलकर करते हैं और कार्य को जीवन में उतारने के लिये मेहनत करते हैं। Constant प्यास के तौर पर फिल्म करते हैं। मेरा मुंबई आने का अभिप्राय फिल्में भी था। नाटक तो दिल्ली में भी कर रहे थे। एक अच्छे नाटक की की संतुष्टि आंतरिक है जो सिनेमा, सीरियल में कभी ही मिलती है। इच्छा है उन क्षणों को जीने की जो मुझे, आपको और लोगों को मज़ा दे।
उत्तर: ऐसा कुछ भी नहीं है। फिल्मों में वह भाषा है जो लेखक, डाइरेक्टर ने दी है। एक्टर उनकी संतुष्टि के लिये कार्य करता है और उसे करना पड़ेगा, चाहे वह ग़लत ही क्यों न हो। आपके और मेरे लिये जो कुभाषा है, वही उनके लिये भाषा है। आप ही बताईये, हमारे पास अपने जो संस्कार हैं, नाटक के जो अनुभव हैं, जो भाषा है ये सब कहां जायेंगे? उसे हम कैसे भुला पायेंगे? ऐसा तो मुझे कभी कोई कारण नहीं मिला कि इस भाषा को छोड़कर उस भाषा को पकड़ूं।
मुझे याद आता है कि 27 जून, 1998 को कालिदास जयन्ती थी। उस दिन आषाढ़ का एक दिन नाटक और मेघदूत आदि पढ़े गये। हमने ही अपने- अपने पांच-पांच लोगों को आमंत्रित कर लिया और आगे चलकर इसे अच्छा सहयोग और ज़बर्दस्त समर्थन मिला। फिर धीरे-धीरे काम बांटते चले गये और अब महीने में एक बार चौपाल जमती है। मेरा इसमें सहयोग कम है। इसकी जि़म्मेदारी संभालनेवाली त्रिमूर्ति है- शेखरसेन, अतुल तिवारी और अशोक बिन्दल। ये लोग आउट आफ वे जाकर काम करते हैं। ये लोग चौपाल के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं और उन्होने इसे महत्वपूर्ण माना है। जो इस चौपाल में आते हैं, उनका जिस तरह से साथ मिलता है, वह अभूतपूर्व है। हम एक-दूसरे को चौपाली कहते हैं। चौपाल को शुरू हुए चौदह वर्ष हो गये।
उत्तर: यह अनुभव अपने आप में अद्भुत था। हम लोग वहां पांच दिन थे। बहुत ही मज़ा आया। हमारे दिलों में सामाजिक, राजनैतिक ख़बरों की वजह से जो टोटल पर्सपैक्शन बस गया है, जिसमें दुश्मनी दिखती है, उससे एकदम सौ प्रतिशत उलट अनुभव मिलते हैं, वहां जाकर व्यक्तिगत तौर पर। मेरे जैसा व्यक्ति सोचता है कि दोनों देशों के व्दारा फैलाया गया यह षणयंत्र का जाल है ताकि उनकी गद्दियां बची रहें। उन्होने हमें जो सम्मान दिया, उससे भ्रान्तियां टूटती हैं। उनकी भी हमारी जैसी संस्कृति, सरोकार और भावुकता है। हमारे यहां किसी कवि को लेकर ऐसा कुछ भी नहीं होता जबकि हमारे यहां उनके बनिस्बत ज्य़ादा खुलापन है। वहां फैज़ का म्यूजियम है, लायब्रेरी है जो जनता के लिये खुली है। अपने यहां ऐसे बहुत से घराने, परिवार हैं जो बहुत कुछ कर सकते हैं, पर किसी ने हमारे लेखकों के लिये कभी ऐसा कुछ नहीं किया है। हमें साहित्य के जरिये उन लोगों में घुसपैठ करनी चाहिये और अपने यहां भी ऐसे काम होने चाहिये। हम बारह लोग वहां गये तो यदि हम उनका सद्व्यवहार बारह सौ लोगों तक भी पहुंचा सकें तो हमारे बीच के पूर्वाग्रह कम हो सकेंगे और एक दूसरे को स्वीकार करने की क्षमता विकसित कर सकेंगे1 यदि हम यह आना- जाना शुरू कर दें तो इसके दूरगामी परिणाम बहुत अच्छे हो सकते हैं, लेकिन…………………………।
उत्तर: वीना ने हमेशा मेरा साथ दिया है1 उन्होने दिल से, पूरी तरह से साथ दिया है। सचमुच Big support. उन्होने बख़ूबी घर की जि़म्मेदारी, बच्चों की जि़म्मेदारी संभाली। मुझे लगता है कि यह प्लस पांइट हो जाता है आपके काम में। हम तो एक दूसरी दुनिया से आये लोग हैं जिन्हें ‘परिवार’ पता नहीं होता। धीरे-धीरे स्वीकारोक्ति होती है और इसमें वीना काफी पाजिटिव रही।
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