श्यामा नाम था उसका। लेकिन, आप उसके नाम पर कतई न जाएँ, अन्यथा संशय उत्पन्न होने का खतरा रहता है। वह श्याम वर्ण तो बिल्कुल नहीं थी। रूप और सौंदर्य की प्रतिमूर्ति थी वह। इस वर्ष वह अठारहवें वसंत की ड्योढ़ी पार करने को थी। यौवन रूपी वसंत उसके अंग-प्रत्यंग पर अट्टहास मार रहा था।
अहेरी जरसंद ने अपने कबीले में एक बार गुण कथन में रूप गर्विता श्यामा के संबंध में बहुत कुछ सुना था। और फिर एक दिन स्वप्न दर्शन से वह अधीर हो उठा। शीत के प्रचंड प्रवाह में उसका हृदय छटपटाने लगा। मुख विवर ध्वनित हो उठा – “श्यामा!”
रूपनगर दुर्ग के इर्द-गिर्द फैली शैल मालाओं के ढलनों में विस्तार पाती सरिता के तट पर अहेरियों का गाँव था – अहेरी टिब्बा। यहीं रहता था कुमार जरसंद। इक्कीस वर्षीय जरसंद धनुर्विद्या में दक्ष होने के साथ, पुष्टभुजा और रोबदार चेहरे वाला था। अपने अहेर पर सबसे सटीक निशाना उसी का था गाँव में। उसके पास किसी राज्य का साम्राज्य नहीं था, लेकिन उसके धनुष-बाण नावक के तीर की तरह थे जिनके बल पर वह अभेद्य लक्ष्य को भी साधने में माहिर था। उसने श्यामा को कभी देखा नहीं, लेकिन वह उसे पाना चाहता था। प्रणय की आस उसके भीतर प्रबल होने लगी।
श्यामा रूपनगर दुर्ग के दुर्गपति महाराज सदानंद कृष्ण की इकलौती कन्या थी। यह दुर्ग कभी इस प्रखंड के प्रतापी राजा मिहिर वर्मा के आधिपत्य में था। उनकी दानप्रियता जनमानस में व्याप्त थी। सदानंद कृष्ण इनके यहाँ दुर्ग की अधित्यका में उद्यानों की देखभाल करते थे। राजा के कोई संतान नहीं थी। व्याधि के समय सदानंद कृष्ण ने उनकी खूब सेवा की। मृत्यु पूर्व राजा ने यह दुर्ग सेना और साजो-सामान के साथ उपहार स्वरूप सदानंद कृष्ण को दे दिया।
स्वप्न दर्शन और गुण कथन कितना सही-गलत हो सकता है, इसका फैसला जरसंद स्वयं करना चाहता था। एक दिन अवसर पाकर वह दुर्ग के नीचे शांत स्थिर भाव में लीन पड़ी सरिता के तट पर पहुँचा। प्रातःकाल का समय था। शीत का भारी प्रभाव, लेकिन कोहरे का अभाव था। उसने अनिमेष दुर्ग के वातायन की ओर देखा, लेकिन श्यामा नजर नहीं आई। दिन चढ़ आया था। सूर्य धीरे-धीरे दुर्ग को घेरने लगा था। अरुण किरणें दुर्ग से निकलकर सरिता पर तैरने लगी थीं।
युवक ने देखा, दुर्ग से कुछ घुड़सवार नीचे की ओर आ रहे थे। वह पीछे हट गया। उसकी इच्छा और घनीभूत हो उठी। अनमने भाव से वह घर लौट आया। वीचियों की मानिंद देर तक एक कसक उसके भीतर उठती रही।
कुछ दिन बीते। वसंत के आगमन से मेदिनी खिल उठी थी। भ्रमर राग जरसंद को और उद्वेलित कर रहा था। मधुमास में उसकी पीड़ा असहनीय हो चली थी। निशीथ काटे नहीं कटती। वह युद्ध में हारे योद्धा की तरह विकल था।
एक दिन दुर्गपति महाराज सदानंद कृष्ण ने घोषणा करवाई कि वह अपनी पुत्री श्यामा का विवाह प्रखंड के किसी श्रेष्ठ धनुर्धर से करवाएंगे। इस खबर से जरसंद के चेतना शून्य शरीर में जैसे पुनः प्राण आ गए। उसने अपनी दोनों भुजाओं की ओर देखा। स्वाभाविक गर्व उसके चेहरे पर उमड़ने लगा। उस दिन से वह नियमित अभ्यास के लिए कानन में जाने लगा।
मधुमास की पंचमी थी। सदानंद कृष्ण ने अपने मातहत सैनिकों से कहा – “श्यामा अब मृगया के योग्य हो गई है। विवाह पूर्व मैं इसे यह सब सिखा देना चाहता हूँ। मेरी पुत्री किसी श्रेष्ठ धनुर्धर के सामने कम साबित न हो। तुम लोग इसे आज से ही सरिता के पूर्व में स्थित कानन में अभ्यास हेतु ले जाओ।”
सैनिकों ने आदेश के अनुसार रथ तैयार किया। श्यामा को लेकर चार सैनिक उपत्यका से होते हुए, नदी के पुल को पार करके वनप्रांत में पहुँचे । जरसंद वहीं मौजूद था। वह मधूकवृक्ष के नीचे खड़ा अहेर की प्रतीक्षा कर रहा था। उसकी नजर युवती पर पड़ी। युवती ने कौशेय वसन धारण कर रखे थे। चेहरे पर अवगुंठन था और कंधे पर धनुष-बाण। जरसंद उसे पहचान न सका।
सभी शिकार की प्रतीक्षा में थे। सहसा बादलों की मानिंद गर्जना करता हुआ एक नरभक्षी बाघ रथ के सामने आ खड़ा हुआ। यह सब श्यामा की उम्मीदों के विपरीत था। श्यामा ने ऐसा आदमखोर बाघ पहली बार देखा। वह घबरा उठी। अश्व पीछे हटने लगे। सैनिकों से कुछ बनते नहीं बन रहा था। वे भी भयाक्रांत हो उठे।
एक सैनिक ने श्यामा से कहा – “आप धनुष पर बाण का संधान करें। देर न करें, अन्यथा हम सब काल के ग्रास बन जाएँगे।”
यह ज्वालाशाल का नरभक्षी बाघ था। अपने क्षेत्र से भटक कर इस कानन में आ गया था। जरसंद ने उसे पहचान लिया। वह सचेत हुआ। श्यामा के कांपते हाथों से प्रत्यंचा पर बाण चढ़ नहीं रहा था। बाघ ने अवसर पाया। तेज कदमों से दौड़ते हुए उसने हवा में श्यामा की ओर छलांग भरी। इधर लाघव से रथ में आ चढ़े जरसंद ने अपने एक ही बाण से बाघ को हवा में ही ढेर कर दिया। काँपती श्यामा जरसंद की बाहों में समा गई। जरसंद का एक हाथ युवती की कटि में था।
युवती का कर स्पर्श जरसंद के हृदय को पुलकित करने लगा। शीतल हवा का झोंका देर तक उसके अंतस में ठहरा रहा। पूरे वनप्रांत में ऋतुराज वसंत का डेरा था। कई कोयलें एक साथ कुहुक रही थीं।
सैनिकों ने जरसंद को युवती से अलग किया। युवती के चेहरे से अवगुंठन हटा। वसंत वहीं खिल रहा था। वाह! अद्भुत रूप-सौन्दर्य की अधिकारिणी। जरसंद के भीतर संशय की धारा बहने लगी।
उसने पूछा – “कौन हैं आप सुकुमारी ?”
“रूपनगर दुर्ग के दुर्गपति महाराज सदानंद कृष्ण की इकलौती पुत्री से यह पूछने का साहस करने वाले तुम कौन हो ?” एक सैनिक ने पूछा।
“दबे होंठ उसने मन ही मन उसका नाम पुकारा- श्यामा ! फिर जवाब दिया- “अहेरी।”
“अहेरी ! लेकिन तुम्हारा नाम क्या है ?” दूसरे सैनिक ने पूछा।
“कुमार जरसंद ।” उसने जवाब दिया ।
“बड़े वीर और साहसी धनुर्धर लगते हो ! हमारे प्राण बचाए, इसलिए हम आपके ऋणी हैं। मांगो, क्या पुरस्कार चाहिए ?” बड़ी सहजता से श्यामा ने कहा।
“यदि आप उपहार देना ही चाहती हैं, तो मैं चाहता हूँ कि महाराज ने आपके विवाह के लिए जो घोषणा की है, उसमें वे मुझे भी आमंत्रित करें।”
जरसंद को आस्वस्त कर, श्यामा और सैनिक चले गए। दो साल वह कल्पना लोक में विचरता रहा । एक दिन उसने सूना – श्यामा का विवाह किसी राजपुत्र के साथ संपन्न हुआ। उस दिन उसे भी उपहार भिजवाया गया। लेकिन उस समारोह में उसे निमंत्रण न था।
ग्रीष्म के दिन थे। किसी शैल पर आतप के तेज प्रभाव के कारण दूर्वा जल उठी। धीरे -धीरे उस शैल ने शोण रूप धारण कर लिया। मेघ बरसने का वक्त भी न था। शैलखंड से निकलकर कई जानवर सरिता के तट की ओर भाग रहे थे।
जरसंद अपने आहत हृदय को समझा न सका। अन्याय की पराकाष्ठा ! “क्या ऊँचे महलों से दिया जाने वाला यही पुरस्कार है?”
स्निग्ध दृष्टि और कर स्पर्श से मिला कोमल अहसास, साथ में कौशेय वसनों की भीनी सुगंध वह भूल नहीं पाया। वह चित्कार उठा। उसके बेचैन स्वर में एक ही ध्वनि थी- श्यामा!
उस दिन उसने दुर्गपति की ओर से भेजा गया उपहार वापस लौटा दिया।
डॉ. एस. डी. वैष्णव
सम्पर्क:- डॉ. एस. डी. वैष्णव, 243, दुर्गा भवन, यूनिवर्सिटी रोड, गणेश नगर, पायड़ा, उदयपुर -313081 (राज.)
मो- 9799828291

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