विजय कुमार तिवारी नियमित रूप से पुरवाई के लिये समीक्षाएं लिख रहे हैं। मूलरूप से विजय जी कहानीकार रहे हैं और एक लंबे अरसे से सृजनात्मक लेखन पर विराम लगाए हुए थे। एक बार फिर उनके भीतर का कहानीकार सक्रिय हो रहा है और वे कथा लेखन के क्षेत्र में वापसी कर रहे हैं। प्रस्तुत है पुरवाई के पाठकों के लिये उनकी संवेदनात्मक कहानी ‘कोई दस्तक हुई?’
कोई दस्तक हुई
“जीवन आलोकमय हो,  मधुरता हो,  प्रेम की फुहार हो और हमारा सब कुछ दूसरों के लिए समर्पित हो,  हे ईश्वर! कुछ ऐसी ही कृपा करना,” विशम्भर बाबू इन्हीं भावनाओं के साथ जीवन जीते हैं। जब से थोड़ी समझ हुई, संसार के रहस्य को जाना, त्याग पूर्वक जीना शुरु कर दिया। ईश्वर भी समान वृत्ति,  सोच-विचार वालों को मिला देता है। वे अक्सर कहते हैं, “अपना विचार शुद्ध रखो,  दुनिया बहुत खूबसूरत है और ईश्वर सब सुलभ करवाता रहता है।
इस संसार में सबको प्रेम चाहिए, सभी प्रेम के लिए तड़पते रहते हैं परन्तु कोई प्रेम देना नहीं चाहता।” उन्होंने अनुभव किया है, “प्रेम चाहिए तो दुनिया से, लोगों से,  जीव-जन्तुओं से प्रेम करना शुरु कर दो, तुम्हारा किया हुआ प्रेम हजार गुना होकर तुम्हारे पास लौट आता है और आप निहाल हो जाते हो।” उनके विश्वास पर ईश्वर मुहर लगा देता है। रमा वैसी ही है जैसा विशम्भर बाबू सोचते हैं, बातचीत में, हँसने, खुश होने में, रुप-रंग सौन्दर्य में, व्यवहार में और सबसे महत्वपूर्ण प्रेम करने में। रमा प्रेम करती है। वह सबको प्रेम करती है। उसके प्रेम के दायरे में अपने स्वजन-परिजन तो हैं ही, आसपास के परिवार,  दूर-दराज के रिश्तेदार सभी हैं। उसका प्रेम का अपना चिन्तन है और बड़ी साफ-सुथरी सोच है, इसलिए खूब हँसती है, खुश होती है। उसका आदर-प्रेम पाने वालों में विशम्भर महाशय सरीखे लोग भी हैं जिनके प्रति श्रद्धा भाव रखती है। विशम्भर बाबू खुश होते हैं और अपना स्नेह बरसाते रहते हैं।
विशम्भर और रमा दोनों का मानना है कि यह दुनिया स्वार्थों के चलते जुड़ी हुई है और एक-दूसरे का शोषण करती है। दोनों चाहते हैं कि लोग स्वार्थ से ऊपर उठें, सबके साथ सद्भावना रखें, एक-दूसरे का हर तरह से सहयोग करें और खूब प्रेम करें। उन्होंने मनुष्य के पूरे जीवन को बहुत करीब से देखा है।
अधिकांश लोगों के साथ ऐसा ही होता है। बच्चा जन्म लेता है, प्यार से पाला-पोसा जाता है। थोड़ा बड़ा होता है, पढ़ता-लिखता है, खेलता-कूदता है, थोड़ी शरारतें करता है। थोड़ा और बड़ा होता है, जवानी चढ़ती है, आँखें अपना काम शुरु करती हैं, दुनिया को नये सिरे से देखता है, उसे तलाश शुरु होती है और उसका मन किसी को खोजता है। यह खोजना साधारण नहीं होता, उसका पूरा अस्तित्व दाँव पर लगा होता है, जीवन-मरण का प्रश्न होता है। वह बेचैन होता है क्योंकि भीतर पल रही सौन्दर्यानुभूति बाहर की दुनिया में दिखती नहीं। मात्रा, व्यवहार, भाव, प्रकटीकरण और उपलब्धता कुछ भी वैसा नहीं मिलता जैसी चाह होती है। अतृप्ति उसे व्यथित करती है, जो देना चाहता है, दे नहीं पाता, जो पाना चाहता है, नहीं मिलता। गुहार लगाता है, प्रश्न पूछता है, उत्तर चाहता है, कुछ भी मनोनुकूल नहीं होता।
उसकी बेचैनी विक्षिप्तता का रुप लेने लगती है, पागल दुनिया उसकी बेचैनी नहीं समझती, समझती भी है तो साथ नहीं देती क्योंकि वह पुरुष है, घर का मुखिया है,  पिता है,  किसी का पति है और सबके लिए चिन्ता करना उसकी जिम्मेदारी है। सब उसकी ओर देखते हैं, अपनी-अपनी मांगें रखते हैं, अपना हक व अधिकार चाहते हैं। वह किससे मांगे, किसको पुकारे? मौन हो जाता है। यह दुनिया उसे भी नहीं समझती, साथ नहीं देती क्योंकि वह स्त्री है, पत्नी है, मां है और घर के साथ-साथ सबके प्रति उसकी जिम्मेदारी है। उसकी भी वही दशा है, उसके प्रति किसी की जिम्मेदारी नहीं है, कोई उसके लिए चिन्ता नहीं करता। वह किससे मांगे? किसे अपने मन का सुनाये? किसे बताए अपने भाव, विचार और उलझनें? वह भी मौन हो जाती है।
मौन होना सहज है क्या? भीतर-भीतर चीत्कार उठती है, वह रो भी नहीं सकता। रोता है तो दुनिया कायर समझती है, उसपर हँसती है, उसकी व्यथा पर हास्य होता है। उसका दुख कोई सुनना नहीं चाहता, उसके अपने भी नहीं सुनते जिनके लिए उसने अपना जीवन खपा दिया है। दुख सुनना तो दूर, सबको उससे शिकायतें हैं, उसने हर किसी को कम दिया है बल्कि हर किसी को दुखी किया है। नाना शिकायतें हैं उससे,  कभी दबी जबान, कभी खुलकर विरोध है उससे। सबको याद है, कब-कब उसने जरुरत भर पैसे नहीं दिए, कब-कब डांट पिलाई, कब-कब अनसुना किया और हमेशा अपने मन का किया। वह अपनों की आँखों को पढ़ता है, कहीं भी सहयोग, सद्भाव नहीं दिखता। सबसे दुःसह स्थिति है, अब उसका होना बोझ की तरह है, उसका बोलना गैरजरूरी, उसका पीड़ा में तड़पना घर की शांति भंग करती है, लोगों की नींद पूरी नहीं होती। साथ बैठना तो दूर, सब बच कर निकलते हैं, आये हुए लोगों से कहते हैं,  “जीना मुश्किल कर दिया है, दवा-दारु का खर्च कंगाल कर रहा है और घर का वातावरण दूषित हो गया है।“
रमा की स्थिति किंचित भिन्न है, अभी उसकी जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं हुई हैं, संघर्ष के दिन हैं और उसे फुरसत नहीं है। वह दुखी नहीं है क्योंकि मौन है। दुखी नहीं है क्योंकि उसने मार्ग खोज लिया है, ईश्वर से और समान विचार वाले लोगों से स्वयं को जोड़ लिया है।
विशम्भर बाबू विह्वल हो रहे हैं और चिन्तन में उलझे हुए हैं। यह उनका दार्शनिक पक्ष है, सब समझते-जानते है, उन्होंने दुनिया देखी है, यह दुनिया ऐसी ही है। उन्हें किसी से कोई शिकायत नहीं है। शिकायत रमा को भी नहीं है। दोनों संतोष कर लेते हैं, जो दुनिया के साथ होता है, वही उनके साथ हो रहा है। स्मृतियों की खिड़कियाँ, दरवाजे खुलते हैं, नाना दृश्य उभरते हैं, सुख कम, दुख की ज्वालाएं जलाने लगती हैं। ईश्वर को मन ही मन पुकारते है जब अपनों की बेरुखी सहन नहीं होती,  हालांकि वे संसार में माया के खेल और उसके रहस्य को समझते हैं और स्वयं को कुछ इस तरह व्यवस्थित कर लेना चाहते हैं कि आवश्यकताएं कम हों, लोगों द्वारा सेवा की कम जरुरत पड़े। उनकी सीमित मित्र मंडली है जिनके साथ कुछ समय गुजर जाता है, थोड़ी देर बाहर जाकर टहलते हैं।
बचपन की सीख को शिरोधार्य किया है-सौ दवा न एक परहेज। यह संसार रोग का घर है। रोग न हो इसके लिए परहेज करना चाहिए। साथ वाले मित्र भी समझ गये हैं। अपने-अपने तरीके से सब परहेज करते हैं। उनकी बातों में संसार का अनुभव है, अनुभव की सच्चाई है। जो कहते हैं, सच कहते हैं। उनका मानना है, यदि सच को स्वीकार करना सीख लिया जाए तो जीवन सरल हो जायेगा। इसलिए वे सच समझना और लोगों को समझाना चाहते हैं। संसार की स्थिति थोड़ी भिन्न है, कोई सच सुनना नहीं चाहता,  इसलिए उनके यहाँ भीड़ नहीं है। बाहर भी खाली, भीतर भी खाली। भीतर-बाहर खाली हो जाना सहज नहीं है, साधना करनी पड़ती है। उन्होंने खाली होना सीख लिया है और खाली होने लगे है। विशम्भर बाबू को आश्चर्य होता है, इतनी बड़ी दुनिया में कोई एक भी नहीं है जो समान सोच का हो, उसके और मेरे विचार मिलते हों या समान चिन्तन हो।
विशम्भर बाबू काम की बात कहते हैं, यह दुनिया तुम्हें अलग कर दे, उससे पहले तुम स्वयं उससे उदासीन हो जाओ, तुम्हें कोई छोड़े, उससे पहले तुम्हीं छोड़ दो। मित्र कहते हैं, यह सहज है क्या? विशम्भर बाबू हँसते हैं, सहज तो बहुत है, तुम्हारा मन कमजोर है इसलिए कठिन लगता है, तुम आत्मबल,  आत्मविश्वास खो देते हो,  इसलिए कठिन लगता है और तुम्हें भोगना है, इसलिए कठिन लगता है। उन्होंने घर भी विचित्र तरीके से बनवाया है। दो कमरे पीछे की ओर हैं जो भीतर से जुडे़ तो हैं परन्तु वह दरवाजा कभी नहीं खुलता। बगल से होते हुए पीछे जाया जाता है। उन कमरों में पहले से ही अपने एकाकी निवास के लिए तैयारी कर रखी है। सेवा-मुक्ति के दिन उन्होंने उन कमरों में प्रवेश किया और आत्मनिर्भर भाव से जीने की शुरुआत की। भीतर से संकल्पित व्यक्ति साहसी और मजबूत होता है।
विशम्भर बाबू मजबूत व्यक्ति हैं क्योंकि संकल्पित हैं परन्तु भीतर से द्रवित हैं, करुणा से भरे हैं और दुनिया को देना चाहते हैं। यह भी एक समस्या है, पूरी दुनिया पाना चाहती है। पाने के लिए नैतिक-अनैतिक कुछ भी करती है। उन्होंने देने की कला सीख ली है। अक्सर कहते रहते हैं, जिस वस्तु के बिना काम चल जाए, उसे त्यागना शुरु कर दो।
विशम्भर बाबू ने अपनी दिनचर्या में बदलाव किया है और अपनी आवश्यकताओं को कम किया है। गहरी छानबीन शुरु कर दी है कि ऐसा क्या-क्या हो कि खुश रह सकूँ। उन्होंने अपने स्वभाव और विचारों की पड़ताल की। जो-जो गड़बड़ी लगी, उन्हें दूर करने का संकल्प लिया और प्रयास करने लगे। उन्होंने अपनी ओर से परिजन, पुत्र,  बहू, पत्नी या किसी को आदेश देना बंद कर दिया। सबको छूट थी, जिसे जो पूछना या सूचित करना हो,  कभी भी पूछ सकता है। जब तक स्वस्थ हूँ, अपनी सारी जिम्मेदारी स्वयं उठाऊँगा। घर के सभी लोग स्वतंत्र हैं अपना निर्णय लेने के लिए। आपातकालीन परिस्थितियों में हमें एक-दूसरे को देखना या चिन्ता करनी चाहिए। मुझे कोई भी अपने ऊपर बोझ न समझे।
कुछ दिनों तक सबको थोड़ा अटपटा सा लगा परन्तु धीरे-धीरे सब ने राहत की सांस ली। सेवा-निवृत्ति और चौबीस घंटा साथ रहने को लेकर तनिक उलझन थी,  विशम्भर बाबू ने एक झटके में सब कुछ बदल डाला। इसका सुफल हुआ कि उनके प्रति सब के मन में श्रद्धा जाग उठी। उनकी भोजन आदि की समुचित व्यवस्था स्वतः हो गयी। उन्होंने अपने लिए अलग से अखबार, पुस्तकें, छोटा सा टीवी,  लैपटाप व मोबाइल ले लिया और सामाजिक मीडिया की दुनिया में स्वयं को रमा लिया।
प्रातः उठकर योगा-प्राणायाम करना, टहलना, मित्रों के साथ घुमना-फिरना और सब के लिए चाय बना लेना उनकी दिनचर्या में शामिल हो गया। दोनों कमरों के साथ कीचेन आदि की सफाई स्वयं कर लेते थे। सामने कि खुली जमीन में उन्होंने फूलों के पौधे लगा लिए। फेसबुक, ह्वाट्सअप में धीरे-धीरे उनके मित्रों और रिश्तेदारों की संख्या बढ़ती गयी। मित्रों के चयन में उन्होंने वैचारिक समानता और समान अभिरुचियों का ध्यान रखा।
ईश्वर लीला करता है, सब कुछ दे देता है फिर भी कोई कोना खाली छोड़ देता है। वह खाली कोना टीस पैदा करता है। विशम्भर बाबू को इसका रहस्य पता है और समाधान भी। यह प्रेम की टीस है,  कोई अतृप्ति है जो सिर उठाये रहती है। जहाँ से पूर्ति होनी चाहिए, नहीं होती, चाहे कारण कितना भी सात्विक क्यों न हो। जीवन की भाग-दौड़ में दबी रहती है। अचानक किसी दिन टीस के रुप में उभरती है।
सांसारिक प्रेम के स्थान पर ईश्वरीय प्रेम भरना सर्वोत्तम विकल्प है, लोग करते भी हैं परन्तु कभी-कभी सहज नहीं होता। ऐसे में ईश्वर ही पुनः कोई लीला रचा देता है। विशम्भर बाबू समझते हैं, प्रेम की टीस प्रेम से ही परिपूरित होती है और यह प्रेम वासना रहित होता है। अक्सर लोग ईश्वरीय मूर्ति की जगह संसार की दिव्य मूर्ति बसा लेते हैं। यहाँ पा लेने की चाह नहीं होती, बस किसी का आसपास होना ही पर्याप्त है। सुखद लगता है सौन्दर्यानुभूति करना, किसी के साथ सात्विक भाव से जुड़ा महसूस करना और प्रेम की टीस के साथ जीना। प्रेम का यह भी कोई मनोविज्ञान है।
किसी दिन कोई दस्तक हुई और फेसबुक पर मित्रता के लिए एक नया प्रस्ताव मिला। भेजने वाली की फोटो में पति-पत्नी दोनों थे, प्रोफाइल की सूचनाएं सामान्य ही थीं और अभिरुचि की दृष्टि से कला-साहित्य को पसंद करने वाली। विशम्भर बाबू ने प्रस्ताव स्वीकार करने में किंचित तेजी दिखाई और देर तक उसकी पोस्ट्स पढ़ते, देखते रहे। दरअसल उन्हें कला, साहित्य और संस्कृति से जुड़े लोगों के प्रति हाल के महीनों में आकर्षण व लगाव बढता गया है। मित्रों के साथ बातचीत में ये विषय आते रहते हैं और एक तरह की नयी सुखानुभूति होती है। जिस कड़ाई से उन्होंने अपने लिए नियम बनाए हैं, उसमें कोई ढील देना नहीं चाहते परन्तु साहित्य,  कला, गीत,  संगीत द्वारा उपलब्ध रसों से परहेज करने का कोई तुक नहीं दिखता। इसलिए उन्होंने स्वयं को थोड़ी छूट देना शुरु कर दिया है।
नयी मित्र बनी रमा अलग तरह से उत्साहित है। मौसम कुछ सुहाना सा है,  वातावरण में नयी तरह की खुशबू है और बसन्ती बयार बह रही है। रमा के पास पूछने के लिए ढेर सारे प्रश्न हैं। विशम्भर बाबू उसके प्रश्नों से खुश होते हैं। उन्हें लगता है, रमा जीवन के रहस्यों को, सम्बन्धों और जटिलताओं को समझना चाहती है। स्वयं को मध्यमवर्गीय आम भारतीय परिवार की तरह समझती है, परिधान भी वैसा ही धारण करती है और सोच-विचार के स्तर पर किंचित आधुनिकता लिए हुए है।
शुरु-शुरु में मैसेंजर पर उसकी लम्बी बातों से बचने के लिए विशम्भर बाबू ने अपना फोन नम्बर दिया ताकि सीधे बातें हो सके। रमा ने वैसा नहीं किया। विशम्भर बाबू उसकी लाचारी समझ गये और अपने अति उत्साह पर शर्मिन्दगी महसूस की। कुछ दिनों बाद रमा ने अपना नम्बर दिया परन्तु विशम्भर बाबू ने भी उसका उपयोग नहीं किया। उस नम्बर को उन्होंने कहीं लिखा भी नहीं और ना ही मोबाइल में जोड़ा। शायद कोई भावनात्मक अनुभूतियों का दबाव हो या किसी परहेज की भावना। शेष सब कुछ यथावत चलता रहा जैसे एक-दूसरे के पोस्ट को पढ़ना, पसन्द करना, कभी-कभी टिप्पणी करना। विशम्भर बाबू ने महसूस किया, रमा रुढ़िगत संस्कार वाली मानसिकता के दबाव में है,  आधुनिकता को स्वीकार करती है परन्तु सीमा में रहकर। वे उसके इस आदर्श पूर्ण व्यवहार से खुश होते हैं और बार-बार आशीर्वाद देते हैं। ऐसे ही सालों से चल रहा है।
कुछ महीनों पूर्व रमा ने प्रश्न पूछने के साथ फोन नम्बर के लिए आग्रह किया। विशम्भर बाबू को लगा, अब जाकर रमा को विश्वास हुआ है। उन्हें खुशी हुई। उस दिन रमा ने फोन पर बहुत सी बातें की, बहुत कुछ अपने बारे में, घर-परिवार के बारे में बताया और अपनी कुछ तस्वीरें भेजी। वह सुन्दर है, उसके चेहरे में लावण्य है और बोलती सी आँखें हैं। उसकी आवाज में मासूमियत और अलग तरह की खनक है। विशम्भर बाबू को वह ‘सर’ कहकर सम्बोधित करती है और कृतज्ञ भाव से भरी रहती है। उनकी बातों पर खूब हँसती है। उसने छूट दे रखा है,  सर आप अपनी किसी रचना की नायिका बना सकते हैं, यदि कोई चरित्र समझ में आये। विशम्भर बाबू मन ही मन मुस्कराते हैं परन्तु भीतर जाग रहे भावों को व्यक्त नहीं करते। उन्हें पता है, रमा की आँखों में चमक उभर आती होगी और चेहरा खिल जाता होगा। उत्साहित होकर कुछ कहते हैं, रमा खिलखिलाकर हँसती है।
रमा हजारों मील दूर एक बड़े से शहर में अपने पति और बच्चों के साथ रहती है। शायद उसके भी जीवन में कोई खाली कोना है या ज्ञान की कोई ललक,  इसीलिए उसके पास प्रश्न हैं। यह किसी के भी जीवन का स्वाभाविक सत्य हो सकता है, इसमें कोई बुराई नहीं है। सामाजिक मीडिया ने ऐसे बहुत से लोगों को जोड़ रखा है।
विशम्भर बाबू रमा को पसंद करने लगे हैं, उसकी चिन्ताओं पर दुखी होते हैं, चाहते हैं, वह खुश रहे,  उसके जीवन में कोई असुविधा न हो और उसे अपनों का स्नेह-आदर मिले। रमा सहज स्वीकार करती है, ”आपकी बातों से बल मिलता है, जीवन जीना सरल हो जाता है और रिश्तों की पेचीदगियों से निकलना आसान हो जाता है।“ उसकी बातों में भावुकता है, निश्चित ही आँखें नम हो जाती होंगी। विशम्भर बाबू का भी मन भर आता है। रमा पास होती तो अपना स्नेह जताते, प्रेम जताते। वह उनका आशीर्वाद समझती है, खुश होती है और बार-बार प्रणाम करती है।
विशम्भर बाबू कहीं खोये हुए से हैं, क्या यह मिलना ऐसे ही है, क्या कोई ऐसे ही किसी से कहीं भी मिल जाता है?क्या ऐसे ही मिलना आत्मीय होने लगता है? ऐसे ही लगाव-जुड़ाव महसूस होने लगता है? इस परिचय के पीछे के भाव क्या इतने सहज हैं? इसकी तो सीमाएं हैं, संस्कार हैं। विशम्भर बाबू पारंगत हैं, मर्यादा जानते हैं, यह भी जानते हैं,  माया ऐसे ही लोगों को नचाती रहती है। यह भी हो सकता है किसी जन्म में सहयात्रा हुई हो, कुछ कदम एक ही डगर पर एक ही भाव लिए साथ चले हों और ईश्वर ने पुनः मिला दिया है। उन्होंने विश्वास पूर्वक मान लिया, रमा उत्साहित है, उसकी आँखों में चमक और श्रद्धा है। रमा में सामाजिक चेतना है, वह लोगों की मदद करना चाहती है, अपना समय देना चाहती है। उसमें उदारता है, करुणा और प्रेम है।
रमा ने बताया था, उसने कुछ यात्राएं की है हाल के महीनों में और पीड़ित लोगों के साथ सहानुभूति,  सान्त्वना और विश्वास जगाने का प्रयास किया है। उसने एक तस्वीर भेजी है जिसमें तेजाब से जले हुए चेहरे वाली लड़की मुस्करा रही है। यह रमा के प्रयास का प्रतिफल है, वह अपनी पीड़ा, व्यथा और भय से बाहर निकल आयी है। रमा की साथ में हँसती हुई सौम्य तस्वीर है। विशम्भर बाबू सहसा मुस्कराते हैं, स्वयं को समझाते हैं, अपनी उड़ान को लगाम दो विशम्भर! आगे का चिन्तन भयावह है,  अशोभनीय है और दुखी करने वाला है। मित्र मुस्कराते हैं, शायद सच कहते हैं, “अब तो विशम्भर जवान होते जा रहे हैं, चेहरे पर अद्भुत तेज उभरा रहता है और पुतलियाँ चमकती रहती हैं।” विशम्भर को रमा की बात याद आ रही है, “सर जी! आपको देखकर मन प्रसन्न हो जाता है। बस हमेशा अपना आशीर्वाद बनाये रखिए।”
‘कितने पवित्र और शुद्ध भाव हैं रमा के? उसके भाव को तोड़ा नहीं जा सकता। यही क्या कम है,  उससे मिलने के बाद निराश-हताश जिन्दगी भावनाओं, संवेदनाओं और रसों से भर गयी है। जीने की चाह बढ़ गयी है और दूसरों के लिए कुछ करने का मन होने लगा है। कोई रिश्ता नहीं है फिर भी रिश्ता तो उसने जोड़ ही लिया है और अपनी ओर से निभा भी रही है। निभा तो विशम्भर बाबू भी रहे हैं, अपने तरीके से और अपनी भावनाओं के साथ।
रमा अक्सर विह्वल होती है, सोचती है,  अपने लोग विशम्भर सर की तरह क्यों नहीं हैं? क्यों लोग अपनी स्त्रियों के प्रति सहानुभूति नहीं रखते?क्यों साथ खड़ा नहीं होते? क्यों साथ खड़ा होना नहीं चाहते? क्यों लोग स्त्रियों को समझना नहीं चाहते? क्या स्त्रियाँ आलीशान घर, गाड़ियाँ, जेवरात, कपड़े और शारीरिक भूख की भूखी हैं? विशम्भर बाबू भी कुछ इन्हीं विचारों के साथ अपनों को देखते रहते हैं और हृदय की गहराई से, मन ही मन रमा को आशीर्वाद देते हैं।
रमा अति उत्साह में है, उसकी आवाज में खनक है, बातों में कोई स्वीकृति है, उसने कहा, “मेरे मन के खाली कोने को आपने भर दिया है,  स्नेह-प्रेम की अनुभूति होती है। चेतना का यह विस्तार मुझे परिपूर्ण कर रहा है। इसमें ना तो भौतिक तौर पर मिलने की आवश्यकता है और ना ही कोई बंधन। आप को मैंने स्वीकार किया है, मेरे शुभचिन्तक के रुप में, मेरे प्रेमी के रुप में और मेरे गुरु के रुप में। बस इतनी ही प्रार्थना है, मेरे प्रेम और आदर भाव को सांसारिक दृष्टि से मत देखियेगा।”
विशम्भर जी की आँखें भर आई हैं, हृदय के दरवाजे पर कोई दस्तक महसूस हो रही है, तेज हवा का झोंका घर के दरवाजे को खोलता भीतर आ गया है और सामने क्यारियों में फूल मुस्करा रहे हैं।
विजय कुमार तिवारी, (कवि,लेखक,कहानीकार,उपन्यासकार,समीक्षक)
टाटा अरियाना हाऊसिंग,टावर-4 फ्लैट-1002
पोस्ट-महालक्ष्मी विहार-751029
भुवनेश्वर,उडीसा,भारत
मो०-9102939190

2 टिप्पणी

  1. आदरणीय विजय कुमार जी!
    पूरी रचना को बेहद संजीदगी के साथ पढ़ा। प्रारंभ थोड़ा खिंचा हुआ लगा।ऐसा महसूस हुआ मानो भूमिका कुछ ज्यादा लंबी हो गई पर कहानी शुरू नहीं हुई।फिर जब , *कोई दस्तक हुई* तब कहानी से वास्तविक परिचय हुआ।
    कहानी पुरुष और स्त्री की भिन्न-भिन्न स्थितियों और दोनों की एकाकीपन की मनोदशाओं के अंतर्द्वंद्व को बारीकी से उद्घाटित करते हुए बुनी गई है।
    पढ़ते हुए भी ऐसा लगा मानो कहानी अपने आसपास की ही है। वास्तव में जिंदगी में सभी के साथ यह स्थिति निश्चित ही बनती है। दाम्पत्य जीवन में, जब बच्चे बड़े हो जाते हैं और उनकी गृहस्थी बन जाती है और मुखिया अकेला हो ,उस समय की कार्यान्विति को बहुत ही बारीकी से रचा है आपके कथाकार मन ने!पुरुष और स्त्री दोनों की ही मन: स्थिति का अलग-अलग वर्णन किया है। रिटायर्मैंट की उम्र में अपने लिए तय सारी व्यवस्थाएँ जुटा लेने के बाद भी पुरुष को एक अकेलापन तो महसूस होता है। ऐसा लगता है कि कोई हो जिससे हम अपने मन की बात कर सकें। प्रेम और अपनत्व की आकांक्षा तो रहती है। वह प्रेम दैहिक आकांक्षाओं से परे होता है। वैचारिक समानता के चलते उसमें अपनापन और सम्मान होता है।आजकल यह सब मोबाइल के चलते संभव हो सका। कहानी के नायक और नायिका प्रेमिल स्वभाव के विशम्भर और रमा का परिचय इसी तरह वैचारिक मतैक्य के चलते होता है। उसमें मर्यादा है,अपनापन है, प्रेम है और एक दूसरे के प्रति उतना ही सम्मान भी है।परस्पर बात करके दोनों आत्म संतोष की
    अनुभूति करते हैं।
    कहानी बहुत जीवंत लगी। हालांकि परिणाम पलट भी सकते हैं शक की हल्की सी भनक पर।
    विजय जी !बधाइयाँ बहुत- बहुत! एक लंबे अंतराल के बाद ही सही, लेकिन आपने एक बहुत अच्छी और सच्ची कहानी रची।
    यह कहानी हमें बहुत सच्ची इसलिए भी लगी, क्योंकि आपकी कहानी की नायिका हमें अपनी एक विदेशी महिला मित्र सी लगी। वह हमसे अभिन्न है तथा अपनी सब बातें शेयर करती है। एक पल के लिए ऐसा लगा कि उसकी ही कहानी है जो आपके शब्दों में लिपिबद्ध होकर आँखों के सामने घूम गई।
    एक पल के लिये स्तब्ध हो गए थे पढ़कर।
    आप विश्वास नहीं करेंगे कि इस कहानी पर लिखने के लिए हमें बहुत विचार करना पड़ा। बहरहाल लिख दिया इस उम्मीद में कि आप पढ़ें।कथानक की कथावस्तु वास्तव में हमारे आसपास ही होती है।
    बेहतरीन कहानी के लिए एक बार पुनः बधाई आपको। आपसे अनुमति लिए बिना हम आपकी कहानी उसे भेजना नहीं चाहते। अनुमति की अपेक्षा है।

    • नीलिमा जी देख कर अच्छा लगता है कि आप लेखकों की कृति को न केवल पढ़ती हैं, उस पर विस्तृत टिप्पणी भी करती हैं। आभार।

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