कहावतें ऐसे ही नहीं बना करती। बरसों बरस के अनुभवों के बाद कई कई लोगों की टिप्पणियों के बाद जनमानस में बनने वाली धारणा कहावत का रूप ले लेती है। ऐसा नहीं है कि कहावतें किसी न्याय की किताब में लिखी हुई पत्थर की लकीर जैसी हो, कभी झूठ ना होने वाली हमेशा सच्ची ही साबित होने वाली। लेकिन हाँ आमतौर पर जो अनुमान लगाया जा सकता है उसे वह इंगित करती है जैसे एक विदेशी कहावत है कि हम तभी तक ईमानदार हैं जब तक हमें बेईमानी का मौका नहीं मिले या एक विशुद्ध भारतीय कहावत है कि वीराने का ब्रह्मचर्य कोई मायने नहीं रखता कोई साधु संत या तपस्वी हिमालय पर जाकर या जंगल में जाकर अपने ब्रह्मचर्य का दावा करें वह उतना प्रामाणिक नहीं होगा जितना इस रंग रंगीली दुनिया में आकर भौतिक सुखों के बीच रहकर संयम से रहना। जबकि यही असली ब्रह्मचर्य है।
मेरे ख्यालों में ये बातें आने का भी कुछ कारण था। दरअसल मैं एक इमानदार आदमी हूँ ऐसा मैं मानता हूँ और हूँ भी। दूसरों की समृद्धि से , दूसरों के संसाधनों से मुझे कोई इर्ष्या नहीं होती कोई लालच नहीं आता मुझे किसी भी तरह की धोखाधड़ी से कोई सुख सुविधा प्राप्त करने की इच्छा नहीं होती। मैं अपनी कम वेतन वाली शिक्षा विभाग की नौकरी से खुश था।
किसी की भी आर्थिक समृद्धि देखकर मैं दुखी हुआ हूँ या उसे देख कर दिल में कोई पाप जागा हो? ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। लेकिन आज! हाँ आज मैं विचलित हो गया। सिर्फ कुछ ही देर में ईर्ष्याग्रस्त हो गया मन में कुछ अफसोस के भाव आए और फिर मन मे एक पाप पूर्ण विचार ने सर उठाया। ऐसी स्थितियां निर्मित होने के कुछ कारण थे। कल ही मुझे पता चला था, पन्नालाल के मुंह से कि उसके पास सोने के तीन बिस्किट है जो उसने अपने घर के अंदर ही कहीं छुपा रखे हैं। वह घर जो हमारे घर के ही पिछवाड़े का हिस्सा था जो उसने किराए से ले रखा था।
पन्नालाल राजस्थान से आकर पिछले पाँच सात सालों से राज मिस्त्री का काम करते हुए ठेकेदारी भी करता था। उसे हम औसत कमाने वाला, रोजाना प्याज रोटी खाकर दिन निकालने वाला मानते थे, उसके पास सोने के बिस्किट? वो भी तीन? यदि 70 ग्राम का एक बिस्किट हो तो दो सौ ग्राम से भी ज्यादा, और यदि सोने के बिस्किट का भाव रु. साठ हजार तोला का माना जाए तो लगभग बारह लाख से ज्यादा का। इतना सोना हमारे किराएदार पन्नालाल के पास था और हम मकान मालिक रोजाना की रोटियों में घी भी लगाने की स्थिति में नहीं थे।
: मैंने अपनी और अपने परिवार की स्थिति पर नजर डाली। गाँव की निचली तरफ मुख्य बस्ती से कुछ हटके हमारा कमजोर सा मकान था जो पिता का ही बनवाया हुआ था। ईंट गारे की कच्ची पक्की दीवारों और कवेलू से ढका हुआ यद्यपि कुछ लंबा चौड़ा जरूर था पाँच छ : कमरे का , लेकिन अब गिरे तब गिरे जैसी स्थिति में। मैं राम अवतार जिसे गांव के लोग रामू मास्टर कहते थे संविदा शिक्षक था। महीने के 12000 कमाता था। दो कमरे में रहता था बीच के हिस्से में माँ रहती थी और दूसरे कोने पर बड़ा भाई अपनी घरवाली के साथ रहता था यद्यपि उसकी घरवाली उस से लड़ झगड़ कर दो साल पहले ही उसके मायके जा चुकी थी क्योंकि बड़ा भाई कुछ भी करता धरता नहीं था। बिल्कुल नाकारा, माँ को पेंशन मिलती थी उसी आधार पर वह खुद का और बड़े भाई का खर्चा चलाती थी। हमारी आय बढ़ाने को हमने घर के पिछले हिस्से के दो कमरे राजस्थानी ठेकेदार को दे रखे थे। छ: साल पहले आया यह पन्नालाल सीधा-साधा राजस्थानी कारीगर था लेकिन बहुत वर्कर था कुछ राजस्थान से ही आए मजदूरों और कारिगरों के सहारे ठेकेदारी के काम करता था। हम नहीं जानते थे वो कितना कमा लेता था लेकिन लगता वह गरीब ही था क्योंकि रोजाना साइट से आने के बाद कभी बेसन रोटी खाता था तो कभी प्याज और मिर्च से ही रोटियां खा लेता था।
घर में एक चौथा सदस्य और भी था मेरा मामा। माँ का भाई जो रहता तो पास के एक गाँव में था लेकिन उसका ज्यादातर समय हमारे घर ही बीतता था। वह भी आवारा किस्म का आलसी कामचोर बड़ी-बड़ी बातें करने वाला, था तो ठेकेदार लेकिन कभी मन लगाकर लगातार अच्छे काम नहीं कर पाया। बड़े भाई से उसकी खूब पटती थी। माँ कई बार भाई को जबरदस्ती मामा के पास भेजती थी ताकि कुछ काम सीखे और मामा पर भी दबाव डालती थी कि वह बेटे को कुछ ठेकेदारी के, कारीगरी के काम सिखा दे। मामा माँ के इस आग्रह का लाभ लेता हुआ अपनी समस्याएं बताता रहता था। पूंजी की कमी होने से धंधा नहीं कर पाने की मजबूरी बताता था तथा माँ से कुछ पैसे खींचने की कोशीश करता रहता था। और इन समस्या ग्रस्त लोगों की नजरें मेरे महीने के 12000 की तनखा पर गडी रहती थी। कई बार ये तीनों मुझे लुभाते हुए अपनी समस्या बताते हुए मुझसे उधार लेने की कोशिश करते थे लेकिन मैं भी बहुत पक्का था हमेशा अपनी चिंता में डूबा रहता था। पांच सात हजार में महीने का खाने पीने का खर्च पूरा करके कुछ बचाने की कोशिश करता था, ताकि भविष्य में शादी करके अपना घर बसा सकूं । मामा हर दूसरे चौथे दिन यहीं पर रुक जाता था। भाई को और मामा को शराब पीने का बहुत शौक था। कहीं से भी जुगाड़ करके वे देसी दारू की बोतल ले आते थे माँ को पटाके चिकन बनवाते थे और मजे मारते थे। माँ के पास कुछ तो पेंशन के पैसे और कुछ पन्नालाल से मिलने वाले किराए के पैसे आते थे जिसके सहारे वो अपना घर चलाती थी। माँ भी मामा और भाई की बातों में कई बार शामिल होकर कहीं से पैसे मिलने की जुगाड़ में लगी रहती थी। उसका लालच था कि कहीं से कुछ पैसा मिल जाए तो मकान पक्का बना लिया जाए किराया अच्छा मिलने लग जाए ताकि उसका बचा जीवन भी सुविधाजनक निकल सके।
: ठेकेदार पन्नालाल धीरे-धीरे अपना काम बड़ाता जा रहा था। साल में एक या दो बार अपने गाँव भी जाता। कुछ पैसा अपने घरवालों को खर्च के दे आता था। कई बार कुछ पैसा माँ के पास जमा भी रखता था और जरूरत पड़ने पर वापस ले भी लेता था। उसके द्वारा जमा किए जाने वाले पैसे तो माँ बड़ी खुशी खुशी रख लेती थी लेकिन वही पैसे वापस देते समय बहुत किच किच करती। खुद के अभाव का रोना रोती उसे बहला-फुसलाकर जितने वह मांगता उससे कम ही देने की कोशिश करती। इन्हीं बातों से परेशान हो कर बाद में पन्नालाल ने एक बैंक में खाता भी खुलवा लिया था। अब वह अपने पैसे बैंक में ही जमा करता था। यद्यपि माँ उसे लुभाने को कई बार अपने घर में बना हुआ खाना सब्जी रोटी उसे पहुंचा देती थी। जो उसे अच्छा लगता था और वह भी कई बार बाजार से कुछ कुछ नाश्ता पानी हम लोगों के लिए लाता रहता था। मुझे लगने लगा था कि पन्नालाल अब कुछ मजबूत होने लगा है क्योंकि
वह कई बार मुझसे चर्चा करता था कि बैंक में जमा पूंजी पर ब्याज बहुत कम मिलता है तो पैसा कहाँ लगाना चाहिए ताकि कुछ फायादा मिले। उसकी बातों से तो हमें लगाने लगा था कि उसके पास बहुत पैसा इकट्ठा हो गया है, लेकिन फिर भी हम उसकी आर्थिक स्थिति का सही अंदाजा नहीं लगा पाते थे क्योंकि इन राजस्थानी लोगों की जीवन शेली बहुत साधारण सीमित और मितव्ययी ही हुआ करती थी।
वह तो पिछली रात शराब के नशे में उसके मुंह से निकल पड़ा कि उसने पिछले सात सालों में अच्छी कमाई कर ली है बैंक में कुछ पैसा जमा है और तीन सोने के बिस्किट भी खरीद लिए हैं और अब मैं अपनी शादी बनाऊंगा, मकान भी खरीदूंगा और देश में जाके कुछ जमीन भी खरीदूंगा। उस रात की दारु पार्टी में बड़ा भाई भी था और मामा भी था। अम्मा ने उस दिन चिकन बनाया था दरअसल वो पार्टी पन्नालाल ने ही दी थी। हमारे बहुत पीछे पडने के बाद। हमारा आग्रह था कि वह एक सफल ठेकेदार बन गया है इसलिए पार्टी बनती है लेकिन हम चौंक गए थे उसकी बात से कि इसके पास बहुत पैसा है और संभवत सोने के तीन बिस्किट भी हैं। मैं, मेरा भाई, मेरा मामा और मेरी माँ हम सब ने अपने अपने दिमाग में जोड़ गुणा कर लिया था तीन बिस्कुट मतलब कम से कम 200 ग्राम से अधिक सोना जो कम से कम दस बारह लाख का होता है। हमने जीवन में इतना रुपैया देखना तो दूर सोंचा भी नहीं था। पन्नालाल की स्पष्ट जानकारी ने हम सब के ईमान को संकट में डाल दिया था।
मेरा मामा भी ठेकेदारी करता था लेकिन मैं जानता था ना तो उसके पास पूंजी है और ना ही वह ठेकेदारी के काम में कुशल है बस जोड़-तोड़ करके दो चार मजदूर एक दो कारीगरों को लेकर छोटे मोटे काम करता था। कुछ जुड़ाई का काम खुद भी करता था और जैसे तैसे कुछ कमाई कर लेता था। ऐसा ही निठल्ला मेरा बड़ा भाई भी था। भाई के बारे में माँ बहुत चिंतित रहती थी क्योंकि उसे और उसकी घरवाली के खर्चे चलाने को माँ को पैसे देना पढ़ते थे। माँ कई बार झगड़ा कर के भाई को मामा के साथ ठेकेदारी करने के लिए भेजती रहती थी। कल रात की पार्टी में जब भाई को और मामा को यह पता लगा कि पन्नालाल के पास बहुत माल है उस के बाद उनका दिमाग चलने लगा कि कैसे भी हो पन्नालाल को पटा कर उससे कुछ पैसा खेंचा जाए।
दूसरे दिन दोपहर को मैं स्कूल से घर आ कर आराम कर रहा था तभी बड़ा भाई और मामा दोनों मेरे कमरे पर आए कुछ इधर उधर की बात करने के बाद मतलब की बात पर आ गए उनका कहना था कि “ पन्नालाल पर दबाव बढ़ा कर उससे पैसे उधार लिए जाएं और बाद में आराम से उसे चुकाते रहेंगे और ना चुकाएं तो भी वो क्या कर लेगा।”
उन्होंने मुझसे यह अपेक्षा की कि मैं पन्नालाल को उधार पैसा देने के लिए समझाऊँ। मैंने दोनों को खरी-खोटी सुनाई और यह चेतावनी भी दी कि पन्नालाल को एक सीधा सादा सज्जन आदमी मानते हुए उसे धोखा देने की बात सपने में भी मत सोचना। भाई और मामा दोनों मुझ पर गुस्सा करते हुए जा चुके थे।
दो-चार दिन ही बीते होंगे कि माँ भी मेरे पास आई। कुछ प्रेम प्यार से बातें की और फिर अपने मतलब की बात शुरू कर दी । “ हमारा मकान कितना पुराना हो गया है गिरने पडने जैसा हो रहा है। हम पैसा लगाकर उसे सुधार नहीं पा रहे हैं क्योंकि हमारे पास पैसा नहीं है तो क्यों ना हम पन्नालाल से कुछ पैसा उधार ले लें और अपना मकान पक्का करवा लें। पन्नालाल को धीरे-धीरे चुकाते रहेंगे उसको क्या कमी उसके पास तो सोने के बिस्किट भी हैं और उसका कोई खर्च भी तो नहीं है “ माँ ने यह सुझाव दिया भी दिया कि तू पन्नालाल से दोस्ती बड़ा उसको पटाने में मेरी सहायता कर ताकि हम उससे कुछ पैसे खींच सकें।
पैसे खींच सके मतलब ? मुझे बहुत आश्चर्य हुआ की माँ एक स्त्री होकर भी ऐसा सोचती है इसके मन में भी पन्नालाल को धोखा देने की नियत है। कल भाई और मामा आए थे उनके मन में भी खोट है वह भी पन्नालाल से पैसा लूट लेना चाहते हैं। कितने दुष्ट लोग हैं जरा सी पैसे मिलने की संभावना देखते ही बेईमानी उनके दिमाग में आ गई। इनका बस चले तो ये कुछ भी करके पन्नालाल से पैसे लपक ले बल्कि ये तो सोना चुराने की भी सोंच ले।
मैंने माँ को भी स्पष्ट रूखे शब्दों में इस बारे में कुछ भी सहायता करने से इंकार कर दिया बल्कि मेरे दिमाग में यह भी विचार आया कि मैं पन्नालाल को सावधान कर दूं कि वो इन सब से बच के रहें तथा अपनी पूंजी और सोने के बिस्किट भी सुरक्षित रखें।
मैं देख रहा था की कभी माँ और कभी मामा और भाई , पन्नालाल से मीठी मीठी बातें करके उससे कुछ उधार माँगने के प्रयास करते रहते थे। उसे आये दिन कुछ खिलाते पिलाते भी रहते और कभी उससे धमकी जैसा भी व्यवहार करते हुए पैसे मांगने की कोशिश करते थे और पन्नालाल इनसे बचने की कोशीश करता था। इसी बीच एक और नया घटनाक्रम हुआ जिस कारण मैं भी पैसों की जरूरतमंद की लाइन में आ गया।
कुछ समय बाद आने वाले चुनाव को देखते हुए प्रदेश सरकार द्वारा शिक्षा विभाग के अंतर्गत हर खंड स्तरीय शहर में एक शिक्षक कॉलोनी के विकास की योजना बनाई गई और वहाँ पर हर वर्ग के शिक्षक को सस्ते दामों पर प्लाट आवंटन की घोषणा की गई। इस योजना अंतर्गत
अगले महीने की तीस तारीख तक रुपए दो लाख जमा करने एवं पंजीयन कराने की समयावधी दी गई थी। मैं एकदम रोमांचित था यदि कहीं से भी यह व्यवस्था हो जाती है तो मैं अपना प्लाट खरीद सकता हूँ और बाद में अपना स्वयं का निजी मकान बनाने में सफल हो सकता हूँ
मेरे दिमाग में दो ही नाम अचानक आए जिनकी सहायता से मैं अपना प्लांट ले सकता था पहली कोशिश में मैंने माँ से रुपये मांगे । यद्यपि माँ के पास भी ₹200000 होना मुश्किल थे फिर भी उससे कुछ सहायता तो मिल सकती थी , लेकिन माँ ने साफ इंकार कर दिया कि उसके पास ₹10000 से ज्यादा नहीं हो सकते। माँ के अलावा तत्काल दूसरा नाम जो मेरे दिमाग में कोंधा वो था पन्नालाल का। पता नहीं इसके बैंक खाते में कितना जमा होगा लेकिन इतने सालों की दोस्ती और विश्वास है शायद वो मुझे उधार दे दे। मैं परेशान इसलिए था कि मेरी जरूरत पड़ने और मेरे पन्नालाल से कहने के पहले ही भाई और मामा भी इसी कोशिश में लगे थे। जब बड़े भैया और मामा को पता लगा और उनसे माँ को भी पता लगा कि मैं भी कुछ पैसे की सहायता पन्नालाल से लेने की कोशिश कर रहा हूँ तो वे बड़े शातीर मुस्कुराहट से मुझे उलाहना देने लगे “अभी तक तो तू हमारी बुराई करता था कि क्यों बेचारे गरीब से पैसा मांगते हो, उस पर दबाव डालते हो और अब? अब तू क्या करेगा?“ मैंने उन लोगों को तो कोई जवाब नहीं दिया लेकिन पन्नालाल से गुपचुप बात करते हुए उससे उधार लेने की कोशिश की लेकिन पन्नालाल ने मुझे भी हाथ नहीं धरने दिया मना कर दिया।
अब स्थिति यह थी कि हम तीनों पैसों के जरूरतमंद अलग-अलग अपने ढंग से पन्नालाल को लुभाने की उसे फंसाने की और किसी भी तरह से उससे पैसे हथियाने की कोशिशों में लगे थे इस दौरान यह भी होने लगा कि मामा , बड़ा भाई , माँ और मैं हम चारों मिलकर मीटिंग भी करने लगे नए नए उपाय सोचने लगे की कैसे भी पन्नालाल हमारे घापे में आ जाए और हमें उधार दे दे। ठेकेदारी या किसी और धंधे की पार्टनरशिप के नाम से दे दे हालांकि हमें संदेह था कि पन्नालाल के खाते में इतना पैसा होगा कि वह सब को पैसा दे सके। लेकिन सोने के बिस्किट? यदि पन्नालाल के पास सोने के तीन बिस्किट हैं तो फिर तो वो दस पंद्रह लाख का मालिक है फिर तो उसे हमारी सहायता करना चाहिए। आखिर सात सालों का साथ है।
अब हम तीनो को पन्नालाल पर कुछ गुस्सा भी आने लगा था माँ का आक्रोश था कि कितने दिनों से इसे प्रेम से रख रहे हैं खिला पिला रहे हैं फिर भी अपनी सहायता नहीं करता। भाई और मामा का विचार था कि कुछ दिनों के लिए उधार दे दे हमारी ठेकेदारी चल निकलेगी तो वापस चुका देंगे। मामा और बड़े भाई के इरादे तो कुछ खतरनाक भी लगने लगे थे उनका सोचना था कि साला पन्नालाल सीधी तरह से नहीं मानेगा तो इसको किसी भी तरह से उलझा कर इससे पैसे झटक लेंगे। मुझे लगा कि मामा और भाई मिलके पन्नालाल का कुछ अहित भी कर सकते हैं। मैं इस पक्ष में बिल्कुल नहीं था मैंने उन लोगों को समझाया भी कि कोई आपराधिक बात हमें नहीं सोचना चाहिए यदि वो राजी मर्जी से देता है तो ठीक वरना कोई बात नहीं हालांकि मेरे मन में भी बार-बार प्लाट खरीदने को लेकर पैसों की जरूरत से पन्नालाल के विरुद्ध कुछ आक्रोश आने लगा था मेरा सोचना था कि मैं एक शिक्षित व्यक्ती हूँ इमानदार हूँ पन्नालाल को मेरी सहायता तो करनी चाहिए।
हम सभी इसी तरह के प्रयासों में लगे हुए बहुत बेचैन हो चुके थे। हमारी रातों की नींद उड़ चुकी थी हमारे दिमाग में पन्नालाल के सोने के बिस्किट ही घूम रहे थे यद्यपि हममें से आपस में किसी ने सोने के बिस्कुट के बारे में बात नहीं की लेकिन मैंने महसूस किया कि मामा और बड़े भाई के दिमाग में सोने के बिस्कुट को लेकर कुछ चल रहा है। माँ के दिमाग में भी सोने के बिस्कुट ही घूम रहे हैं और मैं भी बड़ा परेशान था। दिमाग में दिन रात आते विचारों को रोक नहीं पाता था। सोचता था कि तीन सोने के बिस्कुट में से एक भी मिल जाए किसी तरह से , तो गरीबी दूर हो जाए प्लाट भी बुक हो जाए और यह पैसा आगामी कुछ दिनों में धीरे-धीरे पन्नालाल को वापस लौटाया जाए। मेरी एक बार माँ से भी अलग से बात हुई माँ भी बहुत नाराज थी पन्नालाल के ऊपर और उसकी भी यही सोच थी कि किसी भी तरह से पन्नालाल से कुछ हड़प लिया जाए। मुझे सब के इरादे नेक नहीं लग रहे थे। कई बार मुझे यह तीनों आपस में मिले हुए भी लगते थे। इसी बीच तीनों ने प्लान किया कि पन्नालाल को एक शानदार खाने पीने की पार्टी दी जाए और नशे में उससे पता लगाएं कि उसने सोने के बिस्किट कहाँ छुपा कर रखे हैं। फिर उसको थोड़ा समझाते हुए या थोडे दबाव से एक बिस्कुट ले लिए जाए। मैं इस तरह की किसी भी हरकत के पक्ष में तो नहीं था लेकिन जाने क्यों किस लालच में मैंने उन लोगों का विरोध भी नहीं किया। बारिश का मौसम जारी हो चुका था अक्सर हमारे घर रोज पार्टी होने लगी थी ऐसी ही एक पार्टी के दिन मामा द्वारा अंग्रेजी शराब की व्यवस्था की गई। पन्नालाल को बुलाया गया देर रात तक पीना और खाना चला उस दिन भी मामा और भाई ने पन्नालाल से सहायता का निवेदन किया लेकिन पन्नालाल ने हाँ नहीं की।
कुछ देर बाद मैं तो कमरे में आ गया था मुझे कुछ ज्यादा ही नशा हो गया था । पार्टी कब खत्म हुई मुझे नहीं पता चला मैं कमरे में आते ही सो गया था। दूसरे दिन सुबह मेरी नींद अचानक खुली। मुझे लगा कि मेरे कमरे का दरवाजा कोई जोर जोर से बजा रहा है मैंने उठ कर दरवाजा खोला सामने माँ थी , “ क्या हुआ “ ? मैंने पूछा। अम्मा ने मुझे जवाब देने के बजाय कमरे में घुसकर चारों तरफ नजरें घुमाई ऐसा लग रहा था कुछ खोज रही है मैंने पूछा “ क्या हुआ यह तो बताओ “ ? माँ ने मुझे घूरते हुए पूछा “ क्या तू रात को पन्नालाल के घर पर गया था ? “
“ नहीं तो। क्या हुआ ? माँ “। जवाब देने की बजाय माँ ने फिर मुझे डांट डपट कर पूछा सच सच बता तू रात को गया था पन्नालाल के कमरे में ? मुझे गुस्सा आने लगा “ मैं बिलकुल नहीं गया उसके कमरे में।
“फिर पन्नालाल कहाँ है? “ माँ का अगला प्रश्न था। “ मुझे क्या मालूम , होगा उसके कमरे में।“ “ तूने पन्नालाल के बिस्किट चुराए क्या?“ मैं चौंका , क्या कह रही हो माँ? तू सच सच बता क्या हुआ रात को और पन्नालाल कहाँ है? मैंने फिर कहा पन्नालाल उसके कमरे में होगा या कहीं गया होगा मुझे कुछ नहीं मालूम और तू बिस्कुट चुराने की बात मुझे क्यों कह रही है?
“ देख पन्नालाल गायब है और घर का सब सामान बिखरा पड़ा है दरवाजा भी खुल्ला है तूने कुछ किया हो तो सच सच बता दे ? “ माँ की बात सुनकर पहले तो मैं चकराया। अचानक मेरे दिमाग में कुछ साजिश की गंध आने लगी मैंने माँ की आंखों में देखा कहीं माँ तो झूठ नाटक नहीं कर रही। हो सकता है माँ ने रात को कुछ किया हो और अब मेरे ऊपर इल्जाम लगा रही है। तभी माँ वापस नीचे की ओर भागी पीछे पीछे मैं भी भागा। पन्नालाल के कमरे का दरवाजा खोलते हुए माँ ने पन्नालाल के घर में झांका। मैंने फिर पूछा “ हुआ क्या है? “ मैंने मां के दोनों कंधे झिन्झोडते हुए चिल्ला कर पूछा “ सच-सच बताओ तुमने कुछ किया है क्या? पन्नालाल कहां गया ? क्या उसके सोने के बिस्कुट तुमने तो नहीं लिए? “ माँ ने इनकार करते हुए बताया कि “ सुबह उठने पर मैं जब पिछवाड़े की तरफ गई तो देखा पन्नालाल के कमरे का दरवाजा खुला था मैंने उसे आवाज दी कोई जवाब नहीं मिला तो मैंने उसके कमरे में झांका। पन्नालाल तो नहीं दिखा पर कमरे का सारा सामान बिखरा हुआ पाया फिर पन्नालाल को आवाज दी तो भी कोई जवाब नहीं। उसके साथ जरूर रात को कुछ हुआ है किसी ने उसके सोने के बिस्कुट तो चुरा लिए और पन्नालाल को …..। “ क्या? “ क्या कह रही हो माँ “ मैं चीखा तभी अचानक मुझे याद आई बड़े भाई और मामा की वह दोनों कहाँ है? माँ भी चौकी हां रे रात को सबसे आखरी तक वह दोनों ही पन्नालाल के साथ थे। माँ ने मुझे कहा तू अभी तत्काल मामा के गाँव जाकर पता लगा वह कहाँ है और क्या कर रहे हैं मैंने तत्काल अपनी सायकल ली और चल पडा मामा के गाँव वहाँ पहुँचा तो मामा के घर पर ताला लगा था। आसपास वालों से पूछा तो पता चला की वह तो रात से ही बल्कि शाम से ही कहीं गए हुए हैं। अब मुझे पूरा पूरा संदेह था कि मामा ने और भाई ने दोनों ने मिलकर ही कुछ बदमाशी की है। पन्नालाल को या तो अगवा कर दिया है या कहीं कैद कर दिया है या हो सकता है उसको मार ही डाला हो और उसके सोने के बिस्किट चुरा लिये , और हो सकता है माँ भी इनकी साजिश में शामिल हो। रास्ते भर में अनुमान लगाता रहा वापस आया माँ को सारी बातें बताई माँ चौंकी उसे भी यही अंदेशा था कि शायद मामा और भाई ने ही कुछ गड़बड़ कर डाली है।अब हम दोनों माँ -बेटे बड़ी बेचैनी से भाई और मामा का इंतजार कर रहे थे।
दोपहर होने को आई थी दोनों का कहीं पता नहीं था। मैं और माँ दोनों घर में अकेले बैठे बेचैन हो रहे थे। आपस में झगड़ भी रहे थे। मैंने फिर माँ से पूछा कि तू भी शामिल होगी इस प्लान में मुझे सच सच बता। माँ कसम खाते हुए बोली कि मामा बहुत उतावला हो रहा था और गुस्से में कह भी रहा था कि “ चाहे कोई गलत रास्ता भी क्यों ना अपनाना पड़े हम पन्नालाल को छोड़ेंगे नहीं। “
बड़े भयभीत होते हुए माँ ने एक राज और उगला। बताया कि एक बार तो मामा ने ये सुझाव भी दिया था कि इसे खाने में कुछ दे दिया जाए और इसके सोने के बिस्कुट चुरा लिये जाएँ। हो सकता है रात में दोनों ने ही कुछ गलत कर डाला हो। हमने पन्नालाल वाला कमरा बाहर से बंद कर दिया था ताकि गाँव वालों को कुछ भनक नहीं लगे। मेरा दिमाग तेजी से सोच रहा था मैं डर भी रहा था और मुझे गुस्सा भी आ रहा था एक पापी विचार भी मेरे दिमाग में जन्म ले रहा था, अगर भाई और मामा ने ही कुछ किया है तो इनको बिल्कुल नहीं छोडूंगा मैं भी अपना हिस्सा लूंगा।
शाम होते होते अचानक मामा और भाई आते हुए दिखे। हम दोनों खुद को रोक नहीं पाए नजदीक आते ही उन्हें माँ के कमरे में दबोच लिया माँ ने तो भाई को दो चार झापट भी जमा दिए फिर पूछा “ बताओ सोने के बिस्किट कहाँ है और पन्नालाल का क्या किया कहाँ है वो ? “ मामा और भाई दोनों एकदम घबराये से लगे तत्काल बोले पन्नालाल कहाँ गया हमें क्या मालूम देर रात को पन्नालाल तो उसके घर सोने चला गया था और हमने बहुत पी ली थी इसलिए हम भी यहीं सो गए थे। हमको पास के गाँव एक व्यापारी से मिलने जाना था ठेके का काम मिलने वाला था इसलिए हम सुबह जल्दी ही निकल गए थे हमको कुछ नहीं मालूम। मैंने माँ को बोला “ यह हम को बेवकूफ बना रहे हैं माँ इन दोनों ने ही मिलकर पन्नालाल के सोने के बिस्किट चुरा लीये हैं और पन्नालाल को भी कुछ कर दिया है। “ अब स्थिति यह थी कि हम चारों आपस में एक दूसरे से लड़ रहे थे गला पकड़ रहे थे। एक दूसरे पर संदेह कर रहे थे आपस में मारा पीटी भी करने लगे थे। बड़े भाई ने मुझ पर हाथ उठाया तो मैंने भी बिना उसका लिहाज किए एक लकड़ी से मामा को और भाई को दोनों को पीट डाला। मामा ने मुझे पकड़ कर मेरे कपड़े फाड़ डाले ईंट पत्थर से मुझे चोट पहुंचाने की कोशिश की सबकी झुमाझटकी के बीच माँ को भी चोंटे आई।
तभी मामा को सूझा कि एक बार पन्नालाल के कमरे की तो तलाशी लें हम चारों लपकते हुए पन्नालाल के कमरे में घुसे शाम का अंधेरा फैलने लगा था। पन्नालाल के कमरे में अभी भी लाइट नहीं जल रही थी हमने मोबाईल के उजाले में पूरे कमरे की स्थिति देखी। एक लकड़ी की अलमारी जिसमें ताला लगा होता था उसका ताला खुल्ला था और अलमारी के अंदर के कपड़े और सामान बिखरा हुआ था पन्नालाल के कमरे में एक पेटी भी रखी थी वो भी खुली थी। यह सब देखकर हम चारों ने एक दूसरे की और फिर घूरते हुए देखा। चारों को एक दूसरे के ऊपर पूरा पूरा संदेह था।
मैं तत्काल वहाँ से बाहर निकल कर अपने र्कमरे में पहुँचा और सारी स्थितियों पर सोचने लगा मैंने अपने कपड़े बदलना चाहे तभी मुझे एक बात सूझी , यदि पन्नालाल के साथ कुछ बदमाशी हुई भी है और सोने के बिस्किट गायब भी हुए है तो ये हरकत मामा ने और बड़े भाई ने ही की होगी। हो सकता है माँ भी इसमें शामिल हो। लेकिन कल को कोई बात बढी और पुलिस केस बना तो कहीं मेरे ऊपर भी कोई इल्जाम ना आ जाए। ऐसे में क्या यह उचित नहीं होगा कि पुलिस थाने जाकर इसकी रिपोर्ट लिखा दी जाए कि मुझे इनके द्वारा मारा पीटा गया है। अभी तो मेरे कपडे भी फटे हुए हैं तो उसी स्थिति में मैं गांव की पुलिस चौकी पर पहुँच गया वहाँ ड्यूटी पर बैठे साहब को मैंने पन्नालाल की बात छुपाते हुए आपसी झगड़े की बात बताकर मुझे मारने पीटने की और पैसे माँगने की कहानी सूना दी।
हेड साहब ने मेंरी रिपोर्ट . न लिखते हुए सामान्य शिकायत लिखकर मुझे वहीं पर बिठा लिया और एक जवान को भेज कर मामा और भाई को बुलवा लिया। कुछ ही देर बाद बड़े भाई और मामा तथा माँ तीनो वहाँ पर आ गए थे। हेड साहब ने उन्हें डपटते हुए मुझसे मारापीटी का कारण पूछा। उन तीनों ने मेरे विरुद्ध चोरी करने की शिकायत लिखवा दी । हेड साहब ने हम चारों को वहीं थाने पर बैठने का कह कर दो जवानों को हमारे घर की और भेजा। हम चारों चिंतित थे ना जाने अब क्या होगा ? और कुछ ही देर बार हेडसाहब ने हमसे फिर पूछताछ शुरू की। अबकी बार उनका तरिका बिलकुल अलग था। या तो जवानों को कुछ पता चला हो या हमारे झगड़े को किसी गाँव वाले ने सुनकर पुलीस को बता दिया हो क्योंकि हेडसाहब का सीधा प्रश्न था कि सच सच बताओ तुम्हारा आपसी झगड़ा क्यों हुआ ? किन बातों के कारण हुआ ? हम घबरा रहे थे लेकिन हमने किसी ने भी पन्नालाल का जिक्र नहीं किया था लेकिन तभी वहाँ अन्दर आफिस में बैठे थानेदार ने हमारे पास आकर हमसे जो पूछा उस एक प्रश्न ने हम सबको सकते में डाल दिया। थानेदार ने स्पष्ट पूछा कि “ तुम्हारा किराएदार पन्नालाल कहाँ है ? कहीं गया है या तुमने उसे गायब किया है ? “ हम चारों चुप थे। उसके बाद थानेदार ने जो चाल चली वह कामयाब हो गई । उसने हम में से एक एक को अलग अलग ले जाकर धमकाते हुए पूछताछ की और सच बताने के लिए दबाव डालने लगा। चूंकि मैं तो निर्दोष था मैंने कुछ नहीं किया था। मैंने ज़रा भी देर नहीं लगाई सारी कहानी थानेदार को बता दी कि पन्नालाल हमारा किराएदार था उसके पास बहुत पैसे रहते थे उसने सोने के बिस्किट भी बनवाए थे। उन सोने के बिस्कुट पर मेरी माँ की भी नजर थी और मेरे मामा और भाई की भी नजर थी तो इन लोगों ने रात में उसको पिलाया खिलाया उसके बाद मुझे पता नहीं क्या हुआ। मैं तो अपने कमरे में चले गया था। थानेदार चौंका मेरी बात सुनकर उसे लग गया की कोई बड़ी गड़बड़ हुई है। उधर मामा और भाई ने भी यही कहानी हेड साहब को सुनाई लेकिन उसमें अपराध का आरोप माँ पर और मुझ पर लगा दिया। माँ ने जो बयान दिया उसमें आरोप हम तीनों पर लगाया गया परिणाम यह हुआ कि हम चारों की अच्छी तरह से ठुकाई होती रही उस रात हम चारों को थाने पर ही लाकअप रूम में बंद कर दिया गया सुबह हम चारों को हमारे घर ले जाया गया। वहाँ का पंचनामा बनाया गया कमरे की एक एक चीज की जांच की गई और लंबी चौड़ी रिपोर्ट तैयार की जाने लगी फिर हमें वापस थाने में बंद कर दिया गया।
सारे गाँव में हो हल्ला मच गया था। सभी की जुबान पर एक ही बात थी कि रामू माट्साब ने और उनके भाई मामा और माँ वगैरह ने अपने किरायेदार पन्नालाल के सोने के बिस्कुट लूट लिए हैं और पन्नालाल को मार डाला है या कहीं गायब कर दिया है। पुलिस थाने पर हमारी पिटाई जारी थी और अब ज्यादा सख्ती से पूछताछ भी की जा रही थी। कोठरी में बैठा में अब पश्चाताप कर रहा था। मेरे मन में लालच क्यों जागा? मैंने कोई अपराध नहीं किया था लेकिन मैं उस बेईमानी की स्थिति में तो पहुंच ही गया था कि कुछ ना कुछ करके पन्नालाल से पैसे लेना है। दोपहर में जब हमें एक दूसरे से बात करने का कुछ मौका मिला तो मैंने भाई , मामा और माँ से रोते हुए हाथ जोड़कर पूछा तुमने ऐसा क्यों किया ? पैसे के लालच में सब को फंसा दिया मैं तो निर्दोष था फिर मेरा नाम क्यों लिया ?
मामा और भाई बहुत शातिर थे वे दोनों रोने का नाटक कर रहे थे। भगवान की कसम खा रहे थे और कह रहे थे “ हमने कुछ नहीं किया है। हम सच कह रहे हैं पर हाँ हमने सोच लिया था कि पन्नालाल को निपटाना है। हम बहुत परेशान हो गए थे पन्नालाल के पीछे पड पड के पैसों के लिए , लेकिन वो नहीं मान रहा था तो हमने तय किया था कि चाहे कुछ भी गलत करना पड़े उसके सोने के बिस्कुट हड़पना है। पर हम कुछ करते उसके पहले ही किसी और ने यह कर डाला। हमने सच में कुछ नहीं किया है।” हम तीनों की नजरें माँ की तरफ गई। क्या माँ ने कुछ गड़बड़ घोटाला किया है ? हालांकि अकेली माँ ऐसा कुछ नहीं कर सकती ये हम समझ रहे थे , पर फिर भी हमने जब उसके ऊपर दबाव डाला वह भी फूट फूट कर रो पड़ी खुद को निर्दोष बताने लगी। पुलिस वालों की खुसुर पुसर से हम अंदाजा लगा रहे थे कि उनके अनुसार हम चारों का ही हाथ इस साजिश में हो सकता है।
पुलिस ने हमें न्यायालय में पेश कर तीन दिन की रिमांड ले ली थी। इस दौरान हम पर सब कुछ सच सच बताने के लिए मारा पीटी के साथ अब ज्यादा सख्ती की जा रही थी।
हमसे पन्नालाल के गाँव का घर का पता पूछा गया। हम सिर्फ यही बता पाए कि राजस्थान के गंगानगर जिले में किसी गाँव में रहता है गाँव का नाम शायद करौली है। पुलिस ने गाँव के अन्य कुछ ठेकेदारों कारीगरों से और राजस्थान से आये मजदूरों से भी उसका पता पूछा। उसका मोबाइल नंबर हमसे लिया। मोबाइल नंबर पर लगातार बात करने के प्रयास किए जा रहे थे लेकिन उधर से कोई जवाब नहीं आ रहा था। दो दिन बीत चुके थे दोनों दिन हमें बहुत प्रताड़ित किया जा रहा था लगातार पूछताछ की जा रही थी। हम चारों का रो रो कर बुरा हाल था। इस दौरान पुलीस की एक टीम राजस्थान के गंगानगर जिले में करोली गाँव में पहुँच कर पन्नालाल को तलाश कर रही थी। तीसरे दिन सुबह की 9:00 बज रही थी तभी थाने के एक सिपाही ने हमें आकर कुछ मुस्कुराते हुए कहा मुझे मिठाई खिलाओ तो मैं एक अच्छी बात बताता हूँ हम चारों चौके ! क्या खुश खबर हो सकती है?
मामा ने तत्काल सौ का एक नोट निकाल कर उसे दिया , फिर जो उसने बताया उसे सुनकर हम आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी में थे। सिपाही का यह कहना था कि तुम्हारा पन्नालाल तो जिंदा है। वह तो राजस्थान उसके गाँव में है और तुम लोग उसके मर्डर के नाम पर जूते खा रहे हो।“ और सोने के बिस्कुट? उनका क्या कहा पन्नालाल ने?“ हमने तत्काल सिपाही से पूछा। “ इस बारे में तो पन्नालाल ने कुछ नहीं कहा कि उसके सोने के बिस्किट चोरी हुए हैं। “ हम चारों बहुत बेचैन थे हमने फिर उस जवान से पूछा , कि “ अब हमारा क्या होगा “ सिपाही ने कहा कि पुलिस टीम पन्नालाल को लेकर आ रही हैं । पहले पन्नालाल के बयान होंगे फिर तुमसे कुछ पूछताछ होगी और शायद कुछ गलत नहीं मिला तो उसके बाद तुम्हें छोड़ दिया जाएगा।
हम चारों एक दूसरे की और अविश्वास भरी नजरों से देख रहे थे। हमें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि हम में से किसी ने भी पन्नालाल को मारने की या उसके सोने के बिस्किट चुराने की कोशिश नहीं की है। लेकिन हम बेईमान तो थे क्योंकि कोशिशें तो हमने की थी। अपराध तो हमारे मन में पैदा हो चुका था , पाप जन्म ले चुका था। बस हमें अवसर नहीं मिला था कि हम हमारे पाप कर्म को कर डालें। यानी हम अभी तक अपराध से इसलिए बचे हुए थे क्योंकि हमें अपराध करने का मौका नहीं मिला था। हम वैसे ही फर्जी ईमानदार लोग थे जैसे सुदूर जंगल में ऊंचे पर्वतों पर बैठा हुआ ब्रह्मचारी जिसका किसी स्त्री से कभी सामना ही नहीं हुआ है लेकिन वह ब्रह्मचारी होने के बड़े बड़े दावे करता है। दोपहर होते-होते राजस्थान गई पुलिस टीम पन्नालाल को लेकर वापस आ चुकी थी। पन्नालाल का बड़ा सादा सिंपल बयान था कि उस रात उसके मकान मालिक परिवार के साथ वो पार्टी कर रहा था खापीकर वो अपने कमरे में सोने आ गया था तभी उसके एक राजस्थानी साथी ने आकर बताया की मेरी माँ की तबियत बहुत खराब है तत्काल वहाँ पहुँचना बहुत जरूरी है। बाहर बहुत बारीश हो रही थी , बिजली नहीं थी मेरे दोस्त के पास मोटरसायकल थी जाना बहुत मुश्किल था पर बहुत जरूरी भी था। मैंने जाने का निर्णय लिया तभी मुझे अपने सोने के बिस्कुट का ध्यान आया और मैंने जल्दी जल्दी में ताबड़तोड़ अलमारी पेटी खोलकर जहाँ सोने के बिस्किट छुपा कर रखे थे वहाँ से निकाले अपने पास रखे अँधेरे में ही अपने कुछ कपडे तलाशे और बाहर निकल आया इस जल्दबाजी में मैने सारा घर बिखेर दिया था। मुझे अपने कमरे का ताला चाभी भी नहीं मिल रहा था , मैंने इन सबकी ज़रा भी चिंता नहीं की बाहर आकर रामू मास्टर को दो तीन आवाज देकर उन्हें बताना चाहा। अम्मा को भी आवाज दी पर सब गहरी नींद में थे या नशे में होंगे। किसी का कोई जवाब नहीं आया इसलिए मैं तत्काल मोटर सायकल से अपने दोस्त के साथ गाँव से निकल कर नजदीक के रेलवे स्टेशन पहुँच गया और अपने गांव चला गया। यहाँ पर क्या हुआ मुझे नहीं मालूम लेकिन ना तो मेरे बिस्किट किसी ने चुराये है और ना ही किसी ने मुझे मारने की या नुक्सान पहुंचाने की कोई चेष्टा की है । रामू मास्टर साहब से इनकी माँ उनके भाई या उनके मामा से मुझे कोई तकलीफ नहीं है। हमारा कोई झगड़ा भी नहीं है।
इस बयान के बाद पुलिस ने हमसे भी एक लिखित बयान करवाया। जमानत के रूप में एक दो लोगों के दस्तखत लिए और हमें छोड़ दिया। हम थके हारे लुटे लुटे से घर पहुँचे पन्नालाल तो गाँव में ही कहीं रुक गया था। हम चारों माँ के कमरे में बैठे एक दूसरे से कुछ भी नहीं बोल पा रहे थे। कानून ने हमें निर्दोष मान कर छोड़ दिया था। गाँव के लोग भी शर्मिंदा थे हमें अपराधी समझने के लिए। पुलिस वालों ने भी हमें सॉरी बोला था उनके दुर्व्यवहार के लिए। इन सबकी नजरों में हम अब सभ्य और ईमानदार लोग थे । लेकिन मैं जान रहा था कि हम चारों पुरी तरह से निर्दोष नहीं थे क्योंकि हमारे मन में भी आपराधिक दुष्ट प्रवृत्तियां तो जाग ही चुकी थी । जिन बातों के हम पर इल्जाम लगे थे वह सब हम करना तो चाहते थे लेकिन हमें मौका नहीं मिला। हम अपने आप को अपराधी या पापी मानने से बच नहीं सकते थे। हम चारों ही मानसिक रूप से हत्यारे थे। साथ ही हम तीनों के अलावा माँ भी हमारे अपराध में सहायक थी। सारी रात हम सो नहीं पाए। पन्नालाल को गांव में लोगों से सारी कहानियां पता चल चुकी थी जो हमने एक-दूसरे पर इल्जाम लगाए थे। वह समझ गया था कि हम लोगों ने भले ही कुछ अपराध न किया हो लेकिन हमारे मन जरूर पापी हो चुके थे। उसने गाँव में कहीं एक दूसरी जगह मकान देख लिया था और हमारा मकान खाली कर अपना सारा सामान ले जा रहा था। मैं अपने कमरे में बैठा आँगन में नजर डाल रहा था , जहाँ हम तीनों चारों की ईमानदारी क्षत-विक्षत हो कर मृत रूप में पडी थी। भाई और मामा तथा माँ को क्या दोषी ठहराऊ मैं स्वयं जो अपने आप को बहुत ईमानदार और नेक समझता था ज़रा से लालच में आकर अपने सारे सिद्धांत और ईमानदारी खो चुका था। मैं वास्तव में किसी निर्जन पहाड़ पर बैठा ढोंगी ब्रह्मचारी ही साबित हुआ था।
- महेश शर्मा
लखनऊ उत्तरप्रदेश भारत के निवासी होकर बैंक सेवा से रिटायर्ड अधिकारी। कहानी, कविता,गीत, गजल और लघुकथा में समान अधिकार से लेखन। देश की अधिकांश पत्र पत्रिकाओं मे रचना प्रकाशन। म प्र शासन एवं विभिन्न संस्थाओं समूहों से सम्मान, पुरस्कार प्राप्त। कहानी गरम रोटी पर दिल्ली में नाट्य मंचन।दो कहानी संग्रह, एक गीत संग्रह और दो उपन्यास प्रकाशित। एक लघुकथा संग्रह, एक गजल संग्रह और एक उपन्यास शीघ्र प्रकाश्य। लघुकथा लेखन पर शब्दनिष्ठा पुरस्कार
पता- महेश शर्मा द्वारा 102 पेराडाइज होम्स मोहसीन लेन सरफराज गंज एरा मेडिकल कॉलेज के सामने लखनऊ पिन 226003 उत्तर प्रदेश
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