Sunday, October 18, 2026
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नरेंद्र कौर छाबड़ा दो कविताएँ

जमीन से जुड़ा

गगनचुंबी इमारत के जंगल में
चालीसवीं मंजिल की बालकनी में बैठी
नीचे सड़क पर चलते लोगों को देख
सोच रही हूं
क्या यह शहर बौनों का है हर व्यक्ति दो-तीन बालिश्त का ही तो नजर आता है

कर्म निर्वाहन हेतु
जब सड़क पर उतरी
तो सभी इंसानों को समतुल्य पाया
एक भी बौना नहीं था
तो यह दृष्टि भ्रम था

ऊंचाई पर खड़े हो
नीचे नजर जाएगी तो सबका कद छोटा ही महसूस होगा
फिर चाहे वे इंसान हो
पेड़ मकान हो
नदी पहाड़ हो
आकाश में विचरते
बादल पंछी या
समुद्र ही हो
यह नजारा हम
अक्सर प्लेन से देखते हैं

और जब जमीन पर
खड़े हो
ऊपर देखते हैं
तो सब कुछ
कितना विशाल अद्भुत अनन्य अनंत नजर आता है
कितना श्रेष्ठ होता है
सदा जमीन से जुड़े रहना
क्योंकि ऊंचाई से नीचे गिरने की संभावना
सदा बनी रहती है
पर जमीन से जुड़ा
भला कहां गिरेगा

सन्नाटे की चीख

भीतर का सन्नाटा
वर्षों से
सुषुप्तावस्था में पड़ा रहा

मन के भीतरी कोने में

परत दर परत
उस पर जमती रही
खामोशी की।

जैसे ज्वालामुखी के फटने पर भीतर सुलगता लावा
भीषण तपिश से
बह निकलता है
आज वह सन्नाटा भी
चीखता हुआ बाहर आ गया।

उसका रौद्र रूप देख
चारों ओर का शोर
कोलाहल डरकर थम से गए
कुछ देर के लिए जड़ हो गए
कहां से आया
यह भयावह सन्नाटा?
यही प्रश्न था
सब की जुबान पर
लेकिन किसी की
हिम्मत नहीं पड़ी
सन्नाटे से आंखें मिलाने की क्योंकि इन चीखों
शोर कोलाहल और
चीत्कारों ने ही तो
जन्म दिया था सन्नाटे को ।

नरेंद्र कौर छाबड़ा
मो 9325261079

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