Sunday, October 18, 2026
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सुरेश चौधरी के दोहे

1.
उजियारा होते छिपें, तम में करें विहार।
तिलचट्टों की चाल पर, चलते आज विचार॥

2.
कॉकरोच से भागते, डरकर सारे लोग।
जहाँ मिले कुछ जूठनें, वहीं लगाएँ भोग॥

3.
इधर-उधर वे दौड़ते, टेढ़ी उनकी चाल।
मारे कोई आदमी, तिलचट्टा बेहाल॥

4.
कितना भी हो स्वच्छ घर, फिर भी आएँ चार।
तिलचट्टे समझा रहे—कैसा यह संसार॥

5.
अग्नि धुएं से है ढकी, दर्पण ढांपे धूल।
लोभ ढके जब ज्ञान को, बिगड़े जीवन-मूल॥

6.
विष बिच्छू की पूंछ में, मक्षिका के है माथ।
गरल सर्प के दंत में, दुर्जन के सब गात॥

7.
सद्-विचार मन में रखै, संभव सब हो जाय।
माटी भी फिर यत्न से, कंचन रूप लखाय॥

8.
शशि से रजनी, रवि दिवस, धर्महि तीनों लोक।
सुत-सपूत से कुल खिलै, मिटै सकल भय शोक।।

9.
मन धन अस्थिर जान ले, मृत्यु आय तन जाय
यौवन बुझता समय पा, कीरति सदा सहाय।।

10.
वाणी मधुर उदारता, धीरज निर्णय शक्ति
चार प्रकृति के जन्य हैं, आयें न किये भक्ति।।

11.
अन्न दान सबसे बड़ा, दूजा अन्य न दान
रखे सकल है जगत को, जीवित अन्न महान।।

 

सुरेश चौधरी, कोलकाता
मोबाइल – +91 98300 10986

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