Sunday, July 12, 2026
होमलेखवो कहकहे उनके… वो उनकी ख़ामोशियाँ-आरती स्मित

वो कहकहे उनके… वो उनकी ख़ामोशियाँ-आरती स्मित

यादों की अलगनी पर जब टाँगती हूँ संबंध— दिखते हैं कुछ नए-पुराने, छुए-अनछुए पहलू जो समय की धूप-बरसात में संबंध को पुख़्ता कर गए या कि कमज़ोर। कुछ के रंग गहराए तो कुछ के बदरंग हुए। ऐसे ही पहलुओं को खंगालती हुई जब समय की तपिश और रुनझुन बूँदों के बीच टिके संबंधों को देखती हूँ तो मुस्कुराता है कोई….. एक चेहरा। चिरपरिचित। वे बेहद अज़ीज़ नहीं थे…..  केवल परिचित मात्र भी नहीं। पीढ़ीगत अंतर तो कभी पनपने दी ही नहीं। जब मिले खुले मन से, बेलौस अंदाज़ में कहकहों को न्योता देते हुए। यह उनकी विशिष्टता ही थी कि दो-एक मुलाक़ात के बाद औपचारिकता किसी पतली गली से मुँह छुपाए निकल गई और वे ‘सर’ से ‘शिव कुमार जी’/ ‘शिव जी’ हो गए और उनके मित्र रंजन कुमार ‘रंजन भैया’। दोनों मित्रों को मैंने सिक्के के दो पहलू के रूप में ही पाया। अलग होते हुए भी अभिन्न रूप से परस्पर जुड़े हुए।

शिव कुमार शिव

समय के ताने-बाने को खींचूँ, कसूँ तो यादों की कोठरी में उनसे जुड़ी पहली किरण जगमगाती है। वर्ष 2008, संभवतः अगस्त का महीना। किस जगह– चित्रशाला में या कहीं और, स्मृति की रेखाएँ धुँधली हैं। आकाशवाणी के तत्कालीन निदेशक मानव जी ने मिलवाया था। सावन-भादो की झड़ी के बीच ही उन्होंने ‘क़िस्सा’ पत्रिका पर चर्चा करने के लिए मानव जी सहित कुछ अन्य साहित्यकार मित्रों को भी अपने आवास पर आमंत्रित किया था। मुझे लिवा लाने की ज़िम्मेदारी मानव जी को सौंपी थी। पारिवारिक एवं सामाजिक परिवेश ही ऐसा रहा कि अपने से एक पीढ़ी या उससे भी अधिक वरिष्ठ साथियों से पहली-दूसरी मुलाक़ात में ही खुलकर संवाद करना स्वभाव में शामिल न हुआ था, तो मैं अच्छी श्रोता थी। हाँ, वह शाम कविताओं की शाम भी रही, जिसमें मैंने भी शिरकत की और उन्होंने संभावनाएँ जताईं। यों तो बतौर कथाकार एवं कवयित्री आकाशवाणी से मेरा गहरा नाता 1995 से रहा। श्रोताओं का भरपूर प्यार पाने का सौभाग्य अनवरत मिलता रहा। मंचों से भी कई रूपों में वर्षों पहले से जुड़ाव रहा, किंतु किसी वरिष्ठ साहित्यकार के आवास पर जाकर अनायास कुछ सुनने-सुनाने का यह पहला अवसर था तो झिझक तारी थी। वरिष्ठ साथियों से घिरी स्मिता मिश्रा और मैं— हम दोनों झिझक की मोटी चादर में लिपटे थे जिसे शिव जी की अनुभवी दृष्टि से परख लिया और अपनी बातचीत में हमें शामिल करने को उत्प्रेरित करते रहे। उनकी आँखों में किसी का इंतज़ार दिखता रहा और वे दरवाजे को देखते हुए इधर-उधर की बातें करते रहे जब तक सफ़ेद शर्ट-काले पैंट और उस उमस भरे मौसम में भी टाई लगाए एक दुबली-पतली काया ने हंगामा मचाते हुए प्रवेश न किया। यह थे उनके अभिन्न मित्र रंजन जी! इस मुलाक़ात में शिव कुमार जी अपेक्षाकृत शांत, गंभीर और रंजन जी चंचल जान पड़े, किंतु यह विचार समय के बढ़ते क़दम और बढ़ती मुलाक़ातों के साथ टिका न रहा। उसके बाद की अधिकांश मुलाक़ात अनौपचारिक और ख़ुशनुमा ही रही। उस शाम वाले धीर-गंभीर शिव कुमार जी साहित्यिक गोष्ठियों के अतिरिक्त कभी उस रूप में न दिखे। यह सहजता ही मुझे उन दोनों से जोड़ गई — साहित्यिक या किसी वैचारिक चर्चा पर गंभीर अन्यथा बेपरवाह…. कहकहों से भरा घड़ा फोड़ते हुए। घर-परिवार की बातों से लेकर समाज और साहित्य समाज को लेकर शिव कुमार जी मज़ेदार क़िस्से सुनाते कि रोकते-रोकते भी हँसी फूट पड़ती।

यादों की कोठरी में कुछ पल क्रम से रखे हैं तो कुछ बेतरतीब। बेतरतीबी भी कभी-कभी मोहक होती है। ऐसे ही मोहक पलों का दौर था जब शिव कुमार जी की पुस्तक ‘महुआ घटवारन’ पर परिचर्चा ‘श्रीयश’ के हॉल में रखी गई थी। संचालन का दायित्व-निर्वहन रंजन जी कर रहे थे। रंजन जी के ही बार-बार दबाव देने पर लोकसंस्कृतिपरक इस रचना के लिए शिव जी मन बना पाए थे और अब वह कृति सुंदर कलेवर में सबके सम्मुख थी। इस प्रकार, एक कथाकार के भीतर का रचनाकार अपने विविध लेखकीय गुणों के साथ हिंदी साहित्य-समाज के सामने आता और अपनी खूबियों से चकित करता रहा।

यादों के झुरमुट को हटाती, जगह बनाती हुई आगे बढ़ूँ तो एक यादगार दिन याद आता है। वर्ष 2009! कविता संग्रह ‘अंतर्मन’ के रूप में मेरी पहली पुस्तक के लोकार्पण सह परिचर्चा के अवसर पर कथाकार शिव कुमार जी, रंजन जी, कविहृदय मानव जी, मेरे माता-पिता, शहर के सुप्रसिद्ध चिकित्सक एवं साहित्य-संस्कृति से जुड़े डॉक्टर लक्ष्मीकांत सहाय -– सभी एक साथ एक मंच पर उपस्थित रहे। यह दृश्य मुझे भावुक कर गया— मेरे पिता को भी। जब उनसे कुछ कहने को कहा गया तब वे भावुकतावश रो पड़े और मैंने उन्हें बाँहों में भर लिया। उनके बाद शिव कुमार जी को अपने विचार रखने थे। शिव कुमार जी ने कहा, “इससे उम्दा कविता क्या हो सकती है, जो अभी-अभी इस क्षण ने लिखा। इसके आगे सब शब्दों की कलाबाज़ी है।” वे कुछ पलों के लिए मौन हो गए। यह सच ही था। पिता के आँसू भारी थे हम सब पर। शिव कुमार जी भावुक हो गए थे। शायद, उस क्षण उन्हें अपनी बेटी अनामिका की याद आ गई। उस पल मुझे एक पिता दिखा। वत्सलभाव से छलछलाते हृदय वाला संवेदनशील पिता। कुछ क्षण बाद उन्होंने बोलना आरंभ किया। उनके द्वारा प्रस्तुत की गई समीक्षा कविता पर उनकी पकड़ दर्शाती थी। मेरे लिए यह उनका नया रूप था। उन्होंने उन सभी बारीक सूत्रों/उन महीन धागों को सामने रख दिया, जिनमें मेरी कविता पिरोई गई थी। वे नोट बनाकर नहीं लाए थे। कुछ संकेत चिह्नों की टीप ली थी और अपनी बात रखते गए थे। वर्ष 2010 में मेरे और मानवजी के साझा कविता संग्रह ‘ज्योति कलश’ के विमोचन एवं परिचर्चा में भी शिव कुमार जी ने महती भूमिका निभाई। 2009 से 2011 मार्च तक बाज़ार आने-जाने के क्रम में अधिक अनौपचारिक मुलाक़ातें हुईं। अनौपचारिक मुलाक़ातों का भी कोई क्रमबद्ध सिलसिला स्मृति में दर्ज़ नहीं। उनके ‘कहन’ में कुछ ऐसा होता कि बुलावे को नकारना संभव न होता। और यह अक्सर तब होता जब हमलोग सुजागंज बाज़ार में ख़रीदारी के लिए डोल रहे होते और आनंद होटल वाली गली के बेसमेंट में अवस्थित अपने ऑफ़िस में वे मौजूद होते। फिर तो दस मिनट के लिए सोचकर जाना उनकी क़िस्सागोई में घंटे में बदलता हुआ इसका आभास देता जाता, ख़ासकर जब मानवजी साथ होते और शिव कुमार जी विनोदी भाव से भरे एक के बाद एक मज़ेदार प्रसंग सुनाए जाते। हँसी की फुहार बरसती रहती। इस समय उनकी बेतकल्लुफ़ी, उनका बिंदास अंदाज़ देखने लायक़ होता। भाषा तेल लेने चली जाती। किंतु अपने या हमारे परिवार व बच्चों की बात करते हुए उनकी आँखों में वत्सलभाव अपनी नमी एवं नरमी ओढ़े बिछ जाता। अपने पति एवं बेटे के साथ भी मेरा एक-दो बार वहाँ जाना हुआ, तब हमारे बीच औपचारिकता की गंध अधिक होती। एक अभिभावक की तरह गंभीर। ऐसा भी हुआ कि उनसे विशेष तौर पर मिले बिना बच्चे उन्हें जानने लगे। कारण, जाड़े के दिनों में कभी ख़रीदारी करके लौटते हुए उनसे मिलना होता तो मेरे सौ ना-नुकर के बावज़ूद वे हक़ के साथ कभी थोड़ी गरम जलेबियाँ पैक करवा देते, कभी उस गली का प्रसिद्ध घेवर। यह कहते हुए कि “तुम्हारे लिए नहीं, बच्चों के लिए है।”

उस क्षण, उनके स्नेह को नकारना संभव न होता। मेरे बच्चों से उनकी मुलाक़ात कुछ ख़ास-ख़ास साहित्यिक कार्यक्रमों में हुई होगी, मगर परस्पर संवाद हुआ हो, ऐसा न था। कुछ तो था जो एक डोर का काम करता था— शायद बच्चों के प्रति उनका अतिरेक लगाव जिसे प्रदर्शित करना बेशक उन्हें न आता हो, मगर वह वत्सल भाव उनके व्यवहार में दिख ही जाता।

समय ने अपनी गति से बढ़ते हुए समझ बढ़ाई तब उन्हें ज्यादा समझ पाई और उनके माध्यम से इस बात को कि समाज की दुरवस्थाओं पर गहरा चिंतन करने और उसे बेहतर बनाने की अपनी कोशिश करने वाला हर व्यक्ति — चाहे वह संवेदना और विचारों को क़लम की स्याही बनाकर काग़ज़ पर उतारनेवाला रचनाकार हो या अन्य, यदि अन्य सांसारिक कार्यों को करते हुए स्वयं को हल्का-फ़ुल्का न रखें तो कुछ हो न हो, उच्च रक्तचाप का शिकार अवश्य हो जाएगा। याद आए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद और उनके ठहाके; अब तक इस सरल-सहज रूप में केवल डॉक्टर लक्ष्मीकांत सहाय को देखा-जाना था। वक़्त के बढ़ते क़दम के साथ स्वयं को भी उसी रूप में पाने की अनुभूति अब उनके व्यक्तित्व-कृतित्व की एक मुकम्मल और पुख़्ता तस्वीर सामने लाती है।

         वर्ष  2009-2010 में ही आकाशवाणी में एक विशेष कथागोष्ठी का आयोजन कर तत्कालीन निदेशक शिवमंगल सिंह ‘मानव’ ने सभी कथाकारों को यादगार भेंट दे दी। भागलपुर शिक्षा एवं हिंदी साहित्य जगत् के अभिभावक डॉक्टर राधाकृष्ण की अध्यक्षता में शिरकत करना हम सभी के लिए प्रसन्नता का कारण था। अरविंद कुमार , शिव कुमार शिव, रंजन कुमार, प्रतिभा राजहंस और सबसे बहुत छोटी मैं— किंतु झिझक के लिए कहीं कोई जगह न थी। उस दिन रिकॉर्डिंग के दौरान सभी को प्रत्यक्ष सुनना, विशेषकर राधा बाबू को और सुनाना दोनों आह्लादित करने के लिए पर्याप्त रहा। इस कार्यक्रम को श्रोताओं का बहुत प्यार मिला। शिवकुमार जी को सुनने का यह तीसरा अवसर रहा। वर्ष 2011 मई से दिल्ली प्रवास की आपाधापी में फिर लंबे समय तक मिलने का संयोग न बना।

याद आती है वह शाम— वर्ष 2017 की। अपने ट्रस्ट की ओर से डॉक्टर राधाकृष्ण सहाय को सम्मानित करने हम उनके आवास पर गए। रंजन भैया ने कुछ ख़ास मित्रों को इस अवसर पर बुलावा भेजा था। हमारे पहुँचने से पूर्व डॉक्टर अरविंद के घर सभी पहुँच चुके थे। शिव कुमार जी से यहीं मुलाक़ात हुई और हल्की-फुलकी बातचीत भी। राधा बाबू को लेकर सभी चिंतित थे। वातावरण में गंभीरता विचरती रही थी। शिव कुमार जी अधिकांश समय ख़ामोश ही रहे— अपने भीतर कुछ खंगालते हुए-से। तब अनुमान न था कि उनसे भी फिर मुलाक़ात का योग न बनेगा। हालाँकि उसके बाद भी लगातार भागलपुर जाना हुआ किंतु बेहद सीमित समय के लिए। वर्ष 2021 ने कोरोना का ज़हर फैलाकर कई साथी छीन लिए। शिव कुमार जी के इस तरह जाने की सूचना से कहीं कुछ चटका था और धीरे-धीरे स्मृतियों ने उनसे जुड़े प्रसंगों का पिटारा खोल दिया था।

कई छोटी-छोटी खिलखिलाती स्मृतियाँ फुदकी बन मन-आँगन में विचर रही हैं, सबको काग़ज़ पर उतार पाना मुमकिन नहीं। जब भी भागलपुर के उस बाज़ार से, आनंद होटल की उस गली से गुज़रना होता है, यादें झप से आकर गले मिल लेती हैं और गूँजने लगता है आसमान का ख़ास टुकड़ा उन कहकहों से……

संपर्क :

डॉ. आरती स्मित

दिल्ली

 मोब : 8376836119

ईमेल : [email protected]

आरती स्मित
आरती स्मित
तीन कविता संग्रह, दो कहानी संग्रह, दो बाल साहित्य, दो आलोचना संग्रह, 40 से अधिक पुस्तक अनुवाद, धारावाहिक ध्वनि रूपक एवं नाटक, रंगमंच नाटक लेखन, 20 से अधिक चुनिंदा पुस्तकों में संकलित रचनाएँ, बतौर रेडियो नाटक कलाकार कई नाटकों में भूमिका. विभिन्न उच्चस्तरीय पत्रिकाओं में सतत लेखन. सत्यवती कॉलेज,दिल्ली में अध्यापन. सम्पर्क - [email protected]
RELATED ARTICLES

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest