Wednesday, April 8, 2026
होमशख़्सियत / व्यक्तित्वरेडियो पत्रकारिता के एक युग का अंत - शिवकांत

रेडियो पत्रकारिता के एक युग का अंत – शिवकांत

मार्क टली नहीं रहे

पुरवाई परिवार की ओर से श्रद्धांजलि

 

बीबीसी की भारत आवाज़ के नाम से मशहूर पत्रकार, प्रसारक और टीकाकार सर मार्क टली नहीं रहे। वे 90 वर्ष के थे और पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उनके निधन पर भारत और ब्रिटेन समेत दुनिया के कोने-कोने से उनके प्रशंसकों, पत्रकारों और नेताओं के संवेदना संदेश आ रहे हैं।

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक्स पर लिखा, सर मार्क टली के निधन से दुख हुआ। वे पत्रकारिता की एक प्रभावशाली आवाज़ थे। उनके काम में भारत और यहाँ के लोगों से उनका जुड़ाव साफ़ दिखता था। उनकी रिपोर्टिंग और उनके विचारों ने सार्वजनिक विमर्श पर एक स्थायी प्रभाव छोड़ा है। उनके परिवार, दोस्तों और असंख्य प्रशंसकों के प्रति संवेदनाएँ।”

कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने एक्स पर लिखा, “मुझ जैसे कई लोग उनकी आवाज़ सुनते हुए और उनकी किताबें पढ़ते हुए बड़े हुए। मैं उसी इलाके में रहने लगा जहाँ वह सालों तक रहे और जिसे उन्होंने बहुत प्यार किया। आपकी यात्रा मंगलमय हो, पद्मश्री सर मार्क टली।”

हिन्दू मीडिया समूह की निदेशक मालिनी पार्थसारथी ने लिखा, “मार्क टली के निधन की ख़बर सुनकर दु:ख हुआ। उन्हें भारत के प्रति उनके जुनून और समर्पण के लिए प्यार से ‘टली साहब’ कहा जाता था…वे एक लेजेंड और आइकॉन थे। वे शायद उन कुछ लोगों में से थे जिन्होंने ब्रिटिश राज से एक आज़ाद देश बनने तक बदलते भारत को सचमुच समझा।”

बीबीसी के ही एक और दिग्गज प्रसारक और लेखक जॉर्ज ऑरवेल की तरह मार्क टली का जन्म भी भारत में हुआ था। वे 1935 में भारत के कोलकाता महानगर में पैदा हुए जहाँ उनके पिता एक कारोबारी थे। उनकी माँ का जन्म बंगाल में हुआ था। उनका परिवार पीढ़ियों से भारत में कारोबारी और प्रशासक के तौर पर काम करता आ रहा थदूसरा महायुद्ध समाप्त होते ही नौ वर्ष की आयु में मार्क को शिक्षा के लिए ब्रिटेन भेज दिया गया था। यहाँ उन्होंने केंब्रिज से इतिहास और धर्मशास्त्र की पढ़ाई की। आरंभ में वे पादरी बनना चाहते थे लेकिन बाद में मन बदल गया और बीबीसी ने उन्हें 1965 के भारत पाकिस्तान युद्ध के दिनों में प्राशासनिक सहायक बनाकर भारत भेज दिया। पर जैसे ही उन्होंने रिपोर्टिंग करना शुरू किया तो पीछे मुड़कर नहीं देखा और वे संवाददाता से बीबीसी के ब्यूरो प्रमुख बना दिए गए।

मार्क टली ने भारतीय राजनीति की अनेक निर्णायक घटनाओं की रिपोर्टिंग की। 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध, इमरजेंसी, खालिस्तानी आतंकवाद, ऑपरेशन ब्लूस्टार, इंदिरा जी की हत्या, सिख नरसंहार, भोपाल गैस त्रासदी, श्रीलंका गृहयुद्ध और बाबरी ध्वंस जैसी निर्णायक घटनाओं की संतुलित और तटस्थ रिपोर्टिंग से उन्होंने भारत में बीबीसी की और अपनी साख और धाक जमाई।

संपर्क सूत्र बनाने में वे माहिर थे, इसलिए कई बार ख़बरें स्वयं उनके पास चलकर पहुँच जाती थीं। इसके बावजूद वे हमेशा फ़ील्ड में जाकर, संबंधित लोगों से मिलकर ही रिपोर्टिंग करना पसंद करते थे। 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय एक बड़ी भीड़ ने उन्हें कई घंटों तक एक कमरे में बंद कर लिया था। बाद में एक स्थानीय अधिकारी और एक हिंदू पुजारी ने उनकी मदद की थी।

आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी उन्हें गिरफ़्तार करना चाहती थीं। इसलिए वे कुछ समय के लिए भारत छोड़कर लंदन चले गए थे। सत्ता के केंद्रों तक उनकी सीधी पहुँच थी, लेकिन यह नज़दीकी कभी उनकी रिपोर्टिंग की निष्पक्षता के आड़े नहीं आई। वे सत्ता में बैठे लोगों से संवाद रखते थे, पर ख़बर के स्तर पर दूरी बनाए रखते थे।

मशहूर लेखक और इतिहासकार विलियम डेलरिंपल ने लिखा, “मार्क टली पत्रकारों में एक बहुत बड़ी हस्ती थे और अपनी पीढ़ी के सबसे बड़े भारत प्रेमी थे। वे बहुत ही मिलनसार, उदार, नेक, दयालु और मददगार इंसान भी थे, जिनके चरणों में मुझे कई सालों तक बैठने का सम्मान मिला।”

“उन्होंने मुझे भारत की बारीकियों समझाईं और सूक्ष्म जानकारी दी। बीबीसी इंडिया की आवाज़ के तौर पर उनकी जगह कोई नहीं ले सकता था, वह ऐसे इंसान थे जो सत्ता के सामने खड़े होने और सच बोलने के लिए तैयार रहते थे, चाहे वह कितना भी मुश्किल क्यों न हो। निजी और पेशेवर, दोनों तरह से उनकी बहुत, बहुत कमी खलेगी।”

अनुभवजन्य परिपक्वता के साथ-साथ वे थोड़े मुखर और विद्रोही भी बन गए थे! इसलिए नब्बे के दशक में बीबीसी में फैलती व्यावसायिकता और बाबूशाही के खिलाफ भी वे ख़ामोश न रह सके। बर्मिंघम के रेडियो महोत्सव में उन्होंने एक भाषण दिया था जो लंदन के अख़बारों में प्रमुखता से छपा और उन्हें बीबीसी ब्यूरो प्रमुख के पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा!

इसके बाद भी वे स्वतंत्र रूप से बीबीसी के लिए लिखते रहे और व्याख्यान देते रहे। उन्हें भारत की आत्मा को और गहराई से समझने का मौका मिला जिसकी झलक उनकी किताबों, No full stops in India, The heart of India, India’s unending journey और India the road ahead में मिलती है। अपने अंतिम दिनों में भी वे अपनी आत्मकथा लिख रहे थे जो जल्द ही पाठकों को उपलब्ध होने की आशा है।

1986 में बीबीसी हिंदी में काम करने के लिए लंदन आने से पहले सर मार्क से मिलने उनके पूर्वी निज़ामुद्दीन स्थित कार्यालयीय आवास पर जाने का मौक़ा मिला था! उन्मुक्त हँसी के साथ गाढ़े अंग्रेज़ी अंदाज़ में हिंदी बोलते विशालकाय व्यक्तित्व को देखकर समझ आया कि क्यों वे भारत में बीबीसी का पर्याय बन चुके थे!

उनके व्यक्तित्व में कोई अहंकार नहीं था। लेकिन अपने बुनियादी उसूलों पर वो कभी समझौता करते नहीं दिखे। शायद यही कारण है कि मार्क टली को केवल एक विदेशी संवाददाता के रूप में नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया को समझने वाले एक संवेदनशील और भरोसेमंद पत्रकार के रूप में याद किया जाता है। उन्हें भारत और ब्रिटेन दोनों से सम्मान मिले। इसलिए वे सर भी थे और पद्मभूषण भी।

मीडिया पर सरकारी एकाधिकार के जमाने में जो विश्वसनीयता बीबीसी ने हासिल की वह कोई हासिल नहीं कर पाया और बीबीसी संवाददाता के रूप में जो नाम मार्क टली ने कमाया वह कोई नहीं कमा पाया! बीबीसी के लिए दिल्ली में चार्ल्स वीलर जैसे कई दिग्गज संवाददाताओं ने काम किया! जॉर्ज ऑरवेल जैसे कालजयी लेखकों ने बीबीसी के लिए भारत पर लिखा। पर मार्क टली जैसी छाप कोई नहीं छोड़ पाया!

बीबीसी की भारत-आवाज़ को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि।

 

शिवकांत – पूर्व संपादक, बीबीसी रेडियो हिन्दी सेवा, लंदन।

मोबाइल – +44 7305 177949

RELATED ARTICLES

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest