Sunday, June 23, 2024
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नीलिमा कैराया का संस्मरण – पूर्णिमा की एक रात

मानव-मन बेहद संवेदनशील होता है।वह बात अलग है कि स्थितियाँ -परिस्थितियाँ मान‌व-मन की संवेदनशीलता को प्रभावित करती हैं। वास्तव में  कारण और कर्म का बड़ा भाईचारा है।दोनों को एक दूसरे का पूरक भी कह सकते है ।संसार में  फैली हर अच्छाई -बुराई ,दया, करुणा, क्रूरता, मानवीयता के पीछे यह कार्य- कारण सिद्धांत ही काम करता है।किसी चाह की प्रबलता इंसान से वह सब भी करवा लेती है जो वह कभी भी करना नहीं  चाहता है। यह संस्मरण इसी चाह की परिणिति है।
वह पूस माह के पूर्णिमा की रात थी। आसमान की नीलिमा सहित  धरती भी दूधिया चाँदनी से प्रफुल्लित  थी।पूस माह की ठंड किसी को भी घर से निकलने के लिए मजबूरी में ही इजाजत देती है और ऐसी ही एक मजबूरी में हम पाँच लोग होशंगाबाद से लगभग 16 किलोमीटर दूर इटारसी रोड पर निकले। एक से भले दो और दो से भले चार की तर्ज पर। वर्तमान में होशंगाबाद का नाम बदलकर नर्मदापुरम् कर दिया गया है।इटारसी जाते हुए रोड से बाँईं ओर 9 किलोमीटर अंदर की ओर जाने पर एक गाँव था, जिसका नाम था रैसलपुर। हम लोग वहीं से लौट रहे थे ।एक स्कूटर पर हमारे छोटे बेटे बब्बल के साथ /स्कूटर पर हमारी छोटी बेटी शानू व मौसेरी  बहन, जो संयुक्त परिवार में हमारी जिठानी भी थीं,उनकी बेटी अलका थी हम अलका के ही भाई हरिओम के साथ  मोटरसाइकिल पर थे। लगभग 1:30 बजे का समय रहा होगा जब हम लोग रैसलपुर से निकले। बब्बल तो स्कूटर पर दोनों बहनों को लेकर निकल गया पर गाँव के कच्चे 9 किलोमीटर रास्ते से निकलने के बाद मेन रोड पर आते ही मोटरसाइकिल बंद हो गई। वहाँ स्ट्रीट लाइट नहीं थी। हरिओम ने थोड़ी देर तक प्रयास किया और गाड़ी स्टार्ट हो गई। उसने कहा कि, “मैं थोड़ी दूर चला कर जरा एंजिन गर्म कर लेता हूँ मौसी।”
हमने कहा, “ठीक है।”
इस तरह गाड़ी थोड़ी घुमाकर वह लौटा ।गाड़ी पर बैठकर हम लोग थोड़ी ही दूर गए थे,आधा किलो मीटर भी नहीं कि गाड़ी फिर बंद हो गई । उसके बाद स्टार्ट ही नहीं हुई। थोड़ी  ही दूर खंबे पर एक ट्यूब लाइट जल रही थी।गाड़ी को किसी तरह घसीटते हुए वहाँ पहुँचे। वह एक खुली  जगह थी और बोर्ड पर लिखा पढ़कर समझ आया कि किसी मैकेनिक  की ही जगह थी पर टपरिया में  कोई था नहीं । हम बाहर पड़े एक पुराने से तख्त पर बैठ गए ।हरिओम काफी देर तक मोटरसाइकिल सुधारने का प्रयास करता रहा ।शायद पेट्रोल की नली में कचरा फँस गया था और बहुत अधिक ठंड के कारण वह नली निकल नहीं रही थी।आधे घंटे तक काफी प्रयास के बाद बड़ी मुश्किल से नली निकली और गाड़ी स्टार्ट हुई।हरि ओम ने आवाज दी  “चलो मौसी!” हम जल्दी ही उठ कर आए और जैसे ही बैठने का उपक्रम ही किया था कि हरिओम निकल लिया।उसे लगा हम बैठ गए पर हमने सीट पर सिर्फ हाथ ही रखा था।जनवरी का शायद दूसरा सप्ताह शुरू ही हुआ था। शीत ऋतु की शीतलता को पवन  हड्डियों तक पहुँचा रही थी। प्रेमचंद जी की कहानी पूस की रात याद आ रही थी। वह समय ऐसा नहीं था कि हम जूते या पजामा पहन पाते। साड़ी के ऊपर एक हल्का सा स्वेटर था और ऊपर से शॉल ओढ़ा हुआ था।ठंड के कारण हाथों और पैरों की उंगलियाँ जल सी रही थीं । उनके होने का अहसास खत्म हो रहा था। उस समय लड़कियों वाले मोजों का चलन नहीं था बहुओं के लिये। हमने सोचा कि थोड़ा मशीन गर्म करके वह लौटकर आएगा और इस तरह इंतजार में 15 मिनट के आसपास  बीत गए। लेकिन वह लौटकर नहीं आया।समय का कुछ अंदाज नहीं लग पा रहा था।मोबाइल का जमाना  नहीं था और घड़ी थी नहीं।आते समय ध्यान ही नहीं  रहा पहनने का।
छुपकर किये जाने वाले कामों  की अपनी सावधानियाँ तो होती ही हैं  पर एक अनजाना  भय भी होता है।खासकर तब, जब मंजिल अनचाही व अनजानी हो।
आकाश में चंद्रमा को देखकर अंदाज लगा रहे थे शायद 2- 3 के आस-पास का समय हो गया होगा।एक अजीब सी बेचैनी व घबराहट थी। इक्का-दुक्का गाड़ियाँ निकलतीं तो सवार घूरते। 15 मिनट बाद हम इस आशा से कि वह लौटकर आता होगा तो मिलेगा, शायद मशीन  गरम करने आगे बढ़  गया हो या फिर गाड़ी रुक न गई हो सोचकर पैदल ही आगे बढ़ गए। एक अनजाना भय हर तरह से व्याप्त था। अर्धरात्रि,सुनसान सड़क, पूर्णिमा की रात ,भूतों का भय, जिनके क्रिया- कलाप  देखकर लौट रहे थे।आगे बढ़ते हुए पास आती फिर पीछे लौटती  पेड़ों  की लंबी-लंबी परछाइयाँ  और यदा-कदा जीव-जंतुओं की आवाजें भय  को बढ़ा रही थीं। सुना था कि बाघ भी कभी-कभी सड़क पर नजर आया था।आज भले ही हनुमान चालीसा रट गई पर उस समय स्त्रियों के  लिये हनुमान चालीसा पढना वर्जित था। बड़ी बात यह भी हुई  कि शाॅल से लिपटे हुए होने के कारण निकलने वाली इक्का-दुक्का  गाड़ी वाले हमारे  पास  से निकलते हुए गाड़ी की स्पीड अचानक बढ़ा लेते। शायद उन्हें भी किसी भूत का ही भय हो।
हनुमान  भूतांशू शब्द बचपन से हमारे दिमाग में था।
सराईपाली(मध्यप्रदेश )के बाद  जल्दी  ही पिताजी ने बरगढ़ में भी दुकान खोल ली और वहाँ शिफ्ट हो गये।यह उड़ीसा प्रांत में था।दुकान मेन रोड पर थी और उसकी  बाँई ओर की गली में घर था। घर से निकलकर दुकान आते हुए 3-4 घर छोड़कर एक बहुत बड़ी सी बाउंड्री में  माॅल जैसी बड़ी  जगह  खाली थी, जिसमें  बहुत घने-घने पेड़ थे और बीच में ही एक पीपल का बड़ा सा पेड़ था। यह प्रचलित  था कि उसमें  भूत है। यह आपसी सखियों के बीच के बाल- मन की बात थी।हम 4-5 साल के रहे होंगे।पिताजी के सामने यह कह नहीं  सकते थे।12 बजे से 3 के बीच भूत सक्रिय रहते हैं यह भी बाल मन जान गया था आपसी बातों से।बाई से कहा था एक बार तो बाई ने समझाया कि,” भूत नहीं  होते और तुम बहादुर बच्ची हो हमारी। जो बहादुर होता है उससे तो भूत अगर होगा  तब भी डर कर भाग जाएगा। याद रखना बेबी!जो डरता है उसे सब डराते हैं ।”
तब यह बात टाॅनिक का काम करती थी,पर फिर भी दिल के किसी  कोने में  भूत का भय छिपा रहता।
जब डेढ़ बजे के आसपास  पिताजी  को खाना खाने के लिये  बुलाने जाते तो उस बाउंड्री के पहले ही एक पल ठहर जाते और फिर हनुमान  भूतांशू बोलते हुए दौड़  लगा जाते  ।दौड़  बाउंड्री  पार करते ही खत्म हो जाती।हनुमान  भूतांशू मंत्र भी बाल सखियों से पाया था। बस वही याद आ गया।उस समय का यह दो अक्षर का मंत्र अब भी हमारे लिये राम बाण था। वही मन में  दोहराते हुए और बाई की बातों  को याद करते हुए लगभग एक किलोमीटर चलने के बाद हार कर और उसे न पाकर  हम पुनः लौट कर वहीं आकर बैठ गए। (ऐसा तो सोचा ही न था।)कम से कम लाइट तो थी वहाँ।उस समय इतने रेप केस सुनने में नहीं आ रहे थे पर युवा थे,डर तो था पर अंदर का डर बाहर नहीं आने दे रहे थे।मन में बहुत से विचार आ -जा रहे थे कि अगर कोई पास आया तो कैसे-कैसे अपने आप को उस से बचाना है ?अगर ऐसा हुआ तो ऐसा करेंगे और ऐसा हुआ तो ऐसा करेंगे आदि इत्यादि। जंगली जानवरों का डर अब भी तारी था ।पलक झपकने को भी मन तैयार न होता। इटारसी  शहर वारदातों  के लिये तब बदनाम भी था। यह भय सब पर भारी था। बच्चे , परिवार , जिंदगी सब चिंतन में  घूम रहे थे। यह भी दिमाग में  आ रहा था  कि ‘ हवन करते हाथ जले’।पानी के बुलबुलों की तरह मानस तरंग बन और मिट रही थी।हर आने वाली गाड़ी को आँखों से ओझल होते तक देखते।
अब वे लोग भी निकलते हुए दिखे जो रैसलपुर में साथ थे और मन उसी गाँव की घटना पर विचार करने लगा।
यह 1997 की बात है शायद।अलका की शादी को 8 साल हो गए थे किंतु उसकी कोई संतान न थी। हर संभव इलाज करवाया। इसके अलावा भी जिसने जो कहा, वैसा उसने किया, पर सफलता हाथ न लगी।
किसी भी स्त्री का सबसे बड़ा सपना माँ बनना होता है। अगर बच्चे नहीं होते तो दुनिया के ताने और व्यवहार भी किसी मानसिक त्रासदी से काम नहीं होते। बस एक बच्चे की चाह ने उसको इस रास्ते पर चलने के लिये  मजबूर किया था।
 तभी किसी से उसे पता चला कि रैसलपुर में कोई है जिसे देवी जी आती हैं, और उन्हें सब माताजी कहकर ही बुलाते हैं ।वहाँ दूर-दूर से भूत- प्रेत उतरवाने व अपनी अपेक्षित समस्याओं  के हल के लिए  लिये लोग आते हैं।
इंसान जब अपनी लड़ाई लड़ते हुए हार जाता है तब भरोसा तो ईश्वर पर करता है और उम्मीद सच्चे-झूठे अंध-विश्वासों की ओर रुख करने से भी खुद को रोक नहीं पाती है।
यहांँ हम कहना नहीं चाहते हैं पर बताने की मंशा रोक भी नहीं पा रहे कि हम भूत -प्रेतों पर विश्वास करते हैं और यह हम अपने अनुभव के आधार पर कह रहे हैं। सब सहमत हों यह बिल्कुल जरूरी नहीं।
खैर…।
भतीजी ने हमसे आग्रह किया कि मौसी आप ही चल सकती हो हमारे साथ ।उसके बार-बार कहने पर श्रीमान जी ने हमें आज्ञा दे दी। उन्हें हम पर भरोसा थाऔर हमें भी खुद पर भरोसा था।यहाँ हमारा इस तरह अकेले जाना ठीक ना होगा सोच कर हमने अपनी छोटी बेटी जो 22वर्ष की थी उसे और छोटे बेटे को भी साथ लिया। एक से भले दो और दो से भले चार की तर्ज पर ।फिर हम सब ने मिलकर इस साहसिक योजना को अंजाम देने का प्लान बनाया।माताजी के देखने का! उनके पास जाने का दिन निर्धारित था, और इत्तफाक से वह दिन तिथि के हिसाब से पूर्णिमा को पड़ा। समय रात को 12:00 बजे के बाद का ही निश्चित था। पहली बार किसी नाजायज काम को जायज तरीके से करने की कोशिश कर रहे थे परिणाम नियति के गर्भ में था जिस पर माँ की उम्मीद आश्रित थी। हम लोगों के लिये यह एक साहसिक साहसिक अभियान सा था। सैंतालीस वर्षीय हम व सब सब बच्चे।
होशंगाबाद से इटारसी 18 किलो मीटर है।आज लगभग मिल ही गया है पर तब ऐसा न था।दोनों शहरों के बीच में खासा जंगल था।मुख्य मार्ग  से बाईं ओर 9 किलोमीटर अंदर गाँव की गली-कूचियों  से होते हुए और पूछते हुए हम लोग वहाँ पहुँचे तब वहाँ काफी लोग थे। कई बाइक और दो-तीन कार व जीप भी बाहर खड़ी थीं ।दूर शहरों के भी लोग थे।घर कच्चा ही था। मिट्टी का बना हुआ। बाहर आँगन था, जिस पर मिट्टी की ही पाल बनी हुई थी कुछ पुरुष वहाँ बैठे हुए थे पाल पर। जगह-जगह कई सारे झंडे लगे हुए थे माहौल में  भय व्याप्त था।
जिन समस्याओं के समाधान न मिलने पर मनुष्य निराशा और हताशा से भर उठता है तो फिर अंध विश्वास भगवान के दर पर शरण पाता है।यह यहाँ स्पष्ट था।
अपना नाम सबको पर्ची में लिख कर देना होता था और नंबर से ही बुलाया जाता था ।अंदर अधिकतर महिलाएँ बैठी थीं । वह 10 बाई 14 -15 का हॉल रहा होगा जो कच्चा बना हुआ था छत ज्यादा ऊँची नहीं थी ।सब बैठने के लिए अपने अपने साधन से दरी इत्यादि लेकर आए हुए थे हम लोग तो नीचे ही बैठ गए। पता ही न था कुछ । बब्बल और हरिओम बाहर थे। हॉल का एक चौथाई भाग माताजी के लिए सुरक्षित था आधा माताजी के लिए और आधा उनके सामने आने वाले मरीजों के लिए।अंततः माता जी का आगमन हुआ ।वह इकहरे बदन से कुछ एक-दो इंच और भरे हुए बदन का अंदाजन 6 फुट लंबा  पुरुष था जिसने धोती कुर्ता पहना हुआ था और ऊपर माथे पर लाल चुनरी डाली हुई थी और उन्हें  ही  माताजी कहते थे! यह हमें थोड़ा हास्यास्पद लगा। पुरुष!!और माताजी!!!!पर खुद को डांटते हुए रोका कि तुम डेंजर जोन में हो।खामोश रहो।
जैसा कि हमेशा सुनने में आता था कि किसी को माताजी आती हैं तो  झूमती हैं ,बाल खुले रहते हैं ।पर वैसा कुछ भी नहीं था। बाल खोलने का प्रश्न ही न था पर माताजी झूमी भी नहीं। आकर खामोशी से अपने स्थान पर बैठ गईं।
 अपनी समझ से पूरी आँखें खोल बिना पलक झपकाए हम लोग ऐसे देख रहे थे जैसे भीड़ में कोई स्टैचू कह गया हो। पूरे माहौल में एक अजीब सी भयभीत कर देने वाली खामोशी व्याप्त थी, ऐसी कि सुई भी गिरे तो आवाज आ जाए।अब सेवकों ने काम करना शुरू किया। पर्ची से नाम बुलाए जाने लगे। हम से पहले चार पाँच लोगों का नंबर था भीड़ देखकर तो लगा था कि बहुत बाद में  नंबर आएगा पर पता चला कि मरीज एक है लेकिन हम लोगों की तरह साथ- साथ आने वाले लोगों की संख्या ज्यादा है भीड़ इसीलिए बड़ी दिख रही थी।
 अलका से पूर्व कुछ ऐसे लोगों के नंबर थे, जो भूत- प्रेत की व्यथा से ग्रसित थे। उन लोगों को देखते हुए हम बहुत असहज हो गए।
कैसी- कैसी विडंबनाओं से इंसान गुजरता है! मन बहुत आहत हुआ! कितना दुख है संसार में! हम अच्छे हैं! हमें शुक्रगुजार होना चाहिए ईश्वर का।
भतीजी के लिए दुख था। एक विवाहिता के लिए माँ बनना ही स्त्री की पूर्णता का परिचायक लगता है। उसे लगता था कि भले ही कुछ भी हो, पर हो तो। उसके संतोष और खुशी के लिए ही हम उसके साथ आए।डेढ़  बजे के लगभग अलका का नंबर आया वह अंदर थी ।हम सब बाहर आ गए। बाहर से सुनने की कोशिश कर रहे थे पर कुछ समझ आया नहीं ठीक से, बहुत ही धीमी आवाज थी। थोड़ी देर बाद बस इतना सुना कि “अब जाओ!” और हम लोगों की प्रतीक्षा समाप्त हुई। हमने कहा,” चलो।” तो पता चला कि जब तक माताजी आदेश नहीं देती तब तक कोई वहाँ से जा नहीं सकता। आदेश होने पर ही सब वहाँ से जाते हैं। उनके निश्चित समय से पूर्व कोई बाहर जा ही नहीं सकता । अगर निकल भी जाओ तो बीच में बाधा आती है,पर हमने कहा कि उन्होंने जाओ कह दिया है। सब के मना करने पर भी हम लोग वहाँ से निकल गए। हालांकि अलका का मन नहीं था। पर ठंड बहुत थी और हम जल्द से जल्द घर पहुँचना चाहते थे ,पर देखिए नियति !हम अटक ही गए अकेले जंगल में और देख रहे थे कि वे सब लौट रहे हैं हमें घूरते हुए।यहाँ  तक कि अलका बब्बल और शानू भी गन्तव्य पर पहुँच चुके थे,पर शायद हमने  नियम तोड़ने की सजा पाई या फिर जो भी हो। सब चले गए तब भी हम अकेले वहीं थे। इसलिए  सजा मिल रही है का भाव प्रबल था।
इन्हीं भावावेगों में उतर डूब रहे थे।
गुप्त जी की पंचवटी की पंक्तियां सार्थक सिद्ध हो रही थीं-
“कोई पास न रहने पर भी
जन मन मौन नहीं रहता
आप आपसे कहता है वह
आप आपकी है सुनता।”
  इतने में ही इतने में हरिओम आया और कहने लगा,” और मौसी !”उसके चेहरे पर भय स्पष्ट दिखाई दे रहा था। समय 4-5 के आसपास हो चला था।ठंड की भोर देर से दिखती है। हरिओम के चेहरे पर हवाइयाँ उड़  रही थीं । हमने कहा ,”और मौसी क्या? हमने सोचा तुम लौट के आओगे मशीन गरम करके और तुम आए ही नहीं ?हम तुम्हारे इंतजार में काफी दूर तक गए फिर लौट कर वापस आ गए ।”
फिर उसने बताया कि,” मैं तो बात करता हुआ होशंगाबाद तक पहुँच गया और फिर मुझे अचानक ध्यान आया कि मैं ही मैं बोल रहा हूँ और मौसी कुछ जवाब ही नहीं दे रही है ,तो मैंने गर्दन घुमा कर पीछे देखा। ऐसा लगा कि आप नहीं हो तो फिर गाड़ी रोक कर देखा। आप वास्तव में नहीं थी ।मैं एकदम घबरा गया !मुझे लगा कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि आप गिर गई हो या फिर आप को भूत प्रेत ने किडनैप कर लिया हो! घबराहट में  गाड़ी पलटाई वापस लौटा और रास्ते भर देखता रहा कि कहीं आप सड़क पर गिरी ना पड़ी हो कहीं।”
 दूर तक हम नहीं  दिखे तो उसे 100% विश्वास हो गया कि  भूत-प्रेतों ने हमारा अपहरण कर लिया है ।खैर ….उसने हमसे चलने को कहा और जब गाड़ी स्टार्ट करने की कोशिश की तो गाड़ी ने फिर जवाब दे दिया और उसके बाद गाड़ी स्टार्ट ही नहीं हुई। वह लगातार प्रयास करता रहा। हम कहते रहे कि गाड़ी को यहीं छोड़कर चलते हैं  पर वह नहीं माना।
भोर दस्तक  दे रही थी।इसी बीच बब्बल भी लौट आया। जब उसने देखा कि बहुत देर हो गई तो उसे चिंता हुई कि हम लोग अभी तक क्यों नहीं पहुँचे और फिर वह  हम लोगों को देखने के लिए लौट कर आया। समय और साथ ने भय खत्म कर दिया था। जब उसे सब पता चला तो उसने भी कोशिश की लेकिन गाड़ी स्टार्ट ही नहीं हुई । विचार किया गया कि गाड़ी को   खींचकर ले जाया जाए।अब किस चीज से बांधा जाए ?रस्सी तो थी नहीं, तो उन दोनों की नजर हमारे शॉल पर पड़ी। हम तो वैसे ही ठंड में ठिठुर रहे थे पर मजबूरी थी। मरता क्या न करता वाला हाल था ।हमने शॉल दिया। शॉल के एक सिरे को  स्कूटर के पिछले भाग से और दूसरे को मोटरसाइकिल के अगले भाग से बाँधा और गाड़ी पर बैठकर धीरे-धीरे हम लोग निकले। जब होशंगाबाद पहुंचे तब तक भोर अंगड़ाई लेती हुई जाग चुकी थी। घर में चाय तैयार किया थी। अलका और शानू तो सारा किस्सा सुनकर स्तब्ध रह गए अलका का तो मुँह खुला का खुला रह गया। वह घबरा गई थी कि मौसी कुछ हो जाता तो? किंतु हम ठहाका  लगा-लगाकर जोर- जोर से हँस रहे थे।
जीवन में संघर्ष ना हो तो जीने का मजा ही क्या? लेकिन संघर्ष ऐसे हों तो हंँसी तो आएगी ही। और हम हँसने का कोई मौका नहीं छोड़ते। यद्यपि अंधेरी रातों में इस तरह बाहर निकलने के पहले भी कई कारण रहे और दुर्योग बने। अधिकतर  कभी परिवार व कभी मोहल्ले -पड़ोसी के लोगों की वजह से अस्पताल कारण रहा।पर वह शहर के अंदर की बात थी।जंगल के लिये वक्त ने पहली बार परीक्षा ली।
घर में  किसी को कुछ पता नहीं  था। उसके बाद दो-तीन दिनों तक यही स्थिति रही। जब एक दूसरे को देखते और बरबस हँसी छूट जाती।
 एक बात निश्चित है। जीवन में दुर्घटनाएँ कहकर नहीं आतीं अतः हमें अपना हौसला और आत्मविश्वास नहीं खोना चाहिए ।हिम्मत हो तो भूत-प्रेत भी  डरकर भाग जाते हैं ।
तब तो नहीं  पर  शादी के 15 वर्ष बाद हमारे  कहने से उसने एक बेटी गोद ले ली।और उसके दो साल के अंतराल में ही, शादी के 17वर्ष बाद एक बेटा भी हो गया।
अभी भी जब सब इकठ्ठा  होते हैं  तो फिर सब बीती बातों  पर चर्चा  होती है और ठहाके लगते हैं ।
और अब भी जब पूस की पूर्णिमा आती है तो वह रात  स्मृतियों से बाहर आकर हल्की सी दस्तक दे ही जाती है।
परिचय
नीलिमा कैराया
संपर्क – karaiyaneelima7@gmail.com
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