Saturday, May 18, 2024
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देवी नागरानी द्वारा अनूदित सिंधी लेखिका आतिया की कविताएँ

1- अमर गीत
जिस धरती की सौगंध खाकर
तुमने प्यार निभाने के वादे किये थे
उस धरती को हमारे लिये क़ब्र बनाया गया है
देश के सारे फूल तोड़कर
बारूद बोया गया है
ख़ुशबू ‘टार्चर’ कैम्प’ में आख़िरी सांसें ले रही है
जिन गलियों में तेरा हाथ थामे
अमन के ताल पर मैंने सदियों से रक्स किया था
वहीं मौत का सौदागर पंख फैला रहा है
गरबी की सलवार, सिलवटों वाला चोला
और सुर्ख लाल दुपट्टा
मैंने संदूक में छिपा रखे हैं
अपनी पहचान को निगलकर, गटक गई हूँ
रास्ते पर चलते
आसमान पर चौदवीं के चाँद को देखकर
मैं तुम्हें भिटाई का बैत सुना नहीं सकती
कलाशंकोफ के धमाकों से मेरा बच्चा
चौंक कर नींद से जाग उठता है
मैं उसे लोरी सुनाने के लिये लब खोलती हूँ तो
घर के सदस्य होंठों पर उंगली रखकर
ख़ामोश रहने के लिये कहते हैं
अखबारें, डायनों के नाखून बनकर
रोज़ मेरा मांस नोच रही हैं
और सियासतदानों के बयान
रटे हुए तोते समान लगते हैं
मैं खौफ़ की दलदल में हाथ पैर मारना नहीं चाहती
ऐ मेरे देश के सृजनहार
ऐसा कोई अमर गीत लिख
कि जबर की सभी ज़ंजीरें तोड़कर
मैं छम छम छम छम नाचने लगूँ!
2 – खोटे बाट
मज़हब की तेज़ छुरी से
कानून का वध करने वालो
तुम्हारा कसाई वाला चलन
अदालत की कुर्सी पर बैठे लोग
तुम्हारी तराजू के पलड़ों में खोट है
तुम्हारे समूरे बाट खोटे हैं
तुम जो हमेशा मज़हब के अंधे घोड़े पर सवार
फ़तह का परचम फहराते रहते हो
क्या समझते हो? औरत भी कोई रिसायत है
मैं ऐसे किसी भी ख़ुदा, किसी भी किताब
किसी भी अदालत, किसी भी तलवार को नहीं मानती
जो आपसी मतभेद की दुश्मनी में
छुरी की तरह मेरी पीठ में खोंप दी गई है
क़ानून की किताबें रटकर डिगरी की उपाधि सजाने वाले
मेरे वारिस भी तो तुम जैसी मिट्टी के गूँथे हुए हैं
किसी को रखैल बना लें, रस्म के नाम पर ऊँटनी बना लें
ग़ैरत के नाम पर ‘कारी’ करके मार दें
किसी को दूसरी, तीसरी और चौथी बीवी बनाएँ
तुम्हारी तराजू के पलड़े में मैं चुप रहूँ
ख़ला में झूलती रहूँ
एक पलड़े में तुम्हारे हाथों ठोकी रीतियों, मज़हब
जिन्सी मतभेद के रंगीन बाट डाले हैं
दूसरे पलड़े में मेरे जिस्म के साथ तुम्हें साइन्सी हक़ीक़तें
मेरी तालीम और शऊर के बाट इस्तेमाल करने होंगे
तुम्हें अपने फैसले बदलने होंगे!
3 – मशीनी इन्सान
हम बड़े शहर के लोग
इज़्ज़त से ज़िन्दगी गुज़ारने की ख़ातिर
‘रोबोट’ की तरह चलते रहते हैं
घर चलाने की ख़ातिर
महंगाई की चक्की में पिसते रहते हैं
घर, जिसके लिये ख़्वाब देखे
उसके पीेछे दौड़ में अपनी नींद गंवा बैठे
प्यार और दूसरे सारे लतीफ़ जज़्बे
जो हमें बेहतर साबित कर सकते हैं
उन्हें हम ड्राइंग रूम में सजाकर रखते हैं
हमारे बतियाये सारे शब्दों की
डेट एक्सपायर हो गई है
नए शब्द हमारे शब्द कोश में
मिस प्रिंट हो गए हैं
हम गूंगों और बहरों की तरह
एक दूसरे की ज़रूरत समझते हैं
जब वह किसी माहिर टाइपिस्ट की तरह
मेरे जिस्म के टाइपराइटर पर
तेज़ी से उंगलियों को हरक़त में लाता है,
तो मैं उसे वही रिज़ल्ट देती हूँ
जो उसकी मांग है!
4 – नया समाज
मेरे पिटारे में खोटा सिक्का डालते हुए
टेड़ी आँख से क्या देखते हो?
मुहब्बत और भूख, दोनों अंधी होती हैं
उनकी डोर तुम्हारे हाथ में है
जैसे चाहो, अपनी उंगली पर नचा सकते हो
मेरी ज़रूरत तुम्हारे पास गिरवी है
सो चाहो तो बबूल की झाड़ी भी खिला सकते हो
बूँद-बूँद ज़हर तमाम उम्र मुझे पिला सकते हो
मुट्ठी भर मुहब्बत एक बार देकर
बाद में ऊँट की तरह कितना भी सफ़र करा सकते हो
नज़रें मिलाते हुए कतराते क्यों हो?
‘दुख’ और ‘इन्तज़ार’ दोनों गहरे होते हैं
और उनकी नब्ज़ तुम्हारे हाथ में है
इसलिये जितना चाहो इलाज में विलम्ब कर सकते हो
चुपचाप नज़रें झुकाकर तुम्हारे पीछे चलती
दुल्हन की बागडोर तुम्हारे बस में है
जहाँ चाहो मोड़ सकते हो।
बेजान मूर्ति की तरह तेरे शोकेस की ज़ीनत बनूँ
मेरे हिस्से का जीवन भी तुम गुज़ारते हो
रोज़ उभरता सूरज मुझे आस बंधाता है
हमेशा ऐसे होने वाला नहीं
आँखों में आँखें डालकर आख़िर तो पूछूँगी
कि ‘मुझे इस तरह क्यों घसीट रहे हो?’
इससे पहले कि मेरी हिम्मत भीतर से नफ़रत बनकर फूटे
आओ तो मिलकर ये समूरे फासले जड़ों से उखाड़ फेंकें
बराबरी की बुनियाद पर नए समाज के बूटे बोयें!
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