मित्रो, 30 जून 1950 को अंबाला भारत में जन्मी नीना पॉल एक लंबे अरसे तक ब्रिटेन में रहीं। वे ग़ज़ल, कविता, कहानी और उपन्यास जैसी विधाओं में निरंतर लेखन करती रहीं। उन्हें ब्रिटेन की संसद के हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में पद्मानंद साहित्य सम्मान से अलंकृत किया गया। वे कथा यूके एवं पुरवाई पत्रिका से एक लंबे समय तक जुड़ी रहीं। 15 अगस्त 2016 को वे कैंसर से अपनी लड़ाई हार गईं और वैकुंठधाम की ओर चल पड़ीं। आज उनकी बरसी पर उन्हें याद करते हुए उनकी कहानी ‘घर-बेघर’ पर कश्मीर से डॉ. मुक्ति शर्मा की एक समीक्षा आपके सामने प्रस्तुत कर रहे हैं। पुरवाई परिवार के तमाम सदस्य नीना पॉल को हार्दिक श्रद्धांजलि प्रस्तुत करते हैं… (संपादक)
उपन्यासकार और कहानीकार नीना पॉल जी हिंदी की वैश्विक कहानियों में उनका नाम आता है । नीना पॉल जी कई पुरस्कारों से सम्मानित है। भारत के पंजाब के अंबाला शहर में जन्मी और पली-बड़ी नीना पॉल जी यू.के. में रहने लगी। कई चर्चित ग़ज़लें लिखी है जो लोक प्रिय रही हैं। साठ- पैंसठ पहले तक महिलाओं की सामाजिक स्थिति पर, उनके सशक्तिकरण और उनकी उपलब्धियों के संघर्ष पर , उनके रचे साहित्य की चर्चा नहीं की जाती थी। पर जैसे-जैसे समय बदला महिलाओं के बारे में विषय बदले हैं। इसके साथ महिला से रचे साहित्य को समझा गया उनकी चर्चा की गई। प्रवासी भारतीयों में अधिकतर संख्या देखी जाए तो महिला लेखकों की है इसका कारण है विदेशों में महिला का अकेलापन है जिसे दूर करने के लिए अपना सहारा लेखन है। नीना पॉल जी ने अपने दर्द को अपने उपन्यास और कहानियों में बखूबी लिखा है। नीना पॉल जी महिला लेखिका है इसलिए महिला के दर्द को और उसकी मजबूरी के बारे में बड़े मार्मिक ढंग से लिखा है
कहानी ‘घर बेघर’ संतानों की माता-पिता के प्रति घोर उपेक्षा का शिकार बन के ओल्ड होम की जाने वाले बुजुर्गों की दर्दनाक कहानी है और अमेरिका से नौकरी से सन्यास लेकर ओल्ड होम में शरण लेने वाली महिला की भी कहानी है।
नीना पॉल ने बुजूर्ग पीढ़ी की यातना के संदर्भ में व्यर्थ बोध और फ़ालतू होने के एहसास को व्यक्त किया है।
जरनैल सिंह घर जाने के लिए तैयार बैठ के अपने बच्चे का इंतज़ार कर रहा है । उत्सुकता और ख़ुशी चेहरे से साफ छलक रही है। बार-बार उसकी नज़र दरवाजे पर जाती है । उसे लगता है उसके लिए समय जैसे रुक गया।
पीटर ने उससे पूछा , “क्या बात है जरनैल बड़े खुश दिख रहे हो?”
“खुश होने की बात है पीटर पूरे तीन हफ्तों के बाद घर जा रहा हूँ।”
जरनैल सिंह को लगता है जैसे किसी जेल से रिहा हो रहा है। और वो कहता है जेल और अस्तपॉल में ज्यादा फर्क नहीं है। घर का महत्व के बारे में बताते हुए कहता है घर तो घर होता है बाहर कितना भी सुख हो पर घर जैसा आनंद कहाँ होता है? घर में पोते पोतियाँ आगे पीछे दादू -दादू कहते हुए भागते हैं। और जहाँ मर्ज़ी घूमो फिरो। जरनैल सिंह इंतज़ार करते हुए बेचैन हो रहा है । पीटर ने उसे कहा , “तुम कितने खुशकिस्मत हो। तुम्हारा परिवार है। मेरी तो एक बेटी है उसने कभी खबर नहीं ली।”
जबकि ओल्ड होम वालों ने उसे मेरी बीमारी की सूचना भी दी थी। फिर भी मेरा पता लेने नहीं आई।”
इतना कहते ही पीटर की आंखें भर आई। पीटर की बातों से यह स्पष्ट होता है कि युवा पीढ़ी बुजुर्ग पीढ़ी का ख्याल रखने से जी चुराने लगी हैं। नई पीढ़ी का वर्तमान परिवेश में बदलते रिश्तों में आज के युग के बच्चों की माता पिता के प्रति दर्दनाक भावना नहीं हैं।
जरनैल सिंह ने उसे हौसला देते हुए कहा कि जब तुम्हारा दिल उदास हो तो मेरे घर मुझसे मिलने आते रहना मेरी बहु तुम्हारा भी मेरे जैसे ख्याल रखेगी ।
दोस्ती भी कितनी प्यारी चीज है। कब, कहाँ, कैसे यह समय का चक्र दो अजनबियों को एक ऐसे अटूट रिश्ते में बांध देता है कि वह अपनों से ज्यादा अपना बन जाते हैं। कभी तो यह रिश्ते यूँ ही जुड़ जाते हैं और कभी अपने खून के रिश्ते भी धोखा दे जाते हैं। किसकी नजर कब पलट जाए पता ही नहीं चलता।
पता तो जरनैल सिंह को भी तब लगा जब समय ने अचानक उनके सामने ही पलटा खाया। सुबह से ही बड़ी उत्सुकता से वह सूट-केस तैयार किए बच्चों का इंतजार करते रहे। एक ऐसा इंतजार जो कभी खत्म ना हुआ। वह कभी खिड़की के बाहर झाँकते तो कभी कमरे में टहलने लगते। पीटर उनकी बेचैनी समझ रहा था। जरनैल सिंह को इतनी तकलीफ तब नहीं हुई थी जब उसकी पत्नी अपने दो बच्चों को छोड़कर स्वर्ग सिधार गई थी । जो हमेशा भारत आने के लिए उत्सुक रहती थी ।
इच्छाएं तो हर इंसान के दिल में होती हैं। कभी-कभी हम भूल भी जाते हैं । कि हमारे दिल में कभी चाहत थी। जब वह अचानक सामने आ कर खड़ी हो जाती हैं। तो हम सकपका जाते हैं जैसे इस समय जरनैल सिंह के मन में भी घर जाने की तीव्र इच्छा उठ रही थी ।
जरनैल सिंह को बुरे-बुरे ख्याल आने लगते हैं उसे लगता है कि उसका हाल भी पीटर जैसे होने वाला है । यही सोच-सोच कर उसका दिल बैठे जा रहा है । उसे लगता था कि उसका परिवार उसे बहुत प्यार करता है । बस थोड़ी बहुत जुबान थोड़ी कड़वी है । वह बेचारी भी क्या करे। सारा दिन बैंक में मगज खपाई, फिर घर का काम, बच्चों की देख भाल। आखिर वह भी तो इंसान है थक जाती होगी। बस काम खत्म करके वह आते ही होंगे मुझे लेने। सोच कर जरनैल सिंह अपने दिल को तसल्ली देने लगे।
जरनैल सिंह को वो दिन बड़े याद आते हैं। जब उसकी पत्नी उसके दो बच्चों को बिलखता छोड़कर स्वर्ग सिधार गई और वो मजबूर बेबस देखता रहा क्योंकि भरी जवानी में उसकी पत्नी उसका परिवार छोड़कर चली गई। गर्मी के दिनों में बर्फ का टुकड़ा शर्बत में डाल कर पी लिया। वही बर्फ़ का टुकड़ा उसकी जान का दुश्मन बन गया उसका कमज़ोर शरीर हैजे के मार सह न सका।
जरनैल सिंह बेचैन था उसके बच्चे लेने क्यों नहीं आये। दूसरी ओर वो पुरानी यादों में खोता जा रहा था । चेहरा तो और भी उतर गया जब उस वार्ड की इन-चार्ज ने आ कर कह- “मिस्टर जरनैल सिंह लांबा, आज आप डिस्चार्ज होने वाले थे लेकिन आपके घर से कोई लेने नहीं आया। हम जानते हैं कि आप सुबह से ही घर जाने के लिए तैयार बैठे हैं। ‘आई एम सोरी टू से ‘ कि परिस्थिति को देखते हुए सिर्फ आज की रात हम आपको यहाँ रुकने की अनुमति दे सकते हैं। मिस्टर पीटरएंग्रेव का इलाज भी खत्म हो चुका है। वह भी कल वापिस होम जा रहे हैं। डॉक्टर उसके सलाह देते हुए बताते है कि आपका बाईपास ऑपरेशन हुआ है आपको देखभाल की जरूरत है आप एकेले नहीं रह सकते । आप घरवालों से बात करो आखिर वो चाहते क्या है? जरनैल सिंह भारी आवाज़ में सफाई देते हए कहता है कि शायद उन्हें कोई काम पड़ गया हो। आप मुझे टेक्सी का अरेंज करवा दें।
घर में बहु अपने पति से झगड़ा करती है कि पापा जी हमारे साथ नहीं रह सकते और उनके लिए हम नर्स रख नहीं सकते। आप उन्हें ओल्ड पीपल होम में छोड़ आये। इसी में सब की भलाई है। जरनैल सिंह अपनी पत्नी को समझाने की कोशिश करता है कि मैं कैसे उनको उन्हीं के घर से बाहर कर दूं। दुनिया क्या कहेगी, कि जिस बाप ने बच्चों की खातिर भरी जवानी में पत्नी खो देने पर दूसरी शादी नहीं की, उसी बाप के बूढ़े होते ही बेटे बहू ने उसे घर से बाहर निकाल दिया।’
पत्नी समझने की तैयार नहीं थी। वह उसे धमकी देती है कि अगर वो इधर आते है तो वह मायके चली जायेगी।
अस्पताल में बिस्तर पर करवटें बदलते हुए गुस्से के स्थान पर जरनैल सिंह को स्वयं पर दया आने लगी। वह रात भर अपनी जिंदगी के बारे में सोचते रहे। एक पल को भी उनकी आँख नहीं लगी। उनके स्वाभिमान को ठेस लगी थी। इससे ज्यादा कोई क्या अपमानित हो सकता है। जिन बच्चों को इतनी तकलीफें सह कर काबिल बनाया। आज उन्हीं बच्चों के लिए बोझ बन गया है । बच्चों ने घर से बेघर करके किसी को भी मुंह दिखाने के काबिल नहीं छोड़ा।
कभी उसे अपनी माँ की बात बड़ी याद आती है कि माँ ने कितने प्यार से कहा था ‘पुत्तर जनरैल जाने वाली तो चली गई। तेरी अभी भरी जवानी है बेटा। बहुत हो गया इंग्लैंड का चक्कर। पुतर अपणे पिंड दे विच वी बथेरी रोटी रोजी ऐ ..नज़रों के सामने रह मेरे। बच्चे भी अभी बहुत छोटे हैं । अब तू फिर से शादी करके यहीं रह… कैसे रह पाएंगे माँ के बिना?
आँखें तो जरनैल सिंह की भी भर आईं थीं यह सोच कर कि बड़े लोगों ने दुनिया देखी होती है तभी तो वह दूर की सोचते हैं। जरनैल सिंह ने हाथ से आँसुओं को हटाते हुए मन ही मन एक इरादा किया।
दर्द सहने के बाद जो इरादे और स्वयं से वादे किए जाते हैं वह बहुत पक्के होते हैं क्यूंकि उनमें कुछ दुख, कुछ स्वाभिमान, कुछ गहरी चोटों के निशान होते हैं। घाव तो समय के साथ भर जाएंगे परंतु उनके निशानों की टीस रिसती रहती है जो दर्द से भी ज्यादा घायल कर जाती है।
पीटर बड़े ध्यान से जरनैल सिंह की ओर देख कर रहा था। एक पल को जरनैल की आँखों में दो मोती चमके दूसरे ही क्षण पलकें झपक कर उन्होंने उन्हें उड़ा दिया और हँस कर बोले ‘मर्द कभी रोते नहीं पीटर। अब तो हम दोनों एक दूसरे का परिवार हैं।’
जरनैल सिंह की बड़ी दयनीय स्थिति थी। वह बेटे से बाते करते हुए बचपन के दिन याद दिलाते हुए कहता है कैसे मैंने रातों को जाग-जाग कर पाला है ।
‘नींद तो पुतर तेरी माँ का साथ देने चली गई थी। फिर किसी को दिया हुआ वादा भी तो निभाना था। तुम चालीस साल की बात करते हो बेटे मुझे तो अभी भी यही महसूस होता है कि बलवंत मेरी बाँहों में दम तोड़ रही है और मैं मजबूरी से उसे जाते हुए देख रहा हूँ।’
पापा जी क्यों ना अगले साल हम सब मिल कर भारत चलें माँ को श्रद्धांजलि देने के प्रीतम ने पापा को उदास देख कर कहा। श्रद्धांजलि माँ को बाद मिलती पहले ज़िंदा बाप को ही बेते ने घर से धक्का दे कर दे दी। अच्छा है प्रीतम की माँ यह दिन देखने से पहले चली गई थी नहीं तो बेचारी बहू-बेटे की इस शर्मनाक हरकत जीते जी ही मर होती ।
बाहर निकलने से पहले जरनैल सिंह सारी उदासी कमरे में ही छोड़ गए। यही तो इनकी विशेषता है की दिल का दर्द कभी चेहरे पर नहीं आने देते। जरनैल सिंह के आने से इस ओल्ड पीपल होम का माहौल ही जैसे बदल गया। अब शाम को कोई भी अकेले अपने कमरों में नहीं बल्कि हाल में इकट्ठे बैठ कर कोई ताश, कोई डोमिनोस और कोई चेस खेलता हुआ दिखाई देने लगा। होम में कुछ भाग्यशाली ऐसे भी थे जिनके रिश्तेदार हर सप्ताह उनसे मिलने आते थे और कुछ बेचारे, अपनों का इंतजार करते रहते जो कभी खत्म ना होता।
यही इंतजार तो अब उसी होम में रहने वाली एलिज़ाबेथ भी करने लगी थी अपने भांजे का जिसने हम उनका इतंजार क्यों करे एलीजाबेथ जिन्हें हमारी परवाह ही नहीं । मतलब पूरा होने के बाद कभी मुड़ कर भी नहीं देखा । उसे उदास देखकर जरनैल सिंह ने समझाया।”
वह उससे पूछता है कि तुम्हारी परवाह तो वह बहुत करता था जरनैल जब तक मैंने उन कागजात पर साइन नहीं किया था। मेरी प्रोपर्टी तो वैसे भी उसी के पास जानी थी। उसके सिवा मेरा और कोई है भी तो नहीं।हम हैं ना सब एक दूसरे के लिए। जब वह हमें नहीं पूछते तो हम उनके लिए आँसू क्यों बहायें। हमें भी उन्हें कुछ सबक तो सिखाना ही चाहिए। जरनैल सिहं ने सबसे पहले अपने बच्चो को सिखाया ।
जसमिंदर जब काम से घर आई तो हैरान रह गई। वह प्रीतम के आने का इंतजार ना कर सकी और बोर्ड पर से नंबर लेकर फोन घुमा दिया।
‘जी मैं 24 मिडल एवन्यू से बोल रही हूँ। शायद आपका आदमी गलती से हमारे घर के बाहर सेल का बोर्ड लगा गया है।’ तब उसे पता चलता है यह उसके ससुर जरनैल सिंह की मर्जी से हुआ है। तब जसमिंदर को बहुत गुस्सा आता है। ढोंग जेसन ने भी किए थे अपनी आंटी एलिज़ाबेथ के सामने। हर सप्ताह कभी फूल तो कभी चॉकलेट ले कर आता था वह अपनी आंटी के लिए। फिर काम निकलते ही सूरत तक देखने नहीं आया।
सूरत तो तब देखता ना यदि उसका दिल साफ होता। आज का स्वार्थी इंसान सिवाय अपने किसी और का सोचता ही कहाँ है। क्या पैसा ही सब कुछ है। इंसान की भावनाओं उसके प्यार की कोई कद्र नहीं। किसी के साथ बुरा करने वाला यह क्यों भूल जाता है कि कल को उसके साथ भी ऐसा हो सकता है।
हुआ तो प्रीतम के साथ भी कुछ ऐसा जब उसने घर के बाहर सेल का बोर्ड देखा। एक तो वह वैसे ही शर्मिंदगी से डूबा जा रहा था ऊपर से जसमिंदर के ताने।
उधर जनरैल सिंह की बेटी पम्मी कैनेडा से बार-बार फोन कर रही थी। वह मन ही मन सोचती है कि यह प्रीतम बात क्यों नहीं करबाता पापा जी से मेरी। तीन बार फोन कर चुकी हूँ । हमेशा कोई न कोई बहाना बना कर टाल देता है। कैनेडा में बैठी पम्मी सोच ही रही थी कि अचानक फोन की घंटी बज उठी।
‘पापा जी आप ठीक तो हैं न। आपसे मिलने का बहुत मन कर रहा है। बच्चों को अभी छुट्टियां भी तो नहीं हैं और अकेले छोड़ कर आ नहीं सकती।’
‘वाहे गुरु ने चाहा तो जल्दी मिलेंगे पुत्तर। तेरा जब भी बात करने का मन करे इस नंबर पर फोन कर लिया करना। चल रखता हूँ। रब राखा। अपना ख्याल रखना।’
बहू- बेटा अपनी गलती पर शर्म महसूस करते है जरनैल सिंह को घर आने के लिए कहते हुए माफी मांगते है पर जरनैल सिंह ने घर जाने से मना कर दिया । बहु को समझाते है जब घर की इज्ज़त बाहर नीलाम हो जाती है तो लोग कुछ न कुछ बोलते रहते हैं । प्रीतम तुम्हे मैं दोष भी क्या दूँ। तुम तो शुरू से ही कमजोर रहे हो। छोटे से छोटा फैसला करने के लिए भी तुम दूसरों की शक्ल देखते रहते हो।’
‘दूसरों के सहारे ऐश करना छोड़ो। जब रोज पकी पकाई थाली सामने आती है तो उसमें बहुत से नुक्स दिखाई देने लगते हैं। जिस आशियाने को तिनका-तिनका इकट्ठा कर के बनाया और सजाया जाता है उसके लुटने का गम…’ जरनैल सिंह की आवाज भर आई। ‘अब इन सूनी आँखों और खाली हाथों में कुछ भी बाकी नहीं बचा। इस कागज के टुकड़े के लिए। यह तो वैसे भी तुम्हारा ही था। यह लो …जरनैल सिंह ने घर के कागज़ दूर फैंकते हुए कहा ….. ये लो उठाओ इस फसाद की जड़ को और उससे पहले कि इस बुड्ढे के मुँह से कोई अपशब्द निकल जाए दूर हो जाओ मेरी नजरों से । आज मैं अपने आपको लावारिस घोषित करता हूँ।”
प्रीतम सिंह रोते हुए आगे बढ़ा जरनैल सिंह के गले लगने के लिए परंतु उन्होंने बेटे को हाथ के इशारे से वहीं रोक दिया और अपने कमरे में जा कर अंदर से दरवाजा बंद कर दिया…।
इस कहानी में वर्तमान समय में बदलते रिश्तों पर करारी चोट दर्शायी गई है। इस संसार में पिता पुत्र का रिश्ता सबसे संबल माना गया है वही पुत्र आज के समय में अपने माँ-बाप को वर्तमान परिवेश में धकेल देता है। साथ ही नये ज़माने की युवा पढ़ी लिखी पीढ़ी बुजुर्गों के प्रति अनादर एवं घृणा-पूर्ण मनोभावों का दर्दनाक चित्रों में एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। और मध्य-वर्गीय परिवार की दशा भी उजागर करती है। दुखद सामाजिक उदाहरण भी प्रस्तुत किया है नीना पॉल जी की सफल कहानियों में से ‘घर बेघर’ कहानी अपने आप में समाज को आईना दिखाने की कहानी है।