यादों में बसी वो मुस्कान अब अधूरी रह गई
रश्मि रविजा के लिये श्रद्धा सुमन
मृत्यु एक ऐसा दर्द छोड़ जाती हैं जिसे कोई दवा ठीक नहीं कर सकती। जाने वाले की यादें एक ऐसा ख़जाना होता हैं जिसे कोई चोरी नहीं कर सकता ।
मित्रो पुरवाई पत्रिका के सदस्य उसका परिवार हैं। आज इसी परिवार की एक सदस्य रश्मि रविजा के लिए श्रद्धांजलि संदेश लिखना बहुत भावुक कर रहा हैं। उनका देहांत 8 फरवरी को दोपहर लगभग तीन बजे मुंबई के चिकित्सालय में हुआ। आज उनका चौथा उनके परिजनों और मित्रो की उपस्थिति में संपन्न हुआ।
रश्मि पुरवाई परिवार की सक्रिय सदस्य रही हैं । जब पत्रिका प्रिंट पत्रिका के रूप में प्रकाशित होती थी तब भी उनकी
कहानियां इस पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। “कांच के शामियाने, शच्ची आय स्टिल लव यू, बंद दरवाजों का शहर” की लेखिका कलम चलाने के साथ-साथ तूलिका से कैनवास पर रंग बिखेरने वाली यह खोजी छायाकार सैकड़ो पक्षियों की तस्वीरें अपने कमरे में कैद कर चुकी हैं। इस वर्ष का नया कैलेंडर उनके जुनूनी खगप्रेम का खूबसूरत नमूना है।
राजनीति शास्त्र में एम. ए. की डिग्री प्राप्त रश्मि ने अपना लेखकीय उपनाम रविजा रखा था। उनके प्रथम उपन्यास “कांच के शामियाने की मार्मिक कहानी ने न जाने कितने दिलों के भीतर उनके अपने दर्द की हलचल को ताजा किया। उनके इस उपन्यास को महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला।
दिल की नरम, स्वभाव से कोमल, कर्मठ, ईमानदार, रिश्तों को निभाने वाली, संवेदनशील लेखिका,शब्दों से दृश्य गढ़ने वाली ब्लॉगर, संस्मरण लिखकर गुदगुदाती, सीख देते किस्से, मुखर अभिव्यक्ति, समर्पित, साहसी, जुनूनी, गहरी अंतर्दृष्टि वाली रश्मि लगभग एक वर्ष तक जब सोशल मीडिया से यदाकदा गायब रहने लगी तो उनके शुभचिंतक और मित्र चिंतित हो उठे।
फिर अचानक एक दिन उनके फेसबुक की टाइम लाइन पर एक लम्बा सा संस्मरण आया जिसमें उन्होंने नामुराद कैंसर के हमले की पूरी कहानी लिखी और इस विकट स्थिति में उन्होंने खुद को कैसे सम्हाला और किस तरह सकारात्मक रहकर इस रोग पर विजय पा ली। उनके प्रिय मित्रो की आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बहने लगी और वो लगातार सबको हौंसला देती रही कि मुझे कुछ नहीं होगा अब। मैं यह जंग जीत आई हूं। सबने ईश्वर का शुक्राना अदा किया और रश्मि फिर से धीमी गति से ही सही सोशल मीडिया पर सक्रिय हुई।
अपूर्व अंकुर स्वरूषि के न जाने कितने किस्से उनके पाठकों को जुबानी याद हैं। उनके पड़ोसियों से लेकर आयरलैंड वाले पा को सब अपने आसपास महसूस करने लगे थे। उनकी चिड़ियों से दोस्ती से और खींचे छायाचित्रों को राष्ट्रीय स्तर पर उनको पहचान मिली। पटना के उनके स्कूल के बच्चे सबको अपने बच्चों की तरह महसूस होने लगे थे। उनके लिखे शब्दों में संवेदनाएं गहरी छाप छोड़ती थी।
मातृभारती.कॉम, प्रतिलिपि सहित अनेक वेबपोर्टल पर उनके उपन्यास, कहानियां, संस्मरण पढ़े जा सकते हैं।
उनके ब्लॉग पर उनका आत्मकथ्य जो 2010 में लिखा गया था हमेशा याद रहेगा।
“मंजिल मिले ना मिले, ये ग़म नहीं, मंजिल की जुस्तजू में, मेरा कारवां तो है”
आज ‘पुरवाई परिवार’ उनको नम आँखों से श्रद्धांजलि सुमन अर्पित करता हैं। उनके लिखे शब्द हमेशा हमारे साथ रहेंगे। ईश्वर उनको अपने श्रीचरणों में स्थान दें और उनकी आत्मा को मोक्ष प्रदान करें।
पुरवाई परिवार के कुछ सदस्यों ओर उनके मित्रों ने भी उनके लिए श्रद्धांजलि लिखकर भेजी हैं।
===============
सुधा अरोरा (वरिष्ठ साहित्यकार)
रश्मि रविजा को कल आखिरी विदा दे दी। अपने से उम्र में बहुत छोटे, और जिंदादिली में बहुत बड़े, मित्रों को इस तरह अलविदा कहना बहुत तकलीफदेह होता है…
बहुत जीवट वाली और बेहद खुशमिजाज इंसान थी रश्मि। हमेशा हंसती खिलखिलाती हुई। दोस्तों के लिए मदद को हर वक्त तैयार। ज़िंदगी से लबालब भरी. हमेशा नई चीज़ें सीखने और करने को उत्सुक।
रश्मि रविजा से मेरी पहली मुलाकात विभा रानी के घर पर करीब बारह साल पहले हुई थी। उसके बाद मुंबई की चौपाल में हम कभी कभार मिलते रहे।
पहली बार वह मेरे घर अपनी पहली किताब “कांच के शामियाने” की पांडुलिपि लेकर आई थी कि मैं उसे पढ़कर अपने सुझाव दूं। मैंने उसे अपनी आंखों की तकलीफ के बारे में बताया कि मैं पढ़ नहीं सकती पर जाने क्यों उससे कहा कि ठीक है छोड़ जाओ। जब मैंने बीच-बीच में से खोलकर कुछ पैराग्राफ पढ़े तो मुझे लगा यह तो आम पाठक के लिए बड़े रुचिकर अंदाज़ में लिखा हुआ है और सारी घटनाएं बिलकुल सच्ची लगती हैं और छूने वाली हैं। बाद में उसने बताया कि वह वाकई किसी फेसबुक मित्र की आपबीती थी जिससे वह कभी मिली नहीं। मैंने कुछ पंक्तियाँ लिख कर भेज दीं। कांच के शामियाने खूब पढ़ी गई, सराही गई।
2015 में उसने मेरी किताब एक औरत की नोटबुक का फेसबुक पेज बनाया था। मुझे याद दिलाती रहती उसमें पोस्ट डालते रहिए। जब तक याद दिलाती रही, पोस्ट डाली जाती रही।… और वह गांव के अपने स्कूल में, पक्षियों में रम गई। उसे सक्रिय देख कर बहुत अच्छा लगता ।
पिछले साल 19 अप्रैल, वह बैंगलोर आई तो घर मिलने चली आई और अपनी बीमारी के बारे में बताया। बीमार मां को कैसे अपनी बीमारी की भनक नहीं लगने दी, सब बताया। सचमुच बहुत जीवट वाली थी रश्मि, हारने वालों में से नहीं थी वह। उसके बस में होता तो कभी नहीं जाती। उस दिन घंटों बातें हुई । मेरी बेटी भी पक्षी विशेषज्ञ है। उसकी किताबें देखती रही। खाने की तारीफ करती रही। अपनी बहू की तारीफ़ करती रही। मुंबई वाले घर को याद करती रही।
नवंबर में कविता गुप्ता के घर संक्षिप्त सी मुलाक़ात हुई। अब बिल्कुल ठीक हूं मैं। आप घर बुलाइए, आती हूं। अच्छा लगा कि सक्रिय हो रही है पहले की तरह। फिर बैंगलोर आने का वायदा भी किया था उसने…
कहा था आऊंगी अगली बार और फिर मिलूंगी।
उसने कभी अपनी तकलीफ़ को सार्वजनिक नहीं किया। ऐसे जिंदादिल इंसान के जाने की खबर एक धक्का है। तुम अब यादों में रहोगी रश्मि। तुम्हारे जीवट से हम सब को बहुत सीखना है।
स्नेहांजलि!
स्नेहिल परिवार के प्रति हार्दिक संवेदना!
==============
रीता गुप्ता (कहानीकार)
Still waiting for you…
अपने इस उपन्यास के नाम की तरह रश्मि रविजा बस एक अंतहीन इंतजार ही बन कर रह गईं।
मैं उनसे फेसबुक प्लेटफॉर्म पर ही मिली, उनके एक लेख जिसमें उन्होंने अपने बालपन की यादों को शेयर किया था जिसमें मेरे शहर राँची का खूब जिक्र था। उन्होंने उसी सड़क और स्कूल का जिक्र किया था, जहाँ मैं अब रहती हूँ। उन बातों को मैं भी नहीं जानती थी, उत्सुकता बढ़ी और उनसे बातचीत होने लगी। रश्मि जी के बर्ड फीडर से प्रभावित हो कर मैंने भी अपने फ्लैट में चिड़ियों को आकर्षित करने का प्रयास किया।
उनके पंछी प्रेम को परवान चढ़ते देखा, पहले मोबाईल से फोटो लेने वाली रश्मि ने कैमरा ही इसलिए लिए ताकि वह पंछियों की स्पष्ट सुन्दर तस्वीर ले सकें। अपने पोस्ट में वे बड़े ही सूक्ष्मता से घर, परिवार, बच्चों, दोस्त का वर्णन करतीं। उनके संस्मरण बड़े ही आत्मीय होते।
फिर उनका अपने ननिहाल राँची आने का प्रोग्राम बना और वे घर आईं। बहुत ही मिलनसार और सहज लगी बिल्कुल अपने पोस्ट की तरह। घर पर वे अचानक ही आई सो मैं राँची के अन्य साहित्यप्रेमियों को बता भी नहीं पाई।
कुछ महीने बाद वे फिर राँची आईं, उन्होंने मुझे फोन किया और मिलने की इच्छा जाहिर की। पर तब तक कैंसर के लपेटे में मैं आ चुकी थी, मेरे पति को ये डिटेक्ट हो गया था। मैं एक हारी हुई बाजी खेल रही थी। एकाध बार याद आया कि रश्मि जी ने फिर हाल-चाल न पूछा, उन्हें तो बताया था। आभासी दुनिया के दोस्त समझ मैंने भी उतना ध्यान नहीं दिया, जिंदगी अपने कुत्सित रंग मुझ पर फेर चुकी थी।
कई महीनों के बाद रश्मि की एक पोस्ट चमकी, जिसमें उन्होंने अपने कैंसर से जीती हुई जंग का जिक्र किया था। बहुत प्रेरणादायक पोस्ट था वह, राँची के एक अखबार ने उनसे बिना पूछे ही अपनी पत्रिका पन्ने पर प्रकाशित किया था। उसके पहले रेडियो पर उनकी कहानी आई थी, मैंने सुन कर उन्हें फोन भी किया था, पर उन्होंने अपनी बीमारी की भनक तक नहीं दी थी। अभी हाल में इन्द्रप्रस्थ भारती में उनकी कहानी आई थी। तब भी बात हुई थी, “आनंद” मूवी के पात्र की तरह वे हँसती मुसकुराती महसूस होती। मुझे तो बड़ा गर्व होता उन पर कि बहुत साहस से उन्होंने इस बीमारी का सामना किया और मुंबई में रहने के चलते शायद बेहतर इलाज करवा पाईं।
पर नियति कुछ और ही रचने में मशगूल था, जो होना था हो कर रहा। अभी तो पारिवारिक जिम्मेदारियाँ भी बाकी थी, साहित्याकाश में कई रंग बिखेरने थे। बिल्कुल आनंद मूवी की तरह टेपरिकार्ड मानों चल रहा है-
हम सब ऊपर वाले के हाथ की कठपुतली हैं…
“खुश रहो प्रिय मित्र जहाँ भी तुम हो”
========
खुशदीप सहगल (ब्लॉगर, पत्रकार)
रश्मि बहन तुम्हीं सो गईं दास्तां कहते कहते…
“अभी बस दो दिनों पहले ही, मैने एक फ्रेंड का स्टेटस देखा… जिसमे उन्होंने लिखा था… “कई दिनों से एक मित्र ऑनलाइन नहीं दिख रहा था… उसका कोई कमेन्ट भी किसी के स्टेटस पर नहीं दिख रहा था तो मुझे लगा कहीं मुझे ब्लॉक तो नहीं कर दिया… खोज-बीन करने पर पता चला… वो अब इस दुनिया में नहीं है…” उस दिवंगत मित्र के प्रोफाइल का लिंक भी था… उस पर भी क्लिक कर उसे देखा और एक सिहरन दौड़ गयी,नसों में… मेरे लिए नेट के द्वारा किसी की मृत्यु के बारे में जानने का ये पहला मौका था।
कितने ही सवाल उठे मन में… इनका प्रोफाइल तो वैसे ही रहेगा… कितने ही लोग…किसी नाम को सर्च करने के दौरान इस प्रोफाइल पर क्लिक करेंगे. शायद उनकी एल्बम भी देखेंगे और उन्हें पता भी नहीं चलेगा ,ये हँसता मुस्कुराता आदमी अब इस दुनिया में नहीं है… क्या पता कोई किसी फोटो, कविता की पंक्तियों के साथ टैग कर ले… कोई किसी ग्रुप का सदस्य बना ले… कोई फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दे…”
ये ऊपर की पंक्तियां मेरी नहीं रश्मि रविजा की ही लिखी हुई हैं. ये उन्होंने अपने ब्लॉग “अपनी, उनकी, सबकी बातें” पर 24 अगस्त 2011 को अमर ब्ल़ॉगर डॉ अमर कुमार को श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए लिखी थीं। क्या पता था उनका लिखा इसमें हर शब्द आज उन्हीं की याद दिलाएगा। मेरा और रश्मि का हिन्दी ब्लॉगिंग में प्रवेश करीब करीब एक साथ ही हुआ. मेरा अगस्त 2009 में रश्मि का एक महीने बाद सितंबर में. रश्मि का लेखन मुझे उनके खिलखिलाते चेहरे की तरह ही शुरू से ही सुखद अनुभूति देने वाला लगा. उनके मेन ब्लॉग में ब्लॉग लेखन हो या ‘मन का पाखी’ ब्लॉग में कहानियों की, हर शब्द ऐसा ही लगता था रश्मि के डायरेक्ट दिल से आया है। बिना किसी बनावट… निर्मल और निश्चल.
बेशक़ हमारा कभी साक्षात मिलना नहीं हुआ लेकिन ब्लॉग के माध्यम से ही हमारा भाई-बहन का रिश्ता बना. नहीं पता था कि एक दिन सब के चेहरे पर मुस्कान लाने वाली ये बहन ख़ुद ही सबको छोड़ चली जाएगी. परम पिता रश्मि को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और अंकुर, अपूर्व समेत समस्त परिवार को ये असीम दुःख सहने की शक्ति…
रश्मि बहन जिस जहान में भी रहो हमेशा खिलखिलाते ही रहना…
ओउम शांति…
=========
शिवानी शर्मा जयपुर (कहानीकार)
जब सितम्बर 2021 में रश्मि दी राइटर्स ब्लॉक से गुज़र रही थीं, उन्हें लेखन के लिए प्रेरित करने के लिए नीलिमा शर्मा ने वॉट्सएप पर कुछ दोस्तों का एक समूह बनाया था, नाम रखा “लिखो रश्मि लिखो”
ग्यारह मित्रों के इस समूह में शुरू से ही शामिल हूँ और समूह बनने के समय से ही इस प्रकार के निर्मल, निःस्वार्थ और शुद्ध मित्रता और स्नेह को देख कर रोमांचित होती रही कि आज के गला काट प्रतिस्पर्धा के युग में ऐसे मित्र भी हैं जो एक दूसरे को लेखन के लिए इस प्रकार से प्रोत्साहित कर रहे हैं। इसलिए मुझे लगता रहा कि इस समूह का बनना उनके व्यक्तित्व की निर्मलता, स्वभाव की कोमलता और सहृदयता का परिचायक भी कहा जा सकता है।
कल रात उसी समूह में नीलिमा ने खबर दी ‘रश्मि नहीं रही…’
आँखें फाड़कर, मसल-मसल कर बार बार उसे पढ़ा और सच्चाई समझने की कोशिश करती उससे पहले ही अगले संदेश पर नज़र पड़ी… ‘अभी मुंबई से रेखा बब्बल ने कन्फर्म किया’
मित्रों को ऐसे स्तब्ध छोड़कर रुलाकर चले गए रश्मि दी…
वो पारदर्शी समीक्षा का समय था शायद जब मैंने उन्हें लेखक के रूप में जाना। ‘काँच के शामियाने’ पढ़ने से पहले उन्हें जानती नहीं थी पर फेसबुक पर कोई समीक्षा पढ़कर ही खरीदी थी। पढ़कर उन्हें मैसेज किया, उनका फोन आया और फिर लम्बी बातचीत के सिलसिले शुरू हो गए। उसके बाद ‘बंद दरवाज़ों का शहर’ भी खरीद कर पढ़ी और उस पर भी लिखा, अपने मन से ही लिखा था।
उन्होंने कभी नहीं कहा कि मुझे पढ़ो और उस पर लिखो। उनकी यही बात प्रभावित करती थी। खूब बातें करती थीं पर कभी भी किसी भी तरह की अपेक्षा उन्होंने नहीं जताई। ‘स्टिल वेटिंग फॉर यू’ नहीं पढ़ पाई थी तो भी कुछ नहीं कहती थीं। जब मेरी कहानी की किताब आई तो उन्होंने आगे होकर खरीदी और समीक्षा भी लिखी।
बाद के दिनों में पता नहीं कैसे, शायद वॉक पर आते-जाते उनका ध्यान पक्षियों पर जाने लगा और उन्होंने अपने देखे हुए पक्षियों के बारे में और जानकारी हासिल करनी शुरू कर दी। उनका पक्षी प्रेम कभी-कभी लगता था कि साहित्य प्रेम पर भारी पड़ रहा है। उनकी ली गई तस्वीरों के कैलेंडर भी बने।
इसके बाद भी वो पेन्टिग के लिए कैसे समय निकाल लेती थीं जाने। एक बार पूछने पर कहने लगीं ‘सब कुछ अपने भीतर ही होता है शिवानी, समयानुसार ढूंढकर बाहर निकालना होता है! बस उस सही समय को सही समय पर पहचान जाना चाहिए।’
आकाशवाणी से उनकी रचनाओं के प्रसारण के समय भी उनसे बातचीत होती थी। कहती थीं “आवाज़ और उच्चारण सही तो हैं ना?” मैं हँसती थी कि सब बढ़िया है।
कितनी बातें याद आ रही हैं सबको साझा करना संभव कहाँ… हर चीज़ का इतना जीवंत चित्रण करती थीं कि लगता था कि सब कुछ हमारे सामने ही है। चाहे वो गाँव में पिताजी का स्कूल हो, माँ की, गाँव की बातें हों या अपूर्व के मकान मालिक की, स्वरुषि के परिवार में शामिल होने की बात हो या बच्चों से जुड़े वाक्यों की! वो इतनी सहज और सुलझी हुई और मोहती हुई बातें हमेशा से अपनी-सी लगती रहीं।
अपनी बीमारी और उससे जूझते हुए समय की जीवंत कहानी साझा करके उन्होंने सबको चौंकाया तो सही, प्रभावित भी किया और प्रेरित भी। सब ठीक हो ही रहा था पर ठीक नहीं रह पाया…
ये रिक्त स्थान कभी नहीं भरेगा…
मन उदास है…
==========
डॉ जया आनंद (नवीं मुंबई)
आत्मीयता से परिपूर्ण रश्मि रविजा दीदी
एक हंसता मुस्कुराता चेहरा, आत्मीयता से परिपूर्ण व्यक्तित्व जिसकी सहजता सरलता अनायास ही मोह ले, ऐसी रश्मि रविजा दी। वो हमारे बीच नहीं हैं… ये लिखते हुए मन कांप जा रहा है। उन्हें तो अभी बहुत सारा कुछ लिखना था, बहुत सारे पंछियों की रंग बिरंगी दुनियाँ को अपने कैमरे में कैद करना था और अपने से छोटे हम जैसे लेखकों को प्रोत्साहन देना था… आप क्यों चली गई रश्मि दी? यह प्रश्न पूछते हुए भी भी लग रहा है जैसे कुछ गलत पूछ रही हूँ क्योंकि आपकी किताबें मेरी अलमारियों से झाँकते हुए आपके होने का प्रमाण दे रही हैं, आपका पंछियों वाला कैलेंडर मेरी मेज पर सजा आपकी स्नेहिल उपस्थिति दर्ज कर रहा है… आप हैं अपने सभी आत्मीय जनों के पास… आप मेरी आत्मीय ही तो थी। इस अद्भुत आत्मीय सबंध जिससे मैंने अपने जीवन में बहुत कुछ पाया।
आपका उपन्यास ‘काँच के शामियाने’, आपका कहानी संग्रह ‘बंद दरवाजों का शहर’, आपकी फेसबुक पर लिखी हुई पोस्ट, आपके कैमरे में कैद पंछी… सभी कुछ मेरे आसपास है।
पिछले वर्ष एक साहित्यिक कार्यक्रम में मुझे ज्ञात हुआ कि आप कैंसर जैसी भयानक पीड़ा से गुजर रही हैं लेकिन उसके बाद भी आप सकारात्मक दृष्टिकोण से परिपूर्ण थी । वाट्सप्प पर उनका लिखा स्टेटस याद आ रहा था “life is ten percent what happens to you and ninty percent how you respond it.”
वे ठीक हो गई थी और पुनः अपने लेखन से, अपने पंछियों के साथ सक्रिय हो गई थी ।
26 दिसंबर 2024 को उनका जन्मदिन था, मैंने उन्हें कई बार फोन किया पर उन्होंने नहीं उठाया। मुंबई के साहित्यिक कार्यक्रम की कई फेसबुक फोटो में भी वे नहीं दिख रहीं थीं।मेरा मन आशंकित हुआ। फिर उनका पंछियों वाला कैलेंडर दिखा और एक बार फिर मैंने रश्मि दी को वो कैलेंडर मंगाने के लिए फोन किया। रश्मि दी ने अपना हाल बताया कि उन्हें वायरल फीवर था और काफी कमजोरी थी इसलिए वे दिख नहीं रही थी, अब वे ठीक हैं। मेरी शंका को विराम लगा और मैंने उनके पंछियों को (कैलेंडर) अपने घर बुला लिया। रश्मि दी के सुंदर पंछी कैलेंडर के रूप मे मेरी मेज पर चहकने लगे थे कि आठ फ़रवरी को खबर मिली कि रश्मि रविजा दी नहीं रही…
नहीं ये नहीं हो सकता बिल्कुल भी नहीं। रश्मि दी! आप कहीं नहीं जा सकती, आप मेरे जीवन का और मेरे जैसे अनेक लोगों के जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं, आप हैं हम सबके बीच अपनी कहानियों,अपने उपन्यास, अपने पंछियों के माध्यम से और अपनी सकरात्मक ऊर्जा से।
रश्मि दी! आपको बहुत प्यार, आप अब भी कहीं दूर बैठी मुस्कुरा रही होंगी । आपका उपन्यास ‘स्टिल वेटिंग फाॅर यू ‘पढ़ा था, प्यार जैसे कोमल भाव का सूक्ष्म वर्णन आप ही कर सकती थी। ‘,स्टिल वेटिंग फाॅर यू रश्मि दी!…लेकिन आपसे फिर मिलने की ये प्रतीक्षा शायद अधूरी रहेगी……. पर आप रहेंगी हम सब के बीच हमारी चिर स्मृतियों में।
========
निर्देश निधि (कहानीकार)
रश्मि के लिये लिखने को इतना कुछ हो सकता है जिसकी सीमा नहीं, परन्तु इस समय क्या लिखा जाए नहीं पता! मन का दर्द अभी बहुत अधिक है, अधिकता में कुछ कहना मुश्किल है, जैसे बहुत अधिक ठून्स कर भरे पात्र से वस्तु गिरती नहीं ऐसे ही इस वक्त शब्द बाहर आने को राजी नहीं हैं। हाँ अगर मैं नहीं रही होती और रश्मि को लिखना होता तो, वह शब्दों की जादूगरनी अभी तक लम्बी सी श्रद्धांजलि लिख चुकी होती।
पटना साहित्योत्सव याद आता है मुझे। तब तक हम बस फेसबुक से ही जानते थे एक दूसरे को, रश्मि ने ही पूछा, “निर्देश निधि हो न तुम?”
“हाँ।”
“मैं रश्मि रविजा।” और बस दोस्ती शुरू हो गई, उसी दिन से।
रश्मि का प्रकृति प्रेम, पक्षी प्रेम छू गया। उसकी रोज की रोचक पोस्ट की प्रतीक्षा रहती। किसी भी विषय को ऐसी रोचकता से लिखती कि पूरा पढ़े बगैर चैन ही ना आता।
दोस्त भी तो बड़ी केयरफुल थी, जब उसने पहली बार बताया मुझे कि उसे कैंसर डिटेक्ट हुआ है तो पहले पूछा कि तुम कहाँ पर हो? यह कंफर्म किया कि मैं अकेली तो नहीं हूँ घर में। इत्तफाक से मैं पूरे परिवार से घिरी थी उस वक्त। तो बोली हाँ अभी मैं तुमको कुछ बताना चाहती हूँ। और उसने बताया तो जैसे पैरों तले की जमीन निकल गई हो मेरे तो। परंतु उसके ऑपरेशन के बाद एक आशा बंधी थी कि अभी इतनी जल्दी तो नहीं वापस लौटेगी बीमारी परंतु जो प्रकृति चाहती है वही करके मानती है हम में से किसी का कोई बस नहीं है उसके ऊपर। क्या हुआ जो वो नहीं है हम उसे प्यार से अपनी स्मृतियों में सहेजे रखेंगे उसकी खिलखिलाहटों, मुस्कुराहटों को हम अपने दिलों में जीवित रखेंगे।
महत्वपूर्ण बात यह है कि जो भी लिख रहा है, वह यही लिख रहा है कि वह उसकी सबसे करीबी थी। यानी उसका रिश्ता कितना आत्मीय था सबके साथ कि सबको यही लगता था कि वह उसकी बिल्कुल अपनी है। वह थी भी तो ऐसी ही। सबके भीतर यह गुण नहीं होता है। दिल दुख से भर जा रहा है उसके विषय में ‘थी’ लिखते हुए। उसके पसारे ‘काँच के शामियाने’ साहित्य पर खिंचे रहेंगे।
एक प्यारी दोस्त, प्रबुद्ध इंसान, गंभीर साहित्यकार को खो दिया हमने। अगर पुनर्जन्म होता है तो रश्मि को सबसे बेहतर स्थान मिले वरना ईश्वर उसे अपने हृदय में स्थान दे।
रश्मि तुम्हें बहुत सारे प्यार के साथ विनम्र और आँसुओं से भीगी श्रद्धांजलि
=========
हरीश पाठक (वरिष्ठ कहानीकार)
रुला गया रश्मि रवीजा का जाना
रश्मि रवीजा नहीं रहीं।
यह छोटी सी सूचना रुला रही है। आज शाम मुम्बई के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया।वे कैंसर से युद्धरत थीं।एक दौर में वे कैंसर को परास्त कर चुकी थीं पर आज कैंसर जीत गया।शब्दों के घर की यह राजकुमारी हार गयी।
अक्षरों और पक्षियों से अगाध स्नेह रखनेवाली रश्मि रवीजा अपनी कृतियों ‘कांच के शामियाने’ व :बारिशों की जुबानी’ के कारण अरसे तक याद रहेँगी।
=========
सपना सिंह (कहानीकार, उपन्यासकार)
तुम चली गई रश्मि रविज़ा…अपने लौट आने का विश्वास दिलाकर फिर तुम चली गई। तुमने कहा था तुम बिल्कुल ठीक हो गई हो तुमने हरा दिया है उस मुई बीमारी को। तुम नहीं जानती तुम्हारा ये कहना मेरे भीतर भी कितना आत्मविश्वास भरता था।
लोग बीमार होते हैं, लोग ठीक भी हो जाते हैं न। जैसे मनीषा कोईराला, महिमा चौधरी, सोनाली बेंद्रे, युवराज सिंह और बहुत से जिन्हें हम नहीं जानते। हम उन सब विजेताओ की कहानियां सुनते हैं और भोलेपन से विश्वास कर लेते हैं। जैसे मैने कर लिया कि रश्मि ठीक हो गई…
पर तुम क्यों नहीं ठीक हुई रश्मि? बताओ तो तुम्हारी छूटी हुई कहानियां कौन पूरा करेगा अब?
कौन लेगा तुम्हारी कॉलोनी की फुदकती चिड़ियों की तस्वीर।
कौन ये कहकर ‘यार तुम पढ़ती बहुत हो’ कई सौ किलोमीटर दूर बैठी सपना को इतराने की वजह देगा ।
हम कभी रुबरू नहीं मिले, हम उस तरह से एक दूसरे से नहीं घुले मिले थे जैसे तुम्हारे बहुत से अपने रहे होंगे फिर भी मै आज बहुत उदास हूं दोस्त। मैं तुम्हारे सारे अपनों के दर्द को महसूस करके उदास हूं। मै तुम्हारे सुंदर चेहरे पर हरदम मौजूद निश्छल हंसी को याद करके उदास हूं। तुम्हारी धीमी मीठी आवाज को याद करके उदास हूं।
तुमने ऐसे जाकर मुझे बहुत दिनों तक के लिए उदास कर दिया है रश्मि,जबकि तुम्हें अच्छे से पता था मुझे उदासी से परहेज बताया गया है…
============
हरकीरत हीर (कवयित्री) – असम
रश्मि रविजा जी नहीं रहीं… उनका अकस्मात यूं चले जाना मन को विचलित कर गया… एक-एक कर सभी करीबी मित्र छूटते जा रहे हैं… जैसा कि पता चला उन्हें कैंसर था मगर कैंसर को वे हरा चुकीं थीं… फिर अचानक क्यों क्या और कैसे हुआ…? इसे रब्ब की ही रजा मान लेते हैं…
रश्मि जी से मेरा परिचय ब्लॉग के जमाने से था… हालांकि मेरी उनसे कभी बातचीत नहीं हुई मगर लेखनी पर टिप्पणियों का आदान प्रदान होता रहता था… वे कहानियां लिखती और मैं कविताएं ..उनकी बहुत सारी टिप्पणियां मेरी मेरी कविताओं की प्रशंसा में लिखी गई हैं जिन्होंने मुझे प्रेरित किया प्रोत्साहित किया… मैं उन्हें आप सब से साझा करना चाहूंगी… लोग चले जाते हैं मगर उनके लिखे शब्द सफ़हों पर हमेशा ज़िंदा रहते हैं… ये टिप्पणियां रश्मि जी का कर्ज़ है मुझपर इसलिए भी उनके बारे में लिखना ज़रूरी था… ज़रूरी समझा भी…
2007 में लगभग एक साथ ही हमने ब्लॉग बनाने की प्रकिया की और लिखना आरम्भ किया। उनके दो ब्लॉग थे ….
१) अपनी उनकी सबकी बातें
२) मन पाखी
‘अपनी उनकी सबकी बातें’ पर वे किसी भी विषय पर लिखतीं और ‘मन पाखी’ पर वे कहानियां लिखा करती थीं, ख़ामोश इल्तज़ा, हाथों की लकीरों सी उलझी ज़िंदगी, आख़िर कब तक, कच्चे बखिये से रिश्ते, कहानी छोटी भाभी की, कश्मकश, आंखों का अनकहा सच आदि कहानियां उन दिनों उनकी पोस्ट पर थीं, जो पाठकों को बेहद पसंद आ रही थीं ।
ये कहना जरा भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हमारे लेखन में पाठकों का बहुत बड़ा सहयोग होता है… रश्मि जी के साथ भी यही था… पाठकों की प्रतिक्रियाएं उनका प्रोत्साहन बढ़ाती… अपनी एक लंबी कहानी पर उन्होंने कहा, “यह लम्बी कहानी सचमुच पाठकों ने ही लिखवा ली। जैसा कि पहले भी मैने जिक्र किया, छः पेज की कहानी को 4 पेज में कर के, सिर्फ 9 मिनट में समेटी थी… और सोचा, अब तो अपना ब्लॉग है। Unedited version ब्लॉग पर डाल दूंगी। पर मन में एक शंका थी, यह बहुत ही सीधी सादी कहानी थी, कोई नाटकीयता नहीं… अप्रत्याशित मोड़ नहीं। सब कहेंगे दो नॉवेल लिख लिया, अब रश्मि का लेखन चुक गया है। पर अपना लिखा एक जगह इकट्ठा करने की ख्वाहिश भी थी. सो बड़ी हिचकिचाहट के साथ पहली किस्त पोस्ट कर दी।
टिप्पणियों और मेल में लोगों की प्रतिक्रिया देख सुखद आश्चर्य हुआ, गाँव की पृष्ठभूमि पर लिखी इस कहानी की पहली किस्त खूब पसंद आई थी लोगों को… किसी ने थोड़ा व्यंग्य भी किया कि “छः बच्चे? कहीं परिवार नियोजन वाले ना दुखी हो जाएँ” पर मैं चुप रही, छः बच्चे इसलिए थे कि मुझे छः अलग अलग जिंदगियां दिखानी थीं… कुछ ने कमेंट्स में कहा भी कि हम भी छः भाई-बहन हैं… कहीं हमारी कहानी तो नहीं, मतलब यह इतनी अनहोनी बात भी नहीं। फिर भी मुझे लगा, कि 3 / 4 किस्त में सिमट जायेगी। पर पाठकों का प्यार और उत्साहवर्द्धन लिखवाता गया और मैं लिखती गयी.
कहानियों के बाद उन्होंने उपन्यास लिखना आरम्भ किया… अपने ब्लॉग पर वे उपन्यास का एक अंश डालती और पाठकों की प्रतिक्रिया का इंतज़ार करतीं ..पाठकों के प्रोत्साहन से उपन्यास धीरे धीरे आगे बढ़ते रहता… और फिर बीच बीच में वे पाठकों के लिए कुछ इस तरह की पोस्ट डालती रहती ताकि पाठकों का भी उत्साह बना रहे… रोचकता को कैसे बरकरार रखा जाए रश्मि बखूबी जानती थी। इतनी संवेदनशील लेखिका का असमय जाना बहुत अखर रहा हैं ।
रश्मि जी को विनम्र श्रद्धांजलि …
=========
व्योमा मिश्रा (संपादक / लेखक)
ख़बर फ़ेसबुक पर देखी… हतप्रभ, स्तब्ध, निःशब्द आदि-आदि शब्द छोटे हैं… एकबारगी यक़ीन ही नहीं हुआ। जिस तरह गला रुँध जाता है, आँखें पनीली हो जाती हैं, उसी तरह उँगलियों को भी जैसे काठ मार गया। भावनाएँ उबलती रहीं लेकिन न शब्द मिले, न उँगलियों ने साथ दिया और न ही कुछ लिखने की हिम्मत ही शेष रही।
फ़ेसबुक से राब्ता शुरू हुआ और कब नज़दीकियाँ परवान चढ़ीं, पता ही नहीं चला। आज से बारह-तेरह साल पहले का दौर वो दौर था जब हमें किसी FB-फ़्रैंड से मिलने पर इंद्रधनुष हाथ लग जाने का गुमान हुआ करता था। फिर धीरे-धीरे हम धरती पर उतरे और अपने उन दोस्तों से रू-ब-रू भी होने लगे। पहली बार पुस्तक-मेले में Rashmi Ravija जी से मिली और बस एक बहनापा-सा हो गया। और फिर तो बस बार-बार मिलने और फ़ोन पर घंटों बतियाने का सिलसिला चल पड़ा। उन्हें मैं ‘दिद्दु’ कहकर पुकारती थी और वो मुझे ‘छुटिया’।
न सिर्फ़ एक साहित्यकार, एक बेहतरीन फ़ोटोग्राफ़र, एक उम्दा चित्रकार, एक लाजवाब कुक, पक्षी-प्रेमी और भी न जाने कितनी ही प्रतिभाओं से संपन्न थीं दिद्दु।
बेहतर याद है मुझे जब ‘काँच के शामियाने’ लेकर मैं अपने पैरेंट्स के घर आई थी। उन दिनों बोरे-बोरे भरकर किताबें मैं पुस्तक-मेले से ख़रीदा करती थी। संयोग से उस दिन मैं अपने घर न जाकर रेलवे-स्टेशन से सीधी अपने पैरेंट्स के घर पहुँची थी। जब मेरे एक बोरे से उनकी ‘काँच के शामियाने’ बाहर झाँक उठी, मेरी एक पड़ोसन आंटी (त्रिवेदी आंटी) की नज़र उस पर पड़ी और उन्होंने पढ़ने के लिये ले ली। अगली बार मैं जब उनसे मिली तो उन्होंने किताब के साथ ही लेखिका की तारीफ़ में कसीदे पढ़ना शुरू किया तो मैंने पूछा कि क्या आप इस पुस्तक की लेखिका से बात करना चाहेंगी? उनके ‘हाँ’ कहते ही मैंने दिद्दु को कॉल किया और तुरंत दोनों की बात करवाई। उस दिन दिद्दु वाक़ई बहुत ख़ुश हुई थीं। आंटी ने ढेरों आशीर्वाद देते हुए यह भी कहा था कि आप जैसी लेखिकाओं की समाज को बहुत ज़रूरत है। सच, एक साहित्यकार के लिये इसे बहुमूल्य उपलब्धि ही माना जा सकता है।
फ़ेब 2017 को मैं एक फ़्रेंच सेमिनार अटैंड करने मुंबई गई थी। दिद्दु को जैसे ही पता चला, तुरंत मिलने का फ़रमान जारी कर डाला। मैंने सेमिनार से हाफ़-डे लिया, वो दिन था 28 फरवरी । उस दिन ईरा जी की पेंटिंग्स की जहाँगीर आर्ट गैलरी में प्रदर्शनी भी चल रही थी। वहीं हम मिले। वहीं पहली बार गंगाशरण जी से उन्होंने मेरा परिचय ये कह करवाया कि ‘व्योमा इनसे मिलो, ये एक ‘विशुद्ध पाठक’ हैं…’ मैंने भी चुटकी लेते हुए कह दिया, “यानी विलुप्त प्रजाति के जीव?”
कई-कई दृश्य आँखों के आगे घूम रहे हैं और आँखों से परे हटने का नाम ही नहीं ले रहे। कभी याद आता है बुक-फ़ेर के फ़ूड-कोर्ट की नरम-नरम दूब पर बैठ अभिषेक, आराधना और अन्य दोस्तों के साथ पुराने-पुराने दोस्तों को याद करना, किसी मित्र-विशेष का नाम लेते ही हँसी के फव्वारे छूटना और मिनटों-मिनट हँसी का रोके न रुकना… कभी जहाँगीर आर्ट-गैलरी में पेंटिंग्स की नुमाइश देखते हुए उनका कलाकारी की बारीक़ियाँ समझाना… कभी किसी कॉफ़ी-हाउस में कॉफ़ी में मग्स के साथ ‘चियर्स’ बोलना… कभी किसी चिड़िया की आवाज़ आते ही उसके रहन-सहन के बारे में बतियाना, कभी पौधों और बाग़वानी के बारे में… कभी किसी रेसिपी की टिप्स शेयर करना… उफ़!
जब मेरी ऐसी हालत हो रही है तो परिवारवालों का हाल जाने क्या हो रहा होगा। परमात्मा दिद्दु को जहाँ भी रखे, सुकून से रखे और उनके परिवारवालों को ये दुःख सहने की क्षमता दे।
ॐ शांति…
=======
उषा किरण (साहित्यकार)
कल से यह देखकर हैरान हूँ कि Rashmi Ravija कितनी पॉपुलर थीं। सबसे कितने आत्मीय संबंध थे।
उनसे कई बार मैसेज पर बात हुई, तो बहुत सहज, सौम्य लगीं।फिर धर्मवीर भारती पर मेरी पोस्ट देखकर उन्होंने मैसेज किए थे। काफी बातें बताई उनके बारे में। फिर स्वरूषी के बनाए स्कैच व पेंटिंग दिखाईं, हमने तारीफ़ की तो बोलीं इसीलिए दिखाई कि आप आर्टिस्ट हैं खुद, तो अच्छी तरह समझ सकेंगी।खुद भी खूब सुंदर पेंटिंग बनाती थीं।
बहुत सौम्य, ख़ुशमिज़ाज, टैलेंटेड, बहादुर रश्मि का यूँ जाना दिल मंजूर नहीं कर पा रहा। मेरी कितनी ही सखियों की नींदें अपनी मुट्ठी में दबाकर ले गईं…रश्मि ये अच्छी बात तो नहीं।
हम तो इंतज़ार में थे कि आपकी भी कैंसर विजय पर जरूर कोई बेमिसाल सी किताब आएगी, दोनों मिलकर परचम लहराएंगे …लेकिन वक्त सबसे बड़ा धोखेबाज़ होता है, ले गया झपट्टा मारकर…सब अवाक् देखते ही रह गये।
क्या कहें इसके सिवा कि-
प्रिय दोस्त
अपने पेंटिंग के शौक को
बचाए रखना…
कुछ रंग धनक से लेना
कुछ धरती से उठा लेना
फिर अपनी जादुई उंगलियों मे
डुबो कर रच देना फलक को
जैसा तुम चाहो
लाल, नीला या धानी…
सूरज को उठाकर
पहाड़ों के पीछे टांग देना
या फिर चाँद को उस पेड़ की
फुनगी पर टिका देना
जहाँ चहचहाते हों ढेरों
रंगवाले बातूनी पंछी
तुम शब्दों से रचना
अफसाना कोई आसमानी
भेज देना उसे बारिशों संग
या रश्मियों में गूँथकर…
वैसे जानती हूँ
तुम चुप होकर
बैठने वाली हो नहीं
वहाँ जाकर कुछ तो रचोगी ही
कुछ अलग कुछ अनोखा
तभी रूह तुम्हारी सुकून पाएगी…!!
जानती हूँ, कायनात का कोई कोना तुम्हारी मुस्कान से आज जगमगा रहा होगा… जहाँ रहना सुकून पाना… अलविदा दोस्त…
======
रेखा सुथार (कहानीकार)
मुझे अभी भी यकीन नहीं हो रहा।
राजस्थान जाने से पहले जब बात हुई थी तो Rashmi दी ने मुझसे वादा लिया था कि मुंबई आते ही उनसे मिलने आऊँगी घर पे।
कल विभा दी से मिली थी तो सोचा था कि रश्मि दी से भी मिलकर आ जाती हूं। लेकिन, तुरंत कोई दूसरा काम आ गया तो सोचा एक-दो दिन में मिल लुंगी।
और आज सुबह ऐसी खबर मिली की कुछ कहने को नहीं हो रहा।
मन पीड़ा से भरा हुआ है समझ नहीं आ रहा क्या लिखूं।
======
रीना पंत
इस बार जब बारिश होगी तुम बूंद बन मेरी हथेली में गिर जाना रश्मि, मैं हथेली बंद कर लूंगी तुम्हें जाने नहीं दूंगी।
हम दोनों उस बारिश को याद कर कितना हंसते थे जब सड़क में तुम और मैं थे ,सड़क कहां थी नाला थी और हम सोलह साल की लड़कियों की तरह खिलखिलाते चौपाल पहुंचे थे।तुमने फोटो खींची,अब वो फोटो साल दर साल मेमरी में दिखती रहेगी।
पक्षी प्रेम के चलते संजय गांधी पार्क में घूमे तो न जाने कितने पक्षियों की फोटो और जानकारी इकट्ठा की ।तुम मुझे याद आती रहोगी। तुम्हारे साथ और भी न जाने कितनी फोटो हैं ,कितनी यादें दर्ज़ हैं कि एक किताब ही बन जाती ।पर किस्से लिखने का जो हुनर तुम जानतीं वो शऊर मैं कहां से लाऊं।
अभी तो हम तुम्हारी उस अमेज़न वाली आखरी पोस्ट पर ही अटके थे कि तुम निकल पड़ीं और कहानियां गढ़ने।
तुम्हें विदा कहना आसान तो नहीं पर जाओ रश्मि, जहां रहो बस दोस्त ढूंढ लेना ,बिना दोस्तों के तुम नहीं रह सकतीं।हम अपनी यादों में रश्मि को ढूंढेंगे – एक शानदार जीवट दोस्त को।
========
विभा रानी (अभिनेत्री, साहित्यकार)
आज भी मैंने लगाई थी
तुम्हारे माथे पर बिंदी
होठों पर लाली
लगता था, उठकर कहोगी
“छोड़िए न भाभी,
मैं कहां सजती धजती हूं इतना”
तुम कहती
मैं मुस्काती
और फिर हम दोनों खो जाते
गपियाते, मुस्काते
खिलखिलाते,
खाते, पीते
जो तुम उठकर कह जाती
========
अमित कुमार श्रीवास्तव (कवि, मित्र)
एक दोस्त चला गया। कितनी नोंक झोंक, कितनी लड़ाई, कितनी उलाहना और हम हमेशा कुछ न कुछ ऐसा लिखते थे जिससे वो हमेशा हमारी क्लास ले लेती थीं। ब्लॉगिंग के दौरान परिचय एक हमारी पोस्ट पर उनसे लड़ाई करते हुए हुआ था। फिर तो ऐसी दोस्ती हुई कि उनकी किसी भी पोस्ट पर हमे उन्हें छेड़ना होता ही था।
अक्सर जब हम देखते थे कि जीतना उनको ही है तो हम सफेद रुमाल दिखा कर समर्पण कर देते थे। बाद में हमारा नाम ही सफेद रुमाल रख दिया था उन्होंने।
व्हाटसप पर भी कुछ न कुछ ऐसे ही हम तंग करते रहते थे। बहुत सारी बातें यादें है जो भीगी आंखों से लिखा नही जा रहा।
अभी मुम्बई गये थे बहुत मन था मिलने का पर व्यस्तता के कारण मिल नही पाए।
उनकी पिछली और अब आखिरी पोस्ट पर हमने लिखा था, “ऐसा भी क्या भाव खाना” और वो भाव दिखा ही गये। छोड़ गए हम सबको।
Rashmi Ravija आपको कभी न भूल पाएंगे।
ॐ शांति।
=======
कुमारी वंदना
संवेदनाओं की एक नदी का सूख जाना
कुछ ऐसा ही महसूस हुआ मुझे, जब Rashmi Ravija जी के निधन की खबर पढ़ी। नहीं, वह लेखिका थीं, इसलिए लगाव नहीं था मुझे उनसे। बहुत सी लेखिकाओं से थोड़ा बहुत परिचय है, पर लगाव सिर्फ एक संवेदनशील व्यक्तित्व के चलते था। वह, जिनकी दुनिया पशु पक्षियों के इर्द गिर्द चलती है, मेरे मन में एक स्थायी घर बना ही लेते हैं, भले ही कभी बात भी होती हो या नहीं और ऐसे बहुत से लोग मिले फेसबुक पर, जिसमें वह भी थीं। बस इसीलिए उनके जाने का दुख इतना अधिक महसूस हुआ। इतना कि किसी की मृत्यु के शोक में शायद ही मैं कोई पोस्ट लिखती हूँ। दुख को नितांत निजी अनुभव मानती हूँ, पर अभी रोकते हुए भी न रोका खुद को।
दुनिया उन्हें लेखिका के अलावा पक्षियों के फोटोग्राफर के रूप में पहचानती होगी। मैं याद करती हूँ मुंबई जैसे मेट्रो सिटी में, जहाँ लोगों को बस अपने आराम के लिए सुविधाएं जुटाने की सुध रहती है, खिड़की का एक हिस्सा पक्षियों के लिए खोलकर उनके लिए दाना पानी रखने के लिए तरह तरह के पात्र लटकाने की व्यवस्था करने के लिए। आज वे पक्षी भी तो उदास होंगे। उनके बिना जाने वह झरोखा खुले या न खुले, जिससे भीतर जाकर वे दाने चुग सकें।
आपका होना जरूरी था। खैर, जहाँ, जिस दुनिया में भी रहें, खुश रहें!
========
नीलिमा शर्मा (कहानीकार, संपादक)
बिछड़ा कुछ इस अदा से कि रुत ही बदल गई
इक शख़्स सारे शहर को वीरान कर गया
लिखने को बहुत कुछ हैं रश्मि लेकिन शब्द साथ नहीं दे रहे हैं। तुमने मेरी अगली मुंबई विज़िट पर घर बुलाकर लंच करने का वादा किया था और वादा तोड़कर चली गई। बस जब से खबर सुनी हैं तुम ही तुम हर तरफ याद आ रही हो। वो पहली बार बुकफेयर में कांच के शामियाने पर चर्चा के बहने मिलना, फिर मातृभारती अवॉर्ड लेने आना, फिर पुस्तक मेले में साथ घूमना। फोन पर लंबी बातें करना। क्या भूलूं क्या याद रखूं? हर तरफ तुम्हारे लिए संदेश हैं और तुम एक पर भी टिप्पणी नहीं कर रही हो।
तुम्हारी ज़िंदादिली एक मिसाल बनकर रहेगी।
अलविदा मेरी दोस्त… उदास कर दिया तुमने। कांच के शामियाने लिखते लिखते तुमने बंद दरवाजों का शहर लिखी। फिर स्टिल लव यू कहकर तुम्हारी खुशबू ने उदास कर दिया है। अपूर्व अंकुर स्वरूषि और नवनीत जी को ईश्वर इस दुख को सहने की हिम्मत दें।
आप जिस भी दुनिया में रहे हमेशा सुकून से रहे । शांति ॐ शांति
कहानी ख़त्म हुई और ऐसी ख़त्म हुई
कि लोग रोने लगे तालियाँ बजाते हुए
रश्मि रविजा

रश्मि का इस तरह अचानक चला जाना मुझे बहुत बड़ा धक्का दे गया। उबरने में समय लगेगा ।
रश्मि दी! आपको हम सब कभी भुला नहीं सकते….विश्वास ही नहीं होता आप हमारे बीच नहीं हैं….मेरे लिए बहुत बड़ी क्षति है
जाने वाले चले जाते हैं पर अपनी यादें छोड़ जाते हैं।
यही दुनिया की रीत है।
सहृदय विनम्र रश्मि को विनम्र श्रद्धांजलि।
ॐ शांति।