Wednesday, April 15, 2026
होमकहानीमहेश शर्मा की कहानी - अथ उत्तर गाथा

महेश शर्मा की कहानी – अथ उत्तर गाथा

बहुत उलझन में थे गुप्ता जी | कुछ कुछ उदासी और कुछ खुशी के साथ, कुछ सुकून और कुछ अफसोस के साथ | आप कहेंगे इतनी  सारी  भिन्न-भिन्न अनुभूतियां कैसे कोई एक साथ महसूस कर सकता है तो बंधु मेरा जवाब होगा कि हां कभी-कभी ऐसी परिस्थितियों बन जाती है मैं स्वयं इसका भुक्त भोगी हूं | 2 वर्ष पूर्व इन संयुक्त और मिश्रित अनुभूतियों से गुजर चुका हूं वह वर्ष था जब मैं सेवा निवृत हुआ था मैं रोमांचित था एक नई जीवनचर्या  प्रारंभ करने को लेकर | क्या होगा जब कल सुबह होगी उठने की जल्दी नहीं ऑफिस जाने की चिंता नहीं बस का कोई डर नहीं कोई टारगेट कोई वर्क लोड नहीं तो इस रोमांचक  समय में बहुत खुशी महसूस कर रहा था क्योंकि सभी बंधनों  से आजाद हो गया हूँ लेकिन इस खुशी में कुछ उदासी भी छिपी  थी कि अब मैं कुछ नहीं एक फुरसती  बुजुर्ग व्यक्ति हूँ  जो किसी पद पर नहीं है बैंक मैनेजर की सम्मानजनक  कुर्सी जिससे ली जा चुकी है | दिनभर उसे आदर से नमस्कार करते हुए उसके अधीनस्थ  स्टाफ और अपनी आवश्यकताओं के लिए आने वाले कई कई कस्टमर या फोन से जुड़ी हुई कोई व्यस्तता नहीं है | कोई हलचल नहीं है |  मुझे कुछ सुकून तो था कि चलो नौकरी पूरी हुई सेवानिवृत हुए एक जवाबदारी खत्म हो गई , लेकिन अफसोस भी यह था कि अभी तो मैं कुछ दिन और काम कर सकता था | मुझे यह भी एहसास था कि मेरे बेंक खाते में मेरे पूरे वेतन की बजाय उससे लगभग आधी राशि ही जमा होगी | तो इसी तरह के मिले-जुले भाव को गुप्ता जी भी महसूस कर रहे थे | छ महीने  भी नहीं हुए थे उन्हें सेवानिवृत हुए | उनका दिन का ज्यादातर समय मेरे साथ ही बीतता था|                                                       
“यार शर्मा जी कुछ काम निपटाना है आपको  साथ देना पड़ेगा“                                          
“अरे मैं तो आपके साथ ही हूं आप चिंता न करें “ मैंने गुप्ता जी को आश्वस्त  करना चाहा  तभी उन्होंने जेब से एक  कागज निकाला, “ देखो यार यह सब काम करना है “ मैं आश्चर्य में था और मुझे हंसी भी आ रही थी गुप्ता जी ने आठ –दस  कामों की सूची बना रखी थी | मैं नजर डाली ग्रेच्युटी के पैसे आते ही उनकी एफ डी बेटों के नाम से बनाना है पोते और नाती के नाम से भी कुछ मासिक बचत खाते खोलना है,  अभी तक का पूरा जीवन किराए के मकान में ही निकाल दिया है अब खुद के नाम से अपना कुछ ठिकाना करना है।  एक फ्लेट देख रहा हूँ, उसका  कुछ अग्रिम जमा करके बाकी बैंक से कहीं से लोन लेना है | छोटा बेटा अभी तक कुंवारा है इसी साल कहीं भी कोई लड़की ढूंढ कर उसका विवाह  करना है और हम दोनों पट्टी पत्नी आज   तक कहीं ज्यादा बाहर घूमने फिरने नहीं गए थे बल्कि किसी तीर्थ स्थान का भी भ्रमण  उन्होंने नहीं किया था अब उनकी सूची में प्रमुख रूप से चारों तीर्थ का भ्रमण करना था |
मैंने कागज़ पूरा पढ़कर मोड़कर उनकी जेब में रखा | सब  हो जाएगा गुप्ता जी  आप चिंता मत करो,  ग्रेच्युटी की रकम आ जाने दो हम सारी व्यवस्थाएं कर लेंगे | गुप्ता जी निश्चित होकर चाय पी कर जा चुके थे और मैं ऊपर छत पर पौधों को पानी पिला रहा था | बागवानी के शौक के कारण छत पर 40-50 रंग बिरंगे फूलों से सजे पौधे की मेरे छोटी सी बागवानी हमारी  कॉलोनी में बहुत प्रशंसा पाती थी |  मैं  उन्हें समय पर पानी देता  था जरूरत होने पर उनकी मिट्टी बदलता था और समय-समय पर उन्हें धूप से या अन्य व्यवधान  से बचाने के भी प्रयास करता रहता था | दरअसल मुझे बागवानी का बहुत शौक था | पौधों को पानी पिलाकर नीचे उतर ही रहा था कि पोस्टमैन की आवाज आई आज फिर चार पाँच  पत्रिकाएं आई थी | बड़ी ही दिलचस्पी से मैं उन पत्रिकाओं को सहेज कर  अपने स्टडी रूम की टेबल पर रख रहा था तभी मेरे नजर अहले आई और कुछ पत्रिकाओं पर गई जिन्हे पढ़ना अभी बाकी था |  पढ़ने का शौक मुझे बचपन से था और आर्थिक रूप से संभव होने के कारण मैंने  कम से कम 20-30  मासिक अथवा त्रेमासिक पत्रिकाओं की सदस्यता ले रखी थी |  इन कामों से निपट कर स्नान ध्यान पूजा पाठ करते ही कॉलोनी के मंदिर वाले पंडित जी ठेकेदार को लेकर आ चुके थे |                                                                                                                                                                  
हमारे कॉलोनी के मंदिर का जीर्णोद्धार  हो रहा था | नई छत डाली  जा रही थी | मैं मंदिर समिति का कोषाध्यक्ष था और मेरे स्वभाव को देखते हुए मंदिर समिति ज्यादातर काम मुझे  सुपुर्द कर देती थी | ठेकेदार कुछ पेमेंट लेने आया था और बाजार जाकर उसे कुछ सीमेंट और सरिया भी दिलाना था | हमने आपस में चर्चा करते हुए उसके  पेमेंट का चेक बनाया, खरीदने वाले सामान  की सूची बनाई तब मैं फ्री हुआ | बड़ा बेटा आफ़ीस जाने को निकाल रहा था उससे  कुछ बात करते-करते श्रीमती जी ने सुबह का खाना लगा दिया था खाना खाने के बाद में एक-दो घंटे आराम करता हूं |                                                   
दोपहर में आराम करते हुए अचानक श्रीमती ने छोटे बेटे का जिक्र किया कि  कुछ दिन उसके पास भी जाकर रहना चाहिए | दरअसल मेरे दो बेटे हैं और एक बेटी है तीनों विवाहित हैं  | बड़ा बेटा मेरे साथ ही रहता है उससे छोटी एक बेटी है  वह भी उसके ससुराल जा चुकी  है और दूसरे नंबर का छोटा बेटा एक आई टी  कंपनी में जाब करता है  | बहू  स्त्री रोग विशेषज्ञ के रूप में वहां के एक अस्पताल में कार्यरत है |        बेटे बहू दोनों अपने 4 साल के बेटे के साथ में बेंगलुरु में रहते हैं  साल में एक दो बार उनका आना जाना होता था लेकिन उन्हें अवकाश बहुत कम मिलने से वह 2 दिन 3 दिन से ज्यादा नहीं रह पाते हैं  | उनका नन्हा  बेटा यानी मेरा पोता अभी तक तो अपनी नानी के पास ही रहता था लेकिन अब क्योंकि कुछ समझने लगा था वह मम्मी पापा के साथ रहने को या गया था |  बेटे बहु दोनों की  बहुत कठिन दिनचर्या थी फिर भी वे मेनेज करते थे |                                                                                  
मैंने श्रीमती को आश्वस्त किया कि कुछ मेरी जवाबदारी के काम निपट जाएँ फिर हम भी उनसे मिलने जाएंगे उनके पास भी कुछ दिन बिताएंगे | मैं वास्तव में सोचता  था कि कुछ दिन के लिए मुझे छोटे बेटे के पास भी रहना चाहिए | मैंने अपने रिटायर्ड जीवन के बारे में सोचा तो बड़ा संतोषप्रद लगा सारे पारिवारिक जवाबदारियों के काम निपट चुके थे अब कोई बंधन नहीं था | मैं यहां रहूं या कहीं और मुझे कोई समस्या नहीं होना था | लेकिन मैं यह भी महसूस करता था कि यहां पर मेरे कामों का इतना फैलाव है कि ज्यादा दिन बाहर रहना कठिन  है |  दोपहर के आराम के बाद में उठा ही था कि गुप्ता जी का फोन आया वो या  रहे हैं। किसी ठेकेदार  से उन्होंने बात की थी जो नगर की पास कॉलोनी में एक मल्टी बना रहा था और उसी का एक फ्लैट गुप्ता जी के  दिमाग में कई दिनों से घूम रहा था वही डील फायनल करना था | 
गुप्ता जी का कहना था कि हमें अभी जाकर कुछ एडवांस देकर फ्लैट बुक कर लेना चाहिए ताकि बाद में भाव बढ़ने का कोई असर  अपने सौदे  पर नहीं पड़े | मैं चाय पीकर तैयार था  और गुप्ता जी के आते ही उनके साथ फ्लैट देखने पहुंचा | फ्लैट अभी निर्माणाधीन  था जिसे पूरा होने में  तीन से चार महीने और लगाना  थे | 30-35 लाख की लागत वाला फ्लैट  10% यानी ₹300000 अभी देकर बुक किया जाना था। शेष राशि 3 महीने बाद प्लेट के अधिकार देने के साथ जमा करना होगी। गुताजी का विचार था कि 10% राशि ग्रेच्युटी के पैसों में से जमा कर दी जाए फिर एचडीएफसी बैंक से लोन लेकर किश्तें  स्वयं भरते रहेंगे या बेटे भी भरते रहेंगे | हमने फ्लैट पसंद किया जो लेना था और ठेकेदार से  अगले दो दिनों में एग्रीमेंट पेपर तैयार कर हस्ताक्षर करने और 10% राशि के भुगतान बाबत तय किया |                                                         
हम वापस घर की ओर चल पड़े  थे मैंने गुप्ता जी को बताया कि अब हम दो दिन बाद ही ठेकेदार  के पास जाएंगे तब तक वह एग्रीमेंट बना लेगा |  मैं भी अभी 2 दिन रोटरी क्लब के एक वृक्षारोपण कार्यक्रम में व्यस्त रहने वाला था रोटरी मंडल अध्यक्ष का दौरा  था और मैं रोटरी क्लब का जिला अध्यक्ष होने के कारण मुझ पर कुछ व्यवस्थाओं की  जवाबदारी थी |  गुप्ता जी कुछ-कुछ संतुष्ट थे स्वयं के मकान को प्राप्त करने की दिशा में पहला कदम रखा जा चुका था |                                                             
अगले 2 दिन में रोटरी क्लब के कार्यक्रम को संपन्न करने के कारण मैं अपने आदरणीय शुक्ला जी के घर भी नहीं जा सका था \ शुक्ला जी हमारी कॉलोनी के पास ही  रहते थे काफी बुजुर्ग थे देश के प्रतिष्ठित लेखक शिक्षाविद थे उनका मेरे ऊपर बहुत स्नेह था वे मुझे पुत्रवत मानते थे क्योंकि मुझे भी लेखन और पठन-पाठन में बहुत दिलचस्पी थी  इसलिए उनके आशीर्वाद से और उनके मार्गदर्शन से मेरा लेखन कार्य भी चलता था | 70 साल के बुजुर्ग शुक्ला जी से मेरे स्नेह बंधन इतने सशक्त  थे कि उन्होंने मुझे यह वादा कर रखा था कि मैं प्रतिदिन या कम से कम 1 दिन छोड़कर शाम को उनके पास जरूर एक घंटे बैठ कर चर्चा करुँ  ताकि उनका अकेलापन भी कुछ  दूर हो , नगर के समाचार भी मिले और हम साहित्यिक चर्चाएं करते हुए संतुष्ट होते रहें |  रोटरी क्लब की व्यवस्था के कारण  में दो दिन से जा नहीं पाया था उनके घर इसलिए आज मैं शाम को शुक्ला जी के पास जाकर 1 घंटे बैठा | भिन्न-भिन्न चर्चा  कि और संतुष्ट होकर घर लौटा | जीवनचर्या  इसी प्रकार चल रही थी तभी श्रीमती ने एक दिन प्रफुल्लित होकर यह खबर दी कि छोटा बेटा बहू आ रहे हैं अक्टूबर माह समाप्त हो रहा था दीपावली सामने ही थी और दीपावली के उपलक्ष में बेटे ने तीन दिन की छुट्टी ली थी और वह आ रहा था मैं भी रोमांचित था बेटे बहू के आगमन से | बेटी को छोड़कर हमारा पूरा परिवार एक साथ दीपावली उत्सव में सहभागिता कर रहा था |                                                                                 
बातों बातों में छोटे बेटे ने कुछ महत्वपूर्ण बातें भी बताई |  बेटे को उसकी कंपनी द्वारा 2 वर्ष के लिए विदेश भेजा जाना था  वहाँ  उसे कुछ नए कार्यों की ट्रेनिंग भी दी जाना थी और इस दौरान बेंगलुरु में केवल बहू और छोटे बच्चे  को ही रहना था | बेटे के विदेश जाने की बात सुनकर मैं प्रफुल्लित था तभी बेटे के एक वाक्य ने मुझे चौंका दिया “ पापा जी अब आपको कुछ जवाबदारी उठाना होगी “                                                                    
“जवाबदारी कैसी बेटा ? “                                                                      
“ वह पापा ऐसा है कि मेरे विदेश जाने के दौरान विनीता मोंटी के साथ अकेले सब कुछ एडजस्ट नहीं कर पाएगी इसलिए आपको कुछ समय बेंगलुरु रहना पड़ेगा |”  श्रीमती तो यह सुनकर उछल पड़ी |  बहुत खुश हो गई।
“ बिल्कुल हम चलेंगे मेरे बेटे बहू के साथ रहने के लिए “  लेकिन बेटे की बात सुनकर मैं सोच में पड  गया | बेंगलुरु जाना अच्छा रहेगा ? मेरी विचारणीय  मुद्रा देख बेटा मेरे चेहरे पर गौर से देखने लगा “ क्या हुआ पापा “?  मैंने स्वयं को सम्हाला बिल्कुल बेटा चलेंगे इसमें क्या समस्या है वहां भी रहेंगे महीना पंद्रह दिन तू बिल्कुल चिंता मत कर |
नहीं पापा महीने 15 दिन नहीं कम से कम 2 साल रहना पड़ेगा मेरी वापसी 2 साल में ही हो पाएगी |”
“अरे बेटा 2 साल ? “                                                                              
“हां आपको कुछ समस्या है क्या “ ?                                                               
“नहीं समस्या तो कुछ भी नहीं।”
“तो बस फिर जैसे आप यहां रहते हैं वैसे ही वहां रहें | नौकरी का तो कोई बंधन है ही नहीं , आप तो बिल्कुल  फ्री हैं और वैसे भी आप भैया के पास तो बरसों से रह रहे हैं थोड़ा सा हमारे पास भी रहेंगे तो आपको भी अच्छा लगेगा और विनीता और मोंटी भी अच्छे से रह सकेंगे | वैसे वहां सब व्यवस्था है | मेड है सब काम की लेकिन घर में एक  पुरुष सदस्य का भी होना जरूरी है |”                                            
“कब जाना है तुम्हें विदेश ?” मेरा स्वर  कुछ धीमा सा था |
“एक माह तो लग जाएगा पापा सारी तैयारी में | मैं अगले महीने आप दोनों की टिकट बुक करवा लूंगा और खबर कर दूंगा |” श्रीमती बहुत प्रफुल्लित थीं | उसने बड़े स्नेह से वहीं बैठे नन्हे मोंटी को गले से लगा लिया अब मैं मेरे पोते के साथ मजे से रहूंगी | मैंने  भी बेटे को आश्वस्त  किया बल्कि प्रसन्नता जाहिर की कि तू बिल्कुल चिंता मत कर | लेकिन मैं ?  हाँ मैं कुछ विचार में पड  गया |  , ना जाने क्यों ?
अगले दो-तीन दिन त्यौहार की धूमधाम में समय कब बीता पता ही नहीं चला | बेटे बहुत जा चुके थे हमें एक माह बाद  आने का सुनिश्चित करके और सारी जानकारियां समझा के | गुप्ता जी को मैंने तीन-चार दिन के लिए रोक रखा था |बेटे के जाते ही गुप्ता जी का फोन आ गया था हम फ्लैट वाले को कुछ पेमेंट भी कर दें और एग्रीमेंट का काम भी निपटा लेते हैं |
मैं कुछ विचलित था फिर भी मैं गुप्ता जी के साथ गया | बिल्डर  को ₹300000 अग्रिम जमा कर तीन माह में शेष भुगतान करने फ्लैट का अधिकार प्राप्त करने का अनुबंध कर लिया गया | गुप्ता जी एग्रीमेंट की कापी  पाकर  बहुत खुश थे 3 महीने में किसी भी बैंक से फाइनेंस करवा लेंगे |  मुझे धन्यवाद देकर अगले दो चार दिन में ग्रेच्युटी की राशि की व्यवस्था करने का तय कर गुप्ता जी  उनके घर जा चुके थे |
दिन भर में गुप्ता जी के साथ उनके काम में व्यस्त जरूर था लेकिन मेरी विचार यात्रा सतत जारी थी | मैं विचलित था यह सोच सोच कर कि  एक माह बाद  मुझे छोटे बेटे के साथ पास बेंगलुरु जाना है और वहां लंबे समय तक रहना है | लेकिन मैं  समझ नहीं पा रहा था कि  मैं खुश था या उदास था ?                               
वास्तव में सिर्फ उलझन में था | शाम का खाना खाकर अपने कमरे में बैठा इसी चिंता में डूबा  था कि 2 साल अपने मूल निवास से दूर जाकर कैसे रह पाऊंगा ?  यहां के इतने सारे काम सभी अधूरे छूटेंगे , सभी बिखरे काम समेटने होंगे | ऊपर छत पर पौधों को पानी देते देते हुए मुझे लगा कि वह सारे 40-50 पौधे मुझसे पूछ रहे थे हमारा क्या होगा ? हमें हर  बार पानी कौन देगा  हमारी देखभाल कौन करेगा ? पौधों को मैं कुछ जवाब नहीं दे पाया | नीचे उतर कर अपनी स्टडी रूम में टेबल पर बैठा ही था कि टेबल पर रखी मासिक त्रैमासिक पत्रिकाओं पर नजर गई अब  हर महीने 50 से ज्यादा आने वाली पत्रिकाओं का क्या होगा ? क्या इन सब के पते  बदलवाकर इन्हें बेंगलुरु बुलाना पड़ेगा या बड़े बेटे बहु को यह जवाबदारी देना पड़ेगी कि वे यहाँ आने वाली सारी पत्रिकाओं को बेंगलुरु भेजा जाए दे |  15 दिन बाद कॉलोनी के मंदिर की छत डलने वाली है उसके लिए सीमेंट और सरिया का काफी कुछ स्टॉक खरीदना है और पिछला हिसाब जो इनकंप्लीट है उसे भी पूर्ण करके किसी जवाबदार आदमी को सौंपना पड़ेगा | मुझे लगने लगा कि यद्यपि में रिटायर्ड हो चुका हूं लेकिन फिर भी जवाबदारियों से कितना बंधा हुआ हूँ | अपने बिस्तर पर लेटा  में इन्ही  चिंताओं  में डूबा था तभी कविराज प्रेम कुमार का फोन आया वे प्रदेश  साहित्य समिति के अध्यक्ष थे |                                                                               
“ बंधु वाल्मीकि जयंती आ रही है अगले महीने,  हर वर्ष की भांति हमें 3 दिन का प्रोग्राम करना है |  प्रोग्राम बृहद रूप से और शानदार होना चाहिए क्योंकि हिंदी साहित्य समिति के प्रांतीय अध्यक्ष भी आ रहे हैं “ | मैंने उन्हें आश्वस्त  किया  “ बिल्कुल प्रेम कुमार जी कार्यक्रम शानदार होगा “ लेकिन दिल कह रहा था होगा कैसे ? जब मैं रहूंगा ही नहीं तो | मैं कुछ निराशा सा होने लगा इन सारी जवाबदारियों के चलते कुछ तो व्यवस्था करना होगी | मैं निराशा से उबर कर कुछ सामान्य होने के प्रयास करने लगा | तभी बहू चाय का प्याला लेकर आई और मैंने उसे रोका |  बैठो बहू मुझे तुमसे कुछ बात करना है  | बहू  चौकी , बेठी और बोली जी कहिए पापा जी ? 
देखो मैं एक दो साल के लिए बेंगलुरु जा रहा हूं और ऊपर छत के सारे पौधों को   पानी देना पड़ता है उन्हें धूप से और हवा से बचाना पड़ता है और यदि यह सब नहीं करेंगे  तो सारे पौधे नष्ट हो जाएंगे | क्या तुम जवाबदारी से रोजाना उनकी देखभाल कर सकोगी ?                                                
“बिल्कुल पापा जी आप फिकर मत करो मैं सब संभाल लूंगी |”                                                                                        
बहू कुछ संकोच में बोली |
” बहू गर्मी के दिनों में यदि उन्हे समय पर पानी नहीं दिया  गया तो पौधे शाम तक मुरझा जाएंगे और धीमे-धीमे मरने लगेंगे |”
“ठीक है पापा जी मैं कोशिश करूंगी हालांकि मैं 10:00 बजे सारे काम निपटा कर अपने बैंक नौकरी पर चली जाती हूं और शाम को 6:00 बजे आती हूं फिर भी मैं पानी देने  का काम कर ही लूंगी |”
“अरे दादा जी आप अपने पौधों का सोच रहे हो मेरा क्या होगा ? मुझे स्कूल छोड़ने कौन जाएगा और मेरी शाम की पढ़ाई कौन करवाएगा होमवर्क मेरे साथ ? मैंने असहाय से अपने छोटे पोते की ओर देखा | तभी बहू ने उसे डांटा “ अरे चुप तेरे सब काम पापा कर देंगे “ बहू  जा चुकी थी मैं चिंता में डूबा जाने कब निद्रा देवी की गोद में जा चुका था | दूसरे दिन सुबह चाय पीते हुए मैंने  बड़े बेटे से कहा “ बेटा मैं बेंगलुरु जाऊंगा तो यह जो मेरी पत्रिकाएं आती है इन सब को तुम  बेंगलुरु भेज दिया करोगे ?
बेटा मुस्कुराया “ क्या पापा जी आप भी पत्रिकाओं की चिंता करते हो मैं भेज दूंगा , पर अलग-अलग हर पत्रिका भेजना  मुश्किल है | हाँ ,  महीने दो महीने में एक बार इकट्ठे सारी पत्रिकाएं भेज दूंगा या फिर आप सभी पत्रिका वालों को अपना नया पता भेज कर वहां भी बुला सकते हैं |”
मैं संतुष्ट नहीं था उसका जवाब सुनकर लेकिन कुछ कर नहीं सकता था | दिन गुजर चुका था दूसरे दिन सुबह गुप्ता जी आने वाले थे और हमें बैंक जाना था | गुप्ता जी बड़े प्रसन्न दिखाई दे रहे थे | उन्होंने बताया कि अगले महीने की 7 तारीख से तीन धाम यात्रा की बस जा रही है माहेश्वरी बंधुओं की उसी में उन्होंने दो टिकट बुक करवा लिए थे |                                                                     
20 दिन की यात्रा है और अबकी बार तो मैं जरूर जाऊंगा | बहुत दिनों से टाल  रहे थे महीने भर में सारी तैयारी करना है कुछ खरीदी भी करना है | पूरी लाइफ हो गई किसी तीर्थ में नहीं गया अब तो मैं  लगातार घूमना फिरना ही करूंगा |  किसी लफड़े या जवाबदारी में नहीं पड़ूँगा | “                               
गुप्ता जी के चेहरे पर बहुत प्रफुल्लता थी। मुझे भी अच्छा लगा | कुछ ही देर बाद हम लोग बैंक पहुंचे | मैनेजर कहीं बाहर गए हुए थे तो हमने दो-तीन दिन बाद वापस बैंक में आने का तय किया | वापस घर की और लौट चलें | मैं इस पूरे समय में अपनी  ही उधेड़बुन  में लगा हुआ था | देखते ही देखते आठ  दिन गुजर चुके थे | श्रीमती ने खुशी-खुशी सारी तैयारी कर ली थी | मैं अभी भी अपनी समस्या में उलझा हुआ था | क्या होगा मेरे जाने के बाद ? मुझे कल शाम का स्मरण हुआ , जब मैं शुक्ला जी के घर बैठा  उन्हें बता रहा था अपने बेंगलुरु जाने के बारे में | बहुत विचलित हो गए थे वे |  अरे यार शर्मा जी मुझे आपका बहुत भरोसा था | मैं रोज आपका इंतजार करता हूँ | आपके साथ साहित्यिक चर्चा करके मुझे बहुत सुकून मिलता था आप जा रहे हो वह भी 2 साल के लिए मेरा समय कैसे निकलेगा ?
शुक्ला जी की बात सुनकर मेरे मन में फिर कुछ नैराश्य  भाव पैदा होने लगा | वास्तव में दो साल तो बहुत लंबी अवधि होती है |  दरअसल में दुखी बिल्कुल भी नहीं था ना ही मुझे इस बात की कोई चिंता थी कि बेटे के वहां अच्छी तरह से रह पाऊंगा या नहीं ? लेकिन मैं दुखी हो रहा था अपने यहां के फैले हुए कामों को लेकर | यही सब मुझे मोह  में डाल रहे थे | कुछ रोजाना मिलने वाले मित्र , कभी कुछ साहित्यिक कार्य तो सामान्य रूप से थे ही , बागवानी की चिंता , मंदिर की व्यवस्था , रोटरी क्लब की जवाबदारी और काव्य गोष्ठियों की गतिविधियां और हर दूसरे चौथे दिन आने वाली पत्रिकाओं का मोह मुझे सता रहा था , और इन सबसे जरूरी शुक्ला जी से रोजाना की आत्मीय मुलाकात ये सभी कुछ छूट जाने वाला था | इन्ही विचार मंथन में डूबा था मैं |
आज फिर गुप्ता जी का फोन आना आया था 12:00 बजे बैंक चलना है | भोजन से निवृत होकर में तैयार बैठा था इस बीच मैंने कुछ किताबें पत्रिकाएं बेंगलुरु ले जाने के लिए बांध ली थी | कंप्यूटर का साहित्यिक डाटा एक पेन ड्राइव में सेव कर लिया था ताकि वहां भी साहित्यिक गतिविधियां जारी रह सके | मैं गुप्ता जी का इंतजार कर रहा था तभी मोबाइल की घंटी बजी | मैंने कॉल रिसीव की लेकिन उधर गुप्ता जी नहीं गुप्ता जी का बेटा था जो बहुत घबराते हुए मुझे तत्काल गवर्नमेंट सिटी हॉस्पिटल पहुंचने का कह रहा था |   क्या हुआ अस्पताल क्यों ? अंकल पापा को सिटी हॉस्पिटल ले गए हैं उन्हें दिल का दौरा पड़ा  है आईसीयू में ले गए हैं आप तत्काल आ जाइए |
मैं यह सुन कर दंग   रह गया | कहां तो हम बैंक जाने का प्रोग्राम बना रहे थे और अचानक यह क्या हुआ ? मैं तत्काल चल पड़ा  और दस मिनट में अस्पताल पहुंच गया | आईसीयू की ओर मुडा ही  था कि वहां से रोने चिल्लाने की आवाज आने लगी | गुप्ता जी का सारा परिवार वहाँ  इकट्ठा था | मैंने  लपककर गुप्ता जी के बड़े बेटे को पकड़ कर झिंझोड़ा , क्या हुआ  ? और बेटा दहाड़े मार कर रोते रोते चिल्ला पड़ा “ अंकल पापा चले गए “
“क्या ?” मैं बेहोश सा होने लगा मानो ऊंचे आकाश से नीचे पथरीली  जमीन पर धम्म  से गिरा हो  | एक-दो घंटे बाद में कुछ सामान्य होने लगा | मुझे अपने घर लाया जा चुका था | मेरा स्वास्थ्य इतना बिगड़ चुका था कि मैं गुप्ता जी के दाह संस्कार में भी नहीं जा पाया |  बेटा दाह  संस्कार से शाम को वापस लौटा तो उसने बताया कि खाना खाकर गुप्ता जी आराम कर रहे थे , तभी अचानक उन्हे  चक्कर आए, सीने में दर्द उठा था। डॉक्टर ने बताया कि बहुत तीव्र दिल का दौर आया है और उन्हें बचाया नहीं जा सका | यह सुनकर मुझे फिर घबराहट होने लगी | है प्रभु क्या ऐसा भी होता है ? मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था | 6 माह पहले रिटायर्ड हुए गुप्ता जी, जिन्होंने 15 दिन पहले अपना फ्लैट बुक किया | एक दो माह में  नए फ्लैट में शिफ्ट होने के सपने देख रहे थे | 1 महीने बाद ही तीर्थ यात्रा पर भी जाने वाले थे | अगले दो-तीन दिनों में अपनी ग्रेच्युटी की रकम को बेटों और नाती पोतों  के नाम से डिपाजिट करने की व्यवस्था सोच रहे थे और इतनी सारी योजनाओं के बीच अचानक बिना कुछ किए बिना किसी पूर्व सूचना किसी  चेतावनी के अचानक  चले गए | मैं विचार शून्य था | स्तब्ध था | पत्नी धीरज बंधा  रही थी। शांत कर रही थी | कुछ धार्मिक स्वाभाव की थी  और इसी की शक्ति उसके दिलों दिमाग को नियंत्रित रखे हुए थी | उसका बोलना जारी था।
“ सब कुछ विधि के हाथ है , कल की मत सोचो , आज की ही फिक्र करो | कभी भी कुछ भी हो सकता है यह सब ऊपर वाले के हाथ है |”  ऐसी बातें मैंने पहले भी किताबों में पढ़ी थी , संतों के  प्रवचन में भी सुनी थी और उन्हें सुनकर भुला  भी दिया था , लेकिन आज मुझे पत्नी द्वारा कही गई हर बात बहुत  सत्य और प्रामाणिक लग रही थी |  मैं मन ही मन तुलना कर रहा था अपनी और गुप्ता जी की | गुप्ता जी  रिटायरमेंट के बाद अपने कई कई पेंडिंग कामों को लेकर व्यस्त और थे | सब की व्यवस्थाओं में लगे थे , उन्हें पता भी नहीं था कि वे  इस तरह से अचानक अज्ञात यात्रा पर प्रस्थित  हो जाएंगे  | और मैं रिटायरमेंट के बाद स्वयं द्वारा ही पैदा की गई  कई कई उलझनों  में बंधा हुआ स्वयं को असहाय पा रहा था | बेटे बहू के आत्मीय  निमंत्रण और पारिवारिक जिम्मेदारी के लिए जाने के कारण ही विचलित हो रहा था | मुझे मालूम था कि मुझे एक माह बाद  जाना है और दो एक साल रहकर वापस आना है , फिर भी मैं उलझन में  था | और गुप्ता जी को तो कोई पूर्व सूचना भी नहीं थी , कोई चेतावनी कोई अंदेशा भी नहीं था | उनके भी कितने ही काम अधूरे और  बिखरे हुए थे और अचानक बिना सूचना के उन्हें चले जाना पड़ा | ओफ कोई इस तरह भी कहीं जाता है क्या ?                                                                            
मैं अपने छोटे-छोटे कामों की चिंता कर रहा था जबरदस्ती उनके मोहपाश  में बंध रहा था क्या होगा , क्या होगा ,और गुप्ता जी….. मैंने अपना सिर पकड़ लिया | तभी श्रीमती के बोले हुए वाक्य मेरे कानों में फिर घूमने लगे “ जितना भी जी लिया वह समझ लो अपने भाग्य का था |  जो भोग लिया वह अपना था और जो बाकी बचा उसकी जरा भी चिंता मत करना | उसके बारे में सोचकर परेशान ना होना |                             
मेरी नजरों में मेरी बागवानी घूमती रही | मेरी पत्र पत्रिकाएं मेरे सामने आती रहीं| भावुक होते हुए शुक्ला जी मेरे मस्तिष्क में स्थाई रूप से महसूस होने लगे | कॉलोनी की मंदिर की छत और वाल्मीकि जयंती पर आयोजित किए जाने वाले हिंदी दिवस , ऐसे कई कई काम आपस में गड़बड़ होने लगे | इन सब बातों को मैं  सोचता रहा  दो-तीन दिन बाद जब मैं गुप्ता जी के घर बैठक बैठने गया | उनके घर की ओर जाते  हुए मैं सोच रहा था कि , क्या हालत हो रही होगी पूरे घर परिवार की | उनके बेटे की उनकी पत्नी की | सारे अधूरे काम छोड़कर गुप्ता जी अद्रश्य  हो चुके थे | उनका स्वयं के फ्लेट में जाकर रहना , तीर्थ यात्रा पर जाना रह गया था | उनकी ग्रेच्युटी के पैसे की व्यवस्था करना रह गई थी |  गुप्ता जी के साथ हुए हादसे के बारे में सोच सोच कर मैं दुखी बहुत हुआ था  लेकिन अब एक परिवर्तन मेरी सोच में यह आ रहा था कि मेरा एक-दो साल के लिए छोटे बेटे के यहां जाकर रहना तो बहुत छोटी बात थी अपने बागवानी या पौधों पर ध्यान नहीं दे पाना या पत्रिकाओं के मिलने की व्यवस्था न होना , मंदिर समिति के या रोटरी क्लब के या काव्य गोष्ठी के कार्यों को पूरा न कर पाना और अपने श्रद्धेय  शुक्ला जी से रोजाना ना मिल पाना आदि  भी कुछ तकलीफ देह  जरूर थे लेकिन वह इतने बड़े कारण  भी नहीं थे जिनके लिए मैं दुखी होता | मुझे लग रहा था कि हम स्वभावत;  इतने मोहजाल में उलझे होते  हैं कि जीवित व्यक्ति तो ठीक है निर्जीव वस्तुओं के मोहपाश में भी बँध  जाते हैं |                                          
यह सारी बातें सोचते सोचते में स्वयं को बहुत हल्का महसूस कर रहा था | गुप्ता जी के यहां बैठक में चुप सा  बैठा यही  सब बातों को सोच रहा था तभी उनके बड़े बेटे ने मुझे अंदर के कमरे में बुलाया और वह बताने लगा “ अंकल वह बिल्डर आया था ₹300000 की जमा रसीद दे गया है और दो महीने में फ्लैट तैयार कर देने का वादा कर गया है तथा  कल बैंक मैनेजर साहब भी आए थे वे भी कह गए है कि हमें जितने  भी लोन की आवश्यकता होगी वह सरलता से  दे देंगे , और शायद अगले 2 महीने बाद हम पापा के सपनों के अनुसार हमारे स्वयं के मकान में चले जाएंगे |” गुप्ता जी के बेटे की बातें सुनकर मुझे लगा ईश्वर की यह मनुष्य रूप की निर्मिति बहुत सशक्त है | किसी आदमी का अभाव या किसी की मृत्यु भी मनुष्य को पूरी तरह से तोड़ नहीं पाती है | एक बहुत महत्वपूर्ण  कहावत दिमाग में आई, “आपका होना कई कई लोगों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है ,  लेकिन आपका ना होना सब कुछ खत्म हो जाने के बराबर नहीं है | जीवन तो सतत चलता रहता है |”                                                                       
मैं घर लौट रहा था लेकिन बहुत संतुष्ट था | निर्विकार सा था | सप्ताह भर  पहले मैं  कहां छोटी-छोटी चीजों के मोह में पडा था उनकी व्यवस्थाओं को लेकर विचलित था | और कहां अब यह सोच रहा था कि मिलना बिछुड़ना  यह लगाव  और यह दूरियां सभी सहज घटनाएं है जो सतत जीवन में घटती रहती है हमें  वर्तमान में जीना चाहिए | भूतकाल का मोह या अतीत का आकर्षण उतने सुखद नहीं होते हैं जितने वर्तमान में जीना | अब मैं उत्सुक था बेंगलुरु जाने के लिए वहां के नवीन वातावरण को जानने समझने के लिए | घर पहुंचते ही बहू ने दो और छोटी-छोटी बातें ऐसी बताई कि मुझे स्वयं की बेवकूफियां पर हंसी आने लगी |  बहू ने बताया कि , बेटे ने रामलाल माली से बात कर ली है वह रोजाना एक बार आकर पौधों को  पानी भी देगा और उसकी देखभाल भी करेगा | और और छोटे पोते के स्कूल की टीचर को भी ट्यूशन पर बुला लिया है | आपके बाकी बचे काम भी व्यवस्थित हो जाएंगे आप बिल्कुल चिंता न करना | अब मैं बहू की बातों को बिल्कुल सहजता में ले रहा था | दिमाग पर छाया भ्रमित मोह का सारा अंधकार दूर हो चुका था | मैंने श्रीमती को तत्काल बुलाया और बेंगलुरू जाने की तैयारी का जायजा लेने लगा |

महेश शर्मा धारवाले
लखनऊ
RELATED ARTICLES

2 टिप्पणी

  1. अच्छी कहानी है‌ महेश जी!
    जब तक जीवन है, मोह से बंधे हैं उसके बाद कुछ नहीं। कोई अगर साथ है‌ तो बहुत अच्छा है,न है तो भी रास्ते हैं। ज़िंदगी ऐसे ही चलती है। किसी के बिना किसी का कोई काम नहीं रुकता।

  2. बहुत अच्छी और सामयिक परिस्थितियों से उपजी सोच को.दर्शाती कहानी।इस कहानी की संवेदनात्मक दृष्टि प्रभावित करती है।हम अपने जीवन में तमाम चीजों, घटनाओं,और परिचितों से लगाव रखते हैं,और धीरे धीरे वो इतने महत्वपूर्ण हो जाते हैं.हमारे लिए या हमें.महसूस होता है हमारे बिना इनका अस्तित्व ही नहीं रहेगा।पर यथार्थ यह महीं है।जीवन चलता रहता है,हमारे होने या न होने से कहीं कुछ भी नहीं बदलता। बहुत ही भावप्रवण और मार्मिक कहानी।भावनाओ में बहा ले जाती है और पाठक यह सोचने के लिए विवश हो जाता है कि कहीं यह हमारे साथ तो नहीं होगा?। मैने कहानी को बहुत ही रोचक और प्रेरक भी पाया।हार्दिक बधाई अशेष शुभ कामनाए सर।प्रणाम।
    पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest