1- व्यंग्यिका

जैसे कोस कोस पर पानी
चार कोस पर बानी ,यहां बदलती है
उसी तरह हर दो कदम पर साहित्यकार
और हर चार कदम पर संस्था की भरमार
देख लगता है कि रचनात्मकता
यहां बिखरी पड़ी है।

विचारों का समुद्र लहरा रहा है
और जब ख्याल आती है,
बात असर की , तो बिल्कुल बेअसर
दस प्रतिशत  हैं ओरिजिनल
बाकी दूसरों की नकल
कॉपी पेस्ट में ही कुछ
अपनी भी धाक है जमती
तभी तो साहित्यकारों की आज,
है इतनी बड़ी सृष्टि।

इनका है कहना क्वालिटी में दम हो न हो,
क्वांटिटी में हम कम नहीं !
अपने नाम के आगे साहित्यकार
न लगाया ,तो हमारा नाम नहीं
यह और बात  कि बरबस क़लम थामे
ऐसे लोगों को सचमुच में  कुछ काम नहीं।

सोचने की बात है यहां
साहित्यकारों की फैक्ट्री लगी है,
और विदेश की फैक्ट्री में क्या बनते
पेन नहीं या जन्मते चिंतक, लेखक नहीं!
समाज की हालत जस की तस,
सच्चे साहित्यकार सोचते हैं कि ,
उनके मन के कालेपन को साफ करें या
कि सही रचनाधर्मिता कर कागज काले करें।

व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम,टि्वटर पर
इनकी रचना शीलता की भरमार।
सुनना कम, सुनाना ज्यादा
लिखना कम, चुराना ज्यादा
का मचा है अभिसार।

2- पुरुषों की सोच पर ज़रूरी विमर्श

स्वयंसिद्धि रूपा ये भारत की ललनाएं!
लिखने चली है विकास की नव गाथाएं !!
अब न रुकेंगी,अब न  झुकेंगी
बस आगे ही आगे यूँ  बढ़ेंगी।
आसमान की ऊंचाइयों को छूती
कोई क्षेत्र न ऊंची कोई चोटी
तुमसे रहे अछूती।

अब्र की बारिश में भीगती
अनगिनत शक्तियां समेटे
चल पड़ी वह चरेवेति चरेवेति
सीता ,उर्मिला , बा का तप से तप्त पत्नीत्व
विदुषी गार्गी, घोषा ,इंद्राणी ,
अपाला,शची ऋषिकाओं की ऋचाएँ,
ऋग्वेद में गूंजती है
संघमित्रा का दर्शन ज्ञान,
अरुंधति की व्यवस्था का सम्मान
भीकाजी कामा,दुर्गा भाभी,
सरोजिनी की देशभक्ति के,
रंग से नई तस्वीरें बनती है।

लालिमा बिखर जाती है जब अरुणिमा
झंडा गाड़ देती है, अपने साहस को निचोड़
, सारी बाधाएं परे धकेल ऊंची चोटियाँ
नतमस्तक  हो करती है वंदन अभिनंदन ।

मां शब्द को परिभाषित करती,
हुई क्षत्राणी पन्नाधाय,
जीजा बाई के आंचल में पलते
, सिंह शावक जैसे शिवाजी
और त्याग ममता और दया की
प्रतिमूर्ति मदर टेरेसा

भरती हुई हुंकार जब ,
चमक पड़ती है तलवार,
टूट पड़ती है दुश्मन दल पर ,
झांसी की रानी
और  धरा को चूम,
आसमान की ऊंचाई पर
अपना हस्ताक्षर करती है,
फाइटर जेट पायलट अवनी।

तैरती हुई जलपरी  बुला के ऊंचे इरादे
समंदर भी देखता है सर झुका के
जब मिथाली बॉल पर वार करती हैं
तो सीधा रुकता है बाउंड्री पार जाके
दीपिका, अंजली का अचूक निशाना
लक्ष्य से टलता नहीं
मैरी कॉम के मुक्के चटा देते हैं
दुश्मन को धूल जम के।

किरण बेदी का हौसला , इंदिरा की दृढ़ता,
दबंगता सिखा देती है हर क्षेत्र में सफलता,
कल्पना अंतरिक्ष की कल्पनाओं को,
हकीकत में उतार लाती हैं तो,
नंदिनी मंगलयान भेज मंगल गान रचती हैं,
मिसाइलों के लिए मिसाल बन टेसी थॉमस,
अग्निशिखा सी अवतरित होती हैं।

लता के सुरों की कोमलता ,
अर्श छूकर रूहों में दस्तक देती है ,
शबाना,स्मिता,कंगना के अभिनय की,
जीवंतता मन को जगा देती है,
अमृता के कनवास के रंग ,
उड़ उड़ कीर्तिमान रचते हैं,
प्रतिभा पाटिल,निर्मला सीतारमन,
शक्तियों की नई परिभाषाएं  बनती हैँ।

फौलाद सा दिल हुए फौजी की,
मां और बेटियां बहुएं, अपने पति,
बच्चों को दुश्मनों के छक्के छुड़ाने ,
जब सीमा पर विदा करती हैं ,
तो इन वीरांगनाओं की सहनशक्ति पर,
मातृभूमि भी गर्व करती है।

जब महादेवी, सुभद्रा , महाश्वेता,
शब्दों में एहसास भरती हैं ,
जागृत कर देती है तन मन,
और शब्द बोल उठते हैं।

ऐसी अनगिनत ध्रुव तारिकाओं से
भरी पड़ी है निहारिका
नारी ही तो है सृष्टि पर सच्ची नायिका
अध्यात्म प्रेम दया मातृत्व
शक्ति और भक्ति का गहना पहने।

संपूर्णत्व से सुसज्जित
यह सभी जगमगाती दीप शिखाएं
जिनकी रोशनाई से ही सृष्टि की खूबसूरती है
फिर भी सवाल कई खड़े होते हैं
जिनके जवाब ढूंढने हैं खुद  ही
कई गुना बेहतर होने पर भी,
कन्याएं कोख में ही मार दी जाती है।
चलाने पड़ते हैं लाडो अभियान,
बाल विवाह से बचाने के लिए
‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ ‘पढ़ाने के लिए ।

अस्मिता की गुनाहगारों को सज़ा दिलाने
गुहार लगाती, मासूम की जब
रिपोर्ट नहीं लिखी जाती।
उसी पर लांछन लगाकर स्कूलों में
भी जाना कर दिया जाता है बंद
अभी भी  उनके लिए बने है क्यों इतने  फंद!

विमर्श विमर्श विमर्श
कैसा स्त्री विमर्श !
विमर्श तो हो  पुरुष की
अहम ग्रस्त उस मानसिकता पर
जो जीने नहीं देती स्त्री को
मानवी समझ सहर्ष।

अब सामाजिक सोच बदलेगी ,
पुरुषों के छद्म अहंकार की दीवार भी गिरेगी
जो सदियों से था , रहेगा,नारी विदुषी
मानवी का अधिकार पाकर रहेगी।

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