पता नहीं रविवारीय सूरज की रोशनी दिखाई देते ही वह चौकन्नी सी क्यों हो जाती थी जैसे कोई कुछ छीनने आ रहा हो उससे ।खिड़की के अधखुले पल्ले से छनती ताज़ी झाँकती सी रोशनी से उसके मन की धुकड़-पुकड़ बढ़ने लगती थी , अब बस दिन के भरपूर उजाले की दुहाई , आज आ तो नहीं जाएगा वो?पापा से मिलने के बहाने अपने पिता के साथ वह कितने महीनों से रविवार को शाम की चाय पीने पहुँच ही जाता ।

सीटियाँ सी बजने लगतीं निन्नी के कानों में ! खुशी की नहीं होती थीं वो सीटियाँ ,गुस्से की होती थीं।कुछ न कर पाने की होतीं, पर फ़ायदा क्या था ?भीतर उफ़नती रहे ,जब तक मुह खोलकर कुछ कहे न किसी को भला कैसे पता चलता कि वह क्यों इस कदर उफ़नती रहती है ?वैसे, उसकी बात का वज़न भी क्या था घरवालों पर? उन्हें तो जो करना था, वही करते न ! आख़िर पाँच  बेटियाँ जमा जो कर लीं थीं।अपना बोझ  तो हल्का करना ही था न ! इन बेटियों के बाद भी बेटे का स्वप्न अधर में लटकता ही रह गया था ! पापा तो नहीं पर उसकी शिक्षित माँ कहीं पर भी बेटी के ब्याह की मृदंग बजाने लगें,निन्नी को कभी भी भला नहीं लगा था ।

माँ तो शर्मा जी  के आने से खुशी के मारे चकरघन्नी बन जातीं।न जाने कहाँ से भर जाती थी इतनी ताक़त उनमें? वैसे तो दिनोंदिन गिरी-पड़ी जातीं, कोई न कोई परेशानी उन्हें घेरे ही रहती थी। पर शर्मा जी के आने पर फटाफट अपनी घरेलू सहायिका बिमला  को पल्लू में से मुड़े-तुड़े नोट निकालकर नंदी हलवाई के यहाँ छनते गर्मागर्म समोसे लाने का हुकुम देकर बिमला का इंतज़ार किए बिना गोल बत्ती वाले स्टोव  पर चाय का पानी चढ़ा देतीं,फिर खुद भी आकर साड़ी का पल्लू संभालती हुईं बैठक में बिराज जातीं।चाय तो बिमला आकर बना ही लेती पर ट्रे में नाश्ता सजाकर लाने की ड्यूटी निरुपमा यानि निन्नी की ही होती जिससे वह बेहद चिढ़ती।खासतौर पर जब वह जानती थी कि शर्मा जी का ढीठ बेटा दीपकचरण भी अपने पिता के साथ पूँछ की तरह लटका चला आता था। वह उसके साथ उस कॉलेज में ही तो पढ़ता था जिसमें शहर के नए धनाढ्य या कहें नए-नए मॉडर्न लोगों के बच्चे ‘को-एज्युकेशन’ में पढ़ने भेजे जाते थे। अब वो बात और थी कि वे पढ़ने के नाम पर अपने माँ-बाप का नाम कैसे और क्या-क्या खुराफ़ातों से  रोशन करने जाते थे !   शर्मा जी के आने की आवाज़ सुनते ही निन्नी की ओर माँ की आँख का इशारा कुछ ऐसा सरपट फिसलता कि बस उसे माँ समझती या निन्नी ! कुछ ऐसा था उस इशारे में कि बस वो सब कुछ होता निरंतर जो माँ चाहतीं ।

पंडित शिवचरण शर्मा बिना नागा रविवार को पाण्डे  जी से मुलाकात करने उनके घर पहुँच जाते ।पाण्डे जी जैसे भी शिक्षित परिवार गिने-चुने ही तो थे वहाँ ! शर्मा जी  भी अपने परिवार के कम शिक्षित होने को किसी न किसी तरह ऐसे परिवारों में  मित्रता करके अपने स्तर को और भी ऊंचा दिखाकर अहं को संतुष्ट करना चाहते थे ,वे ठहरे बड़े व्यवसाई,शुगर मिल के मालिक ! और भी न जाने कितने काम-धंधों  के साथ रूपये ब्याज़ पर देने का काम भी करते। पूरी फ़ौज थी उनके यहाँ काम करने वालों की ! तीन नकारा बेटे पैदा किये थे उन्होंने और तीन ही बेटियाँ ! तीनों बड़ी थीं बेटियाँ !उनकी  शादी में कहाँ से और कैसे किस-किसका  खाकर खर्चा किया था उन्होंने ,ईश्वर ही जाने किन्तु पूरे मोदीनगर के साथ जुड़े हुए शहर मुरादनगर ,मेरठ, मुज़फ्फरनगर,सहारनपुर तक उनके चर्चे पहुंचे हुए थे। ब्राह्मण परिवार में इतना धनाढ्य बंदा कोई विरला ही होता था ,वाणिक्य समाज में तो यह बात कोई इतनी अधिक आश्चर्य की नहीं मानी जाती थी। कारण ? बनियों में अधिकांशत:व्यवसाय ही करते थे लोग और उस ज़माने में भी मोदीनगर में कई लखपति बनिए परिवार थे किन्तु ब्राह्मणों में तूती बोलती शर्मा जी की !

जब वो अपनी बड़ी सी गाड़ी में बैठकर अपने परम मित्र पाण्डे जी के घर पधारते तो मुहल्ले के बच्चे धीरे-धीरे जाकर उस गाड़ी को ऐसे सहलाते मानो किसी शनील या मखमल के बहुमूल्य कालीन पर चलने का स्वप्न देख रहे हों पर ड्राईवर की झिड़की खाकर उसे चिढ़ाते हुए भागते नज़र आते ,किन्तु जहाँ ड्राईवर सुखलाल यानि सुखी अपने आपको गाड़ी के शीशे में निहारने लगता ,वे बदमाश बच्चे फिर से वही हरकतें करने पर उतारू हो जाते। कभी-कभी तो सुखी सड़क पर पड़े कंकर उठाकर ही बच्चों पर फेंकने लगता और बच्चे उसे चिढ़ाते ,हो-हो करते वहाँ से भाग खड़े होते।गिनी-चुनी दसेक गाड़ियाँ होंगी उस ज़माने में मोदीनगर में !

पाण्डे जी पूरे सप्ताह भर तो दिल्ली सरकारी नौकरी में सिर खपाते, शनिवार की शाम को दफ़्तर से ही सीधे बस में बैठकर मोदीनगर रात तक पहुँच पाते ।उनकी वृद्धा माँ, पत्नी और पाँच बेटियाँ जो थीं वहाँ ।अच्छी-खासी सरकारी नौकरी पर थे पाण्डे जी पर परिवार के खर्चे क्या कम थे?  उन दिनों भी  बनियों,ब्राह्मणों में लेन-देन तो था ही, हाँ ! बनियों में कुछ अधिक ही होता था ,अमीर बनने की दिशा sमें अग्रसर हुए ब्राह्मणों ने भी बनियों के जैसे नया नया दिखावा शुरू कर दिया था ।उन दिनों एक धातु निकली थी, स्टील ! क्या चाँदी से चमकते थे बर्तन उस धातु के ! जिन परिवारों पर ‘बड़प्पन’ का ठप्पा लग चुका था, ऐसे परिवारों के रसोईघरों में वो बर्तन चमचमाते और गृहणियों को अपने ताज़ा-ताज़ा  स्टैंडिंग किचन के दर्शन कराने के बहाने चमकते बर्तनों में अपने मेकअप या उड़ती ज़ुल्फ़ों को संवारने का मौका भी मिलता रहता ।

सत्तर के साल की बातें हैं ये सब ! जब उत्तर प्रदेश के ये कस्बे ही तो थे , जिन पर बाद में शहर का लेबल चिपक गया था।शर्मा जी के घर जाने पर सुंदर साड़ी में लिपटी शर्माइन के कुछ ऐसे ही नख़रे देखने को मिलते| घर में कुक था ,आया थी,घर व रसोईघर संभालने वाले कई बंदे थे किन्तु शर्माइन सबको अपना स्टैंडिंग किचन दिखाने अपने आप  मेहमान को लेकर ज़रूर रसोईघर में घुसतीं ,बर्तनों की चमक तो वैसे ही मन मोह लेती ।चुपके से किसी बर्तन को हाथ में पकड़ वे अपने रंगे होठों पर जीभ फिरा लेतीं या उड़ती हुई ज़ुल्फ़ों को जूड़े में खोंसने का हल्का सा प्रयास करती नज़र आ ही जातीं।

उनकी दिल्ली में ब्याही बेटियाँ अपने मायके आती रहती थीं ,वे भी तो दिल्ली के खूब धनाढ्य परिवारों में ब्याही गईं थीं। वे अपनी माँ के लिए नए से नया मेकअप  का सामान लाती रहतीं,बाकायदा मेकअप करने की ट्रेनिंग दिलवाई थी उन बेटियों ने अपनी माँ शीलो शर्माइन को। एक बार अपने साथ गाड़ी में उनमें से एक बेटी अपने साथ  मेकअप सिखाने वाली को लेकर आई थी जो दो दिन वहीं शर्मा जी के हवेली जैसे घर में रही थी। इसका पता भी उनके मुहल्ले के बच्चों ने लगा ही लिया था और फिर अपने सभी दोस्तों में कुछ ऐसा रस ले-लेकर सुनाया था कि सारी कानाफूसी पाण्डे जी के मुहल्ले तक पहुंच गई थी ।

जिस कमरे में दिल्ली से आई हुई मेकअप सिखाने वाली लेडी ठहरी हुई थी ,उस कमरे की खिड़की उनके बड़े से बगीचे की बाउंड्री से बाहर निकली हुई थी।अक़्सर सभी मेहमान उसी शानदार कमरे में ठहराए जाते थे जिसमें रेशमी पर्दे बाहर से ही दिखाई देते थे और जिसमें आधी खिड़की  में गर्मियों के मौसम में एक स्टैंड पर कूलर रखा रहता था जिसे सर्दियों में वहाँ से पीछे गार्डन के भाग में सरका दिया जाता था। उस कमरे की खिड़की पर बच्चे आराम से पहुँच जाते थे और उन्हें कमरे की नई-नई चीज़ें देखकर बहुत मज़ा आता था। वे सपने देखते कि उस कमरे में उधम मचा रहे हैं और ख़याली पुलाव का स्वाद लेते हुए कभी-कभी पकड़े भी जाते थे पर वहाँ से रफूचक्कर होने  में उन्हें कितनी देर लगती थी !

बड़ी प्रभावित निन्नी की माँ शर्मा परिवार से ,और निन्नी —-उनसे मिलने की सोच से ही घबराहट से भर उठती ।भगवान ने जाने कितने पैसों की खेती करवा दी थी शर्मा जी के यहाँ।जिस बिज़नेस में पैसा डालते वही बीज से हरा-भरा वृक्ष बन जाता और शर्मा जी तो ठीक,शर्माइन के ठाठ दिन पे दिन निखरते जाते ।जब कभी बड़ी ज़िद करने पर निन्नी को माँ के साथ शर्मा अंकल के घर जाना होता ,वह असहज हो ही जाती ।

“ले ,निन्नी बेट्टा , सम्मोसा फोड़ ले।तू तो कुछ खात्तीनी।ले यो खाकै देखिए, ताजा ताजा रसगुल्ले मंगाए हैंगे तेरी खातर—-“इतना सब होने के बाद भी शीलो शर्माइन अपने मूल  स्वभाव व गँवैया बोली से अलग नहीं हो पाई थी।

निन्नी का मन करता रसगुल्ला उठाकर शर्माइन के मुह पर लपेट दे।पर मरती क्या न करती ! चुपचाप उनकी चमकती तश्तरी में से कुछ उठाकर मुख में डाल  दाँतों में ऐसे पीसकर चबाती जैसे शर्माइन को काट रही हो और फिर उसे कंठ में उतार लेती। आँखों ही आँखों में माँ को वहाँ से उठने की प्रार्थना करती वह ! चमकदार स्टील के प्याले के किनारे पर मुह लगाकर शर्माइन के चाय के सुड़कने की आवाज़ उसे बेहद असहज कर जाती।कितने गर्म हो जाते थे उन स्टील के प्यालों के किनारे ! अक्सर उनसे गर्मागर्म चाय पीने के मोह में होठ कैसे जल जाते थे  !

मोदीनगर में अभी भी काफ़ी घरों में बिजली नहीं थी, पाण्डे जी के घर में बिजली जगमगाती तो उनके नीचे वाले जाट परिवार में अभी तक लालटेन टिमटिमाती।निन्नी बी.ए में थी और जाट परिवार की बड़ी बेटी कांता दसवीं में , जबकि दोनों की उम्र में कोई ख़ास फ़र्क न था ।पूरे दिन कांता टब्बर के लिए पिसती।माँ ने तो चार बेटे और तीन बेटियाँ जनी थीं सो उसे अब आराम की ज़रूरत थी ।वह खाट पर बैठी-बैठी हुकुम चलाती ।

” पढ़-लिखके कलट्टर बनेगी लौंडिया , बाद में तो गोड्डे तुड़वाने ही हैं ।अच्छा है न अब्बी से परेकटिस हो जावेगी-“

बड़ी मुश्किल से कांता को अपने पिता से दसवीं की प्राइवेट परीक्षा देने की आज्ञा मिल पाई थी ।निन्नी को कांता की माँ और शर्माइन की सोच में कुछ भी फ़र्क न लगता , बस पैसे का फ़र्क था।उसे यह सोचकर ही पसीने छूटने लगते कि उसकी माँ कैसे यह सोच सकती है कि इस शिक्षित वातावरण की बेटी शर्मा के पैसों की खनक में खो सकेगी? पूरे दिन भर की थकी-माँदी कांता को रात को लालटेन की टिमटिमाती रोशनी में किताब लेकर बैठते ही झटके आने लगते। किसी प्रकार से निन्नी ने उसके माता-पिता से रात को ऊपर बिजली में पढ़ने की आज्ञा ली थी और कांता रात दस बजते अपनी किताबें लेकर ऊपर उसके पास आ जाती। निन्नी उसे पढ़ाई में सहायता भी कर देती और उसकी पनीली आँखों से टपकते आँसू भी पोंछती रहती। इस प्रकार वे दोनों मूल रूप से बहुत अलग वातावरण में पलकर भी एक-दूसरे के काफ़ी करीब हो गईं थीं।

निन्नी ने अपने मन का भय कांता से शेयर किया था।कांता तो शर्मा परिवार के नाम से ही अजीब सी हो उठी थी ।उसके और निन्नी की आर्थिक स्थिति से लेकर मानसिक स्तर में ज़मीन-आसमान का अंतर था ।वास्तव में वह समझ ही नहीं पाती थी कि अपनी सखी को क्या और कैसी सलाह दे?

‘हय ! वह सोचती ,अगर निन्नी की जगह उसका रिश्ता आया होता , उसके तो भाग ही खुल गए होते ! पता नहीं कैसी है ये निन्नी भी ! इसे तो अपनी माँ के पैर धोकर पीने चाहिएं।’ वैसे भी वह जाटों की औलाद थी जिसके पिता पास के अपने पुश्तैनी गाँव में खेती करते थे सो उसका दाव तो किसी हालत में भी नहीं लग सकता था, वह तो दूर से देखकर चटखारे ही ले सकती थी, बस।कांता के कृषक पिता के पास बहुत ज़मीन थी पर वे स्वयं पाँचवी पास थे सो अपने परिवार को उन्होंने उन बेटों को पढ़ाने के लिए शहर में किराए का मकान लेकर रखा था जिन्हें पढ़ने से ज़्यादा लड़कियों को छेड़ने में रूचि थी। कांता निन्नी के सामने कुछ न बोल पाती ,कोशिश भी  करती कि कुछ पढ़ सके पर कहाँ ? दो पेज़ पलटते  ही उसका सिर झूमने लगता और ज़ेवरों से लदी शर्माइन उसे दिखाई देने लगतीं।उसने कई बार निन्नी के घर बनारसी साड़ी संभालती हुई  चमकदार चेहरे वाली शर्माइन को देखकर लंबी साँसें भरी थीं।

कांता के दिल की धड़कनों से बेख़बर निन्नी पढ़ने में तल्लीन रहती ।वह कांता को हिलाती, पढ़ने के लिए उकसाती पर उसका उतरा,थका चेहरा देखकर उसे उस पर तरस आ जाता ।एक दिन ऐसी ही स्थिति में बाहर छत पर नीचे से कुछ फेंकने की आवाज़ आई और निन्नी ने हड़बड़ाकर झटोके लेती कांता को  हिला दिया ।किसी के छत पर आ जाने की आशंका ने उनके पैरों तले की ज़मीन खींच ली।हाथ पकड़कर सहमी हुई कबूतरियों की तरह दोनों कमरे  से छत पर आईं।सड़क की स्ट्रीट लाइट छत पर फैली रहती सो बत्ती जलाए बिना एक मुड़े-तुड़े कागज़ पर नज़र पड़ते ही उसे झपटकर उठाकर कमरे में भाग आए दोनों।दिल की धड़कन सप्तम पर पहुँची हुई थीं।कमरे में पहुँचकर देखा पत्थर में लिपटा प्रेम-पत्र !

आय हाय ! दिल निकालकर रख दिया गया था पत्र में तो ! निन्नी के हाथ-पैर काँपने  लगे और घबराहट के मारे  उसकी धौंकनी बढ़ गई। कांता को बड़ा मज़ा आ रहा था पत्र को बारबार पढ़ने में ! निन्नी की आँखों में तारे नाच रहे थे। पत्र तो उसके नाम था न ,किसीको पता चल गया तो बदनामी तो उसकी होगी न ! वैसे भी उसके ही घर तो फेंका गया था पत्र ! किसने फेंका था ? किसीका नाम ही नहीं लिखा था। अचानक कांता चिल्लाई ;

“देख तो पीछे क्या लिखा है —-?”

निन्नी ने चौंककर कागज़ पलटा ,लिखा था ;’नीचे ही खड़ा हूँ,छज्जे पर से झाँककर तो देखो ‘

दोनों लड़कियों को मानो करेंट लगा ,भागी हुई छज्जे पर गईं। निन्नी का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था ,पता नहीं कौन शोहदा होगा ?कॉलेज आते-जाते जाने कितने मनचले उसकी साइकिल को घेरकर चलते थे। यहाँ तक कि उसने बेकार की बकवासबाज़ी से बचने के लिए  अपनी और दो सहेलियों के साथ कॉलेज जाना शुरू कर दिया था,जिसमें से एक को तो उसे अपने पीछे बैठाकर ढोना पड़ता,उसके पास साइकिल नहीं थी और दूसरी शेरनी थी। जाट की बेटी थी और सबसे अच्छी तरह भिड़ सकती थी। वह पहले तो अकेली ही जाती थी पर जब निन्नी ने उससे साथ चलने के लिए कहा तो वह इस शर्त पर राज़ी हुई कि वह उस दूसरी लड़की को अपने साथ नहीं बैठाएगी जिसके पास साइकिल नहीं थी सो वह निन्नी की ज़िम्मेदारी थी कि वह उस भिनभिनी सी अपनी पड़ौस की लड़की को अपनी साइकिल पर खींचे।

छज्जे पर टँगी दोनों लड़कियों ने नीचे सड़क पर झाँककर देखा ,मन में तो दोनों  के ही सुपरफ़ास्ट ट्रेन चल रही थी,धुक-धुक,छुकर-पुकर ! लैंप-पोस्ट की चमकदार रोशनी में कोई साया तक दिखाई नहीं दे रहा था। दोनों लड़कियों ने एक-दूसरे के चेहरे पर नज़र गडा दी ,क्या किया जाए? इस तरह पत्थर पर लपेटकर चिट्ठी फेंकना उस शहर में आम बात थी। काॅलेज में लड़कियाँ खूब खुसर-फुसर करती हुई अपने लवर्स के प्रेम पत्रों की बात करतीं, एक-दूसरे के पत्रों को किताबों में रखकर सहेलियों में खूब घुमाया जाता पर निन्नी को कभी इन सबमें मज़ा नहीं आया था ।

यहाँ तक कि एक बार तो इन्हीं शर्मा अंकल का जो बेटा उनके साथ हर रविवार को निन्नी के घर अपने पिता के साथ आ टपकता था, इसी बेटे ने सड़क पर जाती हुई उसे एक पत्र  थमा दिया था ,यह कहकर ;

“तुम्हारे पापा का ख़त आया  है पापा के पास ,दीदी के साथ भिजवाया है उन्होंने। उन्होंने कहा था तुम्हें दे दूँ —-” निन्नी ने चुपचाप पत्र पकड़ लिया था।जाने क्यों उसको यह समझ नहीं आया था कि पापा अभी एक दिन पहले सोमवार को तो दिल्ली गए हैं ,ऎसी क्या एमरजेंसी हो गई होगी कि उन्हें शर्मा अंकल की बेटी के साथ पत्र भेजना पड़ गया । कॉलेज में जाकर जब उसने उस कागज़ को खोला तो प्रेम-पत्र था ,उसी गधे का जो आजकल अपने पिता के साथ हर रविवार को आकर उसके घर चाय सुड़क  जाता था। यह उसके माँ-बाप की शै ही तो थी जो वह उसके पीछे पड़ा हुआ था। उस समय डर के मारे वह अपनी माँ को भी नहीं बता पाई थी और उसने वह ख़त फाड़कर फेंक दिया था।

दोनों लड़कियाँ छज्जे पर से मुड़ी ही थीं अचानक एक फुसफुसी सी सीटी सुनाई दी। रात के सन्नाटे में सीटी की आवाज़ वातावरण  में पसर सी गई और निन्नी का दिल एक बार फिर से धड़क उठा। वह तो अच्छा था कि मौसम कुछ कुनमुना सा हो चुका था और मुहल्ले के लोगों की खाटें बाहर व बरामदों में से कमरों में बिछने लगीं थीं वरना पूरा मुहल्ला पाण्डे जी की बेटी का तमाशा देखने खड़ा हो जाता। वैसे ही मुहल्ले के अधिकांश समाज-सुधारक प्रकृति के लोगों की उस घर पर नज़र बनी रहती थी ,उस घर में केवल महिलाएं ही जो थीं और परिवार का एकमात्र पुरुष पूरे सप्ताह भर में एक ही दिन दिखाई देता था।

हाय राम ! ये तो वही शर्मा जी का लड़का था ढिंचू  ! अब रात के अँधेरे में भी उसकी खुराफ़ात शुरू हो गई थी।निन्नी ने देखा वह लैंप-पोस्ट के नीचे न जाने कहाँ से अचानक नमूदार हो गया था और बड़ी बेशर्मी से उसकी ओर चुंबन उछाल रहा था।निन्नी का रक्त उबलने लगा ,उसे लगा उसने पहले वाले खत के बारे में माँ को न बताकर बहुत बड़ी गलती कर दी थी। इतना अपमान तो उसने कभी भी महसूस नहीं किया था| अब जो भी हो ,वह इस रईसज़ादे का भाँडा फोड़कर ही दम लेगी ,उसने मन में सोचा और पीछे बरामदे में जाकर छत की सारी बत्तियाँ जला डालीं। कांता कुछ समझती ,उससे पहले तो निन्नी ने शोर मचाना शुरू कर दिया था और प्रतिष्ठित परिवार का सुपुत्र दीपकचरण यानि कॉलेज में ढिंचू के नाम से पुकारा जाने वाला  वहाँ से भाग निकलता  ,इससे पहले ही वहाँ पर लोगों का इक्क्ठा होना शुरू हो गया था।

कोई कुछ समझता इससे पहले निन्नी दनदनाती हुई सीढ़ियाँ उतरकर सड़क पर आ खड़ी हुई थी और उसने ढिंचू का कॉलर पकड़कर ज़ोर से चिल्लाकर कहा था कि अब करे न वो बेशर्मी जो उसे दिखाकर कर रहा था। दीपकचरण के तो काटो खून नहीं ! वह बगलें झाँकता हुआ वहाँ से भागने की सोच रहा था पर  इतना  कहाँ आसान था लोगों की कैद से छूटना !निन्नी के दो थप्पड़ पड़ते ही उसका सर घूमने लगा और अपने आपको संभाल पाता कि मुहल्ले वालों के हाथ पड़ गया। शोर इतना बरपा कि पूरे मुहल्ले के लोग इक्क्ठे होने लगे। सबके मन में एक ही प्रश्न कुलबुला रहा था ,आखिर रात के एक बजे वह वहाँ क्या करने आया था ?माँ और दादी भी घबराती हुई ऊपर से नीचे उतर आईं थीं और माँ तो घबराहट के मारे बेहोशी  की स्थिति में आ गई थी। दादी ने ही उन्हें संभाल रखा था।निन्नी के हाथ में मुड़ा-तुड़ा प्रेम-पत्र था जिसे उसने अब पड़ौस के गुप्ता अंकल को पकड़ा दिया था।

“आखिर कर क्या रहा था ये इतनी रात में यहाँ पर ?”वे पत्र पलटते हुए बड़बड़ाए थे।

“चुम्मियाँ उछाल रहा था ,और क्या ,इतना ही शेर है तो उछाल चुम्मियाँ सबके सामने —-और ये खत इसने ही फेंका है ऊपर। “निन्नी भी बेशरम बन गई थी ,आखिर कब तक बनावटी चुप्पी ओढ़े खड़ी रहती !

“मैं क्यों फेंकूँगा ? मेरा नाम कहाँ  है? ” थप्पड़ खाकर भी वह अपनी बेशरमी दिखाने से बाज़ नहीं आ रहा था।

यों भी उसके बाप के रसूखों से शहर में कौन परिचित नहीं था ? लोग बड़बड़ कर रहे थे पर उनके हाथ उस राजकुमार को छूने में हिचक रहे थे लेकिन पड़ौस के उन युवाओं ने तो जी भरकर अपनी खुंदक निकाल ली थी जिनसे ढिंचू  का निन्नी के घर हर इतवार को अपने पिता के साथ कार में बैठकर आना बर्दाश्त नहीं होता था। पेज़ पलटकर देखा गया तो उस पर साफ़ घसीटे हुए शब्दों में लिखा हुआ था कि नीचे  झाँककर देखो ! सबको माज़रा समझ में आ रहा था ,सब रईस शर्मा जी के बेटे को पीटते हुए देखकर मज़ा ले रहे थे। जमकर पिटाई हुई साहबज़ादे की और युवा लड़के आशिक को पीटते -पीटते घसीटते हुए उसके मुहल्ले में छोड़कर हाथ झाड़ते ,ठहाके मारते हुए वापिस लौटे थे ।

अगले रविवार को पाण्डे जी अपनी पत्नी से पूछ रहे थे ;

” क्या बात है निन्नी की माँ , शर्मा जी के परिवार में सब ठीक तो है न? रात होने लगी, जाने क्यों शर्मा जी नहीं आए इस बार? “

डॉ. प्रणव भारती
हिंदी में एम.ए ,पी. एचडी. बारह वर्ष की उम्र से ही पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. अबतक कई उपन्यास. कहानी और कविता विधा की पुस्तकें प्रकाशित. अहमदाबाद में निवास. संपर्क - pranavabharti@gmail.com

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