1 – ख़ुश्बू चुराते बच्चे
कोलतार चुपड़ी काली सड़क से
दौड़ते हुए आ मिलते वे बच्चे
सवेरे-सवेरे जो
फूटती किरण के साथ
गए थे सुंदर, साफ, उजर यूनिफाॅर्म में
कई स्कूलों में पंक्तिबद्ध
अपने-अपने बाबा का हाथ थामे
गँवीली पगडंडियों से गुजरकर ।
दुपहरिया होते घर लौटते ही
बाबा के संग,
छोड़ उन्हें ओसारे पर
भागकर आ गए हैं
पगडंडी, मेड़ों को
लांघते-फर्लांघते हुए
माटी के करीब अपनी,
इतने-इतने करीब कि
उनकी देह से माटी की
ख़ुश्बू चुराई जा सकती है।
2 – पिता
पिता के खुरदुरे रौबीले चेहरे के पीछे
छिपा है एक कोमल चेहरा
जिसे सिर्फ बेटियाँ ही
पहचान पाती हैं
पिता बेटियों के लिए हैं
होते हैं ऐसे आदर्श
जो बेटियों का
रूप गढ़ते हैं
उनके हाथ के झूले में झूल
पा जातीं वे सारी दुनिया
विदाई के अश्रु वे नहीं बहाते कभी
घोंघे के कठोर खोल के अंदर
दबा रह जाता उनका मन
लेकिन सबसे अधिक बेटी की
आड़ी-तिरछी चपाती और नमकहीन
दाल को वे ही याद करते हैं
पापा की प्यारी, पापा की दुलारी
कुछ माँ से ज्यादा उनमें ढलती हैं
माँ की सीख पोटली में
पिता का दुलार दिल में रखतीं हैं
ये माता की नहीं
पिता की बेटियाँ होती हैं
पिता के मौन से जगतीं
पिता के मौन में सोती हैं
फिर भी कहाँ खुलते हैं
पिता अपने बेटे-बेटियों के समक्ष
मौन में घुला उनका गीला मन
न देख ले कोई इसी कोशिश में
वे हरदम हर पल रहते हैं
ऊपर से खुरदुरे गुस्सैल, रौबीले, निष्कंप
भीतर से कंपित, मुलायम
पिता ऐसे ही होते हैं।
3 – सपने
सलीमा टेटे, निक्की प्रधान की
आंँखों में सपने हैं
बेहद रंगीन सपने हैं
झाड़-झँखाड़ों के बीच
छोटे से उबड़-खाबड़ मैदान में
बाँस की हॉकी बनाकर
बचपन से देखे गए
उनके अंदर
भूख से उठकर ऊपर
ओलंपिक के गहन
परिश्रम के लिए
बड़े-बड़े सपने हैं
बेहद हसीन सपने हैं
उनके धनरोपनी औ धनकटनी
कामों के साथ-साथ
जगते, पलते
जब कोई
सोच भी नहीं पाता
वे अंधमुंदी, बंद-खुलीं
आंँखों से बारंबार देखती हैं
उन सपनों को
अभावों के अनगिनत
सिलसिले को बताकर धत्ता
झारखंडी विश्व विजेता
हाॅकी खिलाड़ी सोमराय की तरह
सपने उन्होंने देखे नहीं
जिए हैं खेल-खेल में
अर्जुनवाली मछली की
आंँख की तरह,
एकलव्य के अचूक
निशाने की तरह।
4 – मुर्गा लड़ाई
काईंत* बाँधकर
लड़ते हैं जब
दो बाँके मुर्गे
लाल कलगी अपनी
उठाकर ऊपर,
बाँध देते हैं समां
उछल-उछल
करते हैं वार
एक-दूसरे पर
तब एक लड़ाकेपन की
आग लेते हैं उधार
मालिकों के भीतर से
आजकल समझ चुके
हैं मुर्गे
उस छल को,
मालिकों ने जो
अपने अहम् के लिए
लड़ाकर उन्हें
खुद उठाया है आन्नद
जग पड़े ये
धारदार काईंत पाँवों में बाँधे
अपने ही साथी पर वार कर
लहूलुहान करते मुर्गे,
अब ठिठक-ठिठक जाते हैं
‘क्या हम भाई-बँधु
यूँ ही लड़ मरें
मनुज के लालच की खातिर
उनके मनोरंजन की
भेंट चढ़कर?’
बतियाते हैं हौले से
और अचानक पलट जाते
वो लड़ाके मुर्गे
मालिक को
सिखाने के लिए सबक।
( काईंत = मुर्गों के पैरों में बँधा हथियार )

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