माँ भी चाहती थी
कि उसके मन में भी खिले
सुंदर सुंदर से फूल
लाल, पीले, गुलाबी, चटक नारंगी से
मगर भावनाओं के अकाल ने
कभी उन बीजों को नहीं होने दिया अंकुरित
जो खिलते तो शायद
दुनिया बन जाती
थोड़ी और खूबसूरत।
इसलिए माँ ने रोप दिये
नन्हे नन्हे से पौधे
अपनी बेटी के मन में
ताकि उसे मिल सके
रंग और ख़ुशबू से भरा हुआ जीवन।
माँ भी चाहती थी
कि वह भी उड़े
अपने पंख फैलाकर
उस खुले आसमान में
मगर उसे बताया गया कि
आसमान पर उसका हक़ नहीं।
इसलिए माँ ने अपनी बेटी को
दिया इतना साहस
कि वह उड़ सके
अपने पंख फैला कर
ऊँचे आसमान में
और नाप ले समस्त ब्रह्मांड की ऊँचाई को।
माँ भी चाहती थी कि
वह भी महसूस करे
बारिश के बाद मिट्टी की
सौंधी सी ख़ुशबू को
मगर हालातों की तेज हवाएँ
उड़ा ले गईं उन बादलों को
जो बरसने ही वाले थे
उसके हिस्से की ज़मीन पर
इसलिए माँ ने अपनी बेटी पर
बरसा दिया अपना सारा दुलार,
उसने रोप दिये सपनों के
नन्हें से पौधे उसके मन की ज़मीन पर,
कभी सबसे लड़ कर
तो कभी सबसे छुप कर
दिया उसे खाद और पानी
ताकि पनप सके वह नन्हा सा पौधा
और एक दिन वह बन जायें
आसमान की ऊँचाइयों को छूता हुआ
एक विशाल वृक्ष।


*गरिमा भाटी ‘गौरी’ की कविता – माँ की चाहतें*
गरिमा भाटी जी!
माधुर्य भाव से ओतप्रोत आपकी कविता ने मन मोह लिया।सच! इस कविता के लिए जितना भी कुछ कहा जाए कम ही लगेगा।
स्त्री स्वयं परिवार में पुरुष द्वारा कमतर समझे जाने पर भी माँ के रूप में अपनी संतान के प्रति अधिक दृढ़ होती है।वह उन हर कमियों को जानती है जो वह स्वयं अपने जीवन में महसूस करती है और उसकी पूरी कोशिश रहती है कि उसकी बेटी को उस के हिस्से का आसमान पूरा मिले।
जिस तरह पिता जो स्वयं नहीं कर पाया, चाहे कारण जो भी रहा हो; जो वह बनने की इच्छा करता था लेकिन नहीं बन पाया, अपने बेट बल्कि अपेक्षाओं को भी बेटी के प्रति पूरी करने की यथासंभव चाह रखती है।
कविता में माँ जो खुद नहीं कर पाई वह सब उसने अपनी बेटी के लिया, यही भाव मन को माधुर्य भाव से मोह गया।
इस लाजवाब कविता के लिए आपको बहुत-बहुत बधाइयाँ।