Thursday, May 14, 2026
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शालिनी सिंह की कहानी – सुजाता

“हे कुँवर की माई..दरवाजा खोला..”
मौर्या जी हाथ में लड्डुओं से भरा डब्बा और चेहरे पर प्रसन्नता के भाव लिए बेचैनी से दरवाजा खुलने की प्रतीक्षा कर रहे थे..
“आवत हई..रुका दुई मिनट..”
जवाब आने के बाद भी मौर्या जी बराबर बुलकारते हुए दरवाज़ा खटखटाते रहे..
ग़ुस्से में भरी हुई मौर्या जी की पत्नी की आवाज़ दरवाजे के उस पार से आई.
“खोलत हई ..काहे इतना जल्दियान बा..छत पर कपड़ा सुखावत रहे”
कुँवर कहाँ है ?
चारपाई तोड़त हुइएँ..
अरे इतनी ख़ुशी की बात है कि हमसे दो मिनट भी इंतज़ार नहीं हो पा रहा था..हमारे कुँवर की नौकरी लग गई है ,सरकारी ऑफिस में बात हुई है..बड़े साहब ने वादा किया है कि अभी संविदा पर रख रहे हैं,मेहनत से काम करेगा तो आगे वैकेंसी आने वाली है तब स्थायी रूप से एडजस्ट करने का पूरा प्रयास करेंगे ..मौर्या जी को लगा कि सरकारी ऑफिस में किसी तरह घुसने का मौक़ा मिले बाक़ी बाद में देखा जाएगा ..
कुँवर ..पिता जी की आवाज़ सुनकर बैठक में आए तो ये शुभ समाचार सुनकर ख़ुशी से  झूम उठे..सुनते ही उन्होंने पिता जी और माँ के पाँव छुए और आशीर्वाद लिया.. 
अब कुँवर मौर्य सरकारी ऑफिस में नौकर थे,भले स्थाई नौकरी नहीं थी लेकिन ये भी क्या कम बड़ी बात थी कि घिसट घिसट कर ठेके पर इंटर पास करने वाले को ऑफिस जाकर 10 से 5 की नौकरी मिल गई थी.. पिता ने बड़े अफ़सरों की ख़ुशामद और चाकरी कर करके उनको नौकरी दिलवाई थी.बड़े अफ़सरों के घर चक्कर लगाते- लगाते उनकी चप्पलें घिस गईं थीं..और आख़िरकार उनको  बैठे बिठाए अपने पिता की मेहनत के फलस्वरूप एक सरकारी विभाग में चपरासी की नौकरी मिल गई थी.
नौकरी क्या मिली कि अब कुंवर साहब ज़मीन पर नहीं आसमान में उड़ने लगे..तनख़्वाह इतनी ज़्यादा तो न  थी लेकिन उन्हें घर के किसी ख़र्चे से कोई लेना देना था नहीं ,जो भी पैसा था ,उसे ख़र्च करने ,बरतने का अधिकार केवल उनका था.. नोटों की गर्मी आई तो यारों दोस्तों पर पैसा उड़ाने लगे.. और इस तरह पंद्रह दिन होते होते तनख़्वाह ख़त्म हो जाती और फिर पिता जी के आगे कोई कहानी बताकर हाथ पसार लेते ख़ैर पिता जी उनमें से नहीं थे जो जो अपने बेटे के हर झूठ साँच को परखना न जानते हों .अपने लड़के के लच्छन देखते हुए एक बार फिर मौर्या जी ने बागडोर अपने हाथों में लेते हुए नौकरी लगने के छह माह के भीतर ही  एक सुसंस्कृत परिवार की लड़की से कुंवर जी की सहमति से  विवाह कर दिया..
कुँवर जी अब तक स्त्री देह के सुख से वंचित थे और जैसे ही उन्हें ये सुख भी मिलना शुरू हुआ,उनके तो जैसे दिन और रातें दोनों बहुर गए..
शादी के बाद जब छुट्टी ख़त्म होने को आईं और पत्नी ने कहा 
“ ए जी कब से ड्यूटी जाइएगा”
 तो कुँवर जी तपाक से  बोले 
“अरे ड्यूटी का क्या है,सब सेट है ऑफिस में ,तुम फ़ालतू फ़ालतू बात मत किया करो..”
और ये कहते हुए पत्नी को अपने पास खींचकर बिठा लेते ..
जब कुँवर जी की पत्नी सुबह देर से कमरे से बाहर आतीं तो सास बड़बड़ाते हुए मिलतीं..कि हमारे सबकी भी शादी ब्याह हुआ था..पर इतना जवानी नहीं सवार था..कुँवर के बाबू को कोई आज तक देख नहीं पाया था,भीतर कमरा में आते हुए..सबके सोने के बाद आते और सुबह सबके उठने से पहले दुआर पर जाकर सो जाते..संस्कार,रिवाज भी कोई चीज़ होता है..
आदमी लोगों का तो बुद्धि भ्रष्ट होता है पर तुम तो पढ़ी लिखी हो ,समझदार हो,तुमको तो समझाना चाहिए ..है कि नहीं..
कुंवर साहब की पत्नी नीचे मुँह किए सुनती रहतीं,लगता कि जमीन फटे और उसमें समा जाएँ..अम्मा को कैसे बताएँ कि भोर से ही बाहर निकलने को छटपटा रहे हैं लेकिन कुँवर जी निकलने दें तब ना..बार बार अपनी क़सम देकर रोक लेते..
एक दिन बाबू जी बोले ..
“क्यों रे कुँवर कब तक की छुट्टी लिए हो ?बीस दिन से ऊपर हो गए ,नई नई नौकरी में इतनी छुट्टी करना ठीक नहीं..छुट्टियाँ बचाकर रखो आड़े वक्त पर काम आएँगी..”
बाबू जी की डाँट फटकार के डर से कुँवर जी ने ऑफिस जाना शुरू कर दिया पर ऑफिस में अधिकारियों से लेकर बाबू तक के आगे सलाम बजाना उन्हें ज़रा कम पसंद आता,अरे भई नाम से कुँवर साहब थे तो ख़ुद को कुँवर साहब से कम नहीं समझते थे..
एक दिन बड़े बाबू का काम करने में टालमटोल करने लगे तो बड़े बाबू ने जमकर पूरे ऑफिस के सामने उन्हें अंग्रेज़ी भाषा में सुनाया,जिसका अंत उन्होंने यह कहकर समाप्त किया कि अपनी औक़ात में रहो..बस औक़ात वाली बात कुंवर साहब को चुभ गई और वो ग़ुस्से में दहेजुआ स्कूटर लेकर सीधे ठेके पर गए और जम कर पी..और फिर जब तक घर पहुँचे ,उनके ऑफिस का कांड घर तक पहुँच चुका था..
पिता जी ग़ुस्से में भरे बैठे थे कि इतनी मुश्किलों से मूरख को नौकरी दिलवाई है और महाराज के नख़रे ही नहीं मिल रहे..ऊपर से जब शराब के नशे में चूर लड़खड़ाते पाँव से घर पहुँचे लड़के को देखा तो आगबबूला होकर जी भर सुनाया..
अब अम्मा की बारी थी कि दुलहिन आदमी का ध्यान रखे के चाही..
अब जब कुँवर जी कमरे में आये तो उनकी पत्नी में उन्हें लिटाया और नींबू पानी पिलाया कि किसी तरह नशा कुछ कम हो..
खैर सुबह हुई तो पत्नी जी ने कुंवर जी को रोते हुए अपनी कसम दी कि आइंदा से इस जहर को हाथ नहीं लगाएँगे..
कुँवर साहब का मन पिघल गया और पत्नी के हाथ और अपना हाथ रखकर क़सम खाई कि अब ऐसा दोबारा न होगा..
कुछ समय तक सब ठीक चलता रहा और कुंवर जी दफ़्तर से लौट कर जो कमरे में घुसते तो फिर सुबह ही निकलते..
अब घर वाले भी कुछ नहीं कहते,सब्र करते कि चलो बाहर शराब या ग़लत संगत से तो अच्छा है घर रहे,सुखी रहे..
कुछ दिनों तक तो सब सही चला लेकिन कुँवर को फिर वहीं रंगीनियाँ और महफ़िलें अपनी ओर आकर्षित करने लगीं..
और इधर कुँवर साहब का अपनी पत्नी से मोह भी कुछ कम होने लगा था..
रात रात भर ग़ायब रहते ,कभी कोई नौटंकी तो कभी मेला ठेला ..पड़े रहते दारू के नशे में..
ऑफिस से नौकरी जॉइन करने के नोटिस आते पर वो कान न धरते..पिता जी का लिहाज़ करते करते अधिकारियों ने काफ़ी समय तक तो उनकी हरकतों पर  परदा डाले रखा लेकिन ऑफिस के और कर्मचारियों ने अब ऊपर तक कंप्लेन करना शुरू कर दिया था.. तो अधिकारियों को उन्हें नौकरी से निकालने को बाध्य होना पड़ा.
पर कुँवर साहब के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी.
इधर पहले पति की आँखों से उतरी सुजाता, अब अपने ससुराल वालों की आँखों से भी उतरने लगीं थीं..
दिन रात अपनी क़िस्मत को कोसतीं कि अगर एक बच्चा उनकी गोद में होता तो वो उसी के सहारे जीवन काट देतीं..
समय का पहिया चलता रहा और अपने इकलौते बेटे की चिंता में कुढ़ते कुढ़ते  एक एक करके सास ससुर दोनों चल बसे..
अब दो प्राणी रह गए ,दो भी कहाँ कुँवर साहब का मन और पैर घर में कहाँ टिकता..
कुंवर साहब एक शाम घर लौटे तो बुख़ार में कराह रहे थे ,पत्नी  ने तुरंत पास में रखी दवा दी  कि किसी तरह रात कट जाए तो सुबह अस्पताल ले जाएँ..
रात भर माथे पर पट्टियाँ रखती रहीं,जब सुबह अस्पताल गईं तो जाँचे हुईं और रिपोर्ट आई तो पता चला कि मियादी बुख़ार है और शरीर में ख़ून की बहुत कमी है..
डॉक्टर ने अलग फटकारा कि आप ध्यान नहीं रखतीं इनका..अगर एक दो दिन में इनकी हालत न सुधरी तो इन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ेगा..
सुजाता  उन्हें घर ले आई और ख़ूब सेवा करके उन्हें एकदम तंदुरुस्त और चंगा कर दिया..
इधर जैसे ही कुँवर की तबियत सँभली,वे फिर मोटर साइकिल निकाल कर निकल पड़ते और देर रात नशे में धुत घर वापस आते..उनकी जेब से कभी सिनेमा की टिकट तो कभी इत्र में भीगे रूमाल मिला करते..
जिन्हें देखकर सुजाता का मन कलप कर रह जाता..चीखने का मन करता,घर छोड़कर भागने का मन करता लेकिन माइ बाप का चेहरा और सीख याद आ जाती ..और ये भी कि समाज कैसे घर छोड़ने वाली लड़की को तानों और तमग़ों से नवाज़ता है.. 
एक दिन वही हुआ,जिसका डर था कि एक बुरी ख़बर आई कि कुँवर जी का एक्सीडेंट हो गया है और उन्हें अस्पताल में भरती करवाया गया है..सुजाता जो थोड़ा बहुत पैसा था ,वो लेकर उसी ख़बर देने वाले के साथ अस्पताल भागी..
अगले दिन पीहर वाले और रिश्तेदारों से अस्पताल भर गया था..लगभग पंद्रह दिनों के बाद वे घर लौट कर आए ..
प्रधान साहब से पैसा उधार लेकर अस्पताल का बिल चुकाया..
लेकिन अब कुँवर साहब पहले जैसे न रहे थे, पाँव में रॉड पड़ी थी और अब एक पाँव उनका मुड़ता नहीं था,लँगड़ा लँगड़ा कर चलने लगे थे और फिर पी पीकर शरीर जर्जर हो चुका था,कई और बीमारियाँ अलग से लग गईं थीं..शरीर ढाँचे में बदल गया था,सुजाता अपनी पूरी लगन से उनकी सेवा कर रही थीं..यही क्या ग़नीमत थी कि वापस जीवन मिल गया था..
कुँवर जी को अब अपनी ग़लती का एहसास होने लगा था..एक दिन सुजाता जब फल काटकर खिला रहीं थीं तो रुआँसे होते हुए बोले..
“ मैंने तुझ पर बडा ज़ुल्म किया है,ईश्वर उसी की सज़ा दे रहा है..
काश मैं अम्मा पिता जी की बात समय रहते समझ जाता..”
“अरे आप भी क्या लेकर बैठ गए !
अब बीती बातों को बिसार दीजिए..”
“मेरे मन में एक विचार चल रहा है बहुत दिनों से..
 आपकी नौकरी का जो थोड़ा बहुत पैसा मिला था, सबका उधार चुकाने के बाद अब इतना नहीं बचा है कि हम आगे का जीवन निश्चिंत होकर गुज़ार सकें..कल को बाल बच्चा हुआ तो उसके भविष्य के लिए भी तो कुछ जोड़ना होगा.अगर आपकी राजी हो तो बैंक में से थोड़ा पैसा निकाल कर ,उससे हम अपने बरामदे वाली ख़ाली जगह पर लड़कियों के लिए सिलाई का स्कूल खोल लें..क्या कहते हैं जी ?”
“अगर तुमको लगता है कि तुम कर लोगी तो फिर कल हमारे साथ बैंक चलकर पैसा निकाल लेना.”
“हमको  पूरा विश्वास है कि ये काम फलेगा हमको और फिर थोड़ी आमदनी भी हो जाएगी और हमारा समय भी कट जाएगा..”
कुँवर साहब की सहमति से स्कूल का काम शुरू हुआ..टीन शेड डाल लिया गया और पाँच सिलाई मशीन खरीद लीं कि अगर नहीं चला तो नुक़सान भी न हो ..
सुजाता के प्रेमिल स्वभाव से सब परिचित थे..
जब स्कूल शुरू हुआ तो पास पड़ोस की लड़कियों को तो जैसे मौक़ा मिल गया,घर से बाहर निकलने का और अपनी चहेती भौजी से सिलाई सीखने और उनके साथ साथ सखी सहेलियों के साथ वक़्त बिताने का..
टोले मोहल्ले की लड़कियाँ आने लगी और सीखने लगी सिलाई,अब सुजाता का मन भी लगने लगा और घर में चहल पहल भी बढ़ गई..
लेकिन कुँवर साहब अब अकेलापन महसूस करने लगे,दिन दिन भर उनके इर्द गिर्द मँडराने वाली उनकी पत्नी अब अधिक समय स्कूल में देने लगीं..वहाँ की साफ़ सफ़ाई और सामान धरने उठाने में उनका वक़्त निकलने लगा..
ऐसा भी नहीं था कि वे अपनी ओर से कुँवर साहब के प्रति कोई लापरवाही कर रहीं थीं लेकिन अब उनका ध्यान पति के साथ साथ काम की तरफ़ भी बँट गया था..
एक दिन सुबह-सुबह पीछे गली से सुमन आ धमकी और आते ही बोली 
“भौजी हम भी सीखना चाहते हैं सिलाई पर बाबू नहीं सीखने दे रहे ,कहते हैं कि रोज़ रोज़ तुम्हारे लिए कपड़ा बिगाड़ने का फ़ालतू पैसा नहीं है हमारे पास
अगले बरस देवठान के रोज़ तुम्हारा बियाह ठाने हैं..
भौजी हमारा सिलाई में बहुत मन लगता है,हम सिलाई सीख लेंगे तो कम से कम शादी के बाद आड़े वखत पर काम ही आएगा.हमारी जित्ती पढ़ाई है,उसमें कौन हमको नौकरी देगा ..भौजी अगर सीखने के लिए कपड़ा आप हमारे लिए ख़रीद कर ला दो तो हम आपको धीमे धीमे पैसा चुकाते रहेंगे..”
“अरे हमारी सुमनिया तो बड़ी समझदार हो गई है..अगर तुम्हारे भीतर इतनी लगन है तो हम तुम्हें सिखाएँगे और पैसे का हिसाब बाद में करेंगे..अब कल से आ जाना दिन में ठीक बारह बजे “
हँसते हुए सुजाता ने कहा
“आज मैं बाजार जाकर छाँटकर कुछ कटपीस के कपड़े ले आऊँगी ,सस्ते में मिल भी जाएँगे और तुम लोगों के सिलाई सीखने के लिए ठीक रहेंगे..”
सुमन चहकते हुए वापस घर चली गई..
सुजाता बाज़ार जाने के लिए कपड़े बदलकर जब बाहर आँगन में आई ,तो कुँवर साहब खटिया पर लेटे हुए  थे..
“सुनिए जी आप खाना खा लीजिए,फिर हमें बाजार जाना है..सिलाई स्कूल के लिए कुछ कटपीस के कपड़े और कुछ और सामान भी लेकर आना है..”
“अकेले कैसे जाओगी ?”
“अरे हम चले जाएँगे,यहाँ कहाँ सवारी मिलेगी,चाची के साथ जाएँगे..है ही कितना दूर .
और फिर ज़्यादा देर का काम नहीं है,बस जाने आने में जो समय लगे..
कुँवर साहब ने बुझे मन से जाने की स्वीकृति दे दी,हालाँकि सुजाता  ने पूछा नहीं केवल बताया भर था पर मर्द होने और निर्णय लेने का अधिकार उन्ही के पास है ..इसे जताने के लिए उन्होंने कहा..
“ठीक है जाओ,जल्दी आना,और जाते समय दरवाज़ा भेड़ जाना”
बाज़ार लगभग दो किलोमीटर दूर था,लोग अपनी सवारियों से जाते थे..वापसी में रिक्शा मिल जाता था
बाजार से लौटते हुए चाची और सुजाता दोनों के हाथ झोलों से भरे थे,मोड़ पर दो तीन रिक्शे वालों को देखकर उसने पूछा कि 
“भैया निरौरा तक जाना है,चले चलो.कितना पैसा लोगे ?”
जब रिक्शे वाले ने 100 रुपया दाम बताया और कहा कि उधर से ख़ाली आएगा रिक्शा..दो सवारी के हिसाब से कम ही बता रहे हैं..इतने में तैयार हो तो चलो.
सुजाता सोंच में पड़ गई कि इतना मोल भाव करके तो कपड़े लेकर आई हूँ,अब एक ही झटके में सौ रुपया ना बाबा ना..है ही कितना दूर..अभी पहुँचे जाते हैं..लेकिन चाची साथ में हैं..कि तभी चाची ने कहा
वो देख दुलहिन..रिक्शा छोड़ो,सन्तोष मोटर साइकिल से आ रहा है,वो हम दोनों को घर छोड़ देगा..
हालाँकि संतोष बाबू के भले स्वभाव से वो भली भाँति परिचित थी पर फिर भी उन्होंने मना किया  कि चाची आप चली जाओ,हम पैदल आ जाएँगे..
लेकिन संतोष बाबू जब ग़ुस्से में बोले कि बैठिए भौजी..इतनी धूप में अकेले पैदल चली जा रही हैं..अच्छा लगता है क्या?
 
बीच में चाची बैठीं और पीछे सुजाता.
.
अम्मा सुबह ही  बता दी होतीं  तो हम ही आप दोनो को बाज़ार ले चलते..इतना दूर  पैदल आने जाने का क्या ज़रूरत था.. 
आगे से जब भी आप दोनों को बाजार जाना हो,बता दीजिएगा ..हम वैसे भी देर से जाते हैं दुकान और फिर दोपहर में खाना लेने भी घर हम ही आते हैं.दिन में ले चला करेंगे आपको और जब खाना लेने घर जाएँगे तो वापसी में आपको छोड़ दिया करेंगे..
सुजाता  मोटरसाइकिल पर बेठ तो गई लेकिन पीछे की तरफ़ ,जहाँ तक खिसक सकती थी,खिसक कर बैठी रही..
घर लौटी और भिड़ा हुआ दरवाज़ा खोलकर जब अंदर आई तो मोटर साइकिल की आवाज़ सुनकर कुंवर साहब ने पूछ ही लिया कि कौन था दरवाजे पर..
अरे संतोष भइया थे ,रास्ते में मिल गए थे,हम तो उनसे ढेर मना किए कि हम पैदल चले जाएँगे लेकिन चाची मानी नहीं ,तो हमें आना ही पड़ा उनके साथ..बड़े भले मानुस हैं,जाने काहे इनकी जोरू की इनसे नहीं निभी..
बस यही नहीं कहा होता तो आज दोनों का साथ आना कुछ कम तकलीफ़ देता..
दरअसल सुजाता की शादी के लिए पहले संतोष बाबू को ही पसंद किया गया था लेकिन तब तक उनकी बात कहीं पक्की हो चुकी थी तो फिर कुँवर जी के साथ विवाह तय हुआ था..लेकिन संतोष की पत्नी शादी के बाद पहली बार जब अपने पीहर गई तो फिर अब तक नहीं लौटी..
कुंवर इधर तिलमिला रहे थे और उधर बिना कुंवर साहब की ओर ध्यान दिए सुजाता ख़रीदारी का लाया हुआ सामान निकाल कर देखने लगीं और क़रीने से रखने में लगी हुईं थीं.
इधर कुँवर साहब इस बात को फिर कुरेद कर अपनी पत्नी के मन में कुछ डालना नहीं चाहते थे और मन ही मन लाल पीले हो रहे थे..
उदासी के बादल जो सुजाता के चेहरे पर हमेशा मंडराते रहते थे ,अब वो छँटने लगे थे,एक नयी ऊर्जा उनके भीतर फिर से बहने लगी थी..रात में सोते समय अगली सुबह के इंतज़ार में ख़ुशी ख़ुशी सोतीं और सुबह भोरे भोरे उठ कर घर के काम काज निपटाने लग जातीं..कुँवर साहब को दस बजे तक गरम गरम खाना खिला देतीं और बर्तन चौका करके लड़कियों के आने की प्रतीक्षा करने लगतीं..
बारह बजते ही ज्यूँ लड़कियाँ घर में दस्तक देतीं ,घर चहकने लगता..सुजाता ख़ुश ख़ुश लड़कियों के साथ सिलाई सिखाने में जुट जातीं और इधर कुँवर साहब अकेले पड़े चारपाई पर लेटे रहते या थोड़ी देर को बाहर निकल जाते पर कब तक बाहर रहते एक दो घण्टा टहल टहुल  कर जब घर वापस लौटते तो लड़कियों की आवाज़ों से उनका माथा फटने लगता..
लेकिन पत्नी को कुछ बोल भी नहीं सकते थे..क्या बोलते..कुछ ग़लत भी तो नहीं कर रही थी,कुँवर साहब के प्रति भी तो सारे कर्तव्य पूरे करने में ज़रा भी लापरवाही नहीं बरतती थी बस अब इतना अंतर ज़रूर आ गया था कि ख़ाली समय में जो समय कुँवर साहब के साथ बिताती थी वही समय अब लड़कियों के साथ बिताने लगी..
समय बीतता जा रहा था,देखते देखते दो माह बीत गए और और अब सिलाई स्कूल की चर्चा अग़ल बग़ल के गाँवों में भी होने लगी..
एक तो सुजाता का व्यवहार मीठा और उस पर सिखाने का तरीक़ा इतना अच्छा कि अब ख्याति तो फैलनी ही थी..
पति अगर कम लायक़ हो और पत्नी पति की तुलना में घर से बाहर भी लायक़ी के झंडे गाड़ने लग जाए तो अधिकतर पतियों का अहम डगमगाने लगता है,वे चाहते हैं कि पत्नी उनकी छत्र छाया में ही फले फूले और लगाम हमेशा पति के हाथों में ही रहे..
कभी अगर कोई लड़की अपने भाई या पिता के साथ आती और सुजाता दरवाज़े पर खड़ी होकर जरा देर बतिया ले तो कुँवर साहब का ख़ून खौलने लगे..
जब सुजाता लौट कर आए तो उलटा सीधा बोलने लगते..कभी कहते कि इतना सजधज कर इन्ही की राह तक रही थी क्या ? 
कुँवर साहब के मन में शक का कीड़ा घर बनाने लगा था..अब तो दूध वाले,सब्ज़ी बेचने वाले से भी बात करता देखते तो मुँह फुला लेते या कुछ अंट संट बकने लगते..सुजाता लाख सफ़ाई देती पर उनके मन पर जूँ न रेंगती..मन तब पिघलता जब रात के किसी पहर उनकी कामनाएँ प्रबल होतीं..उस समय वो बहुत मीठे स्वरों में माफ़ी तलाफ़ी भी कर लेते और एक दो रोज़ थोड़ा अपने व्यवहार पर नियंत्रण भी रखते लेकिन फिर जल्दी ही कोई न कोई मौक़ा उनके हाथ लग जाता और वो फिर अपने पुराने रूप में उतर आते..
लड़कियाँ जब सिलाई सीखतीं तो भी बीच बीच में बहाने से वहाँ चले आते और उन्हें इस तरह आता देखकर बेफिक्र बैठी लड़कियाँ अपने दुपट्टे ठीक करने लगतीं..
एक दिन जब सुजाता ने कहा कि
“सुनिए जी आप ऐसे अचानक मत आया कीजिए,लड़कियों को अच्छा नहीं लगता..”
“क्यों?
लड़कियों ने तुमसे कुछ कहा क्या ?”
“नहीं कहा तो नहीं पर वे आपके आने पर जिस तरह एकदम से चुप हो जाती हैं और..
“मतलब ये कहो ना कि मेरे आने से तुम्हें समस्या है..अब मैं इतना बुरा लगने लगा हूँ तुम्हें ..लगता है अब हमसे मन भरने लगा है हमारी रानी का “ व्यंग्यात्मक लहज़े में कुँवर साहब बोलते 
“छी शरम नहीं आती आपको..बोलने से पहले जरा तो सोंच लिया करिए..”
पर जिस आदमी का ज़ेहन इतना छोटा हो ,उससे सुधरने की उम्मीद करना बेकार ही है..
एक दिन गाँव में एक शादी थी,पति पत्नी दोनों तैयार होकर चलने लगे..
सुजाता  ने अपनी शादी की पीली और लाल रंग की बनारसी साड़ी पहनी हुई थी..कुँवर साहब ने जैसे ही उसे देखा तो एकटक देखते ही रह गए ,लग रहा था जैसे आज ही नई नवेली कोई दुल्हन अँगना में उतरी है..
कुँवर साहब से जब रहा नहीं गया और उन्होंने उसे अपने पास खींचने की कोशिश की तो सुजाता खीज गई कि आपको हर वखत यही सब सूझता  है ,
पहले शादी में चलिए,देर हो रहा है..कुँवर साहब तो पहले से ही जले भुने बैठे थे.
हमको सिंगार पिटार नहीं दिखाएगी तो फिर किसके लिये इतना सजी सँवरी है और ये कहते हुए दाँती भींचते हुए बाहर निकल गए..
सुजाता की आँख से आँसू बह निकले..जब रो चुकी तो शीशा देखा,चेहरे से बीती बातों की गर्द पोंछी और सामान्य चेहरे के साथ ताला चाभी लेकर बाहर निकल आई..
कुँवर साहब ने ताला लगाया और दोनों चल पड़े साथ साथ शादी में..
शादी में सुजाता को देखते ही लड़कियों ने और औरतों ने उसे  घेर लिया..
भाभी आज तो कित्ती सुंदर लग रही हो तुम..रेखा चिहुँकते हुए बोली तो संतोष बाबू की अम्मा साँसे छोड़ते हुए बोलीं कि 
“हमारी तो क़िस्मत ही ख़राब है ,नहीं तो आज ये फूल हमारे घर आँगन में खिला होता..”
“चाची हम का आपकी बहू नहीं है,ऐसी उदासी वाली बातें न किया करें..संतोष बाबू की अभी उमर ही क्या है ,दूसरी शादी करवा दें और इस बार देखभाल कर कीजिएगा शादी..और जो पहले हो गया है ,वही हादसा दोबारा हो ऐसा थोड़े होता है..”
सुजाता  ने कहा
“दुलहिन तुमसे मिले तो तुम भी समझाना संतोषवा को..हम तो कह कह के हार गये हैं..
सुजाता ने उनके कंधे पर हाथ रखकर सिर हिलाकर उनकी बात से  सहमति जताई .”
इधर  सुजाता इस बात से अनजान थी कि कुंवर साहब के मन में क्या तोता पल रहा है और वो पीछे ही खड़े खड़े सब बात सुन रहे हैं..
घर लौट कर आये तो सुजाता से बिल्कुल बात नहीं की और मुँह फेरकर  सो गए..सुजाता  ने उनके बालों को सहलाते हुए लाख मनाया ..प्यार से छेड़ा भी उन्हें पर कुँवर साहब टस से मस न हुए..
ए जी चलते समय तो बड़ा प्यार आ रहा था और अब जब हम बुला रहे तो बोल भी नहीं रहे..
रात आँखों ही आँखों में काटते हुए न जाने कब सुजाता की आँख लगी..सुबह उठीं तो कुँवर साहब बोले कि 
“मौसा के यहाँ जा रहे हैं ,बारात में मौसा के गाँव से उनके एक पट्टीदार भी आए थे  तो उन्हीं के संग जा रहे हैं..”
ए जी कुछ हुआ है क्या?ऐसे काहे जा रहे हैं ?
उनकी चुप्पी देखकर फिर बोली कि अच्छा हम दो पराठे सेंक दे रहे ,दही के साथ खा जाइए..मौसी के लिए एक साड़ी रख दे रहे,उन्हें दे दीजिएगा..
सुजाता कहती रही और कुँवर साहब जूते पहनते रहे और बिना पीछे देखे बोले
देर हो रही है,जा रहे हैं और वो चले गए.
सुजाता कुंडी लगाकर वहीं चारपाई पर बैठ गई..और जाने कब नींद लग गई और वो वहीं पड़े पड़े सो गई..जब लड़कियों के आने का समय हुआ और कुंडी खड़कने की आवाज़ें और भाभी भाभी पुकारने की आवाज़ उस तक पहुँची तो वो चौंक कर उठी..
पल्ला सही करते हुए दरवाज़ा खोला
भाभी का हुआ?सब ठीक है ना ?तबियत नहीं ठीक क्या?
सुमन ने माथा छुआ तो वो तप रहा था..
भाभी आपको तो बुख़ार आ रहा है..सुजाता को भीतर ले जाकर लिटा दिया..
अब लड़कियों ने घर का मोर्चा सम्भाल लिया ..कोई झाड़ू लगाने लगी तो कोई पानी भरने लगी तो कोई बर्तन माँजने लगी तो कोई रसोई में चाय चढ़ाने लगी..
इधर सुजाता कराह रही थी..उसे कुछ होश नहीं था,रात भर की नींद और बुख़ार की वजह से वो आँखें भी नहीं खोल पा रही थी..
“ए सुमन जब तक तू चाय बना रही ,मैं बिस्कुट लेकर आती हूँ दुकान से..”
चाय और बिस्कुट प्लेट में लेकर उन लोगों ने अपनी भाभी को सहारा देकर उठाया..
भाभी में जैसे तैसे दो घूँट चाय और आधा बिस्कुट खाया,वैसे ही उन्हें उल्टी होने लगी तो रेखा बाहर से तसला उठा लाई.
भाभीं जब तक उठ पातीं तब तक उल्टी हो गई..
लड़कियों ने भाभी को लिटा दिया और पानी की ठंडी पट्टियाँ रखने लगीं..
ए बंदना जा कर संतोष भैया और चाची को बुला ला..
बंदना गई और भागकर चाची और संतोष भइया को बुला लाई..
“अरे राम ये क्या हो गया दुलहिन को..संतोष जाकर चौराहे वाले डाक्टर साहब को लिवा ला..और लड़कियों जाकर तेल गरमा लाओ ,सर में ठोंक दें,तब तक कुछ आराम तो मिले..”
संतोष कंपाउंडर अर्थात् डॉक्टर को लिवा लाए ,डॉक्टर ने नब्ज़ चेक की और अपने बैग में से दवा निकाल कर संतोष बाबू को दी.
घबराने की बात नहीं है,बुख़ार का सीजन चल रहा है,दवा दे रहा हूँ ,आराम मिल जाएगा ,ध्यान रखिएगा कुछ खिलाकर ही दवा दीजिएगा..
ये कहते हुए वे चले गए..
“लड़कियों एक बार दूध में तुलसी पत्ती,काली मिर्च,अदरक डालकर कड़क सी चाय बना लाओ..और बिस्कुट भी ले आना..”
चाय बनकर आई तो चाची ने बड़े दुलार से सुजाता को उठाया,आँख खुलते ही सुजाता सुबकने लगी और रात भर का भरा मन बह निकला..
“ए दुलहिन ..ई कुँवर बाबू कहाँ चले गए हैं?उनको पता नहीं था कि तुम्हें बुख़ार है.ऐसा कौन जरुरी काम आ गया कि बीमार पत्नी को छोड़ कर चले गये”
चाची उन्हें पता नहीं था कि हमें बुख़ार है,कल  रात जहाँ से बारात आई थी,बग़ल के गाँव में हमारी मौसिया सास रहती हैं तो उन्होंने बुलवाया था इनको,तभी ये चले गए..
शाम तक वापस आ जाएँगे..
बिटिया लोगों की आज की क्लास भी छूट गई..कितना परेशान कर दिये हम आप सबको बेफालतू में..
दुलहिन ऐसी बातें न करो..आड़े वख़त में हम एक दूसरे के काम नहीं आएँगे तो फिर कौन आएगा..और ये लड़कियाँ दो चार दिन सिलाई नहीं सीखेंगी तो कौन सा पहाड़ टूट जाएगा..चाची की बात सुनकर लड़कियाँ खिलखिला कर हँस पड़ीं..
चाची अब और नही खाया जाएगा..सुजाता को दवा खिला कर चाची बोलीं कि लड़कियों तुम लोग यहीं रुको..मैं जरा घर का चक्कर लगा आऊँ और कुछ खाने के लिए बना दूँ, दुलहिन के लिए भी खाना ले आऊँगी..
चाची चली गईं और लड़कियाँ मिलकर घर के सारे काम निपटाने के बाद उन्हें घेर कर बैठ गईं..कुछ देर बाद चाची आ गईं ..
लड़कियों तुम सब अब घर जाओ,घर में सब इंतज़ार कर रहे होंगे..
लड़कियाँ भाभी को सोता हुआ छोड़कर जाने लगीं..
“चाची कोई काम हो तो हमको बुलवा लेना..हम कल फिर आएँगे..”
लगभग एक घंटे बाद जब चाची ने सुजाता को उठाया तो उसका माथा जल रहा था..
लग रहा है,सरकारी अस्पताल में दिखाना पड़ेगा ,रात बिरात तो कोई डॉक्टर भी नहीं मिलेगा..
चाची सुजाता को सोता हुआ छोड़कर बाहर निकलीं और बग़ल के घर जाकर संतोष को बुला लाने को कहा..
सुजाता के माथे पर ठंडे पानी की पट्टियाँ रखने लगीं..
संतोष के आते ही सुजाता  को सहारा देकर उठाया और घर में ताला लगाकर उसे बीच में बिठाया और ख़ुद उसे पकड़कर पीछे बैठ गई..
अस्पताल में बड़े डॉक्टर को दिखाया और सुजाता  के तेज़ बुख़ार को देखते हुए उसे एडमिट कर लिया कि जब तक ताप कम नहीं हो जाता ,उसे यहीं इमरजेंसी में एडमिट रहने दें,इंजेक्शन लगा दिया है..आधे घंटे में असर दिखना चाहिए.
बेड के एक ओर चाची और संतोष चिंतित मुद्रा में खड़े थे.चाची बार बार माथा सहला रहीं थीं.. लगभग एक घण्टे बाद बुख़ार कम होना शुरू हुआ तो जान में जान आई..
“चाची “
अरे दुलहिन तुम्हारी आवाज़ तो सुनाई दी..
संतोष जा बाहर से चाय और कुछ हल्का फुलका खाने के लिए ले आ..डॉक्टर ने कहा है कि कुछ खिला दें और फिर एक बार डॉक्टर को दिखा दें तब घर जाएँ..
सुजाता को दिखा कर मोटर साइकिल पर बैठाकर दोनों लोग घर ले आए..
ताला खोलकर भीतर आए और उसे अंदर कमरे में लिटाया.
“संतोष तू जरा यहीं रुक ..हम जरा घर से नहाकर आते हैं और तुम अपने और बाबू जी के लिए खिचड़ी डाल लेना..आज हम यहीं रुकेंगे ,जाने कुँवर साहब कब आएँ ,अब तब तक अकेला तो नहीं छोड़ सकते दुलहिन को..”
चाची चली गईं और संतोष बाबू बाहर चारपाई पर बैठ गए..कि तभी सुजाता की खाँसने की और उलटी करने की आवाज़ आई,संतोष बाबू भागकर भीतर पहुँचे और उन्हें कंधे का सहारा देकर उठाया..पानी पिलाया तो वो गले में फँस गया तो वो तेज़ तेज़ खाँसने लगी,संतोष बाबू उसकी पीठ थपथपाने लगे.
और इधर किसी को क्या पता था कि क़यामत आने वाली है..कुँवर दरवाज़ा खुला देखकर घर में घुसे और पत्नी को किसी ग़ैर मरद की बाहों में देखकर आग बबूला हो गए.
संतोष बाबू की तरफ़ जूता लेकर दौड़े और सुजाता को रंडी ,छिनाल और भी न जाने क्या क्या न काह डाला और बिस्तर से खींचकर ज़मीन पर पटक दिया..
तब तक लात घूँसे चलाते रहे,जब तक वो बेसुध नहीं हो गई..
इधर संतोष बाबू भागे भागे माई के पास पहुँचे और सारा वाक़या कह सुनाया..चाची का ग़ुस्सा तो सातवें आसमान पर चढ़ गया..चाचा,चाची दोनों भागे भागे कुंवर साहब के घर पहुँचे..
“हे कुँवरवा तुम्हारे जैसा नीच मानुस हम नहीं देखे हैं..कभी अपने गिरेबान में झांका है..एक दुलहिन ही है जो तुम्हारे साथ निभा गई ,कोई और होती तो कबका तुम्हें छोड़ कर अलग हो गई होती..”
चाची चीखते हुए बोलीं
“चाची पहले अपने लड़के का चरित्तर बाँचो ,हमारी औरत के साथ कब से इसका चक्कर चल रहा है..पता नहीं कब से हमारे पीठ पीछे ये दोनों गुल खिला रहे हैं..वो तो आज हमने रंगें हाथों पकड़ लिया दोनों को..वरना तो दोनों की रंगरेलियाँ चलती रहतीं..”
“ले जाओ ,आज से अपने घर पर बिठा लो इसे..छिप छिपा कर काहे पीठ में छुरा घोंपती हो..”
तब तक शोर सुनकर दुआर पर पूरा गाँव इकट्ठा हो गया था..
प्रधान जी ऊंची आवाज़ में जब कुँवर पर चिल्लाए तब जाकर कुँवर चुप हुए..पर दाँती अभी भी भींचे हुए थे..
जा रे कुँवर ..पहले पूरी बात तो पता कर लिए होते भाई फिर लानत मलानत करते..और उन्होंने पूरा वाक़या कह सुनाया,बाक़ी सन्तोष बाबू वाला क़िस्सा जो कमरे में घटा ,वो चाची ने कह सुनाया..लेकिन कुँवर साहब ने किसी को बोलने ही नहीं दिया ,बराबर से चीखते चिल्लाते रहे..
 जब चाची को दुलहिन का ध्यान आया तो कमरे में भागीं,जहाँ ज़मीन पर सुजाता अर्द्धबेहोशी की हालत में पड़ी थी..
चाची ने छाती से चिपका लिया..ए बनवारी की अम्मा सुनो तो दुलहिन को जरा सहारा देकर उठाओ..हम दुलहिन को यहाँ एक पल भी नहीं रहने देंगे ,कल ही ख़बर भिजवाते हैं इसके पीहर..
सुजाता ज़मीन पर बेसुध हालत में पड़ी थी..प्रधान जी की जीप मँगवाई गई ,सुजाता  को उस पर लादा और सरकारी अस्पताल की तरफ़ जीप दौड़ा दी गई..
आगे प्रधान जी बैठ गए कि डॉक्टर जल्दी से सही ढंग से उसका इलाज शुरू कर दें..
अस्पताल में पहुँचते ही उसे इमरजेंसी में एडमिट कर लिया गया..जितने दिनों वो एडमिट रही,पूरे गाँव ने उसका ध्यान रखा,कहीं से खाना आ जाता तो कोई नाश्ता तो कोई फल लिए चला आता,रात में भी सुजाता के पास रूकने की सबकी बारी लग गई थी..पर कोई नहीं आया तो वो कुँवर था..
सुजाता के पीहर तक जब ख़बर पहुँची तो पूरा परिवार उसे देखने आ पहुँचा और जब उन्होंने कुँवर जी के बारे में पूछा और घटना के बारे में पूरी जानकारी मिली तो पूरा परिवार सिर पकड़ कर बैठ गया..
सुजाता माई से लिपट लिपट कर फूट फूट कर रोने लगी..
माई हमें अपने कोरे में छिपा लो,हम वापस उस घर नहीं जाएँगे.. 
आजा मोर बच्ची
कैसी हालत कर दी हमारी हँसती खेलती बच्ची की..
जब सुजाता माँ की गोद में सिर रखकर पाँव बिस्तर पर पटकने लगी  तो बाबू जी दोनों हाथों से अपनी बिटिया के पाँव रगड़ने लगे ,माँ गोद में सिर रखकर पीठ सहलाने लगीं,भाई डॉक्टर को बुलाने भागे गए ,जब तक डॉक्टर आते ,देह माँ के हाथ में झूल गई तो माँ की चीख निकल गई  ,भागते हुए डॉक्टर आए ,नब्ज़ चेक की ,कहीं कोई हलचल नहीं.. चली गई सुजाता ऐसे देस जहाँ नहीं होगा ऐसा कोई पुरुष जो उसे बात बात पर जलील करे ,होगा कोई ऐसा जो जरा परेशान देखकर पूछ लेगा हाल,चूम लेगा माथा ,हाथ थाम बैठा रहेगा पहरों .चुन चुन फूल लाएगा बगिया से और उसके केशों में सजा देगा..
लेकिन जाते जाते सुजाता ने पुलिस के आगे इक़बालिया बयान दे दिया था .. कुँवर साहब वैसे ही रोते चीखते ,कपड़े फाड़ते रहे और पुलिस उन्हें घसीटती हुई जीप में बैठा कर ले गई ..उन्हें अपनी पत्नी के अंतिम दर्शन भी नसीब नहीं हुए, जैसा कि सुजाता ने पुलिस से विनती करते हुए अपनी इच्छा बताई थी..
शालिनी सिंह
जन्मस्थान -लखनऊ (उत्तर प्रदेश )
शिक्षा -एम ए (हिन्दी ) ,एम फ़िल,पी एच डी
प्रकाशन – नया पथ , अनुनाद , हिंदवी ,  और हिंदवी की नई  सृष्टि नई स्त्री 2024 इक्कीसवीं सदी की स्त्री कविता में चयनित। कुछ साझा संकलन प्रकाशित।
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3 टिप्पणी

  1. नारी के समर्पण को कद्र न करने वालों का साथ जीवन का यही हश्र होता है। शक उनका जन्मसिद्ध अधिकार है और निर्दोष चुपचाप सब कुछ सहती रहे तब भी शोषण और आरोपों से त्रस्त रहती है।
    मर्मस्पर्शी कहानी।

  2. शालिनी जी!

    आपकी कहानी सुजाता पढ़ी। दुखान्त कहानी पढ़कर मन बहुत दुखी हो जाता है।किंतु कई जीवन की यही सच्चाई है।
    पहले कभी बुजुर्ग लोग कहां करते थे के जीवन के तीन पक्षों में से किसी एक पक्ष में तकलीफ उठानी पड़ती है। पता नहीं यह कितना सच है कितना झूठ किंतु सुजाता कहानी को पढ़कर ऐसा लगा कि वह समय तो सही नहीं था।
    शक बहुत बड़ी बीमारी है। इसके अलावा यह कहानी इस सच को भी उद्घाटित करती है कि कभी-कभी आँखों देखा भी सच नहीं होता है। पुरुष जब स्वयं उपार्जन करने से लाचार हो जाता है तो कहीं न कहीं उसमें हीन भावना संभावित हो जाती है। और यही शक को पैदा करती है।
    इस तरह की कहानियाँ पढ़ा तो ले जाती हैं लेकिन “कहानी बहुत अच्छी है” कहते हुए मन ठहर सा जाता है।
    जैसे-जैसे कहानी को पढ़ते हुए आगे बढ़ रहे थे और संतोष आया तभी हमारे मन में खटका पैदा हुआ और धड़कन बढ़ गई कि अब पता नहीं क्या होगा! और जो हुआ वह बहुत बुरा हुआ। लेकिन अंत में उसे सजा मिली यह ठीक हुआ। फिर भी, जो जीवन से चला गया वह तो वापस नहीं आ सकता न!
    एक अक्सर सच्ची कहानी के लिए आपको बहुत-बहुत बधाइयाँ।

  3. शालिनी सिंह जी की सुजाता कहानी केवल एक परिवार की कहानी नहीं है। समाज के काफी हिस्से को अपने में समेटकर चलती है। वो चाहे पिता पुत्र हो या सास-बहू इनके संबंध लगभग ऐसे ही होते हैं। सुबह बहू के जल्दी न जागने से सासों के मुंह बनते हुए देखे जा सकते हैं। इससे भी कोई ज्यादा परेशानी नहीं है क्योंकि इनका समय ढलान की ओर होता है। और एक समय के बाद अपने आप चुप हो जाती हैं।
    लेकिन जिसके गले से बंधी है वही उसका साथ छोड़ने लगे तो स्त्री यहां टूटने लगती है। टूटने क्या वह टूट ही जाती है।
    वह स्त्री से श्रेष्ठ है,पुरुष में ये जन्मजात प्रवृत्ति होती है। स्त्री उससे आगे निकलती है तो वह हीनता का शिकार हो जाता है। और इसी हीनता में वह अपने आपको कमजोर महसूस करने लगता है। यदि परपुरुष उस स्त्री को महत्व देने लगे तो नकारात्मक भाव पति के जीवन को नरक बना देते हैं।
    कहानी इसी विषय को लेकर रची गई है। कहानी को स्त्री विमर्श के खांचे में रखा जा सकता है। क्योंकि इसमें बहुत कुछ है जिस पर बात की जा सकती है। फिलहाल तो सुजाता इस कहानी का सशक्त पात्र है। संघर्षों से उपजा पात्र अपनी छटा बिखेरकर पाठक को एक टीस छोड़कर चला जाता है। अच्छी कहानी के लिए लेखिका को बधाई।

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