Wednesday, May 13, 2026
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हरिहर झा की कविता – पाषाण-जगत में

पाषाण-जगत में संवेदन का, छींटा कभी न आ पाया 
धुँआ-धुँआ, जग बना अखाड़ा
कीट-राजा का आया दूत
मुस्कानो पर अट्टहास का
डर अंतस्तल में घनीभूत
मृदुल भाव संग भीनी गंध, क्या समझे, रस ले, जड़ काया 
चीखों में कोयल की कू कू
ताल, लय गया, सभी सुरों का
शिशु के भोले से क्रंदन को
दबोचता गर्जन शेरों का –
फैंका दूध पकड़ पंजे में माखन स्निग्ध कुचल कर खाया 
न्याय की देवी ना शरण दे
पीती मदिरा खाती काजू
पट्टी आँखो पर बरसों तक
बोला कुछ भी नहीं तराजू
चुप्पी तोड़ी, पटक दिया सच, गीत नराधम का ही गाया
जीवन टूटे यन्त्र सा चला,
मर मर उमर गई खपने में
मौत मिली ना, जड़ सी मूर्छा
चेतन बहक रहा सपने में
जीजिविषा से गुत्थमगुत्था, कुटिल प्रेत की गहरी छाया 
उँगली श्रम में व्यस्त नहीं तो
हाथ उठाये देती गाली
विलास में डूबा जीवन बस
तैर रहा खोखला खाली
सुविधाभोगी, दर्द डराये, खण्डित हो जाना ही भाया
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