कवित्री हूँ, मानव कल्याण के सपने को संजोती हूँ —–
संकल्प लिए जीवन की अनुभूति के साथ जीती हूँ
सत्य, शिव और सौन्दर्य अलौकिक रस पीती हूँ
मेरे दिल से प्रेम की धारा प्रवाहित कर के बहती हूँ ,
मैं कविता हूँ मैं ही कविता लिखती हूँ मैं कवित्री हूँ
कवित्री हूँ मानव कल्याण के सपने को संजोती हूँ
चलो आवो मेरे साथ सार्वभौमिक प्रेम जागती हूँ
कवित्री हूँ मानव कल्याण के सपने को संजोती हूँ
सबक एक समान आनन्दित करते हुवे चलती हूँ
मैं कविता हूँ मैं ही कविता लिखती हूँ मैं कवित्री हूँ
कवित्री हूँ मानव कल्याण के सपने को संजोती हूँ
शब्दों का परिंदा सी खुले आकाश में मै उड़ती हूँ
मैं कविता हूँ आत्मा की फुसफुसाहटों से बनती हूँ
बनकर महानदी सी मनुष्यता के भीतर बहती हूँ
मैं कविता हूँ मैं ही कविता लिखती हूँ मैं कवित्री हूँ
कवित्री हूँ मानव कल्याण के सपने को संजोती हूँ
कविता कभी नहीं मरती इसलिए मैं नहीं मरती हूँ
अक्षरों के गाँव सोती हूँ उठती हूँ पलती हूँ रहती हूँ
इसलिए  ही मैं जिन्दा हूँ, मैं जिन्दा हूँ, मैं जिन्दा हूँ
मैं कविता हूँ, मैं ही कविता लिखती हूँ, मैं कवित्री हूँ
कवित्री हूँ मानव कल्याण के सपने को संजोती हूँ
ज्योतिर्मया ठाकुर
ज्योतिर्मया ठाकुर एक कवियत्री, लेखिका, सम्पादक, शिक्षिका, विदुषी, प्रशासक, अनुवादक, समीक्षक, आलोचक,रेकी - चिकित्स्क, सामाजिक कार्यकर्ता, साहित्य संवर्धक, तथा परोपकारी संस्थानों की अवैतनिक सलाहकार हैं। उनके 23 कविता संग्रह और रेकी चिकित्सा पर एक पुस्तक प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी अनेक कवितायेँ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संग्रहों तथा वेबसाइट में प्रकाशित हो चुकी हैं।

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