Wednesday, June 12, 2024
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कुसुम पालीवाल की कविता – चाँद को देखूँ या देखूँ रोटियाँ ज़मीन पर

एक चाँद आसमान पर
एक ज़मीन पर सिसक रहा
आसमान पर नज़र मैं डालूँ
या डाल दूँ इस ज़मीन पर
आँख चाहती ख़्वाबों की दुनिया
पर दुनिया में रोटी की किल्लत
पानी पीती हूँ जब चुल्लू में भर कर
तब चाँद हथेली पर आता उतर कर
देख चाँद को भूख कराहती पेट में
उठकर मरोड़  पेट से चुल्लू में पसर जाती
और चाँद फिसल कर
गिर जाता ज़मीन पर
इन आँखों का दर्द सिमट कर
आँखों से फिर क्यों  बह जाता
जब चाँद हथेली से गिर जाता
फिर आँखों को नज़र न आता
चाँदनी रातों में चाँद जब कभी
मेरी थाली में बैठकर इठलाता
होंठों पर कुछ नम सा हो जाता
आँखों से नमक तब बह जाता
जब चाँद थाली में नज़र आता
हाथ बढ़ाकर थाली में जब छूना चाहा
वो  तितली  बनकर उड़ जाता
मैं आसमान में चाँद को देखूँ
या चाँद को ढूँढूँ इसी ज़मीन पर
जब भूखे होंठों की पपड़ी पर
कोयल की कूंक नहीं बजती
भूखी आँखों में सपनों की जगह
तब बंजर से खेत नज़र आते
तुम चाँद को देखो आसमान पर
मैं बंजर आँखों में चाँद उगाऊँगी
तुम चाँद की सैर कर आना
मैं कटोरे में चाँद को बैठा लूँगी
फिर पूछूँगी चूल्हे से हँसकर
क्या चाँद कही नज़र आया
मना करेगा जब वो मुझसे
मैं कटोरा उसे  दिखा  दूँगी
और पूछूँगी, और पूछूँगी
आसमान पर नज़र रखूँ
या डाल दूँ ज़मीन पर
मैं चाँद को देखूँ आसमान पर
या देखूँ रोटियाँ ज़मीन पर
चाँद को देखूँ या देखूँ
रोटियाँ ज़मीन पर ..…॥
कुसुम पालीवाल
कुसुम पालीवाल
शिक्षा - एम. ए. प्रकाशित पुस्तकें— चार काव्य संग्रह, दो कहानी संग्रह. संपर्क - kusum.paliwal@icloud.com
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