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गणतंत्र दिवस पर पद्मा मिश्रा की कविता – सिर्फ एक दिन

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भूले बिसरे संबंधों के सूनेपन में,
नवयुग की किरणों का अद्भुत पैगाम भरें,
एक दिन तो अपनी आजादी के नाम करें.
जो धुल भरी आंधियां छा गयी हैं नभ में,
खो गया उजाला जिनसे जाग के आँगन में,
आओ हम नई क्रान्ति का सूरज एक गढ़ें,
जन-मन के अंतर में एक नया प्रकाश भरें,
एक दिन तो अपनी आजादी के नाम करें
जो छोटी छोटी राहों से होकर गुजरे,
राजमार्ग पर भटक गए मेरे साथी,
अपनी माटी की प्यार भरी भाषा भूली,
अब सपनों का संसार बुना करते साथी.
हम सत्ता की उन अंधी गलियों से चलकर
एक नव प्रभात के नवल सोर्य के साथ बढ़ें,
एक दिन तो अपनी आजादी के नाम करें
हमने अपनी पहचान नहीं खोई अब तक,
अब भी जागे हैं ऊंचे पर्वत शिखरों पर,
बर्फीले झंझावातों के सूनेपन में,
हम देश प्रेम के सपने बुनते हैं मन में,
जो लुटा गए प्राणों का बलिदानी सावन,
उन अमर शहीदों की गाथाएं याद करें
एक दिन तो अपनी आजादी के नाम करें.
नन्हीं आँखें पूछा करती हैं सवाल,
कब तक मिल पायेगा अपना अधिकार हमें?
हम नहीं कामना करते ऊँचे महलों की,
अपनी छोटी सी कुटिया  ही स्वीकार हमें,
हम नव युग की इन भोली आशाओं में,
उनके सपनों का एक सुदृढ़ आधार बनें.
एक दिन तो अपनी आजादी के नाम करें.

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