उसे गर्व है अपने आप पर
क्योंकि उसने टक्कर दिया है
समाज को,उस पितृसत्ता को
जिसने वर्षों से उसका जीना
मुहाल किए हुए था।
उसने छीन ली थी उसकी वो हंसी
जिससे कभी सारा घर गूंजा करता था।
उसके रंगीन, डिजाइनर कपड़े
अब सफेदी में तब्दील हो गए थे।
उसके प्रिय भोजन की जगह
सात्विक खाना दिया जाता था।
कसूर भी उसका क्या
कि वो बेवा हो गई।
किसी पुरुष की छत्रछाया
से वंचित हो गई।
मरा तो पति था उसका
पर सब उसे क्यों मुर्दा बना रहें हैं
क्यों नहीं समझते कि वो जिंदा है अभी
जिंदा उसके कुछ अरमान हैं
कुछ सपने  हैं
जिन्हें वो कैसे मार दे
उन्हीं के भरोसे तो
वो आज तक जीती आयी है
उसके उन पंखों का क्या
जो रात दिन उड़ने के लिए
तड़फड़ाते रहते हैं।
और ये लोग जो पितृसत्ता् के ग़ुलाम हैं,
पोषक है
उसके पंखों को काटने
में लगे रहते हैं।
और एक दिन
वह उड़ चली
उन सबसे दूर
जो उसकी उड़ान में
बाधा बने हुए थे।
उन सबको खुली चुनौती देकर
कि रोक सको तो रोक लो
क्योंकि अब मैं परवाज़ भरने वाली हूं।

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