Wednesday, June 12, 2024
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चंद्र मोहन की पांच कविताएँ

1 – शहीद
मैं लड़ता हूँ लड़ाई
मिट्टी और कुदाली से
लहूलुहान होते हुए
मैं लड़ता हूँ लड़ाई
सुलगती हुई आग से
धीरे-धीरे राख होते हुए
मैं लड़ता हूँ लड़ाई
कठिन श्रम जैसी
लगातार मृत्यु की मार से
मैं लड़ता हूँ लड़ाई
रोग,शोक,भूख
घोर दुख के खतरनाक अन्धकार से
मैं लड़ता हूँ लड़ाई
और लड़ते ही लड़ते
अन्ततः
एक दिन
चुपचाप शहीद हो जाता हूँ!
2 – खेती अब परती है
अब खेती क्या है
दुखों की पेटी है
देह को दुहने वाली मरखन्नी गाय है
और कोई उपाय नहीं खेती
क्या? नदी की बेटी
नहीं नहीं
खेती
अब परती है
जहां गेहूं नाम की बाली कम
कृषक की हड्डी-गुड्डी
अधिक मिलती है।
क्या? देह की बरबादी नहीं है?
तो देश के गांव गिरांव घुम देखिए
जिनकी कमाई है सलाना
मात्र तेरह से बीस हजार
उसके पासबुक में
नहीं कोई गांधी हैं
न ही अंत है कोई
पूस की रात का
सूखा और बाढ़ का
हाय और बिपत का
करजा और शुध ब्याज का
नहीं कोई अंत है
वही हल की लकड़ी है
वही खुरपी है
वही कुदाल है
और हाड़ तोड़ खटते खटते
देह हुई कृषक से कृषकाय है
न साधन है
न व्यवस्था है
यहां हर एक छोटे किसान की जान
बहुत सस्ता है
और कोई रास्ता नहीं है
क्या करें
कहां जाकर
गुलामी खटें
क्या करें
किस जन्म तक
गिरवी रखें खुद के दुख को
दिन के दो सौ पगार से भी क्या होगा
मजूर जीवन भी
न यहां का होगा
न वहां का होगा।
3 – किसान किसान किसान
जो युवा अभागा था बचा रह गया वही खेतों में
बचा रह गया वही खेतों में
उसके पीछे कुछ न था उसका
न आगे भी होगा
जैसे कि गांव के लोग कहते रहे हैं
कि अब खेती करके न जीवन संभल सकेगा।
क्या बिपत आन पड़ा था कि
खेती करके जीवन बिताना मुश्किल था
मुश्किल था दिल में सांस का चलना भी
यूरिया डाई खाद तो कुछ ही कार्पोरेट घरानों के पास थी।
जो सचमुच में मामूली किसान था
उसके पास बोने भर को न कोई बीज था
इसलिए वह कभी-कभी पिछड़ा किसान था
तो कभी-कभी दिहाड़ी मजदूर था
हां वह शहर भी तो बहुत दूर था
लेकिन जहां काम मिल जाता
किसी भी रेट पर
वह काम करने को तैयार था
धनी लोगों के लिए
उनके महलों के लिए
माटी ढोता था
बालू ढोता था
पत्थर बीनता था सड़क पर
कभी-कभी जंगल साफ करता था
कौन था वह कैसा था वह
कि भारत जैसे कृषि प्रधान देश में
भारत जैसे पूंजीपति प्रधान देश में
इतना हद तक मजबूर हो गया था कि वह किसान से अब मजदूर हो गया था
अंततः उसके नाम को
किसी ने क्यों नहीं पुकारा
किसान किसान किसान।
4 – श्रम
इस दुनिया में खेतों के शब्दों से अधिक अर्थवान
कौन से शब्द होंगे
श्रमिक हथियारों से अधिक महत्वपूर्ण
कौन से हथियार होंगे
श्रम की कविता से अधिक सुंदर
कौन सी कविता होगी
जब हम दुनिया से कहेंगे शुक्रिया अलविदा
हम जी लिए किसी तरह
अंतिम में
कुछ दिनों के लिए
इन हाथों से छुट कर क्या बचा रह जाएगा
हमारे श्रम से बनाए हुए घर, कुदाल और अनाज के सिवा।
5 – मृत्यु का स्पर्श
क्या आपने कभी मृत्यु का स्पर्श किया है
मैंने किया है
इसे स्पर्श करने के लिए
करना पड़ता है खेतों में बहुत
बहुत मेहनत
बहुत बहुत मेहनत
बहुत बहुत मेहनत करने से
सिहर जाती है आत्मा
एड़ी से चोटी तक पसीने से लथपथ
पानी की तरह बहने लगती है करूणा
मेहनतकश के हृदय में छल छल।
चंद्र मोहन
चंद्र मोहन
हिन्दी की अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित। और प्रतिष्ठित वेबसाइटों पर भी।, पता -खेरोनी कछारी गांव कार्बी आंगलोंग (असम) मोब. 9365909065
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