Thursday, June 13, 2024
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चंद्र मोहन की दो कविताएँ

1 – सुंदर तो बस काम होते हैं
बैल हांकते हुए
या कंधे पर कुदाल या लकड़ी का हल ढोते हुए जब हम खेतों से घरों की तरफ लौट रहे होते हैं
मुरझाए हुए से दिखते हैं
सुंदर नहीं दिखते
मेरे कहने का मतलब
सुंदर कुछ नहीं
एक खटते खटते कृषकाय हुई कृषक की देह
और एक हाड़ मास काया वाले बैल
सुन्दर नहीं हो सकते
सुंदर तो बस काम होते हैं
क्रिया होती हैं
और भूख में कच्ची अधपकी रोटी
बहुत मधुर।
2 – ये गेहूँ के उगने का समय है
हर रोज की तरह सूरज पूरब से उगेगा
खुला आसमान रहेगा और दूर-दूर से पँडुक आएँगे
मैनी चिरैया आएँगी
देसी परदेसी पंछी आएँगे
गेहूँ की निकली हुई पहली पहली डिभी को
मिट्टी में चोंच से गोद गोद कर खाएँगे
इन्हें बच्चे हुलकायेंगे तो उड़ जाएँगे
ये गेहूँ के उगने का समय है
और देश में किसान हक के मोर्चे पर खड़े हैं
युगों की पीड़ा से सनी हुई मिट्टी
किसानों के लबों से बोल रही हैं
जिनके पास ज्यादा खेत है
उन्हीं का भरा पेट है
दोष मिट्टी का नहीं
ज़मीन का खून-पसीना लूटने वाले लोगों का है
ये गेहूँ के उगने का समय है
यह समय मौसम के फसल को
सही-सही लिखित मूल्य मिलने का समय है
यह समय हत्यारे गोदामों की ओर से
कुँवारी ज़मीन की ओर गेहूँ के लौटने का समय है!
चंद्र मोहन
चंद्र मोहन
हिन्दी की अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित। और प्रतिष्ठित वेबसाइटों पर भी।, पता -खेरोनी कछारी गांव कार्बी आंगलोंग (असम) मोब. 9365909065
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