दिविक रमेश की दो कविताएँ 3

  • दिविक रमेश

1- कविता पृथ्वी होती है
जहां से शुरू होती है
खत्म भी वही होती है एक अच्छी कविता।
कविता पृथ्वी जो होती है
जिसका एक छोर
मिला होता है हमेशा
दूसरे छोर से।
कितने ही 
बांटना चाहते हैं पृथ्वी को
कितने ही खींचते रहते हैं  लकीरें
डालते रहते हैं दरारें
लेकिन नहीं कर पाते अलग
पृथ्वी के एक छोर को
दूसरे से।
लहुलुहान हो कर भी जैसे
कविता, कविता रहती है आत्मा सी।
कहां बांट पाते हैं उसे 
बारूद
बन्दूकें
तोपें
तलवारें
तीर
या चाकू
दुनिया भर के।
बांटने वाले 
खुद बंट कर रह जाते हैं।
यह पृथ्वी ही है
जो टुकड़ा-टुकड़ा होकर भी
पृथ्वी ही रहती है।
ठीक वैसे ही
जैसे कविता
हर हाल कविता होती है।
कविता जहां से शुरू होती है
खत्म भी वहीं होती है।
उसमें 
घर जो होता है
हर उत्कृष्ट इंसान का।
ठीक वैसे ही
जैसे पृथ्वी
अन्ततः घर होती है
हर उत्कृष्ट इंसान का ही।

 

2- होती है समय की भी एक गर्दन
कहा तो मजाक में ही था मैंने– 
मक्खियां मार रहे बेकार आदमी की तरह
या हो सकता है उस आदमी की तरह 
जो हर ओर से काट कर खुद को 
बेमतलब हो चुका होता है,
या बेतुके से किसी मूड में महज जीता है—
कहा तो मजाक में ही था मैंने-  
‘कि समय जाओ और कहीं जाकर टांगे फैलाओ,
सुस्ताओ’ !
पूरा यकींन था
कहीं नहीं जाएगा समय
समय ने कब किसकी सुनी है।
जो अब सुनेगा।
यकींन शायद न आए
लेकिन समय सचमुच  चला गया था।
चला गया था समय घड़ियों से,
कलेंडरों से, महीनों से
वर्ष भी जा लटके थे 
आसमान की किसी ऊंची टहनी पर।
लगा
न मैं जीवन में रहा था 
और न मृत्यु में ही।
हो गया था जैसे बस बेमतलब।
सोचने को बस रह गया था यही-  
बड़ा चला था समय को करने बेमतलब !
कमाल का है न हमारा बहुमत 
रहता है न तत्पर
फिर आने को उन्हीं बहकाओं, भ्रमों 
के छाप दिए गए नए संस्करणों के झांसों में, 
बनने को जलूस
जमीन से आकाश तक लहारा दिए गए समर्थ  
झंडॉं के पीछे।
हम फिर 
दुत्कारते ही रह जाते हैं समय को
बिना नजर तक उठाए अपनी ओर।
समय हंसता है अपनी ही गोपनीय विनम्र धूर्ताओं पर।
समय हंसता है अपने ही स्व पोषित अंहकार पर ।
समय हंसता है अपने ही रचे डर के डारावने  मुखौटे पर । 
समय बचता है हमारे ही बचाए रखने पर।
सोचता हूं 
क्या काट लेना समय से 
बस यही एक विकल्प है?
होती है
समय की भी एक गर्दन, 
क्या उचित है जान कर भी 
रह जाना चुप?  

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