नूतन अग्रवाल के काव्य-संग्रह पर प्रो. रमेश ऋषिकल्प की टिप्पणी 1

निजी भावबोध की कविताएँ…

अच्छी कविता के कई आयाम होते हैं |कविता का इतिहास बताता है कि अच्छी कविता अंतर्मंथन से जन्म लेती है और स्वत: ही शब्दों का संयोजन करने लगती है | यह मंथन नितांत निजी अनुभव होता है, इसलिए कविता भी सबसे पहले निजी होती है और फिर सार्वजनिक बनती है| तभी वह सबके लिए हो जाती है, सब उसे बार-बार पढ़ना चाहते हैं, याद रखना चाहते हैं |
नूतन ज्योति की कविताएंँ नितांत निजी भावबोध से निकली हैं |यह कविताएँ बहुत सहज ,सरल और आत्मीय हैं, इसलिए उन्हें पढ़ते रहने का मन करता है| वो हमारी चित्त-वृत्ति को अच्छी लगती हैं| लिखने के बाद नूतन ज्योति की कविताएँ हम सब के भावों को साझा करती हैं | इसलिए वो कविताएँ हैं |मैं हमेशा मानता हूँ कि कविता सबसे पहले अपने लिए लिखी जाती है |वह हमारे अर्जित अनुभव से बनती है| यह अनुभव सबका अपना अलग -अलग अनुभव हो सकता है पर वह नितांत निजी होता है| यह निजता ही हर एक की कविता की संपदा है |नूतन ज्योति जब लिखती हैं _
जानती हूँ
एक छलावा हो तुम
जो दिखते हो
मुझे पेड़ों की ओट से |
नूतन की कविता का यह ‘तुम’ सब पाठकों का तुम बन जाता है| हम सबका कहीं न कहीं ,कोई न कोई  तुम है जिसका नूतन की कविता के तुम से साधारणीकरण हो जाता है और हम सब उस ‘तुम’ के बारे में सोचने लगते हैं|
नूतन की कविताओं में जो आत्मीयता महसूस होती है, वह बहुत नाजुक भी है क्यूंकि नूतन सच्ची भावनाओं के लिए कविता में शब्द तलाश करती हैं भले ही वो ‘मृगतृष्णा’ ही क्यों न हो |
जब हम किसी की कविता पढ़ते हैं तो हमें उसके अंदर झाँकने का एक मौका मिलता है| एक वास्तविक अवसर |यह वो क्षण होता है जब कवि अपनी संवेदना के प्रति पूरी तरह ईमानदार होता है | इसी ईमानदारी से उसकी कविता बनती है |नूतन ज्योति की यह कविता इस बात का उदाहरण है–
कुछ ख़त सीले से
रखे हैं सँभालकर
एहसासों के नर्म बक्से में
पढ़ लेती हूँ
हाँ
पढ़ ही लेती हूँ
कभी -कभार
यूँ ही बस यूँ ही |
नूतन के इन सीले ख़तों ने पाठक के लिए भावना का एक विस्तार तैयार कर दिया है | न जाने कैसे होंगे यह खत जो नूतन ने नर्म बक्से में सँभाल कर रखे हुए हैं | कवयित्री ने ‘सीले ख़तों’ का इस्तेमाल अपनी उठती हुई भावनाओं के साथ मिलकर किया है और संवेदना को व्यापक बनाया है | कविता पढ़ने के बाद हम भी कुछ -कुछ सीलापन महसूस करने लगते हैं | यह नूतन ज्योति का नितांत निजी अनुभव है लेकिन नूतन इस अनुभव को कविता बनाना जानती हैं, इसलिए नूतन जी की कविताएँ आत्मीय भी हैं और सच्ची भी हैं | विचारों का निरर्थक बोझ इनकी कविताओं में नहीं है | विचार जहाँ आए भी हैं तो भाव बनकर आए हैं ,कविता बनकर ही आए हैं..जैसे उनकी यह कविता _
मानते हैं समय के अनुभव
हैं बरगद के पास
पर रुका हुआ है वो
समय के साथ चलना नहीं जानता|
नूतन जी ने समय के विचार को कविता में इस ढंग से इस्तेमाल किया है कि वो अंततः भाव में परिणित हो जाता है| इसलिए मैं नूतन ज्योति को सच्ची और अच्छी कवयित्री मानता हूँ |
नूतन अग्रवाल के काव्य-संग्रह पर प्रो. रमेश ऋषिकल्प की टिप्पणी 2प्रो• रमेश ऋषिकल्प, विज़िटिंग प्रोफ़ेसर, गेंट यूनिवर्सिटी, बेल्जियम (पश्चिमी यूरोप ) Email: rameshrishikalp@gmail.com
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