1 – हे माँ !
हे माँ !
जब लाँघने लगे थे पैर
आँगन की देहरी
उँगली पकड़कर छोड़ आयी थी तुम
पड़ोस के स्कूल में
उसका पाठ्यक्रम
तुम्हारे आँगन की पाठशाला से बिल्कुल भिन्न था
उसमें श्रेणी थी, स्पर्धा थी, चक्र थे, दुष्चक्र थे
जीत के लिए ताज तो था, हार के लिए स्थान नहीं था
हार जाता हूँ जब भी
बाहरी दुनियाँ की पाठशाला में
लौट आता हूँ माँ
तेरे आँगन की कक्षा में
तुम्हारी गोदी में सर रखकर
तुम्हारे पाठ फिर से दोहराने को
अभिमन्यु नहीं लौट पाया था
सुभद्रा के आँगन में
अभिमन्यु सदा मारा जाता है
द्रोण के चक्रव्यहू में फंसकर
जो चक्रव्यहू रचना नहीं जनता
वो निकला भी नहीं जनता।
2 – हमारे बड़े
हमारे बड़े
कहीं नहीं जाते हैं
वो रहते हैं ताउम्र हमारे साथ
सब्जी के छोंक में
चाय के कड़कपन में
दरवाजे की नक्काशी में
आँगन के विन्यास में
भाषा के लहजे में
शब्दों के उच्चारण में
इच्छाओं में, अभिलाषाओं में
डर में और ईर्ष्या में भी
वो दिखते हैं उनमें, जिन्हें वो प्यार करते थे
और उनमें भी जो उन्हें पसंद नहीं थे
फिर रिक्त क्या हो जाता है
किसी एक के भी न रहने से ?
वास्तव में
हम हर दिन रिक्त हो रहे हैं
देखे चुके होते हैं रिक्त होने की पूर्णता
अपनों के अवसान पर
आने वाली पीढ़ी स्थापित कर रही होती है
हमें उसी स्रोत शिखर पर
स्थापित थे जिस पूज्य पद पर
हमारे बड़े
हमारे वन्दन में
अवचेतन सुन रहा होता है
रितते बर्तन की गूँज
इसीलिए शायद
गढ़ लिए हैं हमने
अदृश्य शक्ति प्रतिष्ठान के मूर्त रूप
और स्थापित कर देते हैं उन्हें
अपने बड़ों से रिक्त हुए स्थान पर
निरन्तर रिक्तता की अनुभूति से बचने का
सामुहिक उपक्रम हो जैसे ……..
3 – आँगन के नीम का पेड़
आँगन के नीम का पेड़
देखता था
बाबा जी के बैल, गांय, भैंस
सुनता था बाबा जी के हुक्के की गुड़गुड़ाहट
गुड़गुड़ाहट पर चर्चा
चर्चा में बैल, गांय, भैंस, परिवार, पड़ोस, रिश्तेदार
और नीम भी
नीम देखता था
बाबा जी के लिए
गांय, भैंस, बैल लाभ-हानि के गणित नहीं
भावनाओं के बंधन थे
परिवार की त्रिज्या
पत्नी-बच्चों तक ही आकर ओझल नहीं हो जाती थी
वो दूर तक जाती थी
पडोसी अलग इकाई नहीं
बस आँगन का विस्तार थे
रिश्तेदार सीढ़ी का पायदान नहीं
सम्बन्धों की पूर्णता थे

आँगन के नीम के पेड़ ने देखा था पिताजी को
कुछ सपने बुनते
कुछ बनवाते, कुछ चिनवाते
पिताजी के सपनों में विस्तार तो था
नीम भी था

आँगन के नीम के पेड़ ने देखा था
गाँव में अब बाजार आने लगा था
गाँव को सुनहरे सपने दिखने लगा था
आँगन के नीम के पेड़ ने
देखा था
मेरी तृष्णा विस्तार ले रही थी
मैं नीम की छाँव से दूर जा रहा था
मुझे बाजार लुभा रहा था

आज
आँगन के नीम के पेड़ के सूखे पत्ते
आँगन में उगी बेतरतीब घास
गांय, बैल, भैंस के सुने खूंटे, खाली नांद
पूछ रही है मुझसे
मेरे लाभ-हानि के गणित का क्षेत्रफल
परिवार की परिधि
पडोसी की सब्जी का स्वाद
रिश्तेदारों से आत्मीयता की माप
और बता रही है मुझे
तृष्णा की नियति……..

डॉ नेत्रपाल मलिक
वैज्ञानिक- कृषि प्रसार
कृषि विज्ञान केन्द्र, छेरत
अलीगढ -202122
उत्तर प्रदेश,
भारत
ईमेल: netrapalmalik1@gmail.com
मो० सं ०: 9412954947

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