अभिशप्त बचपन
(1)
चिथड़ों मे लिपटा
अभिशप्त बचपन
गली के कचरों में
गौरैया सा फुदकता
पिल्लों के संग
रहता है मस्त और पस्त
अकुलाते ऐंठते पेट को
तसल्ली देता है नेता की भाँति
होता नहीं धराशायी।
भुखमरी ठोंक-ठोंककर
बनाती है लौह सा शरीर
दिमाग़ी तुतलाहट अलविदा कह
भागती है ख़रगोश सी
नहीं बने रहना है बच्चा
उसे तो सीखना है
पेट भरने की कारीगरी
लेकिन विद्यालय में नहीं
खेत-कारख़ानों में-दुकानों में।
स्कूल अमीरों के लिए है
सरस्वती और लक्ष्मी
दोनों हैं दो महाशक्तियाँ
संबंध भी टिकते हैं
समानता के सिद्धांत पर
फिर वह क्यों बुलाएँ
गुदड़ी के लाल को
उसे तो उतरना है श्रम के बियाबान में
जहाँ नहीं होगी अनुभूति
ममत्व किसी डैने का।
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(2)
रेशमी लिहाफ और गद्दे पर कूदता
उल्लसित बचपन भी
कभी कभी होता है अभिशप्त
जब डैड और ममा
हो जाते हैं नदी के दो छोर
और वह नहीं बन पाता सेतु
बनता है त्रिशंकु
दया-घृणा रूपी तीरों से बिंधता
असहाय उपेक्षित
सबके लिए अप्रिय-असह्य
तब बचपन हो उठता है किशोर
समझे को आतुर ‘दूसरे’ के संदर्भ को
न मम्मा लगती हैं अपनी न पापा
घर भी लगता है खण्डहर
जहाँ वह अकेला
भटकता है अंतहीन निराशा में
निमिष के अंतराल पर
सुनाई देती हैं चीखें भयानक
लड़खड़ाते हैं पाँव
वह धँसता है खाई में
अभिशाप का बदनुमा दाग
कुकुरमुत्ता बन फैलता है
उसके चतुर्दिक
प्रतीत होता है दिन का उजाला
गहन अंधकार सा।
पूर्वज बंदर
पूर्वज कहलाते हैं बंदर
मगर आज भी हैं वे शिक्षक
जंगल कटने से हुए बेदख़ल हैं
इसीलिए शहर में आकर
मचाते हैं घर-घर उत्पात
उजाड़ते हैं सजे बगीचे-गमले
बंदर, मंदिर परिसर में
झपटते हैं चढ़ावा
अक्सर भक्तों के हाथ से
मानो उनका हो उस पर अधिकार
पेट ही भूखों की प्राथमिकता
समाजवाद का यही बुनियादी पाठ
सभी प्राणी हैं एक समान।
बंदर एथलीट हैं
छत-मुंडेर या पेड़-शाखाओं की
दूरियों का वे कर लेते हैं
अविलंब आकलन
अद्भुत उनकी प्रत्युत्पन्नमति
देह-दिमाग़ का पारस्परिक संतुलन
उनसे इन गुणों को सीखकर
मानव हो सकता है बेहतर।
बंदरिया आधुनिक स्त्रियों से उत्तम
मातृत्व की अनूठी उदाहरण
खतरे का अनुमान होते ही
पीठ पर बिठाकर नवजात को
या चिपकाकर उसे पेट से
भागती है हवा की गति से
नहीं बहाती जल-प्रवाह में
और न भागती है वासना के जुनून में।
सहधर्मिता
नदी के जल में
झिलमिलाते चाँद सितारे और
आईने में दीखती परछाईं की तरह
लगती है सहधर्मिता
आत्मीय-अनात्मीय
क्योंकि लंबी दूरी को
तय करते-करते थककर
घिसकर बेदम हो पसर गयी है वह
शासन में, प्रशासन में
विद्यालय और कार्यालयों में
उखड़ती साँसों को रोकती
गुहार लगाती प्राण-रक्षा हेतु
किन्तु अभिनय कुशल सहकर्मी
खेलते हैं मंच पर नाटक
संवेगों का जामा पहन
लगाते हैं मरहम उसके छिलें कटे अंगों पर
मगर, नेपथ्य का दृश्य कुछ और होता
अपराजेय होने के लिए
उन्हीं के मध्य एक बगुला लेता है आकार
जो निगल जाना चाहता है
आसमान की ओर बढ़ते क़द वाले जीवों को
ताकि वही दिखे साबुत
और भर सके उड़ान चर्तुदिक
निर्विरोध एकछत्र साम्राज्य हो।