Friday, June 21, 2024
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हूबनाथ की कविताएँ

बापू
बुनियादी रूप से
हिंसक थे
वे सभी
जिन्हें पढ़ा रहे थे आप
पाठ अहिंसा का
जनमजात झुट्ठे थे
वे सभी
जिन्हें चला रहे थे आप
सत्य की राह पर
और वे हँस रहे थे
आपकी बेवकूफ़ी पर
मन ही मन
आपके
अपरिग्रह के पिछवाड़े
वे जुटा रहे थे संपत्ति
सात पीढ़ियों के लिए
आपकी
अजीबोगरीब सनक
कइयों को लगा था
आदमी अजीब है
पर काम का हो सकता है
इसीलिए वे लगे हुए थे
पीछे-पीछे
जैसे जैसे
आज़ादी करीब आती गई
लोग आपसे दूर होते गए
आज़ादी की चौखट पर
आपके अहिंसा की
निर्मम बलि दी गई
इतनी हिंसा तो
दोनों महायुद्धों में भी
नहीं देखी थी आपने
यह था उनका
असली चेहरा
जो आपको पूजते थे
देवता की जगह
इन्सानों में नहीं
मंदिरों और तस्वीरों में
होती है
कितनी जल्दी
आपके चाहनेवालों ने
तस्वीर में बदल दिया
आपको
अभी तो ठीक से
सुबह भी नहीं हुई थी
आपके सपनों का भारत
सपने में ही
दम तोड़ चुका था
आपके जीते जी
अब तो आप
मर चुके हो बापू
जिन्हें शक़ होता है
वे आपके पुतलों को
भूनते हैं गोलियों से
और पुरस्कृत होते हैं
आपकी निर्लज्ज संतानें
सरे आम दे रही हैं
गालियाँ आपको
आपको पिता मानने से
कर रही हैं इन्कार
उन्हें शर्म आ रही है
आपको बाप कहते हुए
फ़िलहाल
वे नए बाप की तलाश में
व्यस्त हैं
तब तक
आप चाहो तो
मुस्कुरा सकते हो
तस्वीरों में
दीपावली मुबारक
वह रोज़ मनाता है
दीपावली
आसमान की दहलीज़ पर
रोज़ टाँक देता है
एक सूरज
जलते दिये – सा
मीठी-मीठी धूप से
भर देता है
पूरी कायनात को
हर ओर रौशनी का पर्व
खिलखिलाता है
हर रोज़
दिया बुझने बुझने को हो
तो पूरे आँगन में
सजा देता है
छोटे छोटे
रंगबिरंगे
करोड़ों-अरबों दिये
बहुरूपिये चाँद के संग
रातभर
झरता है अमृत
सारे आसमान से
सभी पर
कोई भी नहीं वंचित
न कोई अछूता
उसकी दीपावली
सबकी है
हर रोज़
पर कितने हैं
जो मना पाते हैं
दीपावली उसके साथ
और कितने हैं
जो करते हैं इंतज़ार
अपनी दीपावली का
जो होती है
सिर्फ़ अपनी
और सिर्फ़ अपनों की
जिसमें
कोई जगह नहीं
दूसरों के लिए
मारे जाएँगे
(प्रिय कवि राजेश जोशी से प्रेरित)
जो बोलेंगे
वे तो मारे ही जाएँगे
वे भी मारे जाएँगे
जो चुप रहेंगे
जो गाएँगे
विरुदावलियाँ
पढ़ेंगे क़सीदे
चाटेंगे तलवे
बचेंगे वे भी नहीं
आग की दुकान खोले
बसे हैं बीच बजार
एक हों
या हों हज़ार
जलेगी उनकी भी होली
विवेकहीन होती है आग
कुछ मरेंगे जलकर
कुछ मारकर
जलाए जाएँगे
जो जुलूस में शामिल हैं
वे तो मरेंगे ही
जो छिपे आरामगाहों में
एक रोज़
वे भी मारे जाएँगे
मारे जाने से ठीक पहले
कुछ लोग होंगे ज़िंदा
पर जो पहले से ही मरे हैं
वे भी मारे जाएँगे
हूबनाथ, Email: hubnath@mu.ac.in
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