1 – मौत से पहले
मौत से आँखें मिला कर
चलने से पहले
इतना तो बन जाऊँ क़ाबिल–
मौत भी मुझे मार न सके
जिन्दा रहूँ मैं, सबके दिल में।
मौत से न डरती मैं, डरती जिंदगी से
पाप पुण्य के मेले में न रह जाऊँ किसी कोने में।
मौत से न डरती मैं, डरती जिंदगी से
जो अन्याय को पहचान कर
चुपचाप सह लेती है,
उफ़ तक नहीं करती, क्या यही जिंदगी है ?
मौत भी हमें प्यार से गोद में भर लेती है
ऐसी जिंदगी किस काम की
जो मौत से पहले मार देती है ?
अन्याय अत्याचार तब होता है
जब आप सहते हो दोस्तो!
अन्याय बलात्कार तब होता है
जब आप ना लड़ते हो दोस्तो!
खुदको खड़ा कर सामना करो
उसका, जो आप को रास्ता दिखाने
से पहले छीन लेता है,
जिंदगी सड़ने का नाम नहीं लड़ने है नाम
मौत से डरने से क्या होता है? जिंदगी से लड़ो।
2 – आक्रोश
अंधेरा चीर कर सूरज निकला
शरीर से उसके ख़ून की बूँदें टपक रही थीं।
कुछ बूँदें धरती पर छिड़क गयीं
धरती की आँखें आंसुओं से भर आईं।
दिल चीर कर निकाला
बिलख-बिलख कर रोने लगी।
हवा रुक गई, बादल थम गए
पेड़-पत्तों ने हिलने से इन्कार कर दिया।
सागर लहराना भूल गया,
पक्षियों ने उड़ना छोड़ दिया।
पर मानव को एहसास तक नहीं हुआ,
अपने देश में ख़ून ख़राबा चलता रहा,
अत्याचार बलात्कार सहता रहा
अन्याय के आगे सिर झुका दिया,
पेड़-पौधे काटता रहा
अपनी बर्बादी पर आप दस्तख़त करता रहा।
धरती माँ रो रही है,
बच्चों का भविष्य को देख रही है
मैया यशोदा की तरह दंडित करती
तो क्या मानव को अहसास होता?
सहने की भी हद होती है, माँ भी अब बेबस है
सब्र का बाँध टूट गया, वायु में जहर फैलने लगा
नदी ने रास्ता बदल दिया, रेगिस्तान में बाढ़ आई
गाँव, शहर पानी से भर गए।
ये कैसा युग आया?
सागर में प्रबाल हुए, ग्रीष्म ने अनल बरसाए –
ठंडी ने कोहरा फैलाया।
बढ़ रही है और बढ़ती रहेगी ये बर्बादी
न जाने कहाँ होगा इसका अंत
ये तो मानव है, प्रकृति की नज़ाकत को समझे
माँ की मूलतत्व की कद्र करे।
आगे बढ़े, जरूर बढ़े, प्रकृति का नाश न करे
जगत का कल्याण करे व सच्चाई की रक्षा करे।
यही कुर्बानी धरती माँ के लिए
कपूर होगा, आरती होगी
यही कुर्बानी दिया बनकर
हम सब को रास्ता दिखाएगी।

