1
जानता हूं
एक पेड़ जो कुम्हलाए जा रहा है
हरा न होगा
सूखती नदी अब फिर वैसी
भरी न होगी
हवा उतनी भीगी न होगी
कि सुकून की नींद आ सके
न वो सुबह होगी जब पहले की तरह
हुमक कर कह सकें
यह दिन हमारा है
लेकिन हम मरते हुए जीने को यहीं होंगे
2
कभी-कभी
वे आपको अपने और सिर्फ़अपने लिए
अपनी तरह से चाहते हैं
आप जैसे हैं और चाहते हैं
वे समझना नहीं चाहते
उन्हें आप पागल और सनकी लगते हैं
सिद्ध करने की कोई भी कोशिश
बदल देती है तुम्हारी मूल पहचान
तुम जैसे भी बदलो मत अपने आपको
तुम हवाओं के विरूद्ध चलते हो
साथ न दे कोई तब भी चलते रहो
3
चांद रोज़ एक नये रुप में होता है
वह रोज़ के लिए न श्रृंगार करता है
न कभी इस बारे में सोचता है
उसके भीतर के काले धब्बों के बावजूद
आप प्यार करते हैं उसे
मैं तुम्हे चांद पुकारता हूं
4
इतने मूड्स हैं बहार के
तुम्हारा एक ही
अब है इसी में
हमारी गुज़र
हमारी भी अपनी ज़िद
अब हम बदलने से रहे
5
तुमने प्यार किया
वह पल अविचल हो गया
तुमने अधरों पर कविता लिखी
वह मेरे भीतर अमर हो गयी
तुम्हारी आंखें भीगीं
और एक नदी मेरी पलकों पर सूखी नहीं
तुम मुझसे झगड़ीं
और मैं अपने भाग्य पर इतराया
तुमने मुझे बिन झगड़े छोड़ दिया
मैं इंतज़ार में वहीं हूं ,वैसा ही
कागा जब बोलता है मुंडेर पर
मैं खिड़की नहीं दरवाज़ा खोलता हूं
6
पहले हर पल याद करते थे
तेरी ख़ुशी के लिए
अब तेरी यही ख़ुशी
कि भूल जाएं
तो हर पल भूलने की कोशिश में
वादाफ़रोश होते हैं
बहुत सुंदर! बहुत सुंदर!
लीलाधर मंडलोई जी की कविता ‘साथ न दे कोई तब भी’ कविगुरु रबीन्द्रनाथ ठाकुर की ‘जोदि तोमार डाक न सुने केउ तो तुमि एकला चोलो रे’ की तरह एक प्रेरक व आह्वानपरक कविता है। ‘कागा जब बोलता है मुंडेर पर/ मैं खिड़की नहीं दरवाज़ा खोलता हूं’ कविता-पंक्ति में अब भी गांव की स्मृति, संस्कार, संस्कृति व सरोकार बचे हुए हैं। अन्य
कई बातें भी मार्मिक हैं। बधाई। — डाॅ. रवीन्द्र प्रसाद सिंह ‘नाहर’, दिल्ली