1 – प्रेम: भावनाओं की भौतिकी
हमारे प्रेम में छिपी है वही जटिलता
वही रहस्य
जैसे परमाणु की गहराई में उलझे सवाल
और मैं
डूब जाता हूँ तुम्हारी भावनाओं में
वैसे ही
जैसे ओपेनहाइमर डूबता था भौतिकी के रहस्यों में।
तुम्हारा व्यवहार
कभी-कभी बहुत परेशान करता है
जैसे ओपेनहाइमर को
नैतिकता के प्रश्न करते थे
तुम तक पहुँचने के रास्ते भी
उलझे हुए हैं
जैसे ओपेनहाइमर को
गुजरना पड़ता था
अमेरिकी सुरक्षा एजेंसी के कठोर सवालों से।
तुम जब बन जाती हो
भौतिकी की एक पहेली
एक जटिल एहसास
जो जल्दी नहीं सुलझता
तब मैं हर बार
ओपेनहाइमर बनकर खोजता हूँ
तुम्हारी भावनाओं की उलझनों का
जीतने वाला एकमात्र उत्तर।
2 – मैं तुम्हारा विरोधी नहीं
मैं विरोधी नहीं तुम्हारा
बस हर बात न स्वीकारता
मैं भी लड़ता जाति की दीवारों से
यही सत्य मैं धारण करता।
तुम्हारे संग अंधविश्वास का झंडा उठाता
पर मूर्ति में श्रद्धा का दीप जलाता
बुद्ध, पेरियार, अंबेडकर, राव का मैं भी पूजक
समता और शिक्षा का मैं भी अनुरागक।
पर ईश्वर का मैं नहीं विरोधी
आस्था में देखता कुछ और ज्योति
प्रेम का मैं भी समर्थक
पर संस्कारों का मान भी रखता हूँ।


प्रतीक!आपकी दोनों कविताएँ अच्छी लगीं।
1 – प्रेम: भावनाओं की भौतिकी!
भौतिकी जैसे नीरस विषय से प्रेम को जिस तरह आपने तौला है वह काबिले तारीफ है! लगता है आप विज्ञान के विद्यार्थी हैं और विज्ञान के सूत्रों के माध्यम से प्रेम को तौलने का प्रयास किया है। निष्कर्ष न जाने क्या होगा! बहरहाल इस कविता को पढ़ते हुए हमारे चेहरे पर तो मुस्कुराहट आई। भौतिकी बेहद नीरस और मस्तिष्क का विषय है जबकि प्रेम हृदय की वस्तु है। सामंजस्य भौतिकी के सूत्रों के माध्यम से कैसे बैठेगा?यह आप ओपेनहाइमर के सिद्धांतों के माध्यम से हल कर पाएँगे! प्रयास जारी रहे।
2-मैं तुम्हारा विरोधी नहीं
आपकी दूसरी कविता काफी गंभीर है। आपके संस्कार और मर्यादाएं आपके साथ हैं जो आपको अनुशासित करते हैं। संस्कारों का सम्मान करना पसंद आया।
दोनों ही कविताओं के लिए आपको बहुत-बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएँ भी।
सादर प्रणाम Ma’am
मैं यह देखकर बहुत हुआ कि आपको मेरी कविता बहुत अच्छी लगी। आपके द्वारा की गई टिप्पणी मेरे लिए बहुत उत्साहजनक है। बहुत बहुत धन्यवाद आपका Ma’am..
प्रतीक… आपकी कविता जीवंतता को दर्शा रही है,, बस यूं ही लिखते रहिए!!