Wednesday, May 22, 2024
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शोभा प्रसाद की तीन कविताएँ

1 – शीत बड़ी भरमावत पूनम
शीत बड़ी भरमावत पूनम ,व्याकुल ताक़त नार नवेली ।
चंद्रमुखी यमुना तट ढूँढत ,लालिम चूनर भावन चोली ॥
धीर धरावत कोउ नहीं अब ,चैनन खोवत है सुकुमारी ।
घूँघट के पट खोल रही अब ,चूभ रही नथनी बड़ भारी ॥
आवन साँवरे प्राणप्रिये सुन ,बाजत कानन कुंडल डोले ।
कानन मंगल गीत सुनावत ,पायलिया छनके कुछ बोले ॥
लाल महावर पाँव सुहावन ,कंगन मोतिन चंद्रक मोहे ।
चंचल मंजुल रूप लुभावन ,अंजन जो मृग नैनन सोहे ॥
लाल गुलाल सुहावन सुंदर ,अंबर प्रीत लुटावन चाहे ।
धीर धरे मन डोलत आकुल ,व्याकुल खोवत चैनन काहे ॥
श्याम सुदर्शन साँवरे मोहक ,गूंज उठी अब है शहनाई ।
मंद चली जब डेग धरे तब ,देख धरा चुपके शरमाई ॥
2 – एक आशा झिलमिलाती है कहीं
राह कितनी  हो कठिन पर  दूर मंज़िल  है नहीं ।
हर कदम पर  एक आशा  झिलमिलाती  है कहीं ॥
लक्ष्य साधो  मान कर यह  जीत तेरी  ही रहे ।
दीप आशा  की जले तो  तेल बनकर  तप सहे ॥
आँधियों को  रोक लो तुम  बाजुओं के  ज़ोर से ।
साथ रख विश्वास को पर  दूर रहना   शोर से ॥
राह कितनी  हो कठिन पर  दूर मंज़िल  है नहीं ।
हर कदम पर  एक आशा  झिलमिलाती  है कहीं ॥
पर्वतों को  लाँघ कर तुम  मुस्कुराते   बढ़ चलो ।
हार हो या  जीत हो पर  सिर झुकाकर मत ढलो ॥
राह कितनी  हो कठिन पर  दूर मंज़िल  है नहीं ।
हर कदम पर  एक आशा  झिलमिलाती  है कहीं ॥
हिम्मतों के  ज़ोर से हर  व्याधि सहते  बढ़ चलो ।
हर अमावस  रात सौ-सौ  जुगनुओं-सी  तुम जलो ॥
राह कितनी  हो कठिन पर  दूर मंज़िल  है नहीं ।
हर कदम पर  एक आशा  झिलमिलाती  है कहीं ॥
ग़र निराशा   साथ होगी   साँस भी घुटती कहीं ।
मौत ग़र आए नहीं तो   आस छूटेगी नहीं ॥
राह कितनी  हो कठिन पर  दूर मंज़िल  है नहीं ।
हर कदम पर  एक आशा  झिलमिलाती  है कहीं ॥
3 – अपराजेय 
मैं काल हूँ कराल हूँ ,नियमन-दीवार हूँ ।
मोहमाया  से  दूर ,निरंतरता- दीदार हूँ ॥
अबूझ  अपरिमित  और  अपराजेय  हूँ ।
अज्ञात अनंत अभंग ,सृष्टि का ध्येय हूँ ॥
न छल से न बल से ,न बुद्धि के ज़ोर से ,
कौन मुझे जीत सका तूफ़ानी-शोर से ?
न आफ़त न विपत्ति ,न रंजिश न रंजित ,
न जीत न हार से ,आसक्त-तिरस्कृत ॥
बहता हूँ दरिया-समंदर की लहरों पर ,
दुनिया के नक़्शे,खूबसूरत शहरों पर ।
कभी बवंडर सुनामी ,कोरोना बीमारी ,
कहीं बनकर रक्षक,कहीं बन शिकारी ॥
अबूझ  अपरिमित  और  अपराजेय हूँ ।
अज्ञात अनंत अभंग,सृष्टि का ध्येय हूँ ॥
कभी चंचल हूँ,पतंग की ढीली डोर हूँ ,
मोहिनी दुनिया की ,बेबसी घनघोर हूँ ।
माँझी की कश्ती का जुल्मी हूँ साहिल –
घोर निशा की मैं स्वर्णिम-सी भोर हूँ ॥
कोई प्रशंसा करता है मेरा आसक्ति में ,
कोई कलंकित करता मुझे विरक्ति से ।
मैं तो पाप-पुण्यों का ,किंचित् फल हूँ ,
कहीं मुस्कां की रज़ा ,कहीं विफल हूँ ॥
अबूझ  अपरिमित  और  अपराजेय हूँ ।
अज्ञात अनंत अभंग,सृष्टि का ध्येय हूँ ॥

नामशोभा प्रसाद 
शिक्षा– –बी..ऑनर्स (राजनीतिक विज्ञान)
व्यवसाय- -Ex.Properietor ,
सम्मान- -“राष्ट्रपति अवार्ड” (प्रेसीडेंट्स गाइड)
प्रशस्ति पत्र – अनेक साहित्यिक मंच द्वारा प्रदत्त 
1200 से अधिक,विविध प्रशस्ति पत्र,बुक ऑफ वर्ल्ड रेकौर्ड-8, OMG -1 रेकौर्ड इत्यादि ।
पुस्तक – अनेक साझा संकलन काव्य लहरी, काव्य संग्रह
कई समाचार पत्रों एवं ब्लॉग इत्यादि में प्रकाशित मेरी अनेकों रचनाएँ ।
जन रामायण ( महाग्रंथ) ,कृष्णायण ( महाग्रंथ)
शिवायन ( महाग्रंथ अप्रकाशित अभी )।
ई-बुक – डेढ़ साल से लगातार हर माह 12 से अधिक पुस्तकें ।
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2 टिप्पणी

  1. आपकी तीनों ही रचनाएँ अच्छी हैं शोभा जी!
    पहला-छंद श्रंगार के माधुर्य भाव से ओत-प्रोत।
    दूसरी-“एक आशा झिलमिलाती है कहीं” यह कविता हमें बहुत पसंद आई ।हर स्थिति में सकारात्मक सोच के साथ उम्मीद की किरण जगाती बेहतरीन कविता है यह।
    तीसरी कविता-अपराजेयता! यह कविता हौसले, दृढ़ निश्चय, आत्मविश्वास ,की कविता है ।इंसान अगर ठान ले तो क्या नहीं कर सकता ।इस दृढ़ विश्वास के साथ यह उत्साह और हौसले की कविता है।
    बेहतरीन रचनाओं के लिए बहुत-बहुत बधाइयाँ आपको।

  2. मैं निशब्द हूँ ,इनायत ईश्वर की तो है ही , आपसब की भी है ।हौसला आफ़ज़ाई के लिए तहे दिल से धन्यवाद !
    शोभा प्रसाद

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