(1)
घर की मल्लिका
………………………
तीन दिनों के लिए गई है
इस घर की मल्लिका
और ये तीन दिन कर्फ्यू के दिन हैं।
इन तीन दिनों में कोई न आना
उसके पीछे…
कि इन तीन दिनों में यह घर
फर्श पर फैले मैले, मुचड़े कपड़ों
जूठे, गंधाते बरतनों उतरे चेहरों
और रुकी और थकी-थकी बासी हवाओं
में गुम हो चुका है।
सब कुछ है यहाँ मौजूद
पर सब पर तारी उदासी की एक सतर
जो होंठों से उतरती ही नहीं।
अलबत्ता इस सारी टूटन और उदासियों में
आर-पार गुजरता एक ही सुख
जो टहल रहा है
किसी राहत वैन की तरह यहाँ से वहाँ…
कि तीन दिन बीतते ही वह लौटेगी
वह जो इस घर की रानी है महारानी
और उसके एक दृष्टिपात से
यह रुका-रुका, थका घर
अपने पहियों में लगी जंग और जकड़न छुड़ाकर
फिर चल पड़ेगा अपनी सदाबहार लय-चाल में…
उदासियों की गाढ़ी सतर को तिर्यक् काटते हुए।
*
(2)
बेटी जो गई है काम पर
बेटी गई है बाहर काम पर…
ओ हवाओ, उसे रास्ता देना
दूर तक फैली काली लकीर-सी वहशी सड़को,
तनिक अपनी कालिख समेटकर
उसे दुर्घटना से बचाना।
भीड़ भरी बसो,
तनिक उस पर ममता वारना
उसे इस या उस या उसके वाहियात स्पर्शों
और जंगली छेड़छाड़ से बचाना।
बेटी गई है बाहर काम पर
दिशाओ, चुपके से उसके साथ हो लेना
और शाम ढले जब तलक
वह लौटकर आती नहीं है घर,
खुद को उजला और पारदर्शी बनाए रखना।
दिल्ली शहर के शोर, धुएँ
और पागल कोलाहल,
थोड़ी देर को थम जाना
ताकि बेटी जो गई है बाहर काम पर
शाम को
ठीक-ठाक, उत्फुल्ल मन घर लौटे।
न हो मलिनता,
न चिड़चिड़ेपन का बोझ
उसकी कोमल आत्मा के गीले कैनवास पर…
तनिक ध्यान रखना हवाओ,
दूर तक फैली सड़को
और दिल्ली शहर के अंतहीन कोलाहल,
थोड़ी देर के लिए अपने भब्भड़ को समेटकर
उसे रास्ता देना…
ताकि बेटी जो गई है बाहर
लौटे तो उसकी चाल में
लाचार बासीपन का बोझ नहीं,
चलने और बस चलते चले जाने की उमंग हो।
अलबत्ता अभी तो बेटी घर से बाहर
गई है काम पर
और दिल बुरी तरह धक-धक कर रहा है।
*
(3)
नन्ही किट्टू के लिए एक पभाती
उठो मेरी प्यारी किट्टू, उठो और जरा आखें खोलो
देखो तो बाहर कितना उजला सा सबेरा है
द्वार पर झन-झन करती किरणें सूरज की दस्तक दे रही हैं
चिड़ियाँ किट्टू-किट्टू कहकर प्यार से पुकारती हैं तुम्हारा नाम
हवा तुम्हारे माथे पर बिखरे बालों से खेलती
अचानक खिलखिलाकर हँस पड़ी है
लो, अभी-अभी फिर किसी ने पुकारा तुम्हारा नाम
लो, अभी-अभी फिर किसी ने आवाज दी है
किट्टू, किट्टू, मेरी प्यारी किट्टू—हवा में गूँजता है तुम्हारा नाम
शायद एक नन्ही सी चंचल गौरैया आई है तुम्हें उठाने
उठो प्यारी किट्टू, उठो और जरा आँखें खोलो
सूरज काका तुम्हें बाँहों के झूले पर झुलाने के लिए आ गए
पापा एक मखमली ऊँटनी लाए हैं तुम्हें घुमाने के लिए
उठो और जरा बैठकर उस पर एक चक्कर लगाओ तो प्यारी छुटकू
मम्मी ने गोटे वाली ओढ़नी बनाई है खुद अपने हाथों से
पहनो और जरा नदी के पानियों में देखो तो अपनी परछाहीं
जरा देखो तो, द्वार पर खड़ा घोड़ा हिन-हिन करके स्वागत गान
गा रहा है भला किसके लिए
भूरी कुतिया पूँछ उठाकर पूछती है बार-बार—क्या जागी नहीं किट्टू,
कब आएगी वह मेरे साथ खेलने?
चंचल गौरैया पूछती है, किट्टू मेरे साथ तो जरूर खेलेगी ना?
उठो और खेलो लाडली किट्टू, रोज-रोज के अपने प्यारे दोस्तों से
उठो सब तुम्हारे लिए द्वार पर बैठे हैं
उठो और खेलो
उनके साथ दौड़ो, उछलो-कूदो और यों ही गुलगपाड़ा मचाते हुए
अचानक छुपमछुपाई वाले किसी परदे में छिप जाओ
और वहीं से आवाज लगाओ कि जरा ढूँढ़ो तो मुझे, मैं यहाँ…!
उठो मेरी प्यारी किट्टू, उठो और जरा आखें खोलो तो सही
देखो ये सबके सब तुम्हारे लिए आकुल हैं
देखो तो जरा किस-किस को प्रतीक्षा है तुम्हारी
किस-किस ने आतुर होकर पुकारा तुम्हारा नाम
आओ जरा देखो तो बाहर कौन-कौन हैं तुम्हारे इंतजार में
आओ और देखो तो जरा कि यह भोर का नरम-नरम सा
मखमली उजाला,
यह ओस धुली फूलों की हँसी
यह कोयल की कूक और तितली की बाँक भरी मुसकान
तुम्हारे, बस तुम्हारे लिए है
चिड़ियाँ बस तुम्हारे लिए गा रही हैं सुरीली भोर के गान
फूल खिले हैं बगिया में तुम्हारे, बस तुम्हारे लिए…
उठो, उठो, मेरी प्यारी बच्ची, जरा आँखें खोलो,
कि एक नई सुबह सज-धजकर और गुलाबी फ्रॉक पहनकर
आई है तुम्हारे लिए,
उठो…और मुसकराकर उसका स्वागत करो…
उठो और हँसो और हँसो
और हँसी खुशी से भर दो झोली
कि दुनिया की सब खुशियाँ तुम्हारे, बस, तुम्हारे लिए हैं
मेरी नन्ही प्यारी किट्टू।
जरा उठो और आँखें खोला प्यारी किटू,
कि बाहर कितना खिला-खिला सा उजला सवेरा
तुम्हारा इंतजार कर रहा है
बुला रही हैं तुम्हें चिड़ियाँ—
नन्ही शैतान तुम्हारी दोस्त सहेलियाँ
बुला रही भूरी कुतिया
बुला रहे लान में उगे हँस-हँस पड़ते गेंदे और गुलाब…
उठो मेरी प्यारी किट्टू
उठो और आँखें खोलकर देखो तो जरा
सुबह का यह अलमस्त नजारा।
(4)
एक बूढ़े मल्लाह का गीत
अपनी थकी हुई पुरानी नाव खेता
मैं देख रहा हूँ अपने इर्द-गिर्द नन्ही-नन्ही किश्तियाँ
बड़ी ही चंचल, शरीर और अलमस्त किश्तियाँ कागज की
जो लहरों पर लहर होकर बढ़ी जा रही हैं
इस बुलंद हौसले के साथ कि जैसे कभी रुकेंगी ही नहीं,
नहीं थमेंगी कहीं भी…
और नदी-नालों और समुद्रों की छाती पर हो सवार
विजेता बनकर लौटेंगी एक दिन
वे कागज की किश्तियाँ हैं
नन्हे हाथों के नन्हे इरादों से बनी
पर उनके भीतर ताजा मन, ताजी इच्छाओं
के हैं बहुरंगे पुष्पगुच्छ और मोरपंख गर्वीले
उनके खिले हुए चेहरों की हँसी
हजार घातक तूफानों पर भारी
वे प्रलय के तूफानों पर हँसकर सवारी कर सकती हैं
कि जैसे यह भी हो कोई खो-खो नुमा दिलचस्प खेल
इस अथाह समंदर की हिचकोले खाती विशाल छाती पर
मैं देख रहा हूँ नन्ही-नन्ही किश्तियाँ
और खुश हूँ
कि अब जबकि मैं समेट रहा हूँ अपनी जिंदगी का आखिरी पाल
और हसरतों से देख रहा हूँ अपना बूढ़ा चप्पू
तब हजारों हजार किश्तियाँ ये
हवाओं से मीठी छेड़छाड़ करती
चली जा रही हैं एक बेपरवाह धुन में
अलमस्त
असीसें निकलती हैं भीतर से
जियो…जियो मेरे अनगिनत बेटो, बेटियो
कि हमारी हारी हुई लड़ाइयाँ, खीज और टूटन…
तुम्हारे हाथों में बन जाएँ
अमोघ अस्त्र, ढाल और कवच
कि तुम विजेता होकर लौटो
वहाँ-वहाँ से भी, जहाँ हम हारे…
अपने संशय, अविश्वास और कौशल की कमी से।
नदी किनारे के हरे-भरे बूढ़े पेड़
तुम्हारे आगे हरे पत्तों का बंदनवार सजाएँ
और जब तुम लौटो अपनी गर्वीली विश्वयात्राओं से
तो बिछाएँ तुम्हारी राह में महकते फूलों के कालीन
तब यह बूढ़ा मल्लाह शायद न रहे
पर इस बूढ़े मल्लाह का बूढ़ा चप्पू
नदी के एक किनारे पर उपेक्षित पड़ा
टूटते सुर में
नए युग के नए आने वाले विजेताओं का
विजय-गीत गा रहा होगा…
गाता रहेगा धीरे-धीरे टूटकर बिखरने तक
(5)
खाली कुर्सी का गीत
अब सिर्फ खाली कुर्सी पड़ी है
सन्नाटे में
बिसूरती आने-जाने वालों को।
आदमी जो इस पर बैठता था चला गया
और अब खाली कुर्सी बिसूरती है आने-जाने वालों को
कभी-कभी टुकुर-टुकुर देखती है हर आगत को
और फिर हबसकर रोने लगती है।
आदमी था तो सब था
लोग भी बातें भी हँसी-खुशी और हँसने-गाने के साज भी
बातें भी चर्चाएँ भी
किस्से और कहानियाँ भी
गुजरे और आने वाले कल की तमाम हलचलें भी…
वह आदमी था तो सब था
भरी रहती थी बैठक
लोगों की रौनक और अंतहीन बातों के कोलाहल से।
आदमी
जो इस कुर्सी पर बैठता था
खुशमिजाज था
और उसके इर्द-गिर्द हमेशा एक महफिल सी रहती थी
वह बोलता था तो गुजरे हुए समय की दास्तान
सुनाई पड़ती थी उसकी बातों में
समय की घंटियाँ बजती थीं
और खिलखिलाहटों में बदल जाती थीं…
आदमी था तो बहुत से वादे थे
नए-पुराने
बहुत सी लंबी-चौड़ी बहसें और योजनाएँ…
किताबें थीं और किताबों की पूरी एक दुनिया।
इस कुर्सी के इर्द-गिर्द हँसते थे ठहाके
गाता था प्रेम
नाचती थीं किताबें
और हवा में थरथराते थे शब्द
बहुत कुछ था जो जिंदा था और जिंदादिली से भरा।
और तब कुर्सी भी इन गरमजोश बातों और बहसों
और मीठे ठहाकों में
जिंदा हो जाती थी
किसी जिंदा आदमी की तरह
और जाने कब आदमी की तरह खुलकर बतियाने लगती थी।
आज उस पर बैठने वाला आदमी
नहीं है
तो नहीं हैं गरजजोश बातें न बहसें न वादे न योजनाएँ…
और हवा में दूर-दूर तक उड़ते ठहाके भी नहीं
अब महज एक कुर्सी है
खाली-खाली चुप्पी में सिमटी
बिसूरती हर आने-जाने वाले को।
इस पर बैठने वाला आदमी चला गया तो
जैसे सब चला गया…
और बच गया बस कुर्सी का एक खाली-खाली गीत।
प्रकाश मनु, 545 सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008
मो. 09810602327
ईमेल – [email protected]

प्रकाश मनु जी की पांच कविताओं को पढ़ने और गुन कर आनंद लिया।
पहली कविता ही गृह स्वामिनी के वर्चस्व की बात बड़े ही सरस अंदाज़ में करती है,यथा
अपने पहियों में लगी जंग और जकड़न छुड़ाकर
फिर चल पड़ेगा अपनी सदाबहार लय-चाल में…
उदासियों की गाढ़ी सतर को तिर्यक् काटते हुए।
दूसरी रचना में बेटियों की फ़िक्र है और आज के माहौल की सत्यता से दो चार कराते हैं और कैसा वातावरण हमें अपनी बेटियों को देना चाहिए उसी की बानगी भी बताते हैं।
लाचार बासीपन का बोझ नहीं,
चलने और बस चलते चले जाने की उमंग हो।
वहीं एक बाल साहित्यकार की सहजता के भी दर्शन उनकी इस कविता में बालसुलभ अंदाज़ में अपना असर दर्शाते हैं।
कब आएगी वह मेरे साथ खेलने?
चंचल गौरैया पूछती है, किट्टू मेरे साथ तो जरूर खेलेगी ना?
उक्त पांचों रचनाओं के सृजनकर्ता और पुरवाई पत्रिका परिवार , दोनों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई हो।
उठो और खेलो लाडली किट्टू, रोज-रोज के अपने प्यारे दोस्तों से
अब महज एक कुर्सी है
खाली-खाली चुप्पी में सिमटी
बिसूरती हर आने-जाने वाले को।
अरे वाह भाई सूर्यकांत जी। आनंद आ गया। आप कविताओं के मर्म तक पहुंच गये। आभार, बहुत-बहुत आभार!
स्नेह, प्रकाश मनु
पांचवीं रचना खाली कुर्सी का गीत बेहद बहुत गंभीर रचना है और
दुनिया है फ़ानी दर्शन का यथार्थ बताती है।
अब महज एक कुर्सी है
खाली-खाली चुप्पी में सिमटी
बिसूरती हर आने-जाने वाले को।
कहीं न कहीं आज की सियासत को आईना दिखाती है कि कहीं सारी की सारी शकुनि कृत
जतन कुर्सी के खालीपन में रच बस जाएं।
आपकी रचना को देख ,,,चंद सतरें मन में आईं
काश के सियासत भी सूफियाना हो जाए
उसके जिस्म में भी दिल का आशियाना हो जाए
तो आम आदमी की ज़िंदगी भी कुछ शादियाना
हो जाए।
वाह, सुंदर! क्या कहने भाई सूर्यकांत जी।
आपकी इस गहरी-गहरी सी संवेदना को सलाम,
जो चीजों को देखती तो है, पर देखते-देखते
उनके पार चली जाती है।
मेरा स्नेहाशीष,
प्रकाश मनु
आदरणीय प्रकाश मनु सर(बाबूजी)
सादर प्रणाम,
आपकी कविताएं,जीवन के अनुभवों को गहराई से स्पर्श करती हैं।सुख,दुःख, हर्ष, विषाद, चिंता,वात्सल्य न जाने कितनी भावनात्मक अनुभूतियाँ के.सफर पर कभी कोमल भावनाओ का जादू बिखेरती तो कभी ,गुदगुदाती, बच्चो सी निश्छलता में डूबे मन में प्यारी किट्ट को याद करती, ये कविताएं मन को मोहती हैं।पहली कविता जो गृहस्वमिनी के घर पर न रहने से पूरे घर में व्याप्त उदासी नीरवता को अभिव्यक्त करती हैं,जहां कभी जीवन था जीवंतता थी ,घर का कोना कोना जागता था,आज वो समूचा परिदृश्य उन पलों को याद करता है,जब इस घर की जिंदगी लौटेगी।
सब कुछ है यहाँ मौजूद
पर सब पर तारी उदासी की एक सतर
जो होंठों से उतरती ही नहीं।
अलबत्ता इस सारी टूटन और उदासियों में
आर-पार गुजरता एक ही सुख
जो टहल रहा है
किसी राहत वैन की तरह यहाँ से वहां।
दूसरी कविता में काम पर गयी बेटी के लिए एक पिता की चिंता है,जो अभिभूत करती है।वर्तमान स्थितियों में जहां बेटियाँ घर से बाहर असुरक्षित महसूस करती हैं,वहां उसके घर लौट आने तक पिता का मन आशंकित, चिंतित और उदास भी है,वह विनती करते हैं दिशाओं से ,कि तुम उसके.साथ रहना ,उसे अकेले नहीं छोडना,यह कविता सचमुच भावरस में बहा ले जाती है,जहां आज हर माता पिता का मन सशंकित रहता है।-बेटी गई है बाहर काम पर
दिशाओ, चुपके से उसके साथ हो लेना
और शाम ढले जब तलक
वह लौटकर आती नहीं है घर,
खुद को उजला और पारदर्शी बनाए रखना।
नन्ही किटटू को जगाती प्यारी रचना बहुत अच्छी लगी।कवि.प्रकाश मनु जी का बाल कवि का रुप अत्यंत मोहक,आत्मीय और वात्सल्य भरा है।न जाने क्यों इस रचना को पढते समय मुझे सोहनलाल द्विवेदी जी की याद आई *उठो लील अब आंखें खोलो,पानी लायी हूं मुंह धो लो*।उतनी ही कोमलता,लगाव और एक स्नेहिल आत्मीयता झलकती है इस रचना में जहां जागने पर किटटू अपनी सुंदर दुनिया को देख पायेगी,,उसके खिलौने उसकी भूरी कुतिया, गुनगुन करती चिडिया सूरज की स्वर्णिम किरणें सभी प्रतीक्षित हैं उसके लिए–उठो मेरी प्यारी किट्टू, उठो और जरा आखें खोलो
देखो तो बाहर कितना उजला सा सबेरा है
द्वार पर झन-झन करती किरणें सूरज की दस्तक दे रही हैं
चिड़ियाँ किट्टू-किट्टू कहकर प्यार से पुकारती हैं तुम्हारा नाम
अगली रचना अपने विमर्श में एक गांभीर्य चिंतन और अनुभवों की पड़ताल करती नजर आती है।एक बूढे मल्लाह का गीत ,रचना निराशा के बीच उम्मीद की एक किरण को तलाशती,अपनी आशावान भावनाओ को अभिव्यक्त करती रचना है।जीवन के अंतिम प्रहर में जब वह सारे खट्टे-मीठे अनुभवों से गुजर कर आने वाली पीढियों से एक उम्मीद रखता है वह बूढा नाविक कि वे उसकी तरह जीवन से हारेंगे नहीं,बल्कि जीवन के संघर्षों की अथाह नदी को अपने संकल्प और विश्वास से पार कर जायेंगे।ये नावें ,किश्तियाँ, कागज की ही सही,पर एक हौसला और उम्मीद तो जगाती ही हैं कि वे हारेंगें नहीं।यह गीत मर्मस्पर्शी है,भावुकता से भरा है,मेरी पलकें भी भींगी,कई बार। अद्भुत सृजन। *अपनी थकी हुई पुरानी नाव खेता*
*मैं देख रहा हूँ अपने इर्द-गिर्द नन्ही-नन्ही किश्तियाँ
बड़ी ही चंचल, शरीर और अलमस्त किश्तियाँ कागज की
जो लहरों पर लहर होकर बढ़ी जा रही हैं
इस बुलंद हौसले के साथ कि जैसे कभी रुकेंगी ही नहीं,
नहीं थमेंगी कहीं भी…
और नदी-नालों और समुद्रों की छाती पर हो सवार
विजेता बनकर लौटेंगी एक दिन*
अंतिम रचना खाली कुर्सी से जुडी अनगिनत अपेक्षाओं,उपेक्षाओं का सजीव आकलन है। कुर्स है तो उसका रुतबा है अहमियत है पर जब उस पर बैठने वाला चला गया तो वह अस्तित्व हीन हो गई है।कभी इसी कुर्स ने अनगिनत विवादो, विमर्शों,को जन्म दिया था। आज व्यक्ति नहीं है तो खाली कुर्सी का दायित्व बोध भी नहीं रहा–
आदमी था तो सब था
लोग भी बातें भी हँसी-खुशी और हँसने-गाने के साज भी
बातें भी चर्चाएँ भी
किस्से और कहानियाँ भी
गुजरे और आने वाले कल की तमाम हलचलें भी।
बहुत सुंदर सृजन, और सार्थक भी।हार्दिक बधाई, अशेष शुभ कामनाएं,मंगलकामनाए आपको।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर, झारखंड,
नमस्कार सर
आपकी कविताओं ने सचमुच वास्तविकता को जीवंत कर दिया।
बहुत ही हृदय स्पर्शी और मार्मिक शब्दों में पिरोया है आपने इन सभी लघु कविताओं को।
पढ़कर अत्यंत अच्छा लगा।
सादर
दीपमाला, फरीदाबाद।
आपकी पाँचों कविताएँ पढ़ीं बाबूजी! सभी अलग-अलग रंग की, लेकिन सभी के रंग बेहद गहरे और चटक।आपकी पहली कविता *”घर की मल्लिका “* गृह लक्ष्मी के प्रति है। घर को व्यवस्थित रखने का उत्तरदायित्व गृह लक्ष्मी बहुत अच्छे से निर्वाहित करती है। एक लंबे समय के बाद वह घर की जरूरत बन जाती है और गृह स्वामी को उन स्थितियों में रहने की आदत।
पारिवारिक जीवन समझौते के तहत चलता है ।महिला घर का भार संभाल लेती है, भले ही वह जॉब क्यों ना करती हो तो भी वह अपने दोनों उत्तरदायित्व को भली-भांति निभा लेती है ऐसी स्थिति में अगर उसे एक-दो दिन के लिए भी कहीं जाना पड़े तो उसके न रहने पर घर अस्त-व्यस्त हो जाता है।
उसकी अनुपस्थिति में घर और घर मालिक की जो स्थिति होती है उसका यहाँ पर बहुत अच्छे से वर्णन किया गया है।किस तरह एक-एक पल भारी लगता है। किंतु यह उम्मीद आश्वस्त रखती है कि उसकी अनुपस्थिति में थका,टूटा, उदासी से भरा यह माहौल सदाबहार लय में चल पड़ेगा जब अपनी निर्धारित अवधि 3 दिन में गृह स्वामिनी वापस लौट आएगी। उसकी अनुपस्थिति में गृह स्वामी की अपेक्षा है कि कोई भी घर में न आए।
*कि तीन दिन बीतते ही वह लौटेगी*
*वह जो इस घर की रानी है महारानी*
*और उसके एक दृष्टिपात से*
*यह रुका-रुका, थका घर*
*अपने पहियों में लगी जंग और जकड़न छुड़ाकर*
*फिर चल पड़ेगा अपनी सदाबहार लय-चाल में…*
*उदासियों की गाढ़ी सतर को तिर्यक् काटते हुए।*
*बेटी जो गई है काम पर*
इस कविता में
कितनी फिक्र है बेटी की! जब बेटी काम के लिए निकलती है तो चिंताओं की छाया में माता-पिता घिर जाते हैं। कितनी -कितनी कामनाएंँ हैं बेटी के हित और फिक्र की दृष्टि से। इस कविता को पढ़कर तो सच में; आँखों के सामने काम पर जाती हुई बेटियाँ ही नजर आती रहीं। चाहे फिर वे अपनी हों या किसी की भी हों। ईश्वर सभी की बेटियों को महफ़ूज रखे घर में भी और बाहर भी। आपकी यह कविता अंदर तक दस्तक दे गई।
और सबके साथ-साथ दिल्ली की सड़कों भीड़ और माहौल की चिंता अलग।
*बेटी गई है बाहर काम पर…*
*ओ हवाओ, उसे रास्ता देना*
*दूर तक फैली काली लकीर-सी वहशी सड़को,*
*तनिक अपनी कालिख समेटकर*
*उसे दुर्घटना से बचाना।*
*भीड़ भरी बसो,*
*तनिक उस पर ममता वारना*
*उसे इस या उस या उसके वाहियात स्पर्शों*
*और जंगली छेड़छाड़ से बचाना।*
ऐसा मन हो रहा है कि पूरी कविता ही लिख दें।
और फिर देखो चिंता की इंतेहा।
*अलबत्ता अभी तो बेटी घर से बाहर*
*गई है काम पर*
*और दिल बुरी तरह* *धक-धक कर रहा है।*
नन्हीं सी, प्यारी सी किट्टू के लिये लिखी गई यह कविता तो माधुर्य रस से और ओत-प्रोत है पढ़ते हुए मन प्रफुल्लित हो उठा।
*नन्ही किट्टू के लिए एक पभाती*
हमें लगता है इस कविता में आप शायद प्रभाती लिखना चाह रहे थे और प्रभाती लिखा गया। फिर हमें लगा कि शायद किट्टू के लिए कविता है तो आपने जानबूझकर उसे पभाती लिखा होगा इसलिए हमने कोई सुधार करना उचित नहीं समझा।
भोर के प्राकट्य का इतना मनमोहक वर्णन है कि कुछ कह नहीं सकते। उस प्राकृतिक दृश्य को मानो अपने किट्टू के माध्यम से सजीव कर दिया हो।
हमें वह समय याद आया जब हमारी दया जीजी टूर पर हम लोगों को गाते हुए जगाती थीं
“जागो मोहन प्यारे” और “उठ जाग मुसाफिर भोर भई।”
आप के ह्रदय से जैसे प्रेम तो छलक-छलक पड़ता है।
*उठो मेरी प्यारी किट्टू, उठो और जरा आखें खोलो*
*देखो तो बाहर कितना उजला सा सबेरा है*
*द्वार पर झन-झन करती किरणें सूरज की दस्तक दे रही हैं*
*चिड़ियाँ किट्टू-किट्टू कहकर प्यार से पुकारती हैं तुम्हारा नाम*
*हवा तुम्हारे माथे पर बिखरे बालों से खेलती*
*अचानक खिलखिलाकर हँस पड़ी है।*
*एक बूढ़े मल्लाह का गीत*
यहाँ हमें प्रतीकात्मकता महसूस हुई है ।
यह गहरे भावों की अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति है। वृद्धावस्था युवाओं को आगे बढ़ते हुए देखकर प्रसन्न होती है ,उसे आशीष देती है उसके लिए शुभकामनाएँ प्रेषित करती हैं ।भले ही उसका अपना जीवन जैसा भी बीता हो पर इस कविता में युवाओं के लिये वही भाव महसूस हुआ।
ऐसा लगा जैसे एक बूढी और थकी हुई देह युवाओं का स्वागत करते हुए आह्वान करते हुए अपऩे शुभाशीष से स्नान करा रही हों।
*अपनी थकी हुई पुरानी नाव खेता*
*मैं देख रहा हूँ अपने इर्द-गिर्द नन्ही-नन्ही किश्तियाँ*
*बड़ी ही चंचल, शरीर और अलमस्त किश्तियाँ कागज की*
*जो लहरों पर लहर होकर बढ़ी जा रही हैं*
*इस बुलंद हौसले के साथ कि जैसे कभी रुकेंगी ही नहीं,*
*नहीं थमेंगी कहीं भी…*
*और नदी-नालों और समुद्रों की छाती पर हो सवार*
*विजेता बनकर लौटेंगी एक दिन*
*असीसें निकलती हैं भीतर से*
*जियो…जियो मेरे अनगिनत बेटो, बेटियो*
*कि हमारी हारी हुई* *लड़ाइयाँ, खीज और टूटन…*
*तुम्हारे हाथों में बन जाएँ*
*अमोघ अस्त्र, ढाल और कवच*
*कि तुम विजेता होकर लौटो*
*वहाँ-वहाँ से भी, जहाँ हम हारे…*
*अपने संशय, अविश्वास और कौशल की कमी से।*
पाँचवी कविता
*”खाली कुर्सी का गीत”*
कुर्सी के खेल भी बड़े निराले हैं। अपने आप में जीवित न होते हुए भी वह बहुत महत्वपूर्ण रहती है।
कुर्सी का महत्व उस पर बैठने वाले व्यक्ति से होता है, पद से होता है
जो कुर्सियाँ पद से जुड़ी होती हैं उन कुर्सियों पर पदाधिकारियों के अतिरिक्त और कोई नहीं बैठ सकता।
कुर्सी का महत्व उस पर बैठे व्यक्ति से ही जुड़ा रहता है। उसके सारे क्रिया कलाप उसे पर बैठने वाले से ही जुड़े रहते हैं और अगर वह कुर्सी खाली है तो वह अर्थहीन है। उसके साथ उस पर बैठने वाले की यादें जुड़ी होती हैं।
*वह आदमी था तो सब था*
*आदमी था तो बहुत से वादे थे*
*नए-पुराने*
*बहुत सी लंबी-चौड़ी* *बहसें और योजनाएँ…*
*किताबें थीं और किताबों की पूरी एक दुनिया।*
*इस कुर्सी के इर्द-गिर्द हँसते थे ठहाके*
*गाता था प्रेम*
*नाचती थीं किताबें*
*और हवा में थरथराते थे शब्द*
*बहुत कुछ था जो जिंदा था और जिंदादिली से भरा।*
*इस पर बैठने वाला आदमी चला गया तो*
*जैसे सब चला गया…*
*और बच गया बस कुर्सी का एक* *खाली-खाली गीत।*
ऐसा लगता है जैसे किसी बहुत आत्मीय के जाने पर उसकी खाली कुर्सी के लिये यह गीत लिखा गया है।
खाली कुर्सी के लिये आत्मा बिना किसी कारण के नहीं भीगती, नहीं भाव इतना छलकते।
आपकी प्रारंभिक तीन कविताएँ तो ऐसा लगता है कि सारे संसार को सुना दें, सारी गृहिणियों के लिये ,बेटियों के लिये, छोटी-छोटी बच्चियों के लिये।
सारी भावनाएँ, सारी संवेदनाएँ, उनके जितने भी स्वरूप होते हैं, जितने भी रंग होते हैं, सबको आपने होली के रंगों की तरह इन कविताओं में बिखेर दिया है।
बहुत लाजवाब कविताओं के लिये दिल की गहराइयों से आपको बधाई बाबूजी! काश आपके लेखन के इस कौशल का थोड़ा सा भी अंश हम तक आत्मसात हो पाये तो हम अपने आप को धन्य समझें।
प्रस्तुति के लिए तेजेंद्र जी का शुक्रिया और पुरवाई का आभार तो बनता ही है; इसलिए कि ऐसे -ऐसे नायाब हीरे इस समूह में हैं जिनको पाकर अपने आप को धन्य महसूस करते हैं। जिनके पैरों में लगी हुई रज के बराबर भी ज्ञान नहीं, और न ही भावनाएँ लिखते वक्त उद्वेलित हो पातीं।
तहेदिल से शुक्रिया पुरवाई समूह और समस्त संपादकीय मंडल
प्रकाश मनु जी की “घर की मल्लिका” तथा “बेटी जो गई है काम पर” बहुत वास्तविक और दिल छू लेने वाली कविताएं हैं। यह तो सत्य है कि गृहणी के बिना घर भूतों का डेरा लगता है। पत्नी कुछ दिनों के लिए मायके चली जाती है तो लगता है जैसे घर की आत्मा ही निकल गई हो। घर पर फैले मैले कुचैले कपड़े, जूठे गंधाते बरतन, गृहस्थ का उतरा चेहरा उसकी कमी को साफ महसूस करा देता है। इसी के साथ गृहणी के वापस लौटने की आस में उस घर के जंग लगे पहियों में हलचल पैदा हो जाती है। घर की गाड़ी के पहियों में लगी जंग, उदासियों की गाढ़ी सतर को तिर्यक काटते हुए आदि प्रतीकों ने उबासी भावनाओं को अच्छे से व्यक्त कर दिया है।
“बेटी जो गई है काम पर” कविता में अकेले एक पिता की चिंता नहीं है, बल्कि हर उस पिता की चिंता है जिसकी बेटियां काम पर घर से बाहर जाती हैं। काम पर गई बेटी सकुशल घर वापस लौट आए। पिता दिशाओं को, वहशी सड़कों,शोर, धुएं और पागल कोलाहल से कहता है कि बेटी के लिए तुम हानिकारक मत बनना जब तक कि वह घर न आ जाए। ये बातें, ये निवेदन एक पिता ही कर सकता है। उसमें ही इतनी हिम्मत है कि वह असंभव नियमों को भी संभव बनाने के प्रयास में कुदरती हानियों को भी अपने सापेक्ष बनाने की क्षमता रखता है। किसके लिए? अपनी बेटी के लिए।
बेटी के लिए पिता का जो डर है वह आपने अपने ही अंदाज में व्यक्त कर दिया है। आपकी यह कविता मुझे बहुत उत्कृष्ट व अनूठी लगी। इसके लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर।