बचपन को याद करूँ तो वे तिथि-त्योहार जरूर याद आते हैं, जिनमें माँ को नित नए रूपों में देखने का अवसर मिलता था। इनमें एक ‘नवान्न’ का पर्व था, जिसमें नए अन्न की रोटी या शायद पराँठा बनता था। उसमें घी डालकर चूरी बना ली जाती। अब माँ आसपास सब बेटों को बिठा लेती थी। हाथ में चूरी का एक ग्रास लिए, एक-एक कर हम सब भाइयों से पूछती थी, “चंदर, मैं नवाँ अन्न चखाँ?…श्याम, मैं नवाँ अन्न चखाँ?…जगन, मैं नवाँ अन्न चखाँ?…सतपाल, मैं नवाँ अन्न चखाँ?”
हम लोग ‘हाँ’ कहते, पर कभी-कभी माँ को तंग करने के लिए ‘न’ भी बोल देते थे। तो फिर माँ को फिर से यही सब सिलसिला शुरू करना पड़ता ओर यों माँ उस चूरी का एक-एक ग्रास खातीं और माँ के खाने के बाद फिर हमें भी वही सब मिलता। मगर इस पर्व की खासियत यह थी कि माँ भी हमारे साथ एकदम बच्ची बन जाती थीं और हम कितना भी तंग करें, उनके चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं आती थी। हम हँसते थे और माँ भी हमारे साथ बिल्कुल बच्ची बनकर हँसती रहती थीं। जैसे यह भी खो-खो जैसा कोई खेल हो।
इस उत्सव के पीछे की भावना क्या रही होगी? लगता है, यह कृषि व्यवस्था का पर्व है। घर में नया अन्न आया है। उसे अच्छी तरह धोकर, सुखाकर खाने के लिए तैयार कर लिया गया है। उसकी रोटियाँ बनकर सामने पड़ी हैं। पर नया अन्न है, तो पता नहीं कि वह कैसा हो? उसमें तनिक विषैलापन या कोई और नुकसानदायक वस्तु भी हो सकती है, जिसका हमारे स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता हो। इसलिए वह नया अन्न घर में आए और उसकी रोटियाँ पकें तो पहले बच्चे न खाएँ। घर के बड़ों को पहले उसे चखकर देखना चाहिए कि यह निरापद है कि नहीं। और अगर उसके खाने पर कोई नुकसान नहीं होता तो फिर घर के बाकी लोग भी खाएँ।
माँ बड़ी थीं, घर और रसोई की रानी थीं, इसलिए नवान्न की शुरुआत वे खुद से करती थीं। और खाने से पहले वे हम सबको सतर्क भी करती थीं, “चंदर, मैं नवाँ अन्न चखाँ?…श्याम, मैं नवाँ अन्न चखाँ?…जगन, मैं नवाँ अन्न चखाँ?…सतपाल, मैं नवाँ अन्न चखाँ?” ताकि अगर उन्हें कोई नुकसान भी होता है तो घर के सदस्य इससे वाकिफ रहें और समय पर उपचार करके उन्हें बचाया जा सके।
पर यह तो आज सोचता हूँ। उस समय तो नवान्न हम सब भाइयों के लिए एक मजेदार खेल ही था, और माँ हमारे साथ यह खेल खेलती हुई सचमुच बड़ी मोहक लगती थीं।
इसी तरह नवरात्रों के समय माँ का उत्साह देखते ही बनता था। माँ ‘खेतरी’ (घर के आले में जौ बोना, प्रतीकात्मक खेती) बड़े शौक से बीजती थीं। उसके लिए श्याम भैया खासकर खेतों से मिट्टी लाते थे। माँ ने खेतरी बोने के लिए एक अलग आला बनवा रखा था। जौ बोए जाते थे और जिस बरस माँ की यह छोटी सी खेती खूब जोरों से लहलहाती, माँ की खुशी और उमंग का क्या ठिकाना! सुबह कथा होती, आरती होती। उसमें माँ देवी माँ की बहुत सी आरतियाँ और भजन गातीं। पर मुझे उनमें एक ही पसंद था जिसमें माँ के साथ-साथ दोहराना मुझे अच्छा लगता, “नीं मैया, तेरा काँगड़ा घर चंगा…!”
इस आरती में आगे एक पंक्ति आती थी जो मुझे बड़ी पसंद थी, “नंगी-नंगी पैरीं राजा अकबर वी आया, सोने दा छतर चढ़ंदा…!” (नंगे पैरों राजा अकबर भी यहाँ आया और उसने सोने का छत्र चढ़ाया। अरी माँ, तेरा काँगड़ा वाला घर बड़ा अच्छा है!) इस आरती की हर पंक्ति के तुकांत को मैं इतना रस लेकर और इतने मजे में, बल्कि कहना चाहिए, थोड़े शरारती अंदाज में दोहराता कि गाते-गाते माँ की हँसी छूट जाती और संग-संग मैं भी जोरों से हँस पड़ता। यानी भक्ति में भी थोड़ा खिलंदड़ापन आ जाता और उसकी गंभीरता थोड़ी कम हो जाती। पर मेरी उदार विचारों की माँ को इसमें कोई आपत्ति न थी।

इसी तरह होई या अहोई भी माँ का प्रिय त्योहार था। मेरा खयाल है, उत्तर प्रदेश में इसे अहोई माता का त्योहार कहते हैं और पंजाब में होई का। और यह संतानों की कल्याण कामना का त्योहार है! बहरहाल उस दिन भी गुड़ का शीरा और डोइयाँ बनतीं। हम बच्चे कुंडा खड़काते हुए जोर-जोर से चिल्लाते, “होई…होई…होई, लै आपणा दुद्ध-पुत्तर, दे मेरी डोई…!” फिर माँ के पुकारने पर हम दौड़कर जाते और वहाँ गुड़ के शीरे में डूबी डोइयाँ खाने के बाद, लौटकर फिर चिल्लाना शुरू कर देते, “होई…होई…होई, लै आपणा दुद्ध-पुत्तर, दे मेरी डोई…!”
दुद्ध-पुत्तर क्या है, यह भला कौन जानता था? हाँ, गुड़ में डूबी आटे की डोइयाँ घर भर में—और साथ ही हमारे दिलों में भी आनंद और उल्लास भर देतीं। खेल में लीन हम बच्चे तब शायद इन चीजों को ज्यादा नहीं महसूस कर पाते थे। पर बच्चों के इस खेल के साथ ही घर भर में कैसा आनंद लहलहा उठता है, इसे वे स्त्रियाँ खूब अच्छी तरह समझती थीं और उनके खुशी से दमकते चेहरों पर महसूस किया जा सकता था।
और करवा चौथ का तो नजारा ही कुछ और था। सुबह-सुबह बड़े अँधेरे ही खासी चहल-पहल से हम बच्चों की नींद खुलती। उठकर देखते तो साथ वाले कमरे में बढ़िया-बढ़िया पकवानों से सजी थालियाँ लिए भाभियाँ। खूब हँसती, बातें करती और साथ-साथ थोड़ा-बहुत खाती हुई। उनके बीच माँ, मानो किसी राजमहिषी के-से गौरव से भरी हुई नजर आतीं।
मैं अचानक वहाँ पहुँचकर मजाक करते हुए कहता, “अच्छा, तो चोरी-चोरी खाया जा रहा है!” इस पर भाभियों सहित माँ खूब जोरों से हँसतीं। और कहतीं, “अच्छा चल, तूँ वी खा लै…!”
शाम को करवाचौथ व्रत की कथा होती तो आस-पड़ोस की स्त्रियाँ सज-धजकर हमारे घर आतीं और माँ की कथा शुरू होती। उस कथा की कोई और बात तो मुझे याद नहीं। बस, एक लाइन जरूर याद है, जो मुझे तब अपनी विचित्र ध्वन्यात्मकता के कारण बहुत आकर्षित करती थी कि “जेहड़ी राणी हाई, ओह गोली हो गई ते जेहड़ी गोली हाई, ओह राणी हो गई…!” (यानी जो रानी थी, वह दासी बन गई और जो दासी थी, वह रानी बन बैठी!) इन शब्दों में पता नहीं ध्वन्यात्मकता का कैसा जादू है कि आज भी इन्हें दोहराते ही मानो माँ और घेरे में बैठी स्त्रियों का पूरा ‘कथा-संसार’ भीतर-बाहर से मेरे आगे खुल पड़ता है।
कुछ और भी छोटे-मोटे व्रत-त्योहार थे। इनमें एक ठेठ देशी किस्म का त्योहार बासी खाने का भी था जिसे ‘बेवड़े’ या ऐसा ही कुछ कहा जाता था। मेरा खयाल है, उसी को कहीं-कहीं ‘बासड़े’ भी कहते है और यह होली के कुछ ही रोज बाद आता है। और अगर मैं गलत नहीं हूँ तो इसी को कहीं-कहीं शीतला माता के व्रत या त्योहार के रूप में मनाया जाता है। जिस दिन त्योहार होता, उससे एक रात पहले आलू के ढेर सारे पराँठे बनाकर रख लिए जाते और अगले दिन हम वही खाते। उस दिन चूल्हा सुलगाने और गरम खाने की मनाही थी। क्यों भला? यानी इसके पीछे असली बात या विश्वास क्या था? इसे मैं आज तक नहीं जान पाया। हालाँकि एक मित्र ने पिछले दिनों बड़े आत्मविश्वास के साथ समझाया, कि “भाई, बेवड़े पर्व में एक प्रतीकार्थ है कि आज तुम बासी खाना खा लो, पर यह बासी खाना खाने का आखिरी दिन है। इसके बाद बासी खाना बंद। आगे से ऋतु-परिवर्तन के कारण ताजा बनाकर ही खाना चाहिए।”
यह व्याख्या सही है या गलत, नहीं कह सकता। मगर इतनी बात तय है कि पुरानी बहुत सी चीजों का प्रतीकात्मक मतलब तो है ही। उनसे नए और पुराने वक्तों की तुलना करने का आनंद भी हमारे हाथ आ जाता है।
बात त्योहारों की चल रही थी। उसी सिलसिले में याद आया, शुरू में शिवरात्रि भी हमारे परिवार में खूब जोर-शोर से मनाई जाती थी। शाम के समय आँगन में उपलों की आग सुलगाई जाती। उसके चारों ओर पानी छिड़कते हुए हम लोग परिक्रमा करते। माँ उस आँच पर मोटे-मोटे ‘रोट’ सेकतीं। नमकीन भी, मीठे भी। और वे कई दिनों तक मीठी और नमकीन लस्सी के साथ खाए जाते। मुझे याद है, मीठी लस्सी के साथ नमकीन रोट और नमकीन लस्सी के साथ मीठे रोट खाना मुझे बहुत अच्छा लगता था।
यहीं यह दर्ज करना भी शायद अप्रासंगिक नहीं कि माँ शिवभक्त थीं और उन्होंने ही मेरा नाम शिवचंद्र प्रकाश रखा था। हालाँकि इतना लंबा नाम चला नहीं और स्कूल में दाखिले के समय हैड मास्टर साहब ने खुद-ब-खुद छोटा करके उसे चंद्रप्रकाश बना दिया। पर यह बात मन में पुलक भरती है कि इस नाम में माँ की छुअन है और मेरे नाम में जुड़ा चंद्र असल में शिव के मस्तक में जड़ा चंद्रमा है।
त्योहार के दिन माँ की बनाई चीजों और खाने में पता नहीं कैसे, अनोखा रस आ जाता। यों माँ कोई असाधारण पाक-कलाशास्त्री न थीं, पर उनकी बनाई चीजों में बड़ा रस होता था। माँ के बनाए खाने की बात करें तो माँ आलू और मूली के पराँठे खूब अच्छे बनाती थीं। मक्के और बाजरे की खूब घी से तर रोटी तो शायद वैसी कोई बना ही सकता। उसे हम लोग रोटी नहीं, ‘ढोढा’ कहा करते थे। यानी मक्के का ढोढा, बाजरे का ढोढा…वगैरह-वगैरह। सर्दी के दिनों में ऐसी चीजें हमारे लिए किसी अनमोल नेमत से कम न थीं और इनके आगे पाँच तारा होटल तो छोड़िए, स्वर्ग के पकवान भी हम छोड़ सकते थे। और सर्दियों में माँ के हाथ की बनाई गुड़ और आटे की पिन्नियों के लिए तो आज भी तरसता हूँ। दुनिया की अच्छी से अच्छी मिठाई से वे मुझे ज्यादा स्वाद भरी लगती थीं।
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माँ ने याद नहीं पड़ता कि कभी पीटा हो। बल्कि पीटना तो दूर, याद नहीं पड़ता कि माँ ने कभी हलके से भी डाँटा हो। माँ को न जाने कैसा यह अजब-सा विश्वास था अपनी संतानों को लेकर कि मेरे बेटे या बेटियाँ गलत नहीं हो सकते! या वे कभी कुछ गलत कर ही नहीं सकते।…
एक छोटी सी घटना याद आ रही है—और वह होली के मौके की है। हुआ यह कि होली को मुश्किल से एक-दो दिन बाकी थे। हम सब बच्चे अपनी-अपनी पिचकारियाँ लिए मोरचों पर डटे थे। हमारे घर के सामने खुला मैदान है, जिसके चारों सिरों से चार गलियाँ निकलती हैं। यानी कोई कहीं से भी इनमें से निकलकर आ सकता था या जा सकता था। और हमारी चौकन्नी निगाहें इन चारों छोरों पर थीं। इतने में एक सज्जन ड्राईक्लीन किए हुए बढ़िया कोट-पैंट, टाई पहने हुए निकले। रोब-रुतबे और घमंड की साकार मूर्ति! अब उन पर कौन रंग डाले? सभी बच्चे डर रहे थे तो मैंने बीड़ा उठाया। मैं उस छोटे से बालदल का नायक जो ठहरा! मैं चुपके-चुपके उनके पीछे गया और फिर एकाएक अपनी पिचकारी से उन्हें छींटमछींट कर दिया।
पता लगा तो वे कोट-पेंटधारी महाशय गुस्से में फनफनाते हुए मेरे पीछे दौड़े। मैं तब छोटा सा था। दुबला-पतला और एकदम चुस्त। लिहाजा एकाएक उछलकर घर के अंदर! अब मैं सुरक्षित घेरे में था। वे सज्जन भी तेजी से घर में आना चाहते थे कि हमारे चबूतरे पर धड़ाम से गिरे।…चबूतरे पर काफी गीला रंग बिखरा हुआ था। लिहाजा जितना हमने लगाया, उससे ज्यादा रंग खुद-ब-खुद लग गया।
अब तो उनका गुस्सा और भी बुलंद। अदर आकर उन्होंने शिकायत की। माँ ने कहा, “मैं डाँटूँगी इन्हें, पर ये तो छोटे बच्चे हैं। बेटा, तू बता, तूने कौन-सी समझदारी की कि होली से एक दिन पहले यह सूट पहनकर चला आया?… तू तो इनसे भी गया-बीता है!”
सुनकर उनका पारा उतरा, शर्मिंदा हुए। बाद में माँ ने हमें समझाया कि ऐसा नहीं करते। पर दूसरों के आगे अपने बच्चों को किसी शेरनी की तरह वे बचाती थीं! और धीमे से सीख भी देती जातीं कि देखो, मुझे तुम्हारी वजह से कहीं नीचा न देखना पड़े!

