भगत सिंह के जीवन-दर्शन की महत्त्वपूर्ण कृति : मेरे भगत सिंह – डॉ. शिवजी श्रीवास्तव
मेरे भगत सिंह: लेखक – पंकज चतुर्वेदी; संस्करण -प्रथम 2026 ; पृष्ठ:324; मूल्य: रु 350/-,
प्रकाशक – पेंगुइन स्वदेश, गुरुग्राम हरियाणा.
भारत की आजादी के लिए अपने जीवन का बलिदान करने वाले क्रांतिकारियों में भगत सिंह एक ऐसे क्रांतिकारी रहे हैं, जिन्होंने अपने विचारों और बलिदान द्वारा क्रांतिकारी आंदोलन को एक नया आयाम दिया। वे केवल एक शहीद ही नहीं; अपितु एक वैचारिक आंदोलन के प्रतीक हैं। उनके जीवन और दर्शन पर अनेक विद्वानों द्वारा विविध विधाओं में अनेक पुस्तकें लिखीं गईं हैं। प्रत्येक कृति अपने में महत्वपूर्ण है; किन्तु इस विलक्षण क्रांतिकारी के चरित्र में कुछ ऐसा विशिष्ट आकर्षण है कि सब कुछ जान लेने के बाद भी लगता है- बहुत कुछ जानने को शेष है। उसी बहुत कुछ जानने की जिज्ञासा पंकज चतुर्वेदी की कृति ‘मेरे भगत सिंह’के निकट आकर संतुष्ट होती है। चतुर्वेदी जी ने भगत सिंह के साथ ‘मेरे’ विशेषण जोड़ा है, यह ‘मेरे’ ‘ अत्यंत व्यापक भाव का द्योतक है। राष्ट्र के प्रत्येक क्रांतिचेता को भगत सिंह अपने ही प्रतीत होते हैं और पुस्तक सभी ऐसे सजग पाठकों का भगत सिंह से तादात्म्य स्थापित कराती है।
पुस्तक की भूमिका में ही लेखक ने स्पष्ट किया कि भगत सिंह एक व्यक्ति से विचार कैसे बन गए। इस प्रश्न ने उन्हें इस कृति को लिखने की प्रेरणा दी। निःसंदेह यह पुस्तक इस उद्देश्य की ओर ले जाती है कि भगत सिंह एक विचार कैसे बने। इस खोज में लेखक ने भगत सिंह के जीवन से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति के नजरिये से भगत सिंह को देखा, भगत सिंह के सम्पर्क में आए प्रत्येक व्यक्ति के भगत सिंह के बारे में जो विचार हैं, उन्हें इस कृति में रख कर भगत सिंह की एक मुकम्मल तस्वीर बनाई है। स्वयं लेखक ने भूमिका में लिखा है -“यह पुस्तक केवल भगत सिंह से जुड़ी घटनाओं का वर्णन नहीं करती, बल्कि उन घटनाओं से सीधे जुड़े लोगों के अनुभवों, उनके विचारों को ऐतिहासिक और सामाजिक राजनीतिक संदर्भों में विस्थापित कर उन्हें एक जिन्दा व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है। यह उनके जीवनकाल के संघर्षो का दस्तावेज तो है ही, विचारों की व्यापक गहराई और आधुनिक दौर में उनकी प्रासंगिकता को रेखांकित करने का प्रयास भी है।”
‘पूत के पाँव पालने में’, ‘कॉमरेड्स या साथी क्रांतिकारी’, ‘राजनेता’ तथा ‘मीडिया विमर्श’ शीर्षकों से चार खण्डों में विभक्त 324 पृष्ठों की यह पुस्तक अनेक अर्थों में विशिष्ट है। इन खण्डों में क्रमशः भगत सिंह के परिवार और प्रारम्भिक जीवन से जुड़े लोगों द्वारा भगत सिंह के विषय में दी गई जानकारी है, उनके क्रांतिकारी जीवन के साथियों के भगत सिंह के विषय में व्यक्त विचार हैं। भगत सिंह की फाँसी को सजा घोषित होने से फाँसी होने के बाद तक तत्कालीन प्रसिद्ध राजनेताओं के विचारों के साथ ही देश – विदेश की मीडिया में आए उन समाचारों का वर्णन है, जो भगत सिंह की फाँसी के पश्चात् देश-विदेश की मीडिया ने प्रसारित किए थे ।
सम्पूर्ण कृति में अनेक प्रसिद्ध व्यक्तियों के स्मृति चित्र हैं, उनके अनुभव हैं, जो भगत सिंह के किसी वैशिष्टय को उद्घाटित करते हैं। जिन व्यक्तियों के साथ भगत सिंह का जुड़ाव रहा, उनमें भगत सिंह के गुरु रहे लाहौर नेशनल कॉलेज के प्रिंसिपल छबील दास का नाम उल्लेखनीय है। छबील दास जी के भगत सिंह से जुड़ाव की स्मृतियाँ उनकी पुत्री मनोरमा दीवान के माध्यम से दी गईं हैं, अन्य महत्त्वपूर्ण स्मृति- चित्रों में द्वारका दास पुस्तकालय के पुस्तकालयध्यक्ष श्री राजाराम शास्त्री के अनुभव हैं, ‘भगत सिंह के परिवार’’ के लोगों में प्रो.जगमोहन सिंह द्वारा लिया गया भगत सिंह की माँ विद्यावती का साक्षात्कार अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। सम्पूर्ण साक्षात्कार अत्यंत मर्मस्पर्शी और द्रवित करने वाला है,साथ ही भगत सिंह के भाई की कुलतार सिंह की बेटी वीरेंद्र सन्धु ने अपने आलेख में भगत सिंह के व्यक्तित्व का चित्रण बड़े मार्मिक रूप में किया है। उन्होंने भगत सिंह के व्यक्तित्व का विवेचन करते हुए लिखा है -“भगत सिंह के साहसी क्रान्तिकारी व्यक्तित्व को एक तरफ रखकर हम उनके व्यक्तित्व को स्वभाव के शीशे में देखें, तो वे एक सरस, सजीव, हँसोड़, दिल्लगीबाज, सहृदय, संतुलित और उदार मानव थे।”
वीरेंद्र सन्धु का यह छोटा सा वाक्य भगत सिंह के उस जीवंत चरित्र की झाँकी सामने लाता है, जिससे समान्य जन अपरिचित ही हैं, भगत सिंह के इस सजीव, हँसोड़ और दिल्लगीबाज़ चरित्र के अनेक उदाहरण उनके कॉमरेड साथियों के संस्मरणों में भी विद्यमान हैं, क्रांतिकारी साथी शिव वर्मा, भगवान दास माहौर,अजय कुमार घोष, विजय कुमार सिन्हा, जितेन्द्रनाथ सान्याल, यशपाल, बटुकेश्वर दत्त, दुर्गा भाभी इत्यादि साथियों के आलेख /अनुभव /वक्तव्य भगत सिंह के किसी अछूते पक्ष पर प्रकाश डालते हैं.. दुर्गा भाभी का भगत सिंह के विषय में विचार उनके विलक्षण व्यक्तित्व पर प्रकाश डालने के लिए पर्याप्त है, वे भगत सिंह को एक योगी के रूप में देखती हैं – ‘‘23 वर्ष की आयु में ही भगत सिंह ने किस प्रकार अपने को योग्य एवं अनुकरणीय बना लिया था, यह सराहनीय है। वह भावुक हृदय था, सफल लेखक और प्रभावशाली वक्ता। उसके व्यक्तित्व, व्यवहार दोनों में आकर्षण था। वास्तव में वह एक ऐसा योगी था, जो जीवन में डूबकर तैरना जानता था।’’
सारा विश्व भगत सिंह को एक दुर्द्धर्ष बलिदानी क्रांतिकारी के रूप में पहचानता है, जिसने सांडर्स का वध किया, असेंबली में बम विस्फोट किया और अंतिम साँस तक अंग्रेजी सत्ता के समक्ष एक चुनौती के रूप में खड़ा रहा। यह स्वरूप ही प्रायः इतिहास में चित्रित हुआ है; पर उसके साथ ही वह एक सामान्य नवयुवक था, उसके अंदर भी एक कोमल हृदय था, भाव लोक था और सम्पूर्ण मानवता की बेहतरी के लिए एक स्वप्न था,भगत सिंह के उस समग्र चरित्र को अनेक बिंदुओं से यह पुस्तक सामने लाती है।
पुस्तक के अंतिम दो खण्ड अत्यंत महत्त्व के इसलिए हैं; क्योंकि प्रायः भगतसिंह के बलिदान के बाद अधिकतर जीवनी लेखक इसी स्थल तक भगत सिंह की जीवनी को पूर्ण मान लेते हैं, किन्तु भगत सिंह के बलिदान के बाद विश्व में किस प्रकार की उथल – पुथल हुई, विश्व मीडिया और विश्व के बड़े नेताओं की क्या प्रतिक्रिया हुई, इसका उल्लेख प्रायः अलिखित ही रहा है। पंकज जी ने देश – विदेश की मीडिया के तत्कालीन समाचारों /टिप्पणियों को पाठकों के सम्मुख रखने का जो कार्य किया, वह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
देश और विदेश के जिन नेताओं ने भगत सिंह की शहादत को महत्त्व देते हुए अपने विचार व्यक्त किए, उनमें प्रमुख रूप से सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, मुहम्मद अली जिन्ना, ई. एम. एस. नम्बूदरीपाद, मदनमोहन मालवीय, डॉ. आंबेडकर, पेरियार,के वक्तव्य पुस्तक में संकलित हैं।
एक प्रश्न जो प्रायः जन मानस को व्याकुल करता है वह है भगत सिंह की फाँसी के समय महात्मा गांधी की भूमिका! इस विषय पर लेखक ने विस्तार से एक आलेख लिखा है, लेख के प्रारम्भ में ही लेखक ने लिखा है -“भगत सिंह और साथियों की फाँसी की जब-जब बात आती है, उस दौर में आजादी की लड़ाई के सबसे सशक्त नेता महात्मा गांधी की भूमिका पर सवाल उठते हैं”, अपनी इस बात के साथ लेखक ने तथ्यों के साथ इस बात को स्पष्ट किया है कि गांधी इस विषय पर न मौन थे और न उदासीन, इर्विन से उन्होंने इस सजा को टाल देने के लिए बात भी की थी और लगातार प्रयासरत भी थे, इस संदर्भ में गांधी के प्रयासों का लेख में सिलसिलेवार उल्लेख है; किन्तु गांधी इस प्रयास में सफल नहीं हुए,इर्विन के साथ वार्ता में वे इसे शर्त के रूप में क्यों नहीं रख सके ,उस मजबूरी का भी उल्लेख उन्होंने किया है। यह आलेख गांधी की भूमिका को प्रश्नांकित करने वालों को कुछ उत्तर उपलब्ध कराता है।
देश विदेश के तमाम अखबारों में उस समय छपी खबरों और टिप्पणियों को भी पुस्तक में पूरे एक खण्ड में देने से भगत सिंह की शहादत से वैश्विक स्तर पर होने वाली हलचल का पता चलता है।
निःसंदेह यह भगत सिंह के जीवन पर लिखी एक ऐसी अमूल्य कृति है, जो भगत सिंह के जीवन के लगभग समस्त अध्यायों को खोलती है। संक्षिप्त समीक्षा में इसकी सम्पूर्ण विशेषताओं को उद्घाटित करना सम्भव नहीं है। हर क्रांतिचेता देशभक्त के लिए यह एक अनिवार्य और पठनीय कृति है। इसे पढ़ने के पश्चात महान क्रांतिकारी के जीवन से समग्र रूप से साक्षात्कार किया जा सकता है।

डॉ. शिवाजी श्रीवास्तव, ईमेल – [email protected]
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