Wednesday, July 15, 2026
होमकहानीलखनलाल पाल की कलम से - रमकल्लो की पाती : रमकल्लो कॉलेज...

लखनलाल पाल की कलम से – रमकल्लो की पाती : रमकल्लो कॉलेज जाने लगी (भाग – 18)

प्राननाथ
चरन स्पर्श।
मैं कालेज जाने लगी हूँ। पाँच-छैः दिन हो गए जाते-जाते। शुरुआत में लाज लग रही थी। वहाँ बोलने में भी झिझक होती थी। अब झिझक खतम हो गई। क्लास में लड़कियों की संख्या ठीक है। मैं उन्हीं के पास बैठती हूँ। वे सब मेरी दोस्त बन गई हैं। आपस में हम खूब बातें करती हैं। जब तक सर क्लास में नहीं आते हैं, तब तक हम चिड़ियाँ-सी चिचयात रहत। सर के क्लास में घुसते ही हम उनके सम्मान में खड़े हो जाते हैं। वे हमें बैठने का इशारा करते हैं, तो हम बैठ जाते हैं। थोड़ी देर बाद वे हमें पढ़ाने लगते हैं।
एक सर मुझे देखकर अचकचा गया था। क्या पढ़ाना है, यही भूल गया था। प्राननाथ, एक लोकगीत है- “एक की मोखें हरदी दे दे, दो की दे दे धनियाँ… बोल सुने से तोल भूल गओ, नई उमर का बनिया।”
सर भी नई उमर का है, तो बताव झिझकेगा नहीं? दो-चार दिन में वह सामान्य हो पाया था। पढ़ाने में उसका खूब मन लगता है। वह पूरे पीरियड मुझे ही देखता रहता है। छात्राएँ उसकी ओर देखने लगती हैं, तो वह मुँह फेर लेता है। मैं सब समझती हूँ कि यह मेरे बारे में क्या सोचता है। मैं इतनी बुद्धू थोड़े हूँ। मन तो कर रहा था कि कह दूँ, “पढ़ाने में ध्यान लगा, मेरी तरफ टुकुर-टुकुर न हेर।” मैंने नहीं कहा, सोचा उसे बुरा लग जाएगा। उसके अधबने चित्रों पर क्यों अपनी जुबान की कूची फेरूँ?
कालेज जाने से सरबत चाची नाराज हो रही थी। कह रही थी, “रमकल्लो ! काहे को तमाशा बगरा रही है। ये स्कूल, कालेज जाने के दिन हैं? प्राइवेट फार्म भर देती और परीक्षा दे आती।” मैंने कह दिया कि चाची, घर रहूँ या कालेज, क्या फर्क पड़ता है? रही शर्म-संकोच की बात तो एक दिन किसी न किसी को आगे आना ही पड़ेगा। चाची का रोहू तो पढ़ नहीं पाया है, वे इसी से अपनी भड़ास निकालती हैं।
चिल्लर सर बहुत अच्छे हैं। वे हमें कभी नहीं डाँटते। मुझे समझ में नहीं आता है
तो उनसे पूछ लेती हूँ। वे बता देते हैं।
मेरी जीभ को आग लगे; एक दिन मैंने उन्हें चिल्लर सर कहकर प्रश्न पूछ दिया। वे मुझे घूरकर देखने लगे। मैं अकबका गई कि पता नहीं, क्या कहने लगें। मेरी पतली हालत देखकर वे हँसने लगे थे। उन्हें हँसता देख, मेरा डर दूर हो गया था।
ये सर हमें बड़े प्रेम से पढ़ाते हैं। उनके दो दाँतों के बीच थोड़ा अन्तराल है, जिससे कभी-कभी मुँह से हवा निकल जाती है। कुछ बातें हवा में ही गोल-मोल हो जाती हैं। उनकी एक बात और बताऊँ प्राननाथ, कोई लड़की उन्हें अपनी किताब नहीं देती है। पढ़ाते समय थूक के छींटे किताब पर पड़ जाते हैं। मैं बहुत दिनों बाद समझ पाई कि वे अपनी किताबें सर को क्यों नहीं देना चाहती थी।
सर भी ये बात समझ चुके थे। अब वे अपनी किताब खुद ले आते हैं।
चिल्लर सर की एक विशेषता है कि वे हर बात पर तर्क देते हैं। क्यों ऐसा हुआ और कैसे हुआ, वे यहीं से शुरुआत करते हैं। कभी-कभी वे नकारात्मक से समझ में आने लगते हैं। मैं अच्छी तरह से समझ गई हूँ कि उनका अपना एक दृष्टिकोण है। हर विषयवस्तु को वे अपने चश्मे से देखते हैं। कभी-कभी हम उनसे सहमत नहीं हो पाते हैं।
पहले तो सुनती रहती थी पर अब मैं उनके दृष्टिकोण पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर देती हूँ। लड़कियाँ भी कम हैं क्या, वे मुझे उकसाती रहती हैं। मैं झिझकती नहीं हूँ, मुझे जो कहना होता है, कह देती हूँ। सर यथासंभव हमारी जिज्ञासा को शान्त कर देते हैं।
प्राननाथ, पढ़ाई ठीक चल रही है। सर जो बताते हैं, उसे घर आकर देख लेती हूँ। अब कोई दिक्कत नहीं है।
पढ़ाई में कितनी प्रोग्रेस हो रही है, आपको आगे बताती रहूँगी। अभी इतना ही।
आपकी
रमकल्लो
जीवन परिचय 
नाम – लखनलाल पाल 
जन्मतिथि- 2 जुलाई सन 1968 
जन्म स्थान- ग्राम व पोस्ट इटैलिया बाजा जिला हमीरपुर उत्तर प्रदेश 
शिक्षा – b.sc गणित M.A हिंदी b.ed पीएच-डी हिंदी 
प्रकाशित रचनाएं- हंस, कथादेश, कथाक्रम ,लमही ,युद्धरत आम आदमी, सृजन समीक्षा, पुरवाई आदि में कहानियां प्रकाशित। 
सम्प्रति – रमकल्लो की पाती उपन्यास धारावाहिक रूप से पुरवाई पत्रिका में प्रकाशित 
प्रकाशित पुस्तकें – बाड़ा ऋतदान, रमकल्लो की पाती (उपन्यास) पंच बिरादरी , कोरोना लॉकडाउन और लड़की (कहानी संग्रह )
 वर्तमान पता- कृष्णाधाम के आगे नया रामनगर उरई जिला जालौन उत्तर प्रदेश 28 5 001 
ई-मेल – [email protected]


RELATED ARTICLES

11 टिप्पणी

  1. ‘रमकल्लो की दिवाली

    रमकल्लो संग फेमस हुये
    उसके टीचर चिल्लर सर
    कुछ लक्षण उनमें हैं ऐसे
    जिनसे छात्रों को लगता डर।

    दो दांतों के बीच में दूरी
    बोलें तो हवा निकलती
    पान सुपारी खाये बिन ही
    थूक की छीटें बिखरतीं।

    उन्हें न देना किताब अपनी
    उसमें गिरेंगी थूक की छीटें
    वह जब सूखेंगी किताब में
    तो बन जायेंगी काले चींटे।

    रमकल्लो ने भी सब देखा
    पर उसकी है ऊंची नाक
    वह जैसे ही कॉलेज में आई
    उसकी जमने लगी धाक।

    आने लगा उसमें परिवर्तन
    पर न देती कोई रिएक्शन
    कोशिश रहती उसकी सदा
    उसमें बना रहे परफेक्शन।

    साहित्य के आदित्य पर
    जब से आई है रमकल्लो
    लोग सभी उसे जान गये
    उससे कहते हल्लो, हल्लो।

    देखो आज सजी हैं दीपों से
    छत, मुंडेर और अंगनाई
    रमकल्लो संग आप सभी को
    दीपावली की बहुत बधाई।

    -शन्नो अग्रवाल

    • आदरणीया शन्नो अग्रवाल जी, आपने रमकल्लो पर कविता लिखकर इस लेखक को दीपावली का सुंदर उपहार दे दिया है।
      परिवर्तन, रिएक्शन, परफेक्शन, हल्लो,हल्लो ये चुलबुले शब्द रमकल्लो के चुलबुलेपन को और निखार दे रहे हैं। आपके द्वारा रचित यह कविता मेरे लिए धरोहर बन गई है।
      इस सुंदर उपहार के लिए आपको हृदय से आभार व्यक्त करता हूं

  2. आदरणीय लखन लाल पाल जी
    रमकल्लो की पाती का यह हिस्सा हमें अपने महाविद्यालयीन जीवन की ओर ले गया और तत्कालीन यादों के कुछ आयाम उद्घाटित हुए ।
    महाविद्यालयीन जीवन की स्मृतियाँ हमें जीवन भर साथ सोहबत करती है और उससे हम प्रभावित होते रहते हैं।
    सह शिक्षा प्रणाली में कोई उम्रदराज व्यक्ति शरीक होता है तो स्वाभाविक रूप से उसके मन में संकोच का उभरना प्राकृतिक है जो रमकल्लो के मन में किसी जंगल की भाँति उग कर आता है।
    ऐसी अनेक बातों का चित्रण लेखक ने सफलता पूर्वक किया है
    अन्ततोगत्वा रचनाकार को बहुत बधाई और दीपावली की शुभ कामनाएँ ।
    अन्त में –
    तुम जलों हरदम वहाँ जहाँ जरूरत हो
    उजालों में चरागों के मायने नहीं होते !

    प्रो विजय महादेव गाड़े

    • आदरणीय प्रोफेसर विजय महादेव गाडे जी, पाती को पढ़कर महाविद्यालयीन जीवन की स्मृतियों का उभर आना, मेरे यथार्थ लेखन पर आपकी मुहर ही है। मैं आपके कथन को गहरे तक महसूस कर रहा हूं।
      दीपावली के पावन पर्व पर आपकी टिप्पणी का यह उपहार मेरी खुशियों को द्विगुणित कर गया है।
      आपको भी पावन दीपावली की बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं सर

  3. *रमकल्लो की पाती के निहितार्थ*
    ••••••••••
    पिछले दिनों से कुछ लिख नहीं पा रहा था। वास्तव मे लेखन भी तभी हो पता है, जब अंदर कुछ खदबदाए, खौले या फिर कहीं से कोई मीठा स्रोता (सोता) फूट पड़े…
    खैर, आज मन हुआ तो *रमकल्लो की पाती* पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहा हूँ…
    ‘स्त्री समाज की धुरी है’ इस कथ्य तथ्य को सभी स्वीकारते हैं किंतु यह स्वीकार्यता पुरुष को मन से भाती नहीं है। वह स्त्री को ‘ठगने’ के अवसर तलाशता ही रहता है। पुरुषों की इस ‘ठगई’ में उसकी पुरुषवर्चस्ववादी सोच, स्त्री के प्रति भोग्या दृष्टि और उसकी नाना प्रकार की लंपटताएँ आदि शामिल हैं।
    वर्तमान के पुरुष प्रधान भारतीय समाज में स्त्री के अस्तित्व को खो जाने का गहरा संकट पहले जितना तो नहीं रहा मगर पूरी तरह समाप्त भी नहीं हुआ है।
    *रमकल्लो* जैसे प्रगतिशील चरित्रों को सदैव संघर्षरत रहकर अपना अस्तित्व तथा अपनी सृजनशीलता (शिक्षा) आदि को सुरक्षित रखने को अपने अस्तित्व- अस्मिता के लिए पग-पग पर सचेष्ट रहना पड़ रहा है। इन विद्रूपताओं के बावजूद अब रमकल्लो कालेज जा रही है। पुरुषों के कंधों से कंधा मिलाकर चलना चाह रही है। एक प्रकार से वह पुरुष की प्रतिस्पर्धी के रूप में उभर कर सामने आ गई है। रमकल्लो का यह बदलाव स्त्री का प्रगतिगामी जिजीविषा का परिचायक है।
    कथाकार लखन लाल पाल ने बदले हुए सामाजिक संदर्भों में रमकल्लो का रिश्ता रचनात्मकता से अधिक गहरा जोड़ते हुए *स्त्री बदलाव का समाजशास्त्र* गढ़ दिया है।
    जब तक कोई भी रमकल्लो केवल स्त्री-पुरुष दैहिक संबंधों तक सीमित रहेगी, तब आम स्त्री बनकर उत्पीड़न, बलात्कार और शोषण का शिकार होती रहेगी…
    *रमकल्लो इस मिथ को तोड़कर आगे बढ़ रही है।*
    सच में, जब-जब कोई रमकल्लो समाजिक विसंगतियों को नकारती है, नाइंसाफियों को ध्वस्त करती है, तब वह अद्वितीया बनकर अपनी प्रतिभा के ध्वज फहराती दिखाई देती है…
    वरिष्ठ कथाकार आदरणीय लखनलाल पाल की स्त्री दृष्टि प्रणम्य है…

    रामशंकर भारती
    21/ 10/ 2025

  4. प्यारी बिटिया रमकल्लो
    खुस रहौ,
    तुम कॉलेज जाय लगीं यहि बात की बड़ी खुसी है। राम जी तुम का ऐसे ही आगे बढ़ावत चलैं।
    बिटिया रानी हमका ऐसा बुझाइ रहा है कि तुम बहुत तेजी से आगे बढ़ि रही हौ। तनि थमि थमि के चलौ बेटी,!
    6- 7 दिन एतने नाहीं होते कि तुम केहू के बारे में आपन राय बनाय लेव। मनई कै स्वभाव ठीक से जानै बदे कबो- कबो तौ पूरी उमिरि कम पढ़ि जात है!
    फिर तोहार तौ उमिरि अबहीं बाली ही है!
    हम तो कब्बों कालिज कै दुआर तक नाहीं देखे हैं, अब तोहार चिट्ठी पढ़ि- पढ़ि के उहां कै हाल जानै का मन है।
    सहर के कालिज मां पढै़ वाले लरिका -लरकिन कै हाल-किस्सा सुनात रहत हैं, कब्बों बढ़ियां तो कब्बों बहुतै खराब।तौ बच्ची सम्हारि सम्हारि के आगे बढ़्यौ। तोहरी उमिरि मां दस तरह के लालच मन भरमावत, आवत- जात हैं, एहर ओहर मन कां न भटकै दिहौ।अपनी राह सोझे चलते रह्यो।
    राम जी सब कुशल राखैं।

    तोहरी
    बड़की

    • आदरणीया सरोजिनी पाण्डेय जी, आपकी टिप्पणी में रमकल्लो के लिए वही ममत्व और वही सीख जो बड़की को देनी चाहिए, दिया गया है। अंत:करण से निकली यह टिप्पणी मुझे अंदर तक भिगो गई। सोचता हूं कि मैंने इस रचना को किसी अच्छे मुहूर्त में ही लिखा होगा, तभी तो पुरवाई जैसी अंतरराष्ट्रीय पत्रिका का उसे पालना मिल गया और आप जैसी बड़की का ममत्व।
      आपकी इस टिप्पणी को पढ़कर भावविभोर हो गया हूं। मैं आशा करता हूं कि आप रमकल्लो पर ऐसा ही ममत्व बनाए रखेंगी।
      भावपूर्ण टिप्पणी के लिए आपका बहुत-बहुत आभार सरोजिनी जी

  5. रमकल्लो की पाती पढ़ कर तो बहुत ही ज्यादा खुशी हुई। बहुरिया कॉलेज जाने लगी।
    बोलते समय मुँह से थूक निकलने की किसी-किसी को प्रॉब्लम रहती है। पता नहीं कैसे घर के लोग समझाते नहीं शुरू से। बचपन में ही अगर ध्यान न दिया जाए तो यह आदत आगे जाकर दिक्कत देती है,वह भी दूसरों को।
    हर शख़्स का पढ़ाने का अपना-अपना तरीका होता है।
    कुछ बातें तो बहुत अच्छी लगीं जैसे –
    जब तक सर क्लास में नहीं आते हैं- *तब तक हम चिड़िया सी चिचियात रहत।*

    पढ़कर हँसी आई-
    *एक सर मुझे देखकर अचकचा गया था। क्या पढ़ाना है यही भूल गया था।*
    लोकगीत भी बहुत अच्छी लगा-
    *एक की मोंखें हरदी दे दे*

    *दो की दे दे धनियाँ*
    *बोल सुने से तौल भूल गओ,*
    *नई उमर को बनिया।*

    रमकल्लो अब लाइन पर आ रही है।अब किसी के कहे का उस पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

    शिक्षा की यही विशेषता है कि वह विवेक जाग्रत करती है। सही और गलत को समझने का निर्णय लेने की क्षमता उसे जाग्रत होती है। और रमकल्लो इस समय उसी लीक पर है।

    इस बार पढ़ते हुए न जाने क्यों मन में यह ख्याल आया, कि यह पाती एक प्रेरणा स्रोत की तरह है उन लड़कियों के लिए जो ग्रामीण क्षेत्र से जुड़ी है आगे बढ़ने के लिए और संसार में अपने को स्थापित करने के लिये यह पाती दिशा निर्देश का काम करेगी किस-किस तरह के अवरोध आ सकते हैं और उनसे किस तरह निकलना होगा।
    पाती का मूल्य अब बेहतर खुल रहा है।

    पाती लेखन के लिये आपको और आपकी सोच को प्रणाम करते हैं।

    • आदरणीया नीलिमा करैया जी, बढ़िया टिप्पणी के लिए आपका आभार
      मनोविज्ञान में कुछ आदतें एब्नार्मल कैटागिरी में आती है, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं –
      एक घंटे से अधिक समय तक लगातार पूजा-पाठ करना, ज्यादा बोलने की आदत, वार्तालाप के समय सामने वाले को छूकर या धक्का देकर अपनी बात मनवाना तथा बोलते समय मुंह से थूक के छीटें फैंकना आदि असामान्य स्थिति मानी गई है।
      जीवन में ऐसे बहुत से लोग होते हैं। वही लोग साहित्य में भी आवाजाही करते रहते हैं। क्योंकि जीवन और साहित्य का घनिष्ठ संबंध है।

  6. रमकल्लो की पाती का यह भाग बहुत ही रोचक और स्मृतियो की.सुंदर धरोहर सा मन को छू लेता है।हमारी रमकल्लो अब कालेज जाने लगी है।उसके.मन और जीवन में शिक्षा का प्रकाश बिखर रहा है और जीवन को नये ढंग से जीने की आशावादी सोच भी विकसित हो रही है।यह बहुत सुखद है कि गांव की एक सीधी सरल प्रेम से भरी हुई लडकी शिक्षा की जोत जलाये समाज की क्रूर मानसिकता और संघर्षों से जूझने के लिए निकल पडी है। चाहे काकी का ताना कि अब बहुत हो गया ,रमकल्लो ! काहे को तमाशा बगरा रही है। ये स्कूल, कालेज जाने के दिन हैं? प्राइवेट फार्म भर देती और परीक्षा दे आती।”।
    या अध्यापक का उसके प्रति आकर्षित होना वह डरती नहीं,मन को मजबूत बनाती चलती है।
    मैं सब समझती हूँ कि यह मेरे बारे में क्या सोचता है। मैं इतनी बुद्धू थोड़े हूँ। मन तो कर रहा था कि कह दूँ, “पढ़ाने में ध्यान लगा, मेरी तरफ टुकुर-टुकुर न हेर।” मैंने नहीं कहा, सोचा उसे बुरा लग जाएगा। उसके अधबने चित्रों पर क्यों अपनी जुबान की कूची फेरूँ?
    ये प्रसंग कालेज के दिनो की याद दिला गये। सहेलियों संग कालेज के कामन रुम में चिडियों सी चहचहाहट बिखेरना ,हंसी की फुलझडियां, खूब बातें करना जैसे रमकल्लो करती है। और वह एक आम लड़की की तरह अपने प्राननाथ को भी यह सब.बताना नहीं भूलती कि वह डरे महीं,वह देख लेगी सब कुछ।

    पहले तो सुनती रहती थी पर अब मैं उनके दृष्टिकोण पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर देती हूँ। लड़कियाँ भी कम हैं क्या, वे मुझे उकसाती रहती हैं। मैं झिझकती नहीं हूँ, मुझे जो कहना होता है, कह देती हूँ।
    काश हमारे समाज और परिवेश की हर लडकी में इतना साहस और आत्मविश्वास आ पाता तो.यह समाज एक सभ्य सुसंस्कृत समाज बन पाता।आज रमकल्लो ने एक उम्मीद तो जरुर जगाई है।एक दिन यह जागृति अवश्य आयेगी। बहुत सुंदर और सार्थक सृजन के लिए हार्दिक बधाई सर।अब तो रमकल्लो की हर पाती की प्रतीक्षा रहती है। बुंदेलखंड की संस्कृति की एक सुंदर पहचान भी उभरी है आपकी कलम से ,वहां की कहावतें, जीवन शैली सभी जीवंत हो उठतै हैं।
    सादर प्रणाम सर।
    पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

    • आदरणीया पद्मा मिश्रा जी, आपने बढ़िया समीक्षा की है। इसके लिए आपका बहुत-बहुत आभार
      बच्चों के द्वारा प्रश्नचिन्ह खड़े करने की बात तो ऐसी है कि अगर वे स्वतंत्र रूप से सोचते हैं तो ऐसे वाकए आ जाते हैं।
      एक वाकया यह भी देखिए। मैं कालेज में बिहारीलाल जी के दोहे पढ़ा रहा था। उसमें एक दोहा था –
      *नर की अरु नल नीर की गति एकै करि जोय।*
      *जेतौ नीचे ह्वै चलै, तेतौ ऊंचौ होय।।*
      भावार्थ – मनुष्य की और पानी के नल की एक सी गति होती है। ये जितने नीचे होते हैं वे उतनी ऊंचाई पकड़ते हैं। नर जितना विनम्र होता है उसका सम्मान ऊंचा होता है और नल जितना नीचे होता है उसकी धार उतनी तेज होती है।
      एक बालिका ने इस पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया था। वह खड़े होकर बोली कि सर, बिहारीलाल जी का जन्म काल ( 1603 ई. से 1663 ई.) तक रहा है। तब तो नल थे ही नहीं। मतलब कुआं थे । उस समय बोरिंग का सिस्टम ही ईजाद नहीं हुआ था।
      उसके तर्क ने मुझे निरुत्तर कर दिया था। मैंने इस सत्य को स्वीकार करते हुए कहा था कि आपकी बात में लाॅजिक है। मुझे भी इसकी जानकारी नहीं है। मैं कल आपको इसका उत्तर दूंगा। यह उस समय की बात थी जब हम गूगल आदि को जानते भी नहीं थे। पर विभिन्न पुस्तकें पढ़कर मैंने इसका उत्तर खोज लिया था।

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest