गर्मियों के दिन थे और कॉलोनी में पानी की जबरदस्त किल्लत हो रही थी। लोग बार–बार नगर निगम को शिकायत कर रहे थे, मगर सुनवाई नहीं हो रही थी। जो थोड़ी–बहुत सप्लाई मिलती थी, वह पर्याप्त नहीं थी। ऐसे में लोगों में असंतोष फैलने लगा।
एक दिन कावेरी के घर के बाहर टैंकर रुकने की आवाज आई। आस–पड़ोस के लोग बाहर निकलकर देखने लगे। यह नगर निगम का टैंकर था, जिसे कावेरी ने अपने संपर्कों से बुलवाया था। पास की कॉलोनी, शालीमार सिटी, शहर की पॉश कॉलोनियों में मानी जाती थी, लेकिन पानी की समस्या वहां भी थी। वहाँ अधिकतर लोग प्राइवेट टैंकर मँगवाते थे, लेकिन कुछ परिवार मध्यमवर्गीय होने के कारण महंगे टैंकर नहीं झेल सकते थे।
कावेरी, अपने हंसमुख और सहज व्यवहार के लिए कॉलोनी में पहचानी जाती थी। चाहे कोई नेता हो, सफाई कर्मचारी या दूधवाला — वह सबके साथ समान व्यवहार करती थी। उसका यही स्वभाव था कि लोग उसे किसी भी समस्या में सबसे पहले याद करते।
शिवेंद्र, कावेरी के पति, कई बार उसे समझाते — “हर किसी से घुलने–मिलने की आदत एक दिन तुम्हें परेशानी में डाल सकती है।” मगर कावेरी पर इन बातों का कोई असर नहीं होता।
एक दिन पड़ोसन किर्ती ने आकर पूछा, “कावेरी, ये टैंकर कितने का मंगाया?”
कावेरी ने सहजता से बताया कि यह फ्री का है — नगर निगम का। पार्षद से संपर्क होने के कारण टैंकर की व्यवस्था हो पाई थी। बात फैलते देर न लगी। धीरे–धीरे कॉलोनी में अन्य घरों में भी टैंकर पहुँचने लगे। टैंकर अब हर चार–पाँच दिन में नियमित आने लगा।
कॉलोनी की समस्याएँ अब कावेरी के माध्यम से पार्षद तक पहुँचने लगीं। कई लोग तो अपने काम निकलवाने के लिए कावेरी को आगे कर देते, क्योंकि उन्हें पता था कि वह पीछे पड़कर काम करवाना जानती है। धीरे–धीरे कॉलोनी में उसकी पहचान बढ़ने लगी। लोग कहने लगे — “कावेरी को बोल दो, काम हो जाएगा।“
शिवेंद्र अब खामोश रहने लगा था। पहले वह टोकता था, अब बस अपने काम में लगा रहता।
इसी दौरान पार्षद इंदु दीदी से कावेरी का संबंध गहरा हो गया। वह अक्सर उनके साथ बैठकों में जाने लगी। पार्षद के कामकाज में मदद करने लगी। लोग कहने लगे कि अब वह चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है।
शिवेंद्र को यह सब पसंद नहीं था। उसने एक दिन कड़े शब्दों में कहा, “मैं जो काम कर रहा हूँ, उससे हमारा घर पहले भी चलता था, अब भी चल जाएगा। इस छोटे–मोटे पैसों की जरूरत नहीं है। तुम्हें जो समाज सेवा करनी है, करो, लेकिन घर को मत भूलो।”
कावेरी को लगा शिवेंद्र उसके बदलाव से जलन महसूस कर रहा है। उसने कहा, “तुम्हें मेरी तरक्की से दिक्कत है, मेरी पहचान, मेरे संपर्क, तुम्हें सब नागवार लगते हैं।”
शिवेंद्र ने चुप्पी साध ली, मगर अंदर से वह टूटने लगा था।
अब कावेरी का ज्यादातर समय कॉलोनी और दीदी के कामों में बीतने लगा। घर की ज़िम्मेदारियाँ वह अब भी निभाती थी, मगर उसका मन अब कहीं और था। एक दिन इंदु दीदी ने उसे एक पार्टी में चलने को कहा। वहाँ एक ठेकेदार भी था, जो लगातार कावेरी के आसपास मंडरा रहा था। शरबत पीते ही कावेरी को अजीब–सा महसूस होने लगा। वह बिना कुछ कहे पार्टी से निकल गई और ड्राइवर के साथ घर लौट आई।
दरवाजा खोलते ही शिवेंद्र ने गुस्से में पूछा, “पीकर आई हो क्या?” कावेरी कुछ बोल न सकी, बस जाकर सो गई।
सुबह देर से उठी तो शिवेंद्र जा चुका था। रात की घटना याद कर उसे चिंता होने लगी — क्या शरबत में कुछ मिलाया गया था?
कुछ कह नहीं सकती थी — न दीदी से, न शिवेंद्र से।
अगले दिन दीदी को भोपाल जाना था और उन्होंने ऑफिस की जिम्मेदारी कावेरी को सौंप दी। कावेरी जैसे ही ऑफिस पहुँची, कुछ देर बाद दो महिलाएँ वहाँ पहुँचीं। उन्होंने कहा, “आप पर सरकारी रकम में धोखाधड़ी का आरोप है। हमें आपके खिलाफ कार्रवाई करनी है।”
कावेरी अवाक् रह गई। उसने सफाई देने की कोशिश की मगर पुलिस उसे पकड़ कर ले गई। काफी देर बाद शिवेंद्र वहाँ पहुँचा। पूरी स्थिति समझने के बाद उसने बस इतना कहा — “कावेरी सब कर सकती है, लेकिन गलत काम नहीं।”
उसकी बात सुनकर कावेरी फूट–फूटकर रो पड़ी।
शाम तक जमानत हो गई। बच्चे सो चुके थे। शिवेंद्र ने कुछ नहीं कहा, बस ऑनलाइन खाना मंगवाया। खाने के बाद, जैसे ही बच्चे सोए, कावेरी जोर–जोर से रोने लगी।
“मुझे माफ कर दो शिवेंद्र। अब मैं संभल जाऊंगी।“
शिवेंद्र ने गहरी सांस लेते हुए कहा —
“तुम्हें थोड़ी सी पहचान और झूठी चमक ने कहीं का नहीं छोड़ा। तुम सीधी, सरल और ईमानदार औरत थीं। इसी सादगी ने सबको तुम्हें अपने हिसाब से मोड़ने दिया।
मैंने लाख समझाया, बच्चों का वास्ता दिया, पर तुम नहीं रुकीं। तुमने वापसी के सारे रास्ते खुद बंद कर लिए थे। अब मैं और तुम्हारा साथ नहीं दे सकता।”
यह कहकर वह कमरे में चला गया।
बच्चे सो चुके थे। शिवेंद्र चुपचाप अपने कमरे में चला गया।
कावेरी बालकनी में आ बैठी। हल्की हवा चल रही थी, मगर उसके भीतर सन्नाटा पसरा था। सामने वह पेड़ खड़ा था, जिसकी छांव में वह बच्चों को झूला झुलाया करती थी, जहां वो मोहल्ले की औरतों के साथ हँसी–ठिठोली करती थी। आज वो छांव भी पराई लग रही थी।
उसने आंखें मूंदी। बीते दिन एक–एक करके आँखों के सामने घूमने लगे — कॉलोनी की औरतें, टैंकर, इंदु दीदी, वह पार्टी, और अंत में पुलिस की गाड़ी…
अब समझ आया कि समाज सेवा करने के लिए सिर्फ नीयत ही नहीं, विवेक भी चाहिए।
उसे पहली बार शिवेंद्र की खामोशी में अपना प्रतिबिंब दिखाई दिया — कितना कुछ कहती है वह चुप्पी।
कावेरी उठी, और धीरे–धीरे बच्चों के कमरे में गई। दोनों सो रहे थे। उनके माथे पर हाथ रखा और फुसफुसाई —
“अब मां फिर से वही मां बनेगी, जो तुम्हारे साथ स्कूल की मीटिंग में जाया करती थी, जो दोपहर में कहानियाँ सुनाया करती थी… और जो रात को बिना मोबाइल के सिर्फ तुम्हें देखती थी।”
सुबह उसने पहला काम किया — पार्षद कार्यालय की चाबी लौटाई।
शिवेंद्र ने कुछ नहीं कहा, बस चाय का कप उसकी ओर बढ़ाया।
उस कप में कावेरी ने अपने टूटे रिश्ते की उम्मीद की भाप देखी — हल्की, मगर गरम।
तनुजा चौबे
इंदौर
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