Wednesday, February 11, 2026
होमकहानीलखनलाल पाल की कलम से - रमकल्लो की पाती (भाग 27-28)

लखनलाल पाल की कलम से – रमकल्लो की पाती (भाग 27-28)

सत्ताईसवीं पाती 
प्रचार अभियान तेज हो गया
प्राननाथ,
ब्लाक में नामांकन करा आई हूँ। परधान जी जुलूस लेकर मेरे साथ गए थे। गब्बे ने भी परचा भर दिया है। बताव ले, गब्बे गुंडा चुनाव लड़ रहा है। खुशी की बात यह है कि चुनाव मेरी तरफ केन्द्रित हो गया है। सब जगह मेरी ही चर्चा है। लोग कहने लगे हैं कि रमकल्लो ही जीतेगी, गब्बे हार जाएगा। पहले चारपटिया मुहल्ला उसी का सपोर्ट कर रहा था, इसी से लगता था कि चुनाव गब्बे के पक्ष में चला गया है। अब वह मुहल्ला मेरा समर्थन करने लगा है। परधान जी ने गोटें फिट कर दी हैं। प्राननाथ, उन्होंने लोगों से कहा था कि लोकतंत्र में किसी को भी वोट दिया जा सकता है। यह हमारा अधिकार है, लेकिन अपने मत का सही इस्तेमाल करना भी आना चाहिए। हमारे सामने दो चेहरे हैं, जो गाँव का विकास कराने में सक्षम हो, उसे ही चुनना चाहिए।
कुछ खास लोगों से उन्होंने स्पष्ट बोल दिया है कि रमकल्लो ही हमारे लिए सबसे अच्छा विकल्प है। गब्बे मवाली है। वह अपने बाप की बात नहीं मानता है, आम जनता की कैसे सुनेगा ? पाँच साल आदमी चैन से न बैठ पाएगा। रोज थाना-अदालत के चक्कर काटता फिरेगा।
सरबत चाची को लेकर गाँव में वोट माँग आती हूँ। अभी अन्य औरतों को साथ नहीं लिया है। काहे किसी को सामने लाऊँ। गाँवदारी में एक-दूसरे से सबका काम पड़ता है। मैं अकेली उनका चलावा तो नहीं चला सकती हूँ। यही सोचकर प्रचार में उनको साथ नहीं लिया है। कभी-कभी रोहू लला को भी साथ ले लेती हूँ।
गुप्त मतदान की परम्परा डालकर संविधान निर्माताओं ने अच्छा किया। अपनी पसन्द के प्रत्याशी को मत डाल दो। कोई हल्ला-गुल्ला नहीं। इस गुप्त मतदान से लोग मुझे ही जितवाएँगे। मेरा विश्वास पक्का है।
कुछ लोग जरूर हवा फैला रहे हैं कि रमकल्लो चुनाव जीत भी गयी, तो गाँव का विकास न करा सकेगी। पाँच साल सीखने में लग जाएँगे। बताव ले, पढ़ी-लिखी औरत के लिए ऐसी सोच है। मैं मानती हूँ कि सीखने में वक्त लगेगा पर इतना नहीं। दो महीने में सब सीख जाऊँगी। गब्बे के सपोर्टर यह हवा फैला रहे हैं।
उसने शराबियों की फौज इकट्ठी कर ली है। शराबी भैयन की दम पर चुनाव जीतना चाहता है। ऐसे चुनाव जीत पाएगा? इसने बहुत दाँव चलें, परधान जी ने उसके सारे दाँव काट दिए। परधान जी मुझे जितवाकर ही मानेंगे। चुनाव उनकी इज्जत का सवाल बन गया है। अब वे पीछे न हटेंगे।
प्राननाथ, मैंने कुछ परचे छपवा लिए हैं। वही परचा लोगों को बाँट आती हूँ। चुनाव-चिह्न अच्छा मिल गया है। ‘चक्की’ जिसका पीसा दुनिया खाती है। इस चिह्न को औरतें जल्दी पहचान लेंगी। वोट डालने में उन्हें दिक्कत न होगी।
मेरे प्रचार से गब्बे डर गया है। इसलिए वह उल्टा सीधा बोलने लगा है। रोहू लला के प्रचार करवाने से वह सुलग उठा है। कह रहा था कि मैं उसे रखे हूँ। कहने में उसे शरम भी नहीं है।
परधान जी कहते हैं कि रमकल्लो तेरी जीत पक्की है। एक कुन्तल लड्डुओं का इन्तजाम किए रहना। मैंने कह दिया, “परधान जी चिन्ता न करो, घर में ही बनवा लूँगी। चना घर के हैं, घी भी रखे हूँ, कारीगर को बनाई भर देनी है। चीनी की बोरी आपके यहाँ से उठवा लेंगे।” परधान जी हँस रहे थे।
प्राननाथ, मैं तो दूसरों के लिए जीना चाहती हूँ। मैंने अपने जीवन का यही उद्देश्य बना लिया  है। सरकार जिन योजनाओं के लिए पैसा भेजेगी, उन्हें पूरा किया जाएगा।
दबी जुबान मे कुछ लोग कह रहे हैं कि रमकल्लो चुनाव भले ही जीत जाए, पर प्रधानी तो परधान जी ही करेंगे। रमकल्लो तो दस्तखत भर करती रहेगी। सारी योजनाओं के पैसे परधान जी डकार जाएँगे। अपनी परधानी में खाते रहे हैं, तो इसमें कैसे छोड़ देंगे?
प्राननाथ, लोग बहुत भोले हैं। वे यह नहीं जानते हैं कि चुनाव तक परधान जी की बात ऊपर है। जीत गई, फिर वह बात न रहेगी। उनकी सलाह सिर माथे पर रहेगी, लेकिन काम मैं अपने हिसाब से करूँगी। लोगों का विश्वास थोड़े तोड़ दूँगी ? मैं अभी बहुत व्यस्त हूँ। मुझे दम मारने की फुरसत नहीं है। चुनाव जैसे-जैसे आगे बढ़ेगा, मैं तुम्हें बताती रहूँगी। ये तो पक्का समझो कि मैं इस चुनाव को निकाल ले जाऊँगी।
आप निश्चिन्त रहें।
शेष फिर
आपकी ही रमकल्लो

________________________________________________________________________

अट्ठाईसवीं पाती 
रोहू और रमकल्लो
प्राननाथ, चुनाव में बहुत दिक्कतें आ रही हैं। रोहू लला ही हैं, जो मेरा बराबर साथ दे रहा है। आग लगे, मड़ई को यह भी नहीं देखा जाता है। सबके कलेजे बरे (जले) जा रहे हैं।
गब्बे को ज्यादा कांटे उठ रहे हैं। उसके समर्थक मेरे और रोहू के सम्बन्धों पर चटखारे ले रहे हैं। बरगए, बड़े उचक्का है। उल्टा सीधा बोलकर चुनाव जीतना चाहते हैं। मैंने तो उनकी बातों पर ध्यान देना छोड़ दिया है। रोहू उखड़ जाता है। एक दिन वह गब्बे से उलझ गया था। नाटपरे ने रोहू को दो तमाचा मार दिए थे। जवाब तो वह भी दे देता, पर उसके साथ गुंडों की फौज थी। वह कुछ करता, तो उसके गुंडे उसे अधमरा कर देते। मैंने उसे शांत रहने को बोल दिया, चुनाव बाद देख लूँगी।
मैंने गब्बे को खबर भिजवा दी थी कि मेरे आदमियों को धमकाना बन्द कर दे, वरना अच्छा न होगा। ये मत भूल कि तू अभी जमानत पर बाहर है, एक रिपोर्ट में जेल के अन्दर हो जाएगा। मैं नहीं चाहती हूँ कि तू जेल जाकर फाइट से बाहर हो जाए। मैं तुझे यहीं इसी स्थिति में बुरी तरह से हराऊँगी। इस धमकी से उसने ऊधम मचाना बन्द कर दिया है।
रोहू पहले सामने आने से सकुचाता था, अब वह खुलकर मेरा समर्थन करने लगा है। मेरा भी कर्तव्य बनता है कि मैं उसे दिक्कतों से बचाऊँ। अगर लोग मेरे सपोर्टरों को डराते-धमकाते रहे, तो मेरा साथ कोई नहीं दे पाएगा। इसलिए मैंने गब्बे को
हड़काया था। उसे समझ में आ गया है।
प्राननाथ, मखना कक्का तो ठीक हैं लेकिन उसका लड़का कलुआ बहुत धुकैल है। वह यहाँ भी आ जाता है और वहाँ भी चला जाता है। कलुआ गब्बे से कह रहा था कि भैया तुम्हीं जीतोगे, रमकल्लो बेकार परेशान हो रही है। चुनाव जीत नहीं रही है, व्यर्थ में घी का पैसा फेंक रही है। बताव ले, आदमी की ये मानसिकता है।
कलुआ पहले मुझे कह रहा था कि गब्बे गुंडा है, उसे कोई वोट न देगा। अब उसके गीत गा रहा है। गब्बे उसे शराब जो पिलाता है। मुझे ऐसा चुनाव नहीं जीतना है, जिसकी बुनियाद शराब पर टिकी हो।
मैं बताऊँ प्राननाथ, हरबी मेरे साथ है, इसलिए वह मुझसे कम रुख मिला रहा है। एक दिन मुझे सलाह दे रहा था कि दो-चार पेटी शराब मंगा ले। इसके बिना चुनाव जीतना संभव नहीं है। शराबी हमेशा इसी घात में रहते हैं। मैं जानती हूँ कि वे शराब सुरककर अंट-शंट बकेंगे और लुगाइयों को पीटेंगे। इसी बात का तो मेरा विरोध है। मैं ऐसा करने लगी, तो औरतें यही सोचेंगी कि सारे प्रत्याशी एक जैसे हैं। मेरे चुनाव में खड़े हो जाने से उनमें एक आशा जाग गई है। मैं उनकी आशाओं पर पानी फेरकर पाप अपने सिर न लादूँगी।
पहले तो इन्हें विश्वास ही नहीं था कि चुनाव लड़ पाऊँगी। अब वे आश्वस्त हो गई हैं, इसलिए अपने आप मुझे बता जाती हैं कि उस ओर क्या चल रहा है। वे मुझे सावधान कर जाती हैं कि ऐसा करो, ऐसा न करो। सुबह-शाम लोगों से जरूर मिलो।
प्राननाथ, एक दिन परधान जी कह रहे थे कि रमकल्लो, मुझे दस साल लग गए चुनावी इमेज बनाने में और तूने एक ही बार में लोगों का दिल जीत लिया। उनका इस तरह से उत्साह बढ़ाना, मुझे अच्छा लगा था। जब दिग्गज ऐसा कहें, तो उसमें कुछ सच्चाई तो है। मेरे लिए यह गर्व की बात है।
माहौल अच्छा बनता जा रहा है। कल हरबी जिज्जी के घर गई थी। उसका कक्का कह रहा था कि रमकल्लो इनसे सावधान रहना, अपनी जीत के लिए ये किसी भी हद तक जा सकते हैं। हार वे बर्दाश्त न करेंगे। दोस्त कब दुश्मन बन जाएं, पता न चलेगा। अपनी आँखें हमेशा खुली रखना। मैंने बहुत से चुनाव देखे हैं। मेरी हालत देखती तो हो, खटिया पर पड़ा हूँ। थोड़ा-बहुत चल लेता हूँ। मैं सबकी जानता हूँ।
मुझे कक्का की सब बातें अच्छी लगी, पर एक बात न सुहाई। वे परधान जी से सावधान रहने को बोल रहे थे। बताव, जब उन्हीं ने खड़ा किया है, तो मेरी जीत उनकी जीत न होगी? परधान जी ऐसा कैसे कर सकते हैं? मेरी समझ में नहीं आता है कि उनके बारे में हर कोई ऐसा क्यों कहता है।
रोहू ने चौराहे पर बड़ा पोस्टर चिपका दिया है। पोस्टर में मैं सिर पर पल्लू डाले हाथ जोड़े मुस्करा रही हूँ। मैं बहुत सुन्दर दिख रही हूँ। आप आकर देखते, तो सिर फख्र से ऊँचा हो जाता।
रोहू बदमाश हो गया है। उसके बराबर चलती हूँ तो वह और स्टायल मारने लगता है। एक दिन कह रहा था कि जोड़ी अच्छी है। मैंने कहा, “भग बहायला।” उसकी बातों से कभी-कभी शर्म लगने लगती है।
खैर छोड़ो, इन बातों को। वोट डालने जरूर आना। हर एक वोट की कीमत है। आप ही वोट डालने न आओगे, तो किसकी आस करूँगी।
मेरी विनती है कि आप जरूर आना। नहीं आए तो देख लेना। प्राननाथ, बुरा न मानना। मैं तो ऐसे ही लिख देती हूँ।
शेष फिर
आपकी ही रमकल्लो
RELATED ARTICLES

1 टिप्पणी

  1. इन सत्ताइसवीं और अट्ठाइसवीं दोनों पातियों में रमकल्लो के चुनाव से संबंधित तमाम जानकारियां मिलीं। गाँव में खुले आम ऐलान हो गया है कि रमकल्लो परधानिन बनने के लिए चुनाव में खड़ी हुई है। लेकिन उधर उसका विरोधी गब्बे भी कम नहीं है। वह भी कलुआ और उसके और अपने जैसे गुंडों को शराब आदि पिलाकर अपना सपोर्टर बना कर घर-घर से वोट बटोरने के चक्कर में है। लेकिन अब लगता है कि हवा रमकल्लो के फेवर में बह रही है। परधान जी भी जोर-शोर से उसकी महिमा का प्रदर्शन करते हुए उसकी प्रशंसा में झंडे लगा रहे हैं। उनका सोचना है कि एक वही है जो चुनाव जीतने पर गांव का हुलिया बेहतर कर सकती है। और रमकल्लो भी अपनी जिम्मेदारियों को निभाने के लिए अभी से ही सपने संजोने लगी है। जैसे-जैसे दिन गुजर रहे हैं उसका आत्मविश्वास भी बढ़ता जा रहा है।

    अब वह गब्बे की हरकतों से नहीं डरती। चुनाव के प्रचार-प्रसार में रोहू उसका साथ दे रहा है। लेकिन गब्बे और उसका साथी कलुआ जो थाली के बैंगन की तरह है मिलकर रमकल्लो का नाम रोहू से जोड़कर उसे बदनाम करने पर तुला है। लेकिन रमकल्लो के पास उसका इलाज है। वह गब्बे को कोई तीन तिकड़म करने की कोशिश करते देखती है तो अक्सर उसे उसकी करनी के बारे में याद दिलाकर उसका मुंह बंद कर देती है। और फिर गब्बे दोबारा जेल जाने के डर से तिलमिला कर रह जाता है। रमकल्लो उसकी इस कमजोर नस को जब-तब दबाकर उसका पूरा फायदा उठाती रहती है।

    अब तक गांव के लोगों को रमकल्लो की काबिलियत पर शक था किंतु अब उसकी बातों से सभी स्त्रियां आश्वस्त हो रही हैं। नया सूरज निकलने के पहले ही उसकी गर्माहट गांव वालों को महसूस होने लगी है। रमकल्लो शायद मन ही मन में पुलकित होकर प्लानिंग कर रही है कि चुनाव जीतने के बाद वह गांव में सुधार और स्त्रियों की प्रगति के लिए क्या-क्या करेगी। तमाम और बातें भी होंगी जिनके बारे में उसे अभी कोई आइडिया नहीं है पर रमकल्लो जैसी सहज व बुद्धिमान लड़की उसके लिए भी तैयार है।

    परधान जी की सपोर्ट व प्रशंसा से रमकल्लो न केवल सम्मानित महसूस करती है बल्कि उसका हौसला और बढ़ता दिख रहा है। उसे अपने पर पूरा भरोसा है। और पूरी उम्मीद है कि लोग गब्बे जैसे लंपट को वोट देने की गलती नहीं करेंगे। इन दिनों वह इतनी व्यस्त है कि उसे सांस लेने की भी फुर्सत नहीं फिर भी प्राननाथ को पाती में लिखकर बताना है। साथ में उसके मन में यह उम्मीद और लालच भी है कि इसी बहाने प्राननाथ का भी एक वोट मिल जायेगा। इसलिए घर आने का अनुरोध करती है। शायद आगे की पातियों में चुनाव की और भी गर्मजोशी देखने को मिलेगी। रमकल्लो के बारे में पढ़कर गांव में हो रहे चुनाव के माहौल की मन में कल्पना कर रही हूँ।

    लखनलाल जी, रमकल्लो की हर पाती को मैने डूब कर पढ़ा है। लेखन पर आपको बधाई।

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest