इस बार पुस्तक मेले में किताबों की नहीं, लेखकों की पिकनिक तय हुई। निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया—प्रगतिशील, प्रगतिवादी, प्रतिक्रियावादी, विवादप्रिय, सर्ववादी और सर्वनाशवादी—सभी लेखक संघों ने मिलकर ठाना कि जब साल भर साहित्य में एक-दूसरे को स्वाद चखाते ही रहते हैं, तो क्यों न एक दिन सचमुच स्वाद खुद भी चखा जाए।
अध्यक्षता का भार स्वाभाविक रूप से परम श्रद्धेय परसादी लाल जी ‘जुगाड़ी’ को सौंपा गया—जो एक साथ परजीवी, बहुजीवी, बुद्धिजीवी, आलोचक, समीक्षक और विमोचक हैं। पहले उन्होंने अपनी मरणासन्न व्यस्तता का हवाला देकर आने से इनकार किया, पर प्रथम श्रेणी यात्रा-भत्ते की अग्रिम राशि ने उनमें तुरंत साहित्यिक प्राण फूँक दिए।
नियम तय हुआ—हर लेखक घर से बना खाना लाएगा। खुद न बना सके तो किसी और का उठा लाए, पर लंच बॉक्स अपना होना चाहिए। जाँच खाने की नहीं, डिब्बे की होगी। कोई अगर खाली डिब्बा लाना चाहे तो अध्यक्ष महोदय से पूर्व अनुमति अनिवार्य।
यह भी तय हुआ कि अध्यक्ष स्वयं सभी के लंच बॉक्स खोलेंगे, सूँघेंगे, थोड़ा चखेंगे और फिर बाँट देंगे। समीक्षा की खुजली भी उन्हीं को मिटानी थी, इसलिए कुछ भाग्यशाली लेखक अपने डिब्बे उन्हें सौंप देंगे—आज किताब नहीं, लंच बॉक्स ही पीठ खुजाने का साधन थे।
सब लेखक अपने-अपने डिब्बे लेकर पंक्तिबद्ध बैठ गए। अध्यक्ष महोदय भी अपना लंच बॉक्स लाए—भरा था या खाली, किसी ने देखने का साहस नहीं किया। उसे मेज़ पर ससम्मान रखा गया, अगरबत्ती जली, चरण-स्पर्श हुआ। अध्यक्ष का डिब्बा प्रतीक था—खुलने के लिए नहीं, पूजने के लिए।
वे दूसरों के डिब्बे खोलने आए थे, अपना नहीं। जिनके डिब्बे की प्रशंसा उनके श्रीमुख से निकल जाती, उनकी रेसिपी अगले सत्र की पाठ्यक्रम-सूची में तय मानी जाती। वर्षों से वे अकादमियों और समितियों में पकाकर खिलाते आए थे—अब न उन्हें खाने की ज़रूरत थी, न खिलाने की। बस सूँघना ही पर्याप्त था। सूँघ-सूँघ कर उनकी नाक कद से भी लंबी हो चुकी थी—देशी खाने को विदेशी अकादमियों में पहचान दिलाने की सूंघ-क्षमता दूर से ही सक्रिय हो जाती थी।
कई डिब्बों में बासी भोजन था, जिसकी दुर्गंध खुले मैदान में फैल रही थी। पर जैसे ही वे अध्यक्ष के हाथ में आए, चमत्कार हुआ—सड़ांध सुगंध में बदल गई। भीनी-भीनी साहित्यिक खुशबू उठने लगी।
इशारा होते ही तालियाँ बजीं। दो लेखकों के नाम पहले से तय थे। उनके डिब्बे खोले जाने का नाटक हुआ, कैमरे चमके। अध्यक्ष महोदय ने आल्हादित मुद्रा में चेहरा पाँच मिनट तक स्थिर रखा—जब तक कि फ्लैश बुझ नहीं गए।
फिर जेब से कागज़ निकला— “अहा…!” दो बूँद लार गिरीं, जिन्हें लेखक ने प्रसाद मानकर हथेली पर ग्रहण किया। अध्यक्ष बोले— “जयशंकर, महादेवी और दिनकर की टिफ़िनों से उठी अधूरी साहित्यिक भूख आज तृप्त हुई। यह व्यंजन पेट ही नहीं, मन-मस्तिष्क को भी तृप्त कर रहाहै। पुस्तक मेले हों या गोष्ठियाँ—यह मंच का सितारा बनेगा। शब्दों की इस रसोई से परंपरा जीवित रहेगी।” कहकर उन्होंने वरदहस्त रख दिया। लेखक धन्य हुआ।
दूसरे लेखक के डिब्बे पर टिप्पणी और भी रसीली थी— “यह लंच बॉक्स नहीं पूरी ५६ भोग की साहित्यिक थाली है—हर व्यंजन में कथा, हर मसाले में विचार। पहला कौर हास्य, दूसरा व्यंग्य। कहीं दर्शन, कहीं समाजशास्त्र। इसे पचाने के लिए इसके ऊपर डाली हिंगवटी भूमिका ने अद्भुतकाम किया है ।”
इतने में कुछ कुत्ते आ गए। अध्यक्ष ने डिब्बे से थोड़ा खाना उनके आगे रखा। कुत्तों ने सूँघा, मुँह मोड़ा और चले गए। खाना पड़ा रह गया।
तभी दो लेखक प्रोटोकॉल तोड़ते हुए आगे बढ़े और अपने-अपने निवाले जबरन अध्यक्ष के गले में ठूँस दिए। जुगाली करते हुए अध्यक्ष बोले— “इन डिब्बों में विविधता का अभाव है। स्वाद पुरानी किताब के पीले पन्नोंज़र्द और बासी l नाकल्पना को उड़ान, न विचार को आयाम। हर कौर धूल चाटता हुआ लगता है।” और जुगाली की लुगदी उसी डिब्बे में थूकदी।
एक और लेखक लपेटे गए— “यह डिब्बा उबाऊ कविता-संग्रह जैसा है। खाते ही खट्टी डकारेंआ जाए। न स्वाद, न चटोरापन । भूख भी इस्तीफ़ा दे दे।”
समय समाप्त हो चुका था। आयोजक ने अध्यक्ष के खाली डिब्बे में लिफ़ाफ़ा और दो रसगुल्ले रख दिए—रास्ते के लिए।
नए लेखक हार मानकर आमने-सामने बैठ गए। सबने एक-दूसरे के डिब्बे खोले, स्वाद लिया और ज़ोरदार आपसी समीक्षाएँ शुरू हुईं। कुछ की पीठ में खुजली हुई, तो पास वाला खुजाने लगा—बदले में वही सेवा इसी अनुपात मेंलौटी।
इस तरह लेखकों की स्वादिष्ट पिकनिक बिना स्वाद चखे चखाए संपन्न हुई ।
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