Wednesday, February 11, 2026
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डॉ मुकेश असीमित का व्यंग्य – हुक्का-वार्ता

चौपाल पर दो हुक्के पड़े थे। दोनों पुराने थेइतने पुराने कि इतिहास उन्हें पहचानता था, पर वर्तमान उनसे कतराता था। एक की चिलम में बीते ज़माने की राख जमी थी, दूसरे की नली में राजनीति की नमी। हवा ठंडी थी, पर माहौल में गरमाहट थीवो गरमाहट जो सिर्फ जाति और सत्ता के मेल से पैदा होती है।
हुक्का नंबर एक ने गला साफ़ किया
सुना है भाई, सरकार फिर से लोगों को उनकी जाति याद दिलाने में लगी है।
हुक्का नंबर दो ने गुड़गुड़ाहट भरी
तो इसमें नई बात क्या है? भूल गए थे क्या लोग?”
हुक्का नंबर एक भावुक हो उठा
हाँ यार, लगता है हमारे दिन फिरेंगे। एक ज़माना था जब हमारी कितनी पूछ थी! हर जाति का अलग हुक्का, अलग शान। ऊँची जात वालों के हुक्के तो जैसे राजमहल की शोभामीनाकारी, फुँदे, चाँदी की नली। जमींदार जब मूँछों पर ताव देते हुए हमें गुड़गुड़ाते थे, तो लगता था जैसे हम नहीं, लोकतंत्र चल रहा है।
वह ठहर कर बोला
और नीची जात वाले? अरे, उनका काम तो बस चिलम भरना था। हुक्का पकड़ने का हक़ नहीं, बीड़ी मिल जाए तो उसे भी मालिक की कृपा मानते थे। पंचायत में जब हुक्का पानी बंद होता था, तो आदमी नहींउसकी जात बाहर होती थी।
हुक्का नंबर दो ने सहमति में धुआँ छोड़ा
हाँ, वही दिन थे जब इंसान से ज़्यादा उसकी जात की सांस चलती थी।
हुक्का नंबर एक आगे बढ़ा
फिर धीरे-धीरे बदलाव आया। बराबरी, समानता, लोकतंत्रइन शब्दों ने हमारी चिलम ठंडी कर दी। हुक्कों का सार्वजनीकरण हो गया। अब कोई भी गुड़गुड़ा लेजिसकी सात पुश्तों ने हुक्का देखा भी नहीं, वो भी। पंचायतें ख़त्म, जमींदार गायब, शराब ने हमारी जगह ले ली। हम चौराहों की शोभा बन गएप्रदर्शनी के सामान। और जो बचे-खुचे रईसी हुक्के थे, वो म्यूज़ियम में रख दिए गएजहाँ लोग उन्हें देखकर अपनी विरासत पर रोते थे।
वह तंज़ से हँसा
कहते थे—‘ये हमारे दादा-परदादा का हुक्का है, जब चलता था तो लोग जूते सिर पर रख लेते थे।’”
हुक्का नंबर दो ने चुटकी ली
अब जूते सर पर रखे  नहीं चलाये जाते  हैं ।
हुक्का नंबर एक जैसे चौंक पड़ा
हाँ! यही तो। अब नेता हमें लेकर झुग्गियों में पहुँच जाते हैं—‘लो, गुड़गुड़ा लो हुक्का, बस वोट दे देना।थमा दिए हैं जातिगत गौरव के मांडने और फुंदे लगे हुक्के । इतिहास में दफ़न दमन की आग  से वैमनष्यता का धुआ  छोड़ा जा रहा है 
हुक्का नंबर दो प्रसन्न था
तो दुखी क्यों है भाई? देख, हमें फिर से अलग-अलग बाँटा जा रहा है। हर जाति को उसका हुक्का, हर हुक्के का अपना खेमा। अब राजनीति हुक्कों से चलेगी। जिसके पास जितने हुक्के, उसे उतने टिकट। संख्या बल का लोकतंत्रहुक्का संस्करण।
हुक्का नंबर एक की आवाज़ में डर था
यही तो चिंता है। जब हम चौराहे पर थे, तब तक ठीक था। म्यूज़ियम में सड़ जाते तो भी ग़म न था। पर अब ये बँटवाराअब हुक्के आपस में लड़ेंगे। एक-दूसरे की नली खींचेंगे, चिलम फोड़ेंगे। अफ़वाहें फैलेंगीकिस हुक्के का धुआँ शुद्ध है, किसमें मिलावट।
वह धीरे बोला
अब तंबाकू नहीं, जाति-भेद, रंग-भेद, क्षेत्र-भेद पीया जाएगा। गुड़गुड़ाहट नशा बनेगी और लोग अंधे। फिर बताओ भाईइस देश का क्या होगा?”
हुक्का नंबर दो ने अंतिम कश लिया
जो होगा, देखा जाएगा। हमारा काम तो बस गुड़गुड़ाना है। कम से कम कोई हमें याद तो कर रहा है। नाम तो ले रहा है। इस दौर में इतना ही बहुत है।
दोनों हुक्के चुप हो गए।
चौपाल पर धुआँ तैर रहा थाइतिहास, जाति और राजनीति का मिला-जुला धुआँ।
भविष्य साफ़ नहीं था, पर गुड़गुड़ाहट जारी थी।
रचनाकार –डॉ मुकेश असीमित
मेल ईद – [email protected]
Gangapur City rajasthan
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