भूखे की जाति कैसी …!
जैसे ही कार लाल बत्ती पर आकर रुकी,
एक दुबला-पतला जवान लड़का अचानक दौड़ता हुआ आया।
उसकी आँखों में थकान….,होंठ सूखे हुए…. और चेहरे पर बेबसी साफ झलक रही थी।
खिड़की के पास धीमे, लगभग टूटती हुई आवाज़ में बोला—
“साहब…कुछ मदद कर दीजिए।”
कार में बैठे व्यक्ति ने ऊपर से नीचे तक देखा,
फिर कुछ कठोर स्वर में बोला-
“भीख मांगते शर्म नहीं आती? जवान हो, कोई काम क्यों नहीं करते? हिंदू हो या मुसलमान?”
लड़के की आँखों में एक पल को अजीब-सी हरकत हुई –
दर्द, सवाल और बेबसी की मिली-जुली।
हल्की-सी मुस्कान लाने की कोशिश करते हुए बोला –
“साहब… पेट में अन्न का एक भी दाना नहीं है…तीन दिन से भूखा हूँ।”
फिर सूखे होंठों पर जीभ फेरी और धीमे से बोला-
“बेबश, भूखे की क्या जाति, कैसा धर्म…? ना मैं हिंदू हूँ, ना मुसलमान,
मैं एक भूखा इंसान हूँ। पहले कुछ खाने को दे दीजिए…
फिर आप जो काम बताएंगे, मैं करने को तैयार हूँ।”
कार के अंदर सन्नाटा छा गया। चेहरे का भाव बदल गया।
खाने को कुछ दे, ऐसा उसके पास कुछ नहीं था।
उसने जेब टटोली – दस रुपये का नोट लड़के के हाथ में रखते हुए खिड़की बंद कर ली।
बाहर सिग्नल हरा हो चुका था,
लेकिन भीतर कहीं एक सवाल अब भी लाल बत्ती पर ही अटका हुआ था-
भूख की भी कोई जाति या धर्म होता है क्या…?
….
वट पूर्णिमा
बॉम्बे कॉन्वेंट स्कूल के प्रांगण में खड़े उस बरगद के पेड़ के नीचे सजी-धजी महिलाएँ थाल लिए पेड़ की परिक्रमा करते हुए सफेद धागा बांध रहीं थीं।
ऊपर स्टाफ रूम की खिड़की से कुछ शिक्षिकाएँ यह दृश्य देख रही थीं।
पामेला डिमेलो ने उत्सुकता से पूछा –
“आज इस पेड़ में ऐसा क्या खास है, जो उसकी पूजा की जा रही है?”
“आज वट पूर्णिमा है। आज ही के दिन तपस्विनी सावित्री ने अपने पति के प्राण यमराज से वापस लाए थे…इसलिए महिलाएँ पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं और पूजा करती हैं… सात जन्मों तक वही पति मिले, ऐसी मंगल कामना करती हैं।” मिसेस देशपांडे ने समझाया
“और ये धागा?”
“बंधन… सुरक्षा… सात जन्मों का रिश्ता।” प्रियांका ने जोड़ा।
तभी जेनिफर ने बाहर देखते हुए इशारा किया –
“अरे वो देखो… हमारी स्वीपर संगीता भी पूजा कर रही है। उसका पति रोज शराब पीकर उससे लड़ता-झगड़ता है… क्या वो भी उसी के लिए सात जन्म माँग रही होगी?”
खिड़की के पास खड़ी एवं अन्य सभी शिक्षिकाएँ एक-दूसरे का चेहरा देखने लगीं।
जवाब सबके पास था…पर किसी के पास शब्द नहीं थे।
अचानक स्कूल की बेल बजी।
कविता मैडम उठते हुए बोलीं –
“चलो, क्लास का टाइम हो गया…
और हाँ –
परंपराएँ सवाल नहीं पूछतीं… बस निभाई जाती हैं।”
बाहर, संगीता उसी पेड़ के चारों ओर घूमते हुए परिक्रमा पूरी कर रही थी।
….
खाली कुर्सी
हर मंगलवार को ‘सखी किटी’ सोसायटी में जमती थी। 12 मेंबर, 12 कुर्सियां, 12 तरह की बातें।
इस मंगलवार मीना भाभी नहीं आईं। उनकी कुर्सी खाली थी।
नंदा जी बोलीं, “आजकल बड़ी भाव खा रही हैं। पिछले हफ्ते भी नहीं आईं थीं।”
सुनीता जी ने जोड़ा, “ हाँ, वॉट्सऐप पर भी सीन करके छोड़ देती हैं। पूछो तो कहती हैं,
“सब ठीक है।”
मीना की गैरहाज़िरी में उनके साड़ी कलेक्शन, नई नाइट-ड्रेस से लेकर बेटे के नंबर और नई जवान कामवाली बाई तक का पोस्टमार्टम होता रहा।
किटी खत्म होते-होते मीना का बेटा क्लब आया। आंखें लाल, हाथ में चाबी।
बोला, “आंटी, मम्मी का फोन घर में ही छूट गया था सुबह, वही लेने आया था। वो…वो हॉस्पिटल में एडमिट हैं। आज ही रिपोर्ट आई, उन्हें ब्रेस्ट कॅन्सर हो गया है। मम्मी ने मना किया था किसी को बताने से। कहा था “सखियों को परेशान मत करना’।”
12 कुर्सियां थीं। एक पर मीना का अक्स, बाकी 11 पर सन्नाटा।
नंदा जी की प्लेट में रखा समोसा ठंडा हो चुका था…. स्वाद बिगड़ चुका था।
सबके हाथों में सजी गहरी मेंहदी का रंग फीका पड़ चुका था।
उस दिन किटी के बाद कोई सेल्फी या तस्वीरें नहीं ली गई।
पहली बार 11 औरतें बिना कुछ बोले सिर्फ एक खाली कुर्सी को देख रही थीं।
….
घर की टीम का कप्तान
“सुनो जी, शाम को बाज़ार से फल, मिठाई, ड्राईफ्रूट और तीन लीटर दूध ले आना है… भूल मत जाना, लिख लो। आजकल भूलने भी लगे हो!”
रमा ने एक सांस में कहा।
“हूँ… लिखवा दो वही ठीक रहेगा… आज इंडिया-पाकिस्तान का मैच भी है।”
रमाशंकर जी कागज़ पर शब्दों से ज़्यादा जिम्मेदारियाँ दर्ज कर रहे थे।
“अनिकेत को जगा देना, उसका सेमिस्टर है… पीठ भी थपथपा देना… । कल अष्टमी है- नौ कन्याओं को बुलाना है… फूल, पान, नारियल सब ले आना है। पंडित जी दस बजे आ जाएंगे।
ऑफिस का बैग कंधे पर लटकाते हुए रमा आगे बोली, “और हाँ, गिफ्ट….वो मैं ही ले आऊँगी, तुमसे नहीं होगा।”
दरवाज़े तक जाकर वह फिर लौटी-
“खाना किचन में रखा है, गरम कर लेना… और बेटे को भी खिला देना।”
“हाँ-हाँ, सब हो जाएगा।”
रमाशंकर जी ने अनुभवी खिलाड़ी की तरह सिर हिला दिया।
रमा चली गई। घर में सन्नाटा फैल गया।
टीवी ऑन किया- मैच शुरू होने वाला था। और वे इत्मीनान से बुदबुदाए-
“हमारे घर का कप्तान तो वो ही है…
रिटायरमेंट के बाद हम तो बस ‘ड्रिंक्स ब्रेक’ में मैदान पर भेजे जाने वाले बारहवें खिलाड़ी बनकर रह गए हैं।”
….
प्रमोशन
ऑफिस में मैनेजर की एक वेकेन्सी खाली थी।
दावेदार चार थे- गुप्ता जी, सैनी जी, रश्मि जी और युवा राकेश कुमार।
बॉस को प्रभावित करने के लिए गुप्ता जी कॉफी का कप लिए प्रायः बॉस की केबिन में हाजिर रहते। सैनी जी बॉस के हर मज़ाक पर जमकर ठहाके लगाते।
रश्मि जी दिनभर बॉस की तारीफ़ और खुशामद में व्यस्त रहतीं।
और राकेश कुमार…
वह चुपचाप अपना काम करता रहता। न किसी की चमचागिरी, न किसी की बुराई।
प्रमोशन से ठीक एक दिन पहले बॉस ने चारों को बुलाया।
बोले, “कल रात कंपनी का सर्वर क्रैश हो गया। क्लाइंट्स का पूरा डेटा गायब हो गया है। दो घंटे में रिकवर करना होगा। यह बेहद जरूरी काम है।”
गुप्ता जी बोले, “सर, मैं तो आपके बर्थडे के केक और पार्टी की व्यवस्था में लगा हूँ….”
सैनी जी बोले, “सर, बर्थडे प्रेज़ेंटेशन की स्लाइड्स अभी पूरी करनी है…”
प्रमिला जी बोलीं, “सर बर्थडे सेलिब्रेशन के लिए मैं डांस और गीत की प्रैक्टिस कर रही हूँ।
उधर राकेश बिना एक शब्द बोले सर्वर रूम पहुँचा।
पैंतालीस मिनट बाद डेटा रिकवर हो चुका था।
क्लाइंट्स को मेल भी जा चुके थे।
उसी शाम को केबिन के बाहर नई नेमप्लेट लगी –
“मैनेजर – राकेश कुमार”
तीनों हैरानी से बॉस की ओर देखने लगे।
बर्थडे पार्टी में बॉस मुस्कुराए और बोले-
“चमचागिरी, चापलूसी से बॉस खुश हो सकता है, लेकिन कंपनी नहीं चलती। कंपनी उन लोगों के दम पर चलती है जो संकट आने पर बहाने नहीं, समाधान लेकर आते हैं। और यह काबिलियत राकेश में है।”
बॉस के इस निर्णय से युवा स्टाफ सबक ले रहा था।
- डॉ. रमेश यादव
डॉ. रमेश यादव हिंदी एवं मराठी के बीच साहित्यिक सेतु का कार्य करने वाले वरिष्ठ साहित्यकार, स्वतंत्र पत्रकार और बहुआयामी व्यक्तित्व हैं। मुंबई विश्वविद्यालय से एम.ए. एवं पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त डॉ. यादव ने मौलिक लेखन, अनुवाद, बाल साहित्य तथा मराठी लोक साहित्य को हिंदी में प्रस्तुत करने के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है। उनकी अब तक 18 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और उनकी रचनाएँ महाराष्ट्र के पाठ्यक्रमों में भी शामिल हैं। उनके 400 से अधिक फीचर, लेख एवं रिपोर्ट प्रकाशित हो चुके हैं।
उनकी साहित्यिक उपलब्धियों के लिए उन्हें महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी पुरस्कार, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का सौहार्द सम्मान, विश्व हिंदी सचिवालय (मॉरीशस) का काव्य पुरस्कार, कमलेश्वर स्मृति कहानी पुरस्कार तथा डॉ. राष्ट्रबंधु स्मृति राष्ट्रीय बाल साहित्य सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए हैं। संस्कृति मंत्रालय, संगीत नाटक अकादमी और केंद्रीय हिंदी निदेशालय से शोध एवं प्रकाशन अनुदान प्राप्त करने वाले डॉ. यादव साहित्य, पत्रकारिता, कला और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में निरंतर सक्रिय हैं। महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें दूसरी बार विशेष कार्यकारी अधिकारी (एसईओ) के पद पर बहाल किया है।
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