अपने मोहल्ले के इलावा आस पास के कई इलाकों में ऐसे ही नहीं जाना जाता है अम्मां को। अम्मां की खबर बहुत सटीक होती है। खास बात तो यह है कि अम्मां सब की खबर रखती है। अपनी गली में घर की सीढ़िओं के थड़े पर आ जम जाती है सुबह से ही। सुबह की चाय से लेकर शाम के समोसे-पकौड़ों का मजा लेती है वहीं बैठे-बैठे। इसी बीच दिन की चार-छह बिसनेस मीटिंग्स भी निपटा लेती है अपनी दूर-दराज की संवाददाताओं के साथ उसी खुले सभागार में। हालांकि ज्यों कोई दुकानदार गर्मी की दोपहर में ग्राहकी में मंदी होने पर कुछ घंटो के लिए दुकान बड़ा देता है, अम्मां को भी तेज धूप, बारिश, तूफान के चलते अपना कार्यालय भीतर अपने छोटे से कमरे में भी यदा-कदा स्थानांतरित करना पड़ जाता है पर वह उस समय का सदुपयोग भली-भांति कर लेती है घर वालों को दिन की जुटाई मुख्य खबरों से अवगत करा के। चाहे अम्मां ने यह जिम्मा सामाजिक परोपकार के लिए उठाया हो मगर किसी सरकारी कर्मचारी की तरह उसमें भी चौबीसों घंटे अपनी सेवाएँ प्रदान करने का जज़्बा रहता है।
अम्मां की पैनी नज़र गली में हर आने-जाने वाले का एम आर आई स्कैन कर लेती है – एक्स रे का जमाना कब का लद जो गया। पिछले साल जो कुमार साहब का अपनी नौकरानी के साथ चक्कर का पर्दाफाश हुआ था वह मौटे तौर पर अम्मां की खोजबीन और रिपोर्टिंग का ही नतीजा था। और वो जो ऊँचे फाटक वालों के घर के साथ वाले खाली प्लॉट पर पार्किंग के लिए सिर-फुटव्वल हुई थी, उसका पूरा आँखों-देखा हाल पुलिस वालों ने मौका-वारदात पे पहुँच अम्मां से ही लिया था। और वह जो लाल कोठी वालों की जवान लड़की घर से लापता हो गई थी, उसको बरामद करने में पुलिस वालों को सारा श्रेय अम्मां को ही देना होगा क्योंकि उसी ने उस लड़के की पहचान की थी जो हर रोज़ गली के चक्कर लगाता था और जिसके साथ वह दर असल भागी थी। थोड़े में कहें तो गली नम्बर 14 अम्मां वाली गली के नाम से ही मशहूर रही है।
अम्मां की नज़र से कुछ भी नहीं छुपा। कस्बे का सारा इतिहास उसके पल्लू में बंधा है। अम्मां के पति उसकी जवानी में ही चल बसे थे। पचत्तर की होने को आई अम्मा सफ़ेद सूती धोती ही पहनती है। झुर्रियों से भरे साँवले चेहरे पर गोल शीशों वाली पुराने जमाने की ऐनक का फोकस किसी रडार की तरह इतना पैना है कि वहाँ से गुजरने वाला हर कोई उससे बच के निकलने की कोशिश करता है पर मिलते-जुलते स्वभाव वाली कई औरतें, जिनके पास अम्मां की सेवाओं का फ्रैंचाइज़ है, जरूर उसके पास अक्सर आ जमती हैं और उनमें हफ्ते भर इकट्ठी की गयी महत्वपूर्ण सूचनाओं का दिलचस्प आदान-प्रदान होता रहता है। अपना महत्व और मांग बनाए रखने के लिए अम्मां बहुत कुछ तो अपने तक ही रख लेती है ताकि नियमित अपडेट् के लिए वे लौटें और इस तरह उसकी अपनी टी आर पी बरकरार रहे। हालांकि यह राज़ अम्मां की उन सारी सब-एजेंट्स से छुपा नहीं रहता पर वे उसकी वरिष्ठता का मान रखते हुए कभी कुछ नहीं जताती।
आम दिनों की तरह उस शाम भी अम्मां अपने घर के सामने थड़े पर जमी थी। उसकी जिज्ञासु नज़रें गली के एक छौर से दूसरे तक थोड़ी-थोड़ी देर बाद घूम जाती। छब्बीस नम्बर वाला मनचला लड़का हमेशा की तरह अपने घर की पहली मंज़िल के छज्जे पर बहुत देर से जमा था। अम्मां जानती थी सामने वाले घर की खिड़की पर अभी श्याम लाल की छोरी नहीं आई थी। अम्मां को वह लड़की उसकी ओबसरवेशन पोस्ट से दिखती तो नहीं थी मगर छब्बीस नम्बर वाले छिछोरे के उसके आने पर शुरू होने वाले इशारे लैला-मजनू का सारा किस्सा बयान कर जाते। इतने में ठाकुर की बहू घर से अपने छोटे बेटे के साथ निकली। अम्मां कुछ बेचैन सी हो गई। अम्मां ने ही उसके दसवीं में दूसरी बार फ़ेल होने और फिर आवारा लड़कों की टोली में शामिल हो चोरी के केस में हवालात हो आने की खबर खूब मिर्च-मसाले के साथ हाल में ही छापी थी। पास आने पर उसने अम्मां को जब अपनी गुस्सैल आँखों में लंबा उतारा तो अम्मां आँखों के साथ अपने सिर को ऊपर घुमा माथे पर चू आई पसीने की बूंदों को अपने पल्लू से साफ करने में लग गयी। पर जब ठाकुर की बहू ने उसे राम-राम बुलाया तो पल्लू के पीछे से उसके मुंह से हल्की सी कुछ खिसियानी खरखराहट ही निकल पायी। कुछ देर तक ऊपर टंगी रही उसकी नज़रें कर्तव्य की पुकार पर फिर से नीचे उतरी और माँ-बेटे को गली के छौर तक छौड़ने जा पहुंची पर वापसी पर वहीं उलझी रह गईं।
अम्मां को लगा उसे कोई मुगालता हुआ है। लड़की बिट्टी जैसी ही थी। गौर से देखा तो उसका शक यकीन में बदल गया। ट्यूशन से लौट अम्मां की पोती एक लड़के के साथ हँस-हँस कर बातें कर रही थी । लड़का बार-बार उसका हाथ पकड़ता और थोड़ी देर बाद उसने लिपट कर उसे बाय-बाय कहा। बिट्टी की पीठ अम्मां की तरफ थी पर उसके फ्लाइंग किस्स उसकी पैनी आँखों को साफ दिखाई दे रहे थे। हड़बड़ी में अम्मां उठ कर अंदर भागने को हुई कि इतनी देर में गली के दूसरी तरफ से आती पंडिताइन ने अम्मां को जोर से राम-राम ठोकी और उसी ऊँची, लटकती आवाज़ में पूछा “अम्मां, कुछ खबर है…….?” पंडिताइन ने अपने चेहरे पर चिपकी भेद भरी मुस्कुराहट से लिपटे प्रश्न चिन्ह को गुगली की तरह घूमा कर, विकेट उड़ाने के इरादे से जोर से फेंक कर मारा था। अम्मां ने बिना कोई जवाब दिये तेजी से अंदर गायब होते हुए दबी जुबान में एक मोटी मरदाना गाली के प्रहार से उसके इस बेहूदा सवाल को अपने ज़हन से उठा गली के उस पार कर दिया।
*बिमल सहगल की लघु कथा – अम्मां*
आदरणीय विमल जी
लघुकथा अम्मा पढ़ी। दूसरों के दोषों पर उँगली उठाना सहज है पर बात अपने पर आई तो अम्मा खामोश हो गईं।
लघुकथा के हिसाब से इसे थोड़ा और छोटा किया जाता तो बेहतर होता।
लघु कथा गहरी संवेदनाओं की, गहरी अनुभूतियों की कथा होती है इसमें अभिव्यक्ति की तीव्रता होती है और एक भी शब्द अनावश्यक नहीं होता।
Neelima ji,
Thanks for your critical appreciation and guidance.
Shakespeare argued rightly centuries back in his famous quote, “What’s in a name?”. Living in this modern world of innovation, experimentation under an artistic license, I believe, one need not be bound for creativity by any outdated norms or restrictive thought process just to fit it under any redundant labelling. The objective is to relate with the readers and endeavour to serve them something to their taste. They remain free, however, to ruminate and absorb the content as per their own personal classification.
Regards and best wishes,
Neelima ji,
Thanks for your critical appreciation and guidance.
Shakespeare argued rightly centuries back in his famous quote, “What’s in a name?”. Living in this modern world of innovation, experimentation under an artistic license, I believe, one need not be bound for creativity by any outdated norms or restrictive thought process just to fit it under any redundant labelling. The objective is to relate with the readers and endeavour to serve them something to their taste. They remain free, however, to ruminate and absorb the content as per their own personal classification.
Regards and best wishes,
क्या लाजवाब चित्रण हमारे आसपास गली-मोहल्ले की आम कहानी । मानवीय मनोस्थिति का सजीव और सटीक विश्लेषण। ऐसे चरित्र आम पाये जाते हैं और उन्हे भी नहले पर दहला टकरा ही जाता हैं। तब मात्र अपने बिल में घुस जाने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नही सूझता। आपकी कलम को नमन बिमल जी।