डैफ़ोडिल!
आज मैं खड़ा था लंदन की एक फ्लोरिस्ट शॉप पर
वहाँ तुम्हारी पहली आमद डिस्प्ले विंडो में लगी थी
शॉप में आए लोग तुम पर ही नज़रें गाड़े थे
जब कि फूल तो वहाँ एक से बढ़ के एक कई सारे थे
डैफ़ोडिल! !
तुमने जंगलों में खिलकर जादू सा बिखेर दिया
सर्दी की ठिठुरन में, बसंत की आहट को बता दिया
बेशक तुममें सुगंध नहीं, न ही अन्य फूलों सी सुंदरता
फिर भी यहाँ के कवियों का रहा है तुमसे रिश्ता गहरा
वर्ड्सवर्थ से लेकर ब्रिटेन के कई सारे नामचीन कवि,
तुममें ढूँढते रहे हैं जो उन्हें अन्य फूलों नहीं दिखता
भारत के स्कूल में हम जब पढ़ते थे समझ ही नहीं पाते थे
बाक़ी सारे फूलों को छोड़ कर इन कवियों ने क्यों तुम्हें चुना
डैफ़ोडिल! !
तुम वीराने में जादू सा जगा देते हो,
सर्दी की ठिठुरन में, बसंत की आशा दिखा देते हो
बेशक न है महक, न ग्लैमर किसी और की सी
कवियों के दिलों में बस तुम्हारी यही बात छू दी
भारत में कवियों ने की है चम्पा, चमेली की महक की चर्चा
गुलाब, कमल जैसे फूलों के रंग और सौंदर्य का गान
यूरोप में भीषण ठंड से अधिकांश पेड़ बन जाते हैं जब निर्वस्त्र
वहाँ तुम्हारे खिलना बताता है कोई खड़ा हो रहा है सीना तान
डैफ़ोडिल! !
तेज हवा के साथ झूमते सहज कहते हो तुम –
मैं उग चुका हूँ रंग भरने के लिए, घर बैठ के दुखी मत हो तुम
डैफ़ोडिल!
तुम अदना सा फूल नहीं, उम्मीद का प्रतीक हो
प्रचंड ताकतों के आगे जो झुके नहीं, वह उत्तर बड़ा सटीक हो
कुछ लोग इतर परिवेश में रह के यह बात नहीं समझ पाते हैं
कि ठंडे इलाकों के कवियों को तुम्हारे जैसे क्यों पसंद आते हैं…
मानो डैफ़ोडिल आप से कहना चाहता है :
दूसरे देश या समाज को अपने तराजू में तौल के मत देखो
अपनी जाति, धर्म या रंग से परे दुनिया को समझ के देखो

वाह गुप्ता जी सुंदर विषय और बेहतरीन शिल्प है कविता में ।
Dr Prabha mishra
*प्रदीप गुप्ता की कविता – डैफ़ोडिल*
आदरणीय प्रदीप सर!
अच्छी कविता है आपकी।हर पौधाअपनी भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप पल्लवित होता है। वैसे तो कविता अच्छी है लेकिन इसका आखिरी पद हमें अधिक महत्वपूर्ण लगा।
*डैफ़ोडिल!*
*तुम अदना सा फूल नहीं,उम्मीद का प्रतीक हो*
*प्रचंड ताकतों के आगे जो झुके नहीं, वह उत्तर बड़ा सटीक हो*
*कुछ लोग इतर परिवेश में रह के यह बात नहीं समझ पाते हैं*
*कि ठंडे इलाकों के कवियों को तुम्हारे जैसे क्यों पसंद आते हैं*
*मानो डैफ़ोडिल आप से कहना चाहता है*
*दूसरे देश या समाज को अपने तराजू में तौल के मत देखो*
*अपनी जाति, धर्म या रंग से परे दुनिया को समझ के देखो।*
अंतिम दो पंक्तियाँ अधिक अर्थपूर्ण है कि जो व्यक्ति जिस परिवेश में रहता है उसे अपने जाति धर्म और रंग को तो देखना चाहिए किंतु दूसरों को अपने से तौलने की अपेक्षा समझने की कोशिश करनी चाहिये ।
बेहतरीन कविता के लिए आपको बहुत-बहुत बधाइयाँ।