Wednesday, February 11, 2026
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समीर उपाध्याय की लघुकथा – घर

घर-काम करने वाली रमाबाई ने अग्रवाल जी से कहा-“बाबूजी,क्या मैं आपसे एक बात पूछ सकती हूं?”
अग्रवाल जी ने कहा-“अरे, पूछो ना।”
रमाबाई-“बाबूजी,शहर में बेटे का बड़ा बंगला होने के बावजूद गांव के इस पुराने और जर्जरित घर में बार-बार आकर रूकने का आपका मन क्यों करता है?”
अग्रवाल जी-“शहर में बड़ा बंगला है।नौकर-चाकर सब कुछ है। लेकिन बेटा और बहू दोनों नौकरी करते हैं। सुबह निकल जाते हैं और शाम को लौटते हैं।बच्चें
दिनभर पढ़ाई में व्यस्त रहते हैं।आज की व्यस्त जीवन-शैली में किसी के पास समय ही कहां है बुजुर्गों के साथ बातचीत करने का! सबकुछ होने के बावजूद अकेलापन महसूस होता है।”
रमाबाई-“बाबूजी, अकेलापन तो यहां भी आपको लगता होगा?”
अग्रवाल जी-“नहीं,इस घर में मैं बड़ा हुआ हूं। मेरे जीवन की सारी स्मृतियां इस घर के साथ जुड़ी हुई हैं। मेरे जीवन के सुख-दु:ख के सभी प्रसंगों का यह घर साक्षी है।भले ही पुराना और जर्जरित हो,यह घर मुझे अपना लगता है। पुरानी स्मृतियों को याद करके समय व्यतीत हो जाता है।”
रमाबाई-“लेकिन यहां कोई सुविधाएं तो हैं नहीं।”
अग्रवाल जी-“देखो बेटी, सुविधाओं से घर नहीं बनता। सुविधाओं से मकान बनता है और भावनाओं से घर बनता है।घर एक जज्ब़ा होता है।घर तो एक भावना होती है। घर तो अपनेपन का एहसास होता है।इसे पैसों से खरीदा नहीं जा सकता।मैं उस एहसास की कमी-पूर्ति के लिए यहां आकर रूकता हूं।”
अग्रवाल जी की बात सुनकर रमाबाई गहरी सोच में पड़ गई।
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