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अशोक वर्मा की लघुकथा – छींक

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होटल में सामान रखते ही मैंने अपने क्लास-फेलो संगम को अपने मुंबई पहुँचने की सूचना दी तो वह बहुत खुश हुआ। यह वही संगम कुमार है जो क्लास और इम्तिहान में नकल के लिए मेरी मिन्नतें किया करता था। आज वह फ़िल्म इंडस्ट्री का एक चर्चित सुपर स्टार है। 
सुपर-स्टार होते हुए भी वह यारों का यार है। उसने अपनी मर्सडीज़ कार भेजकर मुझे शूटिंग देखने के लिए बुलाया है। में स्टूडियो पहुँच गया हूँ। स्टूडियो में बनाया गया जंगल का सीन अद्भुत लग रहा है। नृत्य निर्देशक नर्तकों और नायिका को सीन समझा रहा है। 
तभी उसने गले में लटकी सीटी बजा दी है। लाइट, कैमरा ऑन हो गए हैं। तेज़ संगीत के साथ गीत बजते ही नायिका और नर्तकों ने अपनी मादक अदाओं के साथ थिरकना शुरू कर दिया है। नृत्य निर्देशक की दूसरी सीटी सुनकर संगम कुमार कैमरे के सामने पहुँच गया है। वह दो मिनट तक नर्तकों और नायिका को देखता है। फिर अपना दायाँ हाथ उठाकर लौट आता है। 
अब हम रेस्ट-रूम में आ गए हैं। सेवादार ने बीयर के दो गिलास हमारे सामने रख दिये हैं। वह तौलिए से संगम कुमार के माथे का पसीना पोंछ रहा है। गिलास उठाते हुए मैंने कहा– “यार संगम, ये डांसर्स इतनी देर से गाने पर डांस कर रही हैं और तुमने दो मिनट के लिए हाथ को हिलाया-भर है?” 
मेरी बात सुनकर संगम कुमार बड़े मोहक अन्दाज़ में कहता है,  “तुम्हारा दोस्त एक सुपर-स्टार है अरुण। हमारे जैसे चर्चित कलाकार अगर छींक भी दें तो आम लोग उसे हमारी अदा समझकर दिल थाम लेते हैं।” उसकी बात सुनकर मेज़ पर रखी नमकीन की मिर्च से मुझे लगातार कई छींकें आती हैं। जैसे ही छींकों का सिलसिला रुकता है, मैं देखता हूँ कि संगम कुमार अगले शॉट के लिए उठकर जा चुका है।

2 टिप्पणी

  1. लघुकथाएँ घर और छींक यथार्थवादी रचनाएँ हैं।
    कोई भी बुजुर्ग अपने पुश्तैनी घर से दूर रहना नहीं चाहता।

    सुपर स्टार्स के नखरे और असर अपार हैं।

    दोनों लेखकों को हार्दिक बधाई।

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