यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्‍य है कि जब किसी महिला को बार बार उम्र का अहसास कराया जायेगा तो वह अपने आप थोड़े दिनों बाद बूढ़ी दिखने लगती है। कारण? लग़ातार मानसिक दबाव और एक प्रकार से मानसिक यंत्रणा भी। हमारे यहां महिलाओं का दुर्भाग्‍य है कि उनके रहन-सहन के तरीके पुरुष ही तय करते हैं। इस मामले में नारी का पत्‍नी रूप सबसे अधिक शिकार बनता है। पति पत्‍नी को तो सात पर्दे में रखना चाहते हैं लेकिन पर-नारी का खुलापन खूब रास आता है।

महिलाओं के जीवन में उनका पचास वर्ष का होना बहुत मायने रखता है। आमतौर पर जो महिलाएं नौकरी नहीं करतीं, उनके साथ यह समस्‍या होती है कि घर के लोग उन्‍हें बार-बार ‘पचास वर्ष की हो गईं अब तो’ कह-कहकर असमय ही मानसिक रूप से बूढ़ा बना देते हैं। हां, यह बात अलग है कि जब वे पचास वर्षीय महिलाएं काम करें तो उनमें फुर्ती सोलहसाला जैसी हो। जब उन पर कुछ खर्च करने की नौबत आये तो उन्‍हें उनके उम्र के पड़ाव से अवगत करा दिया जाये। कुछ लोग यह अनाधिकार चेष्‍टा अपने लिजलिजे हाथों में ले लेते हैं कि महिलाओं को क्‍या पहनना चाहिये, क्‍या खाना चाहिये, किसके साथ उठना-बैठना चाहिये।  

यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्‍य है कि जब किसी महिला को बार बार उम्र का अहसास कराया जायेगा तो वह अपने आप थोड़े दिनों बाद बूढ़ी दिखने लगती है। कारण? लग़ातार मानसिक दबाव और एक प्रकार से मानसिक यंत्रणा भी। हमारे यहां महिलाओं का दुर्भाग्‍य है कि उनके रहन-सहन के तरीके पुरुष ही तय करते हैं। इस मामले में नारी का पत्‍नी रूप सबसे अधिक शिकार बनता है। पति पत्‍नी को तो सात पर्दे में रखना चाहते हैं लेकिन पर-नारी का खुलापन खूब रास आता है।  

बड़े शहरों में कुछ मात्रा में महिलाओं ने अपने को पहनने-ओढ़ने के मामले में ज़रूर आज़ाद तबियत का किया है, पर ‘लोग क्‍या कहेंगे’ वाली उक्‍ति उनके मन में उथल-पुथल मचाती रहती है। परिणामस्‍वरूप, वे पूरी तरह से आधुनिक भी नहीं बन पातीं और लोगों के कहने की चिंता उनकी चाल में दिखाई देती है। महिलाओं को यह समझना होगा कि पचासवां वर्ष याने ज़िन्‍दगी की दूसरी पारी की शुरूआत। इसके पहले वे बच्‍चों की परवरिश में व्‍यस्‍त होती हैं और अपनी ओर अपेक्षित ध्‍यान नहीं दे पातीं। वे अपने पहनावे व रहन-सहन के लिये अपनी बुद्धि का इस्‍तेमाल नहीं कर पातीं…पति ने जैसा नचा दिया, नाच लिये।

आख़िर उन्‍हें भी तो सजने, संवरने, खुद को मेंटेन करने की इच्‍छा होती होगी। युवावस्‍था में शायद उस समय ये अपेक्षाएं उनकी प्रमुखता में नहीं होतीं। बच्‍चे और परिवार प्रमुख रहते हैं। पचास तक आते आते ये पारिवारिक ज़िम्‍मेदारियां ख़त्‍म तो नहीं, पर कुछ कम ज़रूर हो जाती हैं और तब वे अपनी ओर निहारती हैं तो पाती हैं कि बेसमय मुंह पर झुर्रियां आ गई हैं। तब वे परेशान होती हैं। मुझे लगता है कि परेशान होने के बजाय वे खुद को व्‍यवस्‍थित करने पर ध्‍यान दें। इसीसे संबंधित आपके साथ एक अनुभव पर ग़ौर कीजिये

लंदन में रास्‍ते पर छोटे छोटे ब्‍यूटी पार्लर होते हैं। वहां नेल पॉलिश लगाने, पेडिक्‍योर आदि के कार्य करते हैं। वहां नेल पॉलिश रखी रहती हैं। आप अपने पसंद का रंग लेकर लगवा सकती हैं। सोचा कि यह अनुभव लिया जाये। उस पार्लर में गई। अपनी पसंद की नेल पॉलिश ली और अंदर जाकर बैठ गई। सामने एक क़रीब सत्‍तर वर्षीय महिला अपने हाथों और पैरों पर शोख़ लाल रंग की नेल पॉलिश लगवा रही थी। उस समय उनके चेहरे पर जो ताज़गी दिख रही थी, उसे सिर्फ़ महसूस किया जा सकता था। वहां महिलाएं मेकअप करती हैं और उतने ही शौक से करती हैं जैसे रोज़ कपड़े बदलती हैं। वहां मेकअप का सामान खूब बिकता है। 

मैंने भी शोख़ रंग की नेल पॉलिश लगवाई और अचानक लगा कि मेरी उंगलियां जवान हो गई हैं। खुद को बूढ़ा न समझें। उम्र के इस पड़ाव को स्‍वीकार करें और वह भी सकारात्‍मकता के साथ। मस्‍त रहें। देखिये ज़रा यह करके। आपको ही अपने अंदर फर्क़ महसूस होगा। पचास वर्ष के अनुभव महिला को परिपक्‍व बनाते हैं। सकारात्‍मक सोच महिलाओं को इस पड़ाव पर भी सदाबहार बनाये रखेगी। 

हां, इस बात का ध्‍यान ज़रूर रहे कि कपड़ों की डिज़ाइन व रंगों का चयन उम्र के अनुसार हो। याद आता है कि एक महिला खूब गोरी थी और उसने चटक लाल रंग की चुनरी की साड़ी पहनी थी वह लाल रंग ऐसा लग रहा था मानो उसके शरीर को चीरकर बाहर आ जायेगा। एक बार उसके बेटे को अपनी मां को कहना पड़ा, ममा, आप ये रंग मत पहना करो..कुछ ज्‍य़ादा ही चटकीला है। महिलाएं खूब फैशन करें, बस फूहड़ता न दिखे, उस पहनावे में और मेकअप में। भव्‍य दिखें…भड़कीले नहीं।

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