संपादकीय : अभिव्यक्ति की आज़ादी का अर्थ आपत्तिजनक भाषा और हिंसा नहीं है 3
जब पागलपन हद से बाहर हो जाता है तो अंकित शर्मा की हत्या हो जाती है; हैड कांस्टेबल रतन लाल को जान से मार दिया जाता है; बी.एस.एफ़ के जवान अनीस का घर जला दिया जाता है; पेट्रोल पंप और दुकानें आग की भेंट चढ़ जाती हैं। आम आदमी का जीवन तहस-नहस हो जाता है। लोगों की रोज़ी रोटी बन्द हो जाती है। स्कूल जल जाते हैं। विद्यार्थी दहशत में जीने लगते हैं… मगर वो राजनीतिज्ञ मज़े से एअर-कंडीशन घरों में और टीवी स्टूडियो में अपनी बकवास जारी रखते हैं।

भारतीय संसद में सी.ए.ए. पारित होने के बाद से विपक्ष पूरी तरह से मोदी सरकार को सड़कों पर घेरने में व्यस्त हो गया। सोनिया गान्धी, प्रियंका गान्धी, राहुल गान्धी, मणिशंकर अय्यर, चिदम्बरम, इशरत जहां, वारिस पठान, ओवैसी और ममता बनर्जी जैसे नेताओं ने भड़काऊ भाषणों के ज़रिये भारत में जगह जगह शाहीन बाग़ पैदा करने के प्रयास किये।

पिछले चुनावों में भाजपा के नेताओं में अनुराग ठाकुर, प्रवेश वर्मा, कपिल मिश्रा और गिरिराज सिंह आदि ने भी पूरी तरह आग में घी डालने का काम किया। 

एक तरफ़ जिन्ना वाली आज़ादी; कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटाने के खिलाफ और तीन तलाक़ पर नारे लग रहे थे और शरजील इमाम असम को भारत से काटने के बयान जारी कर रहा था, तो वहीं दूसरी ओर गृह मंत्री ईवीएम के बटन से शाहीन बाग़ में करन्ट भेज रहे थे।

जब राजनीतिक बहस का स्तर इतना गिर जाएगा और राजनीतिज्ञों का ध्येय जनता को भड़काना बन जाएगा तो आप कैसे अपेक्षा रख सकते हैं कि जनता भड़केगी नहीं। 

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ताहिर हुसैन (बाएँ) और उसके घर से बरामद पेट्रोल बम (दाएं)

मगर कोई इस मुग़ालते में ना रहे कि दिल्ली के दंगे, अचानक भड़की हिंसा थी। इसके पीछे एक पूरी प्लानिंग थी। सब योजनाबद्ध तरीके से किया गया। जो असलाह ताहिर हुसैन के घर से बरामद हुए, इससे तो लगता है कि सोनिया गान्धी के आदेशानुसार आरपार की लड़ाई की पूरी तैयारी थी। 

जब पागलपन हद से बाहर हो जाता है तो अंकित शर्मा की हत्या हो जाती है; हैड कांस्टेबल रतन लाल को जान से मार दिया जाता है; बी.एस.एफ़ के जवान अनीस का घर जला दिया जाता है; पेट्रोल पंप और दुकानें आग की भेंट चढ़ जाती हैं। आम आदमी का जीवन तहस-नहस हो जाता है। लोगों की रोज़ी रोटी बन्द हो जाती है। स्कूल जल जाते हैं। विद्यार्थी दहशत में जीने लगते हैं… मगर वो राजनीतिज्ञ मज़े से एअर-कंडीशन घरों में और टीवी स्टूडियो में अपनी बकवास जारी रखते हैं। 

एक अजीब सी बात यह है कि अज्ञात लोगों ने हत्याएं कीं, पेट्रोल पम्प जलाया, पत्थरबाज़ी की, हिंसा फैलाई – आख़िर इन अज्ञात लोगों की पहचान कब होगी। इन दंगों में अब तक 43 लोगों की मृत्यु हो चुकी है। आख़िर यह सी.ए.ए. और एन. आर. सी. की लड़ाई को हिन्दू मुस्लिम लड़ाई में बदलने की ज़िम्मेदारी किनके सिर रहेगी। मोदी सरकार का विरोध करते-करते कब लोग देश के विरुद्ध काम करने लगते हैं, उन्हें इस बात का भान भी नहीं हो पाता। 

इन हालात में भी ऐसे कई उदाहरण सामने आये जब हिन्दुओं और सिखों ने मुसलमान पड़ोसियों को बचाया और मुसलमान पड़ोसियों ने हिन्दुओं को बचाया। दोनों फ़िरकों ने मंदिर और मस्जिदों को भी जलने से बचाया और अपने मित्रों के घरों को भी। इससे लगता है कि अभी सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ है। आशा की किरण अभी बाक़ी है। 

सरकारें आएंगी, सरकारें जाएंगी। भारतीय संविधान में एक सौ से अधिक संशोधन किये जा चुके हैं और अभी ना जाने कितने और संशोधन होंगे। मगर विरोध करने के अपने हक़ का इस्तेमाल करते समय हमें देखना होगा कि हम उस हक़ का इस्तेमाल करते हुए आम जनता के जीवन को अस्त-व्यस्त ना करें।

आम जनता को भड़काने में टीवी चैनलों पर होने वाली डिबेट भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। एन.डी.टी.वी. एकतरफ़ा ख़बरें दिखाता है तो रिपब्लिक टीवी दूसरी तरफ़ की। अधिकांश चैनलों में आने वाले तथाकथित एक्सपर्ट चिल्ला-चिल्ला कर अपनी बात कहते हैं और अपने-अपने सुनने वालों को भड़काने में कोई कसर नहीं छोड़ते। कुछ समय के लिये इन बहसों पर नियन्त्रण रखना ज़रूरी है। कोई ऐसा वॉचडॉग नियुक्त किया जाए जो इन बहसों के विषय और भाषा पर कंट्रोल कर सके।

इस समय ज़रूरत है हालात पर मरहम लगाने की। इन हालात में ग़ैर-ज़िम्मेदार बयान देकर स्थिति को और ख़राब ना किया जाए। हर राजनीतिक दल और नेता को आत्म-मंथन की आवश्यकता है। सबको सोचना होगा कि हमारे लिये अपनी राजनीति अधिक महत्वपूर्ण है, अपना दल अधिक महत्वपूर्ण है या फिर देश। जब हम सब अपने देश को सर्वोपरि मानना शुरू करेंगे तभी इन समस्याओं का हल भी मिलेगा।

तेजेंद्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

4 टिप्पणी

  1. आपका समसामयिक और सार्थक संपादकीय पढ़ा। राजनीति में उपद्रवियों ने एक अजीब सा मकड़जाल बिछा रखा है जिसके तहत वे अपनी कारग़ुजारियों को अंजाम देते हैं और सफल भी हो जाते हैं क्‍योंकि दिल्‍ली सरकार बहुत ढीली है। पता नहीं वह किस समय का इंतज़ार कर रही है। यदि केन्‍द्र सरकार को ही सारे काम करने हैं तो राज्‍य सरकार की क्‍या ज़रूरत है।

  2. सत्य कटाक्ष…सही कहा आपने, लोग मरें या जियें इन नेताओं को इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता बस इनकी राजनीति चलती रहनी चाहिए। क़ाश! इनका घर जला होता, इनका कोई मरा होता, इनका नुक़सान हुआ होता तब इन्हें समझ में आता। पर ऐसा हुआ नहीं तो इन्हें दूसरों के दर्द का एहसास कहाँ से होगा। वाह रे राजनीति..,

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